Book Title: Dash Vaikalika Sutra
Author(s): Hastimalji Aacharya
Publisher: Samyaggyan Pracharak Mandal

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Page 15
________________ प्रथम अध्ययन हिन्दी पद्यानुवाद हम अपनायेंगे वृत्ति वही, जिससे न कोई पीड़ा पावे । यथा गृहीकृत भोजन पर, फूलों पर भँवरा ज्यों जावे ।। अन्वयार्थ-वयं च = और हम । वित्तिं = ऐसी वृत्ति । लब्भामो = प्राप्त करेंगे, जिसमें छोटा बड़ा । न य कोइ उवहम्मइ = कोई भी जीव कष्ट प्राप्त नहीं करे । पुप्फेसु = फूलों पर । भमरा = भँवरे । जहा = जैसे । रीयंते = जाते हैं। अहागडेसु = वैसे ही हम गृहस्थों के द्वारा, उनके निज के लिये बनाये गये भोजन में से थोड़ा-थोड़ा लेकर विचरण करते रहेंगे। भावार्थ-शिष्य गुरुदेव के चरणों में यह प्रतिज्ञा करते हैं कि जिस प्रकार भँवरा फूलों से रस लेने में किसी को कष्ट न है हम भी वही रीति अपनायेंगे, जिससे कि किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो । फूलों पर भँवरों की तरह, गृहस्थ के यहाँ अपने खाने के लिये बनाये गये आहार में से ही थोड़ा-थोड़ा हम ग्रहण करेंगे। महुगार-समा बुद्धा, जे भवंति अणिस्सिया। नाणापिंडरया दंता, तेण वुच्चंति साहुणो ।। त्ति बेमि ।।5।। हिन्दी पद्यानुवाद मधुकर सम जो प्रज्ञाधारी, आश्रय(ण) रहित चल पाते हैं। विध-विध पिंडों में रमण करे, वे दान्त श्रमण कहलाते हैं।। अन्वयार्थ-महुगार-समा = भँवरे के समान । जे बुद्धा = जो ज्ञानवान् और । दंता = जितेन्द्रिय तथा। अणिस्सिया = कल. जाति के प्रतिबन्ध से रहित वे। नाणापिंडरया = अनेक घरों से थोडा-थोडा प्रासुक आहार लेने वाले । भवंति = होते हैं । तेण = इसलिये वे । साहुणो = साधु । वुच्चंति = कहे जाते हैं । त्ति बेमि = ऐसा मैं कहता हूँ। भावार्थ-जैन श्रमण भ्रमरवृत्ति वाले होते हैं। तत्त्वों के ज्ञाता वे भ्रमर के समान किसी एक कुल, जाति या व्यक्ति के आश्रित नहीं होकर अनेक घरों से थोडा-थोडा सरस-नीरस नाना प्रकार का निर्दोष व प्रासक आहार-पानी लेकर संयम पूर्वक जितेन्द्रिय बनकर रहते हैं, इसलिये ही वे साध कहलाते हैं। ऐसा निर्दोष, प्रासुक आहार यदि कभी न भी मिले तब भी वे सन्तुष्ट व समभावी रहते हैं। लाभालाभ में सन्तुष्ट रहना ही सन्तों का स्वभाव है। त्ति बेमि = (इति ब्रवीमि) ऐसा मैं कहता हूँ। ।। प्रथम अध्ययन समाप्त ।। 82888888888880

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