Book Title: Putra Dharm
Author(s): Durlabh V Shyam Dhruvsut
Publisher: Durlabh V Shyam Dhruv and Sons

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Page 22
________________ पारी मतिनलीधे । पेली रेवापी आयुज्य,धन, धान्य, पुत्र,पती परिवार,यशःअने ईपर. कृपाए जन्मदातानी सेवायी पाप्त करी शकाय छे एम आप्त पुरुषो कही गया छ; अने एवं माचरण राम, परशुराम, श्रवणादि आचरी पोतानां नामो मा जगत्पीउपर अमर करी गया छे. ए बधी वात तुं सारी पेठे जाणे छ; छतां तारा दुर्भाग्यने लीधे, तने एमांगें थोड़े पण सारं रखतुं नथी ए तारी मति आ संसारना स्वार्थिक दुगंधथी केवी दूषित थयेली छे तेनो तुं विचार कर. तुं पशुपक्षीओना जीवित भणी जो. वे मल्पसमय जेटलुज माबापतरफ, रक्षण मेळवी शके छे. मने एम भासे के के एवा जन्मनुं कारण तेमणे पूर्व माबापनी सेवा नहि करी होय वे छे. तुं पण आ तक जो चूक्यो तो जरुर ते योनिमा पडवानो. हे मायावश जीव! तुं तारा स्वार्थने माटे केवडो मोटो प्रयास करे छ ? मोडो व्हेलो आवी टाढू शीळू केवो खाई ले छे ? स्वार्थ साधवानी घडतर घडवा माटे रात्रिये केवा प्रकारना उजागरा करे छे? बैरीनो एक बदामनी किम्मतनो बोल साचववा केटली बधी उथलपाथल करी नखे छे? तुं पुत्र पुत्रीने रीझववा केटटुंब, साहस खेडे छ ? स्पारे मातापिताने थोडी पण विश्रान्ति आपवा सारु, तने जरा पण समय नथी मळतो? आते कलियुगनी बलिहारी छे के तारा पोताना भाग्यनी ? सारं, नरसुं जोवा जाणवानी शक्ति बने इश्वरे मापी छे तेनो उपयोग तुं जेटलो नरसा काममा करे छे वेटलो सारा काममा नथी करतो ए तारे माटे मने घणुं आश्चर्य उपजे छ। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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