Book Title: Kasaya Pahuda Sutta
Author(s): Hiralal Jain
Publisher: Veer Shasan Sangh Calcutta

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Page 958
________________ कसाय पाहुड सुत्त [ १५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार १०६३. एत्तो ताब दो मूलगाहाओ थवणिज्जाओ । १०६४. किट्टीवेद गस्स ताव परूवणा कायव्वा । १०६५ तं जहा । १०६६. किट्टीणं पढमसमयवेदगस्स संजलणाणं द्विदिसंतकम्ममट्ठे वस्साणि । १०६७. तिन्हं घादिकम्माणं ठिदिसंतकम्मं संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । १०६८. णामा- गोद-वेदणीयाणं द्विदिसंतकम्ममसंखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । १०६९. संजलणाणं द्विदिबंधो चत्तारि मासा | १०७०. सेसाणं कम्माणं द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि | १०७१. किट्टीणं पढमसमयवेदगप्पहूडि मोहणीयस्स अणुभागाणमणुसमयोवट्टणा । १०७२. पढमसमय किट्टी वेगस्स कोह किट्टी उदये उक्कस्सिया बहुगी । १०७३. बंधे उक्कस्सिया अनंतगुणहीणा । १०७४ विदियसमये उदये उक्कस्सिया अनंतचूर्णिसू० ० - अब इससे आगे अर्थात् नवमी मूलगाथाके पश्चात् क्रमागत एवं कथन करने योग्य दो मूलगाथाएँ स्थापनीय हैं, अर्थात् उनकी समुत्कीर्तना स्थगित की जाती है । ( क्योंकि, उनका अर्थ सरलता से समझने के लिए कुछ अन्य कथन आवश्यक है | ) अतएव पहले कृष्टिवेदककी प्ररूपणा करनी चाहिए । वह इस प्रकार है - कृष्टियोके प्रथम समयमें वेदन करनेवाले क्षपकके चारों संज्वलन कपायोंका स्थितिसत्त्व आठ वर्प है । शेष तीन घातिया कर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातसहस्र वर्ष है । नाम, गोत्र और वेदनीय, इन तीन अघातिया कर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यात सहस्र वर्ष है । चारों संज्वलनोका स्थितिबन्ध चार मास है । शेष कर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यात सहस्र वर्ष है ॥ १०६३- १०७०॥ 1 चूर्णिसू० - कृष्टियों के प्रथमसमयवर्ती वेदक होनेके कालसे लेकर कृष्टिवेदक क्षपकके मोहनीय कर्मके अनुभागोकी प्रतिसमय अपवर्तना होती है ॥ १०७१ ॥ विशेषार्थ - इससे पूर्व अर्थात् अश्वकर्णकरणकालमें और कृष्टिकरणकालमें अन्तमुहूर्तमात्र उत्कीर्णनाकालप्रतिबद्ध अनुभागघात संज्वलनप्रकृतियोका अश्वकर्णकरण के आकार से हो रहा था, किन्तु वह इस समय अर्थात् कृष्टिवेदकके प्रथम समयसे लेकर आगे प्रति समय अनन्तगुणहानिरूपसे प्रवृत्त होता है । इसका अभिप्राय यह है कि कृष्टिकरणकालमें मोहनीय के चारों संज्वलनकषायोंका जो अनुभाग संग्रहकृष्टिके रूपसे बारह भेदोमें विभक्त किया था, उसकी एक-एक संग्रह-कृष्टिके अग्रकृष्टिसे लगाकर असंख्यातवें भाग समयप्रबद्धो के अनुभागको छोड़कर शेष अनुभागकी समय-समय में अनन्तगुणहानिके रूपमे अपवर्तना होने लगती है । किन्तु ज्ञानावरणादि शेष कर्मोंका पूर्वोक्त क्रमसे ही अन्तर्मुहूर्त प्रमित अनुभागघात होता है । तथा उसी पूर्वोक्त क्रमसे ही सभी कर्मोंका स्थितिघात जारी रहता है, उसमें कोई भेद नहीं पड़ता है । चूर्णिसू० - प्रथमसमयवर्ती कृष्टिवेदकके अनन्त मध्यम कृष्टियोमेंसे जो क्रोधकृष्टि उदय में उत्कृष्ट अर्थात् सर्वोपरिमरूपसे प्रवेश कर रही है वह तीव्र अनुभागवाली है । परन्तु बन्धको प्राप्त होनेवाली उत्कृष्ट क्रोधकृष्टि अनन्तगुणी हीन अनुभागवाली है । द्वितीय समयमें उदयमें प्रवेश करनेवाली उत्कृष्ट क्रोधकृष्टि अनन्तगुणी हीन अनुभागवाली है, तथा बन्धको प्राप्त ८५०

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