Book Title: Kasaya Pahuda Sutta
Author(s): Hiralal Jain
Publisher: Veer Shasan Sangh Calcutta

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Page 984
________________ ८७६ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार उदयो । जासिं पयडीणं खओवसमो ण गदो, तासि पयडीणं सव्वधादि-उदयो । प्रकृतियोंका देशघाति-अनुभागोदय होता है। तथा जिन प्रकृतियोका क्षयोपशम प्राप्त नहीं हुआ है, उन प्रकृतियोका सर्वघाति-अनुभागोदय होता है ॥ १३७२-१३७५॥ विशेषार्थ-मतिज्ञानावरणीय आदि कर्मोंके क्षयोपशमविशेषको लब्धि कहते है । क्षयोपशमशक्तिके प्राप्त न होनेको अलब्धि कहते है । क्षपकश्रेणीपर चढ़ने के समय जिसके मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरणकर्मका सर्वोत्कृष्ट क्षयोपशम प्राप्त है, अर्थात् जो चौदह पूर्वरूप श्रुतज्ञानका धारक है, और कोष्ठबुद्धि, बीजवुद्धि, संभिन्नसंश्रोतृबुद्धि और पदानुसारित्व इन चार मतिज्ञानावरणकर्मोंके क्षयोपशमविशेपसे उत्पन्न होनेवाली ऋद्धि या लब्धियोसे सम्पन्न है, वह नियमसे इन प्रकृतियोंके देशवातिरूप अनुभागका वेदन करता है। किन्तु जिसके कोप्टवुद्धि आदि चार मतिज्ञान-लब्धियाँ प्राप्त नहीं हुई है, और जिसके द्वादशांग श्रुतके अक्षरोमेंसे एक भी अक्षरका क्षयोपशमका होना शेष है, वह इन प्रकृतियोके सर्वघातिरूप अनुभागका वेदन करता है। क्षपकश्रेणीपर चढ़नेवाले जीव दोनो प्रकारके देखे जाते हैं, अतः उनके तदनुसार ही देशघाति-अनुभागका उदय सूत्रकारने 'लब्धि' पदसे और सर्वघाति-अनुभागका उदय 'अलब्धि' पदसे सूचित किया है । इस विवेचनसे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि दशवें गुणस्थानके पूर्व मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण कर्मका सम्पूर्ण या सर्वोत्कृष्ट क्षयोपशम हो भी सकता है और नहीं भी। किन्तु इसके अनन्तर नियमसे दोनों कर्मोंका सम्पूर्ण क्षयोपशम प्राप्त हो जाता है, और तव वह क्षपक चतुरमलवुद्धि-ऋद्धिधारी एवं पूर्ण द्वादशांग श्रुतज्ञानका पारगामी बन जाता है । यहाँ इतना और विशेष जानना चाहिए कि श्रेणीपर चढ़ते समय मति-श्रुतज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम जितना होता है, उससे आगे-आगेके गुणस्थानोंमे उसका क्षयोपशम उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है और इसी कारण उसका मतिज्ञान वा श्रुतज्ञान उत्तरोत्तर विस्तृत एवं विशुद्ध होता जाता है। किन्तु यदि कोई क्षपक एक अक्षरके क्षयोपशमसे हीन सकल श्रुतका धारक होकरके भी क्षपकश्रेणीपर चढ़ना प्रारंभ करता है, तो भी उसके उक्त दोनो कर्मोंके सर्वघाति आवरणरूप अनुभागका उदय दशवें गुणस्थानके अन्त तक पाया जाता है। इसी प्रकार क्षपकश्रेणीपर चढ़ते समय जिनके अवधिज्ञानावरण आदि कर्मोंका क्षयोपशम होगा उनके उसका देशघाति-अनुभागोदय पाया जायगा, अन्यथा सर्वघाति-अनुभागोदय पाया जायगा। दर्शनावरणीयकर्मकी चक्षुदर्शनावरणीय आदि उत्तर प्रकृतियोके क्षयोपशमकी संभवता-असंभवतामें भी यही क्रम जानना चाहिए। क्योकि सभी जीवोमे इन सभी प्रकृतियों के समान क्षयोपशमका नियम नही देखा जाता है। इसी प्रकार अन्तरायकर्मके विपयमें भी जानना चाहिए। अर्थात् जिसके श्रेणी चढ़ते समय अन्त. रायकर्मका सर्वोत्कृष्ट क्षयोपशम हो गया है, और जो उत्कृष्ट मनोवललब्धिसे सम्पन्न है, वह अन्तरायकर्मके देशघाति-अनुभागको वेदन करता है। किन्तु जिसके पूर्ण क्षयोपशम नहीं प्राप्त हुआ है, तो वह उसके सर्वघाति-अनुभागको ही वेदन करता है।

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