Book Title: Jainendra Siddhanta kosha Part 1
Author(s): Jinendra Varni
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 428
________________ उदीर्ण ४१३ उद्देश्यतावच्छेदक अणुमणचित १२८-सा एकेन्द्रिय आहार हो उदीर्ण- १३/४,२,१०,२/३०३/३ फलदानृत्वेन परिणत कर्म पुद्गलस्कन्ध उदीर्ण । -फलदान रूपसे परिणत हुआ कर्म-पुद्गल स्कन्ध उदीर्ण हुआ कहा जाता है। उदगम-१. आहारका एक दोष-दे आहार II/४/१,४,१. बसतिका का एक दोष-दे वसतिका । उहावण-(ध १३/२,४,२२/४६/११) जीवस्य उपद्रवण उद्दावण णाम। -जीवका उपद्रव करना ओदावण कहलाता है। उद्दिष्ट-१ आहारकका औद्देशिक दोष १ दातार अपेक्षा म्. आ /मू ४२५-४२६ देवदपास डट किविण8 चावि जंतु उद्दिसिय क्दमण्णसमुद्दे स चतुविधं वा समासेण ।४२५ जावदिय उद्दसो पासंडोत्ति य हवे समुद्दे सो। समणोत्ति य आदेसो णिग्गंथोत्ति य हवे समादेसो ।४२६ - नाग यक्षादि देवताके लिए, अन्यमती पाखंडियों के लिए. दीनजन कृपणजनों के लिए, उनके नामसे बनाया गया भोजन औहशिक है। अथवा सक्षेपसे समौद्देशिक के कहे जानेवाले चार भेद है ।१२५॥ १-जो कोई आयेगा सबको देगे ऐसे उद्देशसे किया (लगर खोलना) अन्न याचानुद्दे श है; २ पारख डी अन्यलिगीके निमित्तसे बना हुआ अन्न समुद्देश है, ३ तापस परिव्राजक आदिके निमित्त बनाया भोजन आदेश है , ४. निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधुओके निमित्त बनाया गया समादेश दोष सहित है। ये चार औद्देशिकके भेद है। प पु. ४/६१-६७ इत्युक्ते भगवानाह भरतेय न कल्पते । साधूनामीदृशी भिक्षा या तह शसस्कृता ।811 -एक बार भगवान् ऋषभदेव ससंघ अयोध्या नगरीमें पधारे। तब भरत अच्छे-अच्छे भोजन बनवाकर नौ करके हाथ उनके स्थान पर ले गया और भक्ति-पूर्वक भगवानसे प्रार्थना करने लगा कि समस्त सघ उस आहारको ग्रहण करके उसे सन्तुष्ट करें । ११-६४. भरतके ऐसा कहने पर भगवान ने कहा कि हे भरत ' जो भिक्षा मुनियोके उद्देश्य से तैयार की जाती है, वह उनके योग्य नहीं है-मुनिजन उद्दिष्ट भोजन ग्रहण नहीं करते ।। श्रावकोके घर ही भोजनके लिए जाते है और वहाँ प्राप्त हुई निर्दोष भिक्षाको मौनसे खड़े रहकर ग्रहण करते है ।६६-१७) भ, आ/वि ४२१/६१३/८ श्रमणानुद्दिश्य कृतं भक्तादिक उद्दे सिगमित्युच्यते । तच्च षोडशविध आधाकर्मादि विकल्पेन । तत्परिहारो द्वितीय स्थितिकल्प । तथा चोक्त कल्पे--सोलसविधमुद्दे स वज्जेदवति मुरिमचरिमाणं । तित्थगराण' तित्थे ठिदिकप्पो होदि विदिओ हु। -मुनिके उद्देशसे किया हुआ आहार, वसतिका वगैरहको उद्देशिक कहते है। उसके आधाकर्मादिक विकल्पसे सोलह प्रकार है। (देखो आहार II/४ मे १६ उद्गमदोष)। उसका त्याग करना सो द्वितीय स्थिति क्रूप है। कल्प नामक ग्रन्थ अर्थात कल्पसूत्रमे इसका ऐसा वर्णन है--श्री आदिनाथ तीर्थकर और श्री महावीर स्वामी (आदि और अन्तिम तीर्थ करो) के तीर्थ में १६ प्रकार के उहशका परिहार करके आहारादि ग्रहण करना चाहिए, यह दूसरा स्थितिकल्प है। स.सा/ता वृ २८७ आहारग्रहणात्पूर्व तस्य पात्रस्य निमित्त यत्किमप्य शनपानादिक कृत तदोपदेशिक भण्यते । अध कर्मोपदेशिक च पुद्गलमयत्वमेतद् द्रव्य । -आहार ग्रहण करनेसे पूर्व उस पात्रके निमित्तसे जो कुछ भी अशनपानादिक बनाये गये है उन्हे औपदेशिक कहते है। अध कर्म और औपदेशिक ये दोनो ही द्रव्य पुद्गलमयी है। २ पात्रकी अपेक्षा मू. आ ४८५,६२८ पगदा असओ जम्हा तम्हादो दव्वदोत्ति त दव। 'फासगमिदि सिद्ध वि य अप्पट्ठकदं असुद्ध तु ॥४८५ पयण वा पायण वा अणुमणचित्तो ण तत्थ बोहेदि । जेम-तोवि सधादी णवि समणो दिठ्ठि संपण्णो ।१२८१-साधु द्रव्य और भाव दोनोसे प्रासुक द्रव्यका भोजन करे। जिसमें से एकेन्द्रिय जीव निकल गये वह द्रव्य-प्रासुक आहार है। और जो प्रासुक आहार होनेपर भी 'मेरे लिए किया है। ऐसा चिन्तन करे बह भावसे अशुद्ध जानना । चिन्तन नही करना वह भाव-प्रामुक आहार है।४८५। पाक करने में अथवा पाक करानेमें पाँच उपकरणोके (पंचसूनासे) अध कर्म में प्रवृत्त हुआ, और अनुमोदनासे प्रवृत्त जो मुनि उस पचनादिसे नहीं डरता है,वह मुनि भोजन करता हुआ भी आत्मघाती है। न तो मुनि है और न सम्यग्दृष्टि है ।।२८ ३ भावार्थ उद्दिष्ट वास्तव में एक सामान्यार्थ वाची शब्द है इसलिए इसका पृथक्से कोई स्वतन्त्र अर्थ नहीं है। आहारके ४६ दोषों में जो अध कर्मादि १६ उद्गम दोष है वे सब मिलकर एक उद्दिष्ट शब्दके द्वारा कहे जाते हैं। इसलिए 'उद्दिष्ट' नामक क्सिी पृथक् दोषका ग्रहण नहीं किया गया है। तिसमें भी दो विकल्प है-एक दातारकी अपेक्षा उद्दिष्ट और दूसरा पात्रकी अपेक्षा उद्दिष्ट । दातार यदि उपरोक्त १६ दोषोंसे युक्त आहार बनाता है तो वह द्रव्यसे उद्दिष्ट है, और यदि पात्र अपने चित्तमें, अपने लिए बनेका अथवा भोजनके उत्पादन सम्बन्धी किसी प्रकार विकल्प करता है तो वह भावसे उद्दिष्ट है। ऐसा आहार साधुको ग्रहण करना नहीं चाहिए । २ वसतिकाका दोष (भ. आ/वि २३०१४४३/१३) यावन्तो दीनानाथकृपणा आगच्छन्ति लिड गिनो वा, तेषामिमित्यद्दिश्य कृता, पाष डिनामेवेति वा, श्रमणानामेवेति वा, निर्ग्रन्थानामेबेति सा उद्दे सिगा बसदिति भण्यते । 'दीन अनाथ अथवा कृपण आवेगे, अथवा सर्वधर्म स धु बावेगे, क्विा जैनधर्मसे भिन्न ऐसे साधु अथवा निम्रन्थ मुनि आवेगे उन सब जनोको यह वसति होगी' इस उद्देश्य से बॉधी गई वसतिका उद्देशिक दोषसे दृष्ट है। ३ उदिष्ट त्याग प्रतिमा (अ ग श्रा ७/७७) यो अधुराबधुरतुल्यचित्तो, गृहाति भोज्य नवकोटिशुद्ध । उद्दिष्टवर्जी गुणिभि स गीतो, विभीलुक समृति यातुधान्या ७७। जो पुरुष भले-बुरे आहार में समान है चित्त जाका ऐसा जो पुरुष नवकोटिशुद्ध कहिये मन बचनकायकरि करचा नाही कराया नाहीं परे हुएको अनुमोद्या नाही ऐसे आहारको ग्रहण कर है सो उहिष्ट त्यागी गुणवंत निने वह्या है। कैसा है, सो ससार रूपी राक्षसीसे विशेष भयभीत है। * उद्दिष्ट आहारमे अनमति का दोष-दे. अनुमति ३ * उद्दिष्ट त्याग प्रतिमाके भेद रूप क्षुल्लक व ऐलकका निर्देश-दे श्रावक १ * क्षुल्लक व ऐलकका स्वरूप-दे वह वह नाम उद्देश-न्या सू /भा /१/१/२/८/६ नामधेयेन पदार्थ मात्रस्याभिधान मुददेश । -- पदार्थों के नाममात्र थिनको उद्देश कहते है। न्या यदो १/३ विवेक्तव्यनाममात्रकथनम् द्देश ।-विवेचनीय वस्तु के केवल नामोल्लेख करनेको उद्देश कहते है। उद्देशिक-दे. उद्दिष्ट। उद्देश्य-विवक्षित धर्मी। उदेश्यता-उद्देश्य मे रहनेवाला धर्म-जैसे घटमें घटत्व । उद्देश्यतावच्छेदक-एक धर्मीको अन्य धर्मीसे व्यावृत्त करने वाला 'स्व' प्रत्यय युक्त धर्म विशेष । जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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