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॥ सर्वार्थसिद्धिषचनिका पंडित जयचंदजीकृता ॥ नवम अध्याय ॥ पान ७२२ ॥ आचार्यवैयावृत्य इत्यादि कहना । तहां जिनतें व्रतआचरण कीजिये, ते आचार्य हैं जिनतें मोक्षके अर्थि प्राप्त होय शास्त्र पढिये ते उपाध्याय हैं । बहुरि महान उपवास तप करते होय, ते तपस्वी हैं। बहुरि जे शास्त्र पंढनेआदि शिक्षाके अधिकारी ते शैक्ष हैं। बहुरि रोगआदिकरि क्षीण होय, ते ग्लान हैं। बहुरि जे स्थविर मुनिनिकी परिपाटीके होय, ते गण कहिये । बहुरि दीक्षा देनेवाले आचार्यके शिष्य हे कुल कहिये । बहुरि च्यारिप्रकार मुनिनिका समूहकू संघ कहिये । बहुरि घणा कालका र्द सो साधु कहिये । बहुरि जो लोकमान्य होय सो मनोज्ञ कहिये । इनके रोग परिषह मि संबंध आवै तब अपनी कायचेष्टाकरि तथा अन्य द्रव्यकरि तिनका प्रतिकार इलाज करैः वृत्य है। याका फल, जो, वैयावृत्यतै समाधिका तौ धारण होय है, निर्विचिकित्साभ प्रवचनका वात्सल्य होय है इत्यादि जानना । इहां च्यारिप्रकारके मुनिकू संघ कह्या, त अनगार मुनि ए च्यारि जानने । तहां ऋद्धिधारीकू तौ ऋषि कहिये, इन्द्रियकू वश कहिये, अवधिमनःपर्यय ज्ञानीकू मुनि कहिये, सामान्य घरके त्यागी साधु सो अ अथवा यति आर्यिका श्रावक श्राविका ऐसैंभी च्यारिप्रकार संघ है। बहुरि मनोज्ञ:
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