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बारहवाँ भाग । अंक ४-५.
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।
రంజిల్లా
जैनहितैषी ।
BABURAO SUSSED ME
కనికరిస్తూ కనబడు
AAAAAAARA:
सारे ही संघ सनेहके सूतसौं, संयुत हों, न रहे कोउ द्वेषी । प्रेमसौं पालैं स्वधर्म सभी, रहें सत्यके साँचे स्वरूप- गवेषी ॥ वैर विरोध न हो मतभेदतें, हों सबके सब बन्धु शुभैषी । भारत के हित को समझें सब, चाहत है यह जैनहितैषी ॥ J2SEIDSPAÐSTÆÐSYN:
Se
जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर
एक दृष्टि
B
लेखक, श्रीयुत बाबू निहालकरणजी सेठी एम. एस. सी । अनादि है, यह बात
चैत्र वैशाख २४४२. अप्रैल, मई १९१६.
C
जैनधर्म हम लोग बहुत अभिमान के साथ कहते आये हैं; किन्तु जनसाधारण इसका विश्वास नहीं करते थे और न हममें इतनी सामर्थ्य - ही थी कि इसको प्रमाणित कर देते । खैर, हमारे सौभाग्यसे कुछ पाश्चात्य विद्वानोंका प्यान इस ओर गया और उन्होंने प्रमाण ढूँढ निकाले; जिनका परिणाम यह हुआ कि आज सब कोई यह बात मानते हैं कि जैनधर्म वास्तव में बहुत ही प्राचीन और
किन्तु इस पिछले गौरवसे हममें यह भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए कि दूसरे धर्म, और दूसरी जातियाँ जो हमारी अपेक्षा बहुत आधुनिक हैं- इस योग्य ही नहीं कि हम उनसे कुछ सीख सकें। क्योंकि अतीत
* लेखक महाशय इस लेखको पहले इलाहाबाद के लीडर में और अँगरेजी जैनगजटमें प्रकाशित करा चुके हैं ।
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स्वतंत्र धर्म है और यह अनेक शताब्दियोंकी सहयोगिता और अत्याचारों के होने पर भी आज तक जीवित है । इस बात से कौन ऐसा जैनधर्मानुयायी है जिसका हृदय आनंद से परिपूर्ण न हो जावे ।
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जैनहितैषी -
कालमें हम चाहे जो रहे हों, उस समय कि इस लेखमें केवल एक ही बात पर विचार किया जाय । जैनसमाजमें कितने मनुष्य हैं ? वे घट रहे हैं या बढ़ रहे हैं ? घटीके कारण क्या हैं ? क्या उपाय हो सकते हैं कि जिनसे वे कारण दूर किये जा सकें ! इत्यादि प्रश्नोंका ही उत्तर देना इस लेखका उद्देश्य है ।
जैनोंकी संख्या दिन प्रतिदिन घट रही है । यह बात प्रायः सबको ज्ञात है और इसे जान लेनेके लिए अधिक परिश्रमकी भी आवश्यकता नहीं । सन् १९११ की मनुष्यगणनामें उनकी संख्या १२, ४८, १८२ पाई गई थी। कुछ शताब्दियों पहले कहा जाता है कि प्रायः सारा संसार जैनधर्मानुयायी था । खैर, इतनी पुरानी बातसे घट बढ़का अंदाजा करना उचित नहीं; परन्तु सन् १९०१ और १८९१ के अंकों से वर्तमान संख्याको तुलना करना कोई अनुचित बात न होगी ।
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।
?
हमारा ज्ञान, हमारा बल, हमारा ऐश्वर्य चाहे कितना ही अधिक क्यों न रहा हो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि आज हमारी दशा बहुत ही गिरी हुई है-आज हमारी गणना संसारकी उन्नत जातियों में न सही, साधारण जातियोंमें भी नहीं है हमारा नाम लेते ही सबसे पिछड़ी हुई जातियोंका ध्यान आता है । अपने पूर्ववैभवको याद करके तो हमें कुछ लज्जा आजानी चाहिए ! क्या हम उसी जैनधर्मके अनुयी हैं ? क्या उसी जैनजातिकी सन्तान हैं क्या हम इस योग्य हैं कि जैन कहलावें ? उन पिछले दिनोंके ध्यानसे तो हममें यह इच्छा उत्पन्न हेनी चाहिए कि जरा वर्त - मान दशा पर विचार करें और वे उपाय ढूँढें कि जिनसे हम पुनः अपने वास्तविक स्थान पर -- उस उच्च आदर्श पर पहुँच सकें । यही नहीं - यह बात तो ऐसी है कि जिसके कारण हमारे हृदयोंमें ऐसा उत्साह भर जाना चाहिए कि तन मन धनसे ऐसा प्रयत्न करें कि जिसमें हमारी सब त्रुटियाँ दूर हो जायँ, संसारकी जातियों में हमारी भी कुछ पूछ हो ।
इससे स्पष्ट होता है कि १९०१-१९११ में ६.४ प्रतिशत और १८९१-१९०१ में ५.८ प्रतिशत जैन घट गये । किन्तु स्मरण रखना चाहिए कि इन्हीं वर्षों में समस्त भारतवर्षकी जनसंख्या घटी नहीं है वरन् बहुत बढ़ी है । १८९१-१९०१ में ९ प्रतिशत और १९०१-१९११ में गया है ११.८ प्रतिशत ।
कुछ ऐसे ही विचारसे यहाँ जैनोंकी वर्तमान दशाका विचार करने का इरादा किया गया है; किन्तु एक ही लेखमें इस सम्बन्धी सब बातोंका उल्लेख करना सम्भव नहीं, इस कारण यही ठीक समझा
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SAIRATALATALATALAIMAMALTHORITALIMALAYALEBALAMAULIHARIHAR
जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि। 8
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यह तो हुई सारे भारतकी बात-पृथक् अपनेको हिन्दू न लिखवा कर जैन लिखवावे पृथक् प्रदेशोंकी जनसंख्याका ह्रास इससे और सरकारी कर्मचारियोंको भी इस भी अधिक डरावना है। मनुष्यगणनासे विषयकी खास हिदायत थी । इस आन्दोपिछले दस वर्षों में संयुक्त प्रदेशमें सैकड़ा लनकी आवश्यकता यों हुई थी कि पहलेकी पीछे १०. ५ पंजाबमें ६. ४ बम्बईमें मनुष्यगणनाओंमें बहुतसे जैन हिंदुओंमें गिने ८.६ मध्यप्रदेशमें २२ और बडोदेमें १० गये थे और इस कारण जैनोंकी वास्तजैन कम हो गये । ग्वालियर राज्यमें यह विक संख्याका ठीक ठीक अन्दाज नहीं लग घटी सैकड़ा पीछे २६ हो गई है और सकता था । इस ही बातसे स्पष्ट है कि १८९१ खास ग्वालियर नगरके समीप तो १०० और १९०१ में जैनोंकी संख्या रिपोर्टमें मनुष्योंमें केवल ७० ही बच रहे हैं । यदि जितनी लिखी है उससे कहीं अधिक थी; एक एक नगर और ग्रामका हिसाब देखें तो किन्तु १९११ की संख्यामें अधिक अन्तर ऐसे बहुतसे स्थान मिलेंगे जहाँ दशवर्ष या गलती नहीं हो सकती। अतः इसमें कोई पहले सौ कुटुम्ब निवास करते थे और अब सन्देह नहीं कि ऊपर लिखे हुए अंकोंसे केवल २ या ३ ही बाकी बच गये हैं। जैनोंकी जो घटी प्रगट होती है वह ठीक मध्यप्रदेश और मध्यभारतमें ऐसी अनेक नहीं, वास्तवमें वह बहुत अधिक होगी। जैनजातियाँ हैं कि जिनकी जनसंख्या खैर, इस समय कोई उपाय ऐसा नहीं कि सहस्रोंसे घटकर सैकड़ों पर रह गई है जिससे यह गलती सुधार ली जाय और इस
और सैकडोंके स्थानमें अब केवल इन गिने कारण हम इन अंकों ही पर विचार करेंगे। .२-४ मनुष्य ही जिनमें बच रहे हैं।
___ सब बातोंका विचार कर यह जान पड़ता किन्त ये तो वे बातें हैं जो सरकारी बै कि जैनोंकी संख्या प्रतिदशवर्ष में प्रायः मनष्यगणनाकी रिपोर्टोंमें लिखी हैं। यदि एक लाखसे अधिक घट जाती है । यदि हमें जनजातिकी इस घटीका ठीक ठीक यही दशा रही और जैनजातिने अपने इस पता लगाना है तो इन संख्याओं ही पर मरणोन्मख कलेवरकी स्थितिका कोई अच्छा निर्भर न रह कर विचारशक्तिसे भी काम उपाय ढूँढ न निकाला तो प्रायः एक ही शतालेना चाहिए । एक बातका विशेष ध्यान ब्दिमें वह सर्वथा विलुप्त हो जायगी, यह समझ रखना होगा-वह यह कि गत मनुष्य गण- लेना कोई कठिन कार्य नहीं । तिस पर यदि नाके पहले एक बहुत जोरदार आन्दोलन हम यह स्मरण रक्खें कि एक छोटी जातिजैनजातिमें प्रारम्भ हुआ था जिसमें समस्त जिसमें प्रदेशका द्वार बंद हो-बड़ी जातिकी जैनियोंसे यह प्रार्थना की गई थी कि वे अपेक्षा अधिक शीघ्रतासे नाशको प्राप्त होती
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Saammammmmmm mmmm
जैनहितैषी
है- तो यह समय और भी कम हो जायगा। परन्तु हम बहुत बड़ी भूल करेंगे यदि किन्तु इस विचारके द्वारा हमें अपने आशंका- हम यह समझें कि जैनोंको भारतकी औसतपूर्ण भविष्यको अधिक भयानक बनानेकी के अनुसार प्रतिशत ११.८ ही बढ़ना आवश्यकता नहीं।
चाहिए था ! भारतमें प्रत्येक पाँच मनुष्यों
मेंसे चार कृषिसे पेट भरते हैं और भारइस प्रश्नपर हम दूसरे प्रकारसे भी विचार
रतीय कृषकोंकी दशा कैसी है इस भयंकर कर सकते हैं । यह घटी वास्तविक नहीं
दुःखपूर्ण कथाके कहनेका न हमें साहस है। क्योंकि इसके हिसाबमें यह समझा ,
होता है और न वह किसीसे छिपी है । गया है कि भारतकी जनसंख्या बढ़ी नहीं,
' दुर्भिक्षने–प्रति वर्षके दुर्भिक्षने-उन्हें सर्वथा अथवा यों कहिए कि यदि जैनोंकी संख्या
निर्जीव कर रक्खा है और इसके अतिरिक्त १९११ में भी वही होती जो १९०१ में
उनकी निर्धनताके, उनके भूखों मरनेके थी तो उस हिसाबके अनुसार कोई घटी न
अनेक कारण हैं जिन्हें प्रायः सब ही विचारमालूम पड़ती; किन्तु यह ठीक नहीं । क्यों कि जब स्वास्थ्यका सरकारको और जनता..
शील भारतवासी जानते हैं, उनके उल्लेखको अधिक ध्यान होने लगा है, जब शान्ति
- की आवश्यकता नहीं । इतना ही कह देना अधिक अधिक फैल रही है, जब शिक्षा
' बस होगा कि जब लाखों करोड़ों उनमें ऐसे
हैं कि जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि दिनमें का प्रचार उत्तरोत्तर अधिक वेगसे हो रहा है है, जब व्यापार आदिमें दिनों दिन उन्नति ?
र दूसरी बार भोजन करना किसे कहते हैं तो होती जाती है और इस कारण जनताकी
उनकी संख्याकी वृद्धि अधिक कैसे होस
कती है ? अतः यह विचारना सर्वथा युक्तिआर्थिक दशा भी उन्नतिके पथ पर है तो का यह हो नहीं सकता कि जनसंख्या न
संगत जान पड़ता है कि कृषकोंको छोड़
' अन्य भारतवासियोंकी संख्या बहुत अबढ़े-और हम देखते भी हैं कि १९०११९११ तक समस्त भारतवर्षकी जनसंख्या
धिक बढ़ी है। किन्तु सबका औसत लगानेपर सैकड़ा पीछे ११:८ बढ़गई है । क्या ।
या किसानोंकी बुरी दशाके कारण ११.८ जैनोंकी संख्या भी ११.८ प्रति शत न प्रतिशत ही रह गई है। . बढनी चाहिए थी ? किन्तु वे तो ६.५ किन्तु जैनाजति तो अधिकतर व्यापार प्रतिशत घट गये । अतः स्पष्ट है कि जैनों- ही करती है। उस पर अच्छी और बरी की कमी वास्तवमें १८.३ प्रतिशत हुई और फसलका उतना अधिक असर नहीं होता, सो भी जब कि पिछले वर्षों में जो जैन हिन्दू दुर्भिक्षसे भी वह अधिक पीडित नहीं होती, लिखे गये वे हिसाबमें न जोडे जायँ। वह निर्धन और भूखी भी नहीं है । उसकी
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SamamARTAIMIMARITALITIATIOmmamamamamammam
जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि । । aliTETTEERTILITT u lf A ITRINITITITIHITITMPETI
गणना तो भारतवर्षकी सबसे अधिक धनाढ्य पंडितोंको अपने कर्तव्यका ध्यान आवेगा ? जातियोंमें है। मद्यपान और मांसभक्षणकी क्या आधुनिक बाबूमंडल इस जीवन मरणके बुरी आदतोंसे स्वास्थ्यको जो हानि होती प्रश्नको उपेक्षाकी दृष्टिसे देखना छोड़ देगा ? है उससे भी वह मुक्त है । अतः कोई कारण अनाद्रि जैनधर्मका अतीत गौरव, उसके नहीं देख पड़ता कि जिससे जैनोंकी दशा बहुमूल्य सिद्धान्त और जैनजातिकी धनाढ्यभी भारतीय निर्धन कृषकोंकीसी रहे अथवा ता ये सब बाते कुछ भी काम न आवेगी । उन्हें भी उन्हीं कठिनाइयोंका सामना करना इनके द्वारा नाश नहीं रोका जा सकता। पड़े जिनके कारण बेचारे कृषकोंको कालके यदि उनके हृदयोंमें इस पवित्र धर्मकी उन्न. गालमें जाना पड़ता है। कोई कारण नहीं तिके लिए प्रेम और उत्साह बाकी है, यदि कि उनकी संख्याकी वृद्धि केवल औसत उन्हें इस बातका कुछ भी ध्यान है कि उन मात्रही हो और औसतसे बहुत अधिक न हो। महान् आचार्योंकी कृतियाँ और उपदेश इस प्रकार विचार करनेपर हमारी क्षति और संसारमें स्थित रहकर सदा मनुष्योंका कल्याण भी अधिक मालूम होती है और जिस करते रहें, यदि उन्हें कभी यह इच्छा १८.३ प्रतिशतकी घटीसे हम घबडा उठे होती है कि पृथ्वीपरसे जैनजातिका नाम न थे वह वास्तवमें २५ प्रतिशत होकर हमारे मिट जाय, तो समय आगया है कि जब वे रोंगटे खड़े कर देगी; किन्तु इस डरसे इस इस प्रश्नपर विचार कर ऐसे उपायोंका ढूँढना विचारकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि ही अपना परम धर्म समझें कि जिनसे हमारा
मरणोन्मुख जातिको सर्वनाशसे बचाना हमें ह्रास रुक जाय और हम मृत्यके पथसे • अभीष्ट है तो इन बातोंको ध्यानपूर्वक विचा- हटकर पुनः सजीवताकी ओर अग्रसर हो रकर भलीभाँति समझ लेना होगा । दश सकें । मैं दृढतापूर्वक कह सकता हूँ कि इस वर्षमें जैनजातिका चतर्थाश नाश होगया समय मंदिर बनवानेमें, पूजावत आदि कर
और वह भी इस हिसाबसे । यदि पिछली नेमें, और शास्त्रोक्त कठिनसे कठिन तपस्यामनुष्यगणनाओंमें जैनजातिकी संख्या वास्त- ओंके करनेमें उतना धर्म नहीं है जितना विक होती तो न जाने यह घटी कितनी इस नाशको रोकनेके उपाय करनेमें है। हो जाती ! क्या जैनजातिके मुखिया लोग यही नहीं मैं तो यहाँतक कहूँगा कि जो इस ओर ध्यान देंगे ? क्या जैनधर्म पर इस ओर कुछ कार्य कर सकते हैं किन्तु न्योछावर हो जानेकी डींग मारनेवाले सेठ करनेमें आलस्य करते हैं, अथवा शास्त्रोंकी लोगोंकी आँखें खुलेंगी ? क्या भोले भाले आज्ञाओंका मिथ्या बहाना बनाकर उन्नतिके समाजसे आदर सत्कार और भेंटके लोलुपी कार्योंसे पीछे हटते हैं उनकी पूजामें, उनकी
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ATIMILAIMIMAMALIBAIIMALIMHABMMISAMARCOALDA
जैनहितैषी
भक्तिमें, और उनके व्रतोंमें भी उन्हें महान् रीति रिवाज जैनोंको और हिन्दुओंको आपसपापका बंध होता है।
में मिला देते हैं । यह तो बहुत अच्छी ___ इतना जान चुकने पर यह आवश्यक बात है और इससे तो हमें इस बातका होगया है कि अब उन कारणोंपर विचार बहुत अच्छा उदाहरण मिलता है कि किया जाय कि जिनके द्वारा हमारी यह बुरी धार्मिक अन्तर होने पर भी सामाजिक दशा हुई है । सरकारी रिपोर्टोमें निम्न कार्योंमें दो जातियाँ मिल सकती हैं। उनके लिखित ४ कारण लिखे हैं:-- लिए धार्मिक भिन्नता सामाजिक-मिलन १ प्लेग,
असंभव नहीं बनाती । किन्तु यह बात तो २ हिन्दुओंमें मिल जाना,
शताब्दियोंसे चली आई है और ऐसा तो ३ आर्यसमाजी हो जाना, मालूम नहीं होता कि इन पिछले दश वर्षों में ४ नाशमान धर्म ।
ही कोई ऐसी विशेष बात हुई हो कि जिसहम इन पर पृथक् पृथक् विचार करेंगे। के कारण जैनोंने जैनधर्म छोडकर हिन्द
१ प्लेग-पिछले दश वर्षोंमें प्लेगका धर्म ग्रहण कर लिया हो। वरन् जैसा अधिक जोर रहा और उसके कारण बहत- पहले लिखा जा चुका है १९११ में तो से मनुष्योंकी मृत्यु हुई । यह सच है परन्त १९०१ की अपेक्षा अधिक जैन हिन्द न सब ही जातिओंके लिए कोई कारण नहीं लिखे जाकर जैन लिखे गये थे । और यदि कि प्लेगने दूसरी जातियोंकी अपेक्षा जैन यह भी मान लिया जाय कि सामाजिक मेल जातिको ही अपना शिकार बनाना अधिक इन दिनों बढ़ गया है तो भी यह कदापि पसंद किया हो । अधिक संभव तो यह है ठीक नहीं कि इस मेलके कारण लोग कि जैनों पर इस बीमारीका औरोंसे कम अपना धर्म छोड़ देते हों । कमसे कम युक्तअसर हुआ हो; क्योंकि वे अधिक धनवान् प्रान्त और पंजाबमें तो ऐसा नहीं होता हैं और हमारे अन्य गरीब भाइयोंकी अपेक्षा और यहीं ऐसा सामाजिक मेल अधिक वे अधिक स्वस्थ स्थानोंमें निवास करते हैं। प्रचलित है । यदि यह मान भी लिया जाय तो भी २५ ३ आर्यसमाजी हो जाना—इससे प्रतिशतका बहुत थोड़ा भाग भी प्लेगके मत्थे कदाचित् जैनसमाजका हृदय बहुत दुखेगा; नहीं मढ़ा जा सकता और सच पूछिए तो किन्तु यदि निष्पक्ष होकर विचार किया भारतकी औसत वृद्धि ११. ६ प्रतिशतमें जाय तो यह बात बहुत स्वाभाविक जान ही प्लेग महाराजका प्रभाव गर्भित है। पडेगी । इसमें कोई सन्देह नहीं कि युक्त
२ हिन्दुओंमें मिलजाना-सामाजिक प्रान्त और पंजाबमें बहुतसे जैन आर्य
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SATURALLITIHARIm miILLIOLLECTRICITHARATARA + जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि । PRATYETIMETHEmmitmITTTTTTTTTT T TTTTTTTTTES
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समानी हो गये हैं, परन्तु प्रश्न-वास्तावक अधिक साहसके कार्य सरलतापूर्वक कर प्रश्न-यह है कि क्यों हो गये ? कारण ढूँढ सकता है । इस बातके लिए आर्यसमाजलेनेमें कोई कठिनाई नहीं । यदि हम अपने की जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है। और ऐबोंको छुपाना न चाहें तो कहना होगा कि यदि हम भारतवासी यह न मानें कि उत्त इसका कारण यह है कि जैनोंमें सुधार रीय भारतमें जो कुछ सामाजिक और
और उन्नतिका मार्ग सर्वथा बंद है। मनुष्य शिक्षासम्बन्धी कार्य देख पड़ते हैं वे सब समाजका भलाकर भाइयोंको उन्नत करनेकी प्रायः इन्हीं उत्साही आर्यसमाजियोंके अभिलाषाको सन्तुष्ट करनेके जो १००० कारण हैं तो अवश्य हम कृतघ्नता सूचित वर्ष पहलेके उपाय हैं उन्हें छोड़कर आप करेंगे । जैनोंके आर्यसमाजी होनेका सचसामाजिक सुधार शिक्षणसम्बन्धी कार्य मुच यही वास्तविक कारण है । इस आदि चाहे जो कार्य करनेको उद्यत होजा- बीसवीं शताब्दिमें धर्मकी परिभाषामें कुछ इए, जैनसमाज आपके कार्यको अच्छा अंतर हो गया है ! मातृभूमि, मनुष्य समाजनहीं समझेगा और पग पग पर आपके की सेवा और आत्मत्यागहीको आजकल मार्गमें विघ्न उपस्थित करना अपना न्याय, सिद्धान्त, संसारकी उत्पत्ति, स्थिति धर्म समझेगा । एक नवयुवक अपरिमित और नाश इत्यादिके ज्ञान, और पूजा, यज्ञ उत्साहसे पूर्ण होकर अपने भाइ- जप आदि बाह्य आडम्बरोंकी अपेक्षा अधिक योंके लिए, अपनी मातृ-भूमिके अर्थ, भारत- महत्त्व दियाजाता है। यही नवयुवकोंका की नीच जातियोंके उत्थानके कार्यमें आदर्श धर्म है । यदि जैनजाति चाहती है अपना जीवन समर्पण कर देना चाहता है कि उसका यह बहुमूल्य अंश, यह उत्साह सहसा समस्त जैन जाति उसके विरुद्ध स- और जीवनसे परिपूर्ण युवक-मंडल उसे छोड़शस्त्र आ उपस्थित होती है। तब उसके कर न चला जाय, तो उसे उचित है कि वह लिए और कोई उपाय बच नहीं रहता सिवाय भी समयानुकूल कार्यको उत्तेजना दे, और वह इसके कि वह जैन जातिको अंतिम प्रणाम भी आधुनिक ढंगपर शिक्षाप्रचारकी संस्थाकर किसी ऐसे समाजमें जा मिले जहाँ उ- ये संगठित करे । फिर वह निश्चिन्त होकर सकी उच्चतम आशायें और उच्चतम बैठ
बैठे; कोई नवयुवक कभी यह बात स्वप्नमें विचार अधिक सरलतासे फलीभूत हो सकें
भी न सोचेगा कि मैं इस श्रेष्ठ धर्मको त्याग और इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता
कर किसी दूसरे मतकी शरण लूँ । इटावेकी
तत्त्व-प्रकाशिनी सभाने यह कार्य प्रारम्भ कि आर्यसमाज ऐसा ही समाज है-उसमें किया है किन्तु अभी इस ओर बहुत कुछ सम्मिलित होकर वह यही नहीं इनसे भी करना बाकी है ।
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JUMBAITHLIBARAMAMATAMIL
जैनहितैषी
___ इस सम्बधमें एक बात और है । कुछ पंडित लेग—जो अगाध प्रेमके कारण अपतो पुराने द्वेषोंके कारण और कुछ इस समा- नेसे निम्र श्रेणीके . मनुष्योंका जैनधर्ममें जमें प्रचलित बुरी प्रथाओंके कारण लोगोंने पदापर्ण करना सहन नहीं कर सकतेइस धर्मको एक प्रकारके भयंकर विषमय अपनी संकीर्ण उपदेशदेनेवाली जिह्वाओंके धुरमें लिप्त कर दिया है, जिसके कारण न केवल लगाम न लगावेंगे? ऐतिहासिक दृष्टिसे जैनलोगोंको इससे घृणा और भय होता है किन्तु स्वयं धर्म बड़े महत्त्वका है, इसके पुराने मंदिरों इस धर्मका भी गला घुट रहा है । अतः और शास्त्रोंसे संसारको बहुत लाभ पहुँचा है, विचारशील जैनोंका यह भी कर्तव्य है कि यह सब कुछ ठीक है; किन्तु क्या वे यह प्रयत्न करें और इस धुएँको नाश कर डालें, नहीं देख सकते कि यदि इस धर्मके अनुकुप्रथाओंको दूर कर दें और वास्तविक मूल यायी ही न रहे तो यह सब महत्त्व क्या सिद्धान्तोंके ज्ञानका प्रचार करें। काम आवेगा ? क्या इतने पर भी औरों के
४ नाशमान धर्म-उपर्यक्त बातोंसे ही इस धममें आजानेको वे लोग द्वार न यह चतुर्थ कारण ठीक जान पड़ता है। " सरकारी रिपोर्टमें लिखा है कि " ऐसा जान ,
. सरकारी रिपोर्टोंमें घटी क्यों हुई इसका पड़ता है कि यह धर्म विलुप्त हो रहा है।"
",, तो उल्लेख है; किन्तु इसका कोई जिकर नहीं विचारवान् पुरुष पूछते हैं कि क्या इस धर्म
कि इस जातिकी जन-संख्या बढी क्यों नहीं। में कोई ऐसी बात है जो जैनोंको उन्नत जन
- जिन करणोंसे घटी हुई है वे चाहे थोड़े नहीं होने देती और उनकी संख्या नहीं समयसे हों ओर शायद थोड़े समय तक रहें बढ़ने देती ? किन्तु हा ! इसमें तनिक भी भी; किन्तु हम देखेंगे कि वे कारण कि सन्देह नहीं कि हमारा नाश हो रहा है।
" जिनसे हमारी उन्नति रुकी हुई है कहीं
अधिक बलवान् और भयंकर हैं। क्या धनाढ्य जैनोंकी आँखें खुलेंगी ? क्या
इन कारणों में हमारे सामाजिक रीतिउन्हें इस बातका ध्यान आवेगा कि जिन , मंदिरोंके बनावानेमें वे लाखों रुपये व्यय
रिवाजोंका बहुत बड़ा भाग है और इनमें
भी यहाँ एक विशेष रिवाज पर खास जोर कर देते हैं वे बहुत निकट भविष्यमें बिना
देना अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि वह पुजारियोंके व्यर्थ हो जायेंगे ! क्या कोई
२ समाजमें ऐसा जमा हुआ है कि कभी किसीउन्हें यह नहीं समझा सकता कि इस हास- को यह ध्यान भी नहीं आता कि इसमें के रोकनेका कार्य लाखों गुणा अधिक पुण्य- भी परिवर्तन करनेकी आवश्यकता है । मय है ? क्या इस बातको जानकर भी वे आइए, पहले जैनोंकी विवाह-सम्बंधी संख्याजैनधर्मको निजकी सम्पत्ति समझनेवाले धुरंधर ओं पर विचार करें।
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उमर
जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि ।
| समस्त जनसंख्या | विवाहित
पुरुष
०-५
७५, ३१६
५- १५ १,४१, २२७
रंडुवे और विधवायें
स्त्रियाँ | पुरुष
स्त्रियाँ
पुरुष | स्त्रियाँ
९४८ ७४, ७२३
७५, १७२
१६८
९२
६,७१०
२५, ३४९ १,३४, ०११
९९,७९७
५०६
१, १६७
९९, ५०७
६, २०७
२३,७०८
७४, ४३९
८,९५६
५२९
३३,०३६
७७,५९९
१५-४५ ३,२२,०११ २,९८,३२८ १,९८,७९६ २,१७,६८२ ४५- १,०४,९९९ १,०३, ७७६ ६३,००७ २५,६४८ जोड़ ! ६,४३,५५३ | ६,०४ ६२९ | २,६८,९३८ | २,६९,६२७ | ३,१७,१९७ | १,८१,७०५ | ५७४१८ | १,५३२९७ लगभग २० जातियाँ तो ऐसी हैं जिनमें १०० से अधिक स्त्री पुरुष नहीं ।
उस
इस विवरण से एकदम स्पष्ट हो जाता है कि जिस वयमें अधिक सन्तान उत्पन्न हो सकती है अर्थात् १५- ४५ वर्षतक, उस वयके ३,२२,०११ पुरुषोंमेंसे केवल १, ९८, ७९६ ही विवाहित हैं और ही वयकी २,९८,३२८ स्त्रियोंमेंसे ८०, ६४६ अविवाहित अथवा विधवायें हैं । अथवा लगभग ५ पुरुषोंमेंसे २ और चार स्त्रियोंमेंसे १ या तो अविवाहित है या विधुर अथवा विधवा है । ४० प्रतिशत पुरुष, और २५ प्रतिशत स्त्रियाँ अविवाहित ! यह संख्या वास्तव में बहुत ही अधिक है और इसमें सन्देह नहीं कि वे अपनी इच्छा से अविबाहित नहीं रहे हैं । अमरीका और यूरोपके लोग बहुधा निर्धनता के कारण विवाह नहीं करते; किन्तु भारतवर्षमें और जैनोंमें ऐसा नहीं है । विवाहके मार्गमें खास रुकावट जो है वह यह है कि जैन-समाजमें अगणित छोटी छोटी जातियाँ हैं जिनमें से बहुतों में केवल २ - ३ सौ स्त्री पुरुष ही बच गये हैं
एक जातिका पुरुष दूसरी जातिमें विवाह नहीं कर सकता । यही नहीं, एक जातिमें बहुतसे गोत्र होते हैं और यदि विवाह होता है तो वर कन्याकी और से चार चार गोत्रोंको छोड़कर विवाह हो सकता है अर्थात् वर अपना गोत्र, अपने नानाका गोत्र, अपने पिताके नानाका गोत्र और अपनी माता के नानाका गोत्र इनमेंसे किसी भी गोत्रकी कन्यासे विवाह नहीं कर सकता और इस ही प्रकार कन्याके पक्षमें भी वर चार गोत्रों में से किसीका नहीं होना चाहिए । यह तो हुई राजपूतानेकी बात; मध्यप्रदेश और है मध्यभारत में यह नियम और भी कड़ा वहाँ कई जातियोंमें आठ आठ गोत्रों को छोड़कर विवाह होता है ।
1
ऐसी दशा में यदि किसी जातिमें १०० स्त्री पुरुष हैं तो वहाँ इस प्रकार गोत्र छोड़े नहीं जा सकते और युवकोंको अविवाहित
।
अविवाहित
स्त्रियाँ | पुरुष
७६, २१२
४२५
१, २६, ३१३
१८५.
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ATUITHLETIHARRAHAILEELABRAHAMARHARY
जैनहितैषी
• १८६
4
रहना पड़ता है। जिन जातियों में इससे भी विधवायें १,५३, २९७ हैं । अविवाहित कम संख्या हैं उनकी दशाका इसहीसे स्त्रियोंकी संख्या १,८१, ७०५ है। ३० अनुमान कर लेना होगा।
वर्षसे ऊपरकी स्त्रियोंको छोड़ दें तो १,८०, २५ वर्षसे अधिक वयकी २.०३२ ००० ऐसी स्त्रियाँ बच जाती हैं जिनका विवाह स्त्रियाँ अविवाहित हैं। इन स्त्रियों के अवि- हो सकता है । ४५ वर्षसे कम वय वाले वाहित रहनेका और कोई कारण हो ही विवाह कर सकनेवाले पुरुषोंकी संख्या ३, नहीं सकता । इस प्रश्नके हल करनेका जो ३२, ६२३ है । यदि मान लिया जाय कि भी उपाय निकलेगा उसमें प्रचलित रिवाजमें वे सब १,८,००० स्त्रियाँ विवाह कर बहुत बड़े परिवर्तन करने होंगे और छोडने- ले ( यद्यपि यह संभव नहीं है ) तो भी डेढ़ के गोत्र घटाने होंगे। जो लोग इन परिव- लाखसे अधिक पुरुष अथवा ४५. वर्षसे कम तनोंकों करनेकी इच्छा करें उन्हें किसी वय वाले पुरुषोंमेंसे २८ प्रतिशत क्वारे ही बातसे डरना नहीं चाहिए । क्योंकि रह जावेंगे । इससे कुछ पता चलता है इन रिवाजोंमें कोई धार्मिक अंश नहीं कि किस प्रकार स्त्रियोंकी कमी जैनोंकी है । धर्म ऐसा करनेके विरुद्ध उपदेश संख्या बढ़ने नहीं देती। नहीं देता । यदि ये प्रथायें धार्मिक हो तो जो लोग इस कठिनाईसे बचनेका उपाय भी आत्मरक्षाके लिए ऐसे परिवर्तन अनिवार्य सोचेंगे उन्हें इस स्त्रियोंकी कमीके कारण ढूँढने हो जाते हैं। उत्तरीय भारतके लोग इस होंगे। उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि नियमकी कडाईको भलीभाँति नहीं समझ प्रकृतिने ही इस जातिके लिए यह कठिनाई सकते; क्योंकि प्रथम तो अग्रवाल जाति उपस्थित नहीं की है। जितने लड़के पैदा बहुत बड़ी है और दूसरे जैन अग्रवालों होते हैं लड़कियाँ उनसे कम नहीं होती। और वैष्णव अग्रवालोंमें विवाह हो सकता उपरके विवरणसे ही स्पष्ट है कि पाँच वर्षहै; किन्तु मध्यप्रदेश और राजपतानेमें से कम अवस्थावाले बालकोंमें लड़कियोंये बातें नहीं है।
' की ही संख्या अधिक है । १० से २०
वर्ष तक ही प्रायः सब बालोंका विवाह स्त्रियोंकी संख्याका कम होना भी बहुत होता है और इस ही वयमें प्रायः लड़किया बड़ी कठिनाई है। सब मिलाकर वे संख्यामें मातायें बन जाती हैं और इस ही वयमें पुरुषोंसे लगभग ४०००० कम हैं । स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक घटजाती है। किन्तु इस संख्यासे वास्तविक कठिनाईका इस वयके १,२८,१०५ पुरुष हैं और कुछ भी पता नहीं चलता। स्त्रियोंका चतुर्थीश १,०५,३७४ स्त्रियाँ । स्त्रियोंकी संख्या तो वैधव्यका दुःख भोग रहा है। कुल कोई २२,४३१ कम है । यह कमी सब
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जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि ।
उमरोंकी स्त्रियोंकी कमीकी आधी से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि यद्यपि प्रकृति पुरुषोंसे अधिक स्त्रियाँ पैदा करती है तो भी हम उन्हें अपने बुरे बर्तावे और बुरी प्रथाओंसे मार डालते हैं । सरकारी रिपोर्ट में भी यही बात लिखी है । बुरा बर्ताव, कामकी अधिकता, स्वास्थ्य नाशक पर्दा, बालविवाह और बचपनमें ही माता हो जानेका भार, सचमुच उन्हें मार डालता है | इन रिवाजों के प्रति घोर युद्ध करना होगा । इनको जबतक हम समूल नाश न कर डालेंगे जैन जातिकी वृद्धि कदापि नहीं हो सकती ।
बालविवाहसे केवल स्त्रीजातिका स्वास्थ्यही नहीं बिगड़ता ; किन्तु बलहीन समाज और रोगी बालकों के होने का यही मुख्य कारण है । यह एक ऐसी प्रथा है कि जिसे हम उपेक्षा की दृष्टिसे कदापि नहीं देख सकते । किन्तु याद रखना चाहिए कि इसके नाश करनेके लिए बहुत साहसऔर बलकी आवश्यकता होती है । इसकी हानियोंको जानते हुए भी हमारे जैन भाई, शिक्षित और विद्वान् जैन नेता तक अपने बालकों की रक्षा करनेमें असमर्थ दिखलाई देते हैं। जबतक हम प्रयाग के भ्रातृमंडलके सदस्योंकी भाँति निर्भयतासे और साहस - पूर्वक नियम न बना लेंगे तबतक इस कुप्र - थाका नाश होना कठिन ही नहीं असम्भव होगा । १८ वर्ष के युवा और १४ वर्षकी कन्याका विवाह हो सकता है । इसले कम
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वयका विवाह, विवाह नहीं गुड़ियों का खेल है । उसमें हमारी सहानुभूति नहीं - हम उसमें भाग नहीं ले सकते । हो सका तो अपनी सन्तानका विवाह इससे भी अधिक वयमें करेंगे । इत्यादि बातें जबतक हम दृढ़तापूर्वक हृदयमें अंकित नहीं करलेंगे, तबतक कोई आशा करना व्यर्थ है ।
किन्तु केवल इन बातों से काम न चलेगा । चले भी कैसे ? जब प्रति ४ स्त्रियोंमेंसे एक विधवा है । बालविवाहके बन्द हो जानेसे कुछ दशा सुधरेगी अवश्य; किन्तु बिना विधवाविवाह के प्रचलित किये जैनजातिका जीवित रहना कठिन है । २५ वर्ष - से कम वय वाली ११,३०४ विधवाओं पर समाजके नेताओंको दया आनी चाहिए । १५ वर्षसे छोटी १,२५९ विधवाओं को देखकर तो उन्हें रोदन आजाना चाहिए । और ५ वर्ष से छोटी ९२ विधवाओंकी तुतली बोलीको सुनकर, यदि वे सच्चे नेता हैं तो प्रचलित रिवाजोंपर और उनको न बढ़लनेकी सलाह देनेवाले समाज पर क्रोध और दुःखके मारे काँप उठना चाहिए । पुरुषकी एक पत्नी बीमार होती है कि उसी समय दूसरे विवाहकी बातें पक्की होने लगती हैं । कोई पूछता है कि लाला साहब ! आपके पुत्र पौत्र सत्र मौजूद हैं, फिर अब विवाहकी क्या आवश्यकता ? कहते हैं, भाई इसके बिना काम नहीं चलता । उन्हें यह कहते लज्जा नहीं आती ! इस बातका ध्यान नहीं
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जैनहितैषी
आता कि उनकी पुत्री जो विवाहके कुछ ही लाद दिया जाता है ? और न जाने कितनी महीने पीछे विधवा हो गई है जन्म कैसे बातें हैं । कहाँ तक कोई लिखे किन्तु एक व्यतीत करेगी ? खैर । यदि समाजको जीवित नये सुधारका जिकर किये बिना नहीं रहा रहना ही नहीं है, यदि उसे अपने स्त्री- जाता । राजपूतानेको ही इस सुधारके प्रचसमाजके चरित्रकी पवित्रता स्थिर रखनी ही लित करनेका सौभाग्य प्राप्त है । आजकल नहीं है तो चाहे जो करे; किन्तु यदि यह कोई युवा विवाह करना चाहे तो उसे पहले इच्छा है कि संसारसे नाम न मिटे तो उसे कन्याके पिताको कुछ हजार रुपये भेंट देना इस प्रश्नको उठाना पड़ेगा और हजार बाधा- पड़ते हैं । वैसे तो कन्याका पिता अपने
ओंके होनेपर भी कार्य करना ही होगा। जामाताके घरका पानी भी नहीं पीता; शिक्षाप्रचार, विधवाश्रमोंका खुलना, ब्रह्म- किन्तु रुपया कुछ पानी थोड़े ही है । धनचर्यकी प्रतिज्ञायें इत्यादि प्रयत्न कदापि वानोंकी बन आती है । खूब पसन्द सफल नहीं हो सकते । प्रकृतिके विरुद्ध करके बाजारके भावसे अधिक रुपयाकार्य करनेकी सामर्थ्य लाखोंमें एक दोसे देते हैं और चाहे कितनी भी उमर अधिकमें नहीं हो सकती । स्त्रियोंसे यह हो, चाहे पाँचवी बार विवाह करते हों, झट आशा करना मूर्खता है । बहुत अच्छा पट विवाह हो जाता है। गरीब लड़का पढ़ होता कि इसकी आवश्यकता न पड़ती; लिखकर होशियार हुआ। शायद २५-३० किन्तु अब कोई उपाय नहीं।
रुपये महीना कमाने लगा। वह कन्याके बूढोंके विवाह भी रोकने होंगे। इससे पिताकी भेटके रुपये कहाँसे लावे ? कहीं विधवाओंकी संख्या अवश्य घटेगी और .
५-७ वर्षमें कुछ रुपया एकत्रित किया कमसे कम ऐसे हास्यमय दृश्य देखनेको तो न .
" और कहीं बातचीत जमाई कि कोई धनाढ्य - मिलेंगे कि सफेद बालोंको रँगकर लाठीके ,
'ने अधिक रुपया देकर सौदा बिगाड़ दिया - सहारे बूढेराम वर बन कर १० वर्षकी रह है बालिकाका पाणिग्रहण कर रहे हैं। दो महीने इनके अतिरिक्त और भी बहुतसे कारण पीछे उनकी मृत्युसमाचार सनकर दःखसे इस क्षतिके निकलेंगे और इससे बचने के आँसू तो न बहाने पड़ेंगे ! .
लिए प्रत्येक कारणका नाश करनेका दृढ़
प्रयत्न करना होगा । बहुत सी सैकड़ों वर्षोंसे विवाहके मार्गमें इस जातिमें न जाने चली आनेवाली रीतियोंको उठा देना पड़ेगा। और कितनी कठिनाइयाँ हैं । इनमें इतना सधारके कार्यमें बहत बड़ा विरोध भी होगा। अधिक व्यय करनेकी क्या आवश्यकता है? लोग ऐसा भी कहेंगे कि यह कार्य जैनसब बिरादरीको मिठाई खिलानेका भार क्यों धर्मके सिद्धान्तोंके अनुकूल नहीं। जो यह कार्य
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ARMAHARITALIRITUTIHALILAULACHILIORAILABORATHAALAIMERIA
जैनधर्म और जैनजातिके भविष्यपर एक दृष्टि। •iffiftytithilitt liftifif tinfrintimYTHIMBS
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कर रहे हैं वे जैनधर्मको नाश करडालनेका नोट-यह जैनजातिकी संख्याके घटनेका विषय उपाय कर रहे हैं, इत्यादिः किन्त सधारकको बहुत ही महत्त्वका है-यह हमारे जीवन-मरणका यह भी याद रखना चाहिए कि ऐसा शोर प्रश्न है । यदि हमने इस प्रश्नको हल कर लियाकेवल संकीर्णहृदय मनुष्य ही मचावेंगे-जिन्हें
: संख्या ह्रासके यथार्थ कारणोंको जान लिया और हम ये सब बातें कुछ भी समझमें नहीं आतीं।
उनके दूर करनेके उपाय प्रचलित कर सके, तो समझ लीजिए कि हम संसारमें जीते रहेंगे, नहीं तो बस
कूच समझिए । अतः जैनसमाजके प्रत्येक हितैषीका उन्हें घृणाकी दृष्टिसे देखेगी, किन्तु इसमें यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह इस विषयपर विचार सन्देह नहीं कि इस प्राचीन धर्मको बहत करे और यथार्थ कारणोंको हूँढ़े । इस विषयमें सहार। मिलेगा । नाशसे वह अवश्य बच किसीको भी सन्देह नहीं हो सकता है कि संख्या जायगा और इस कारण सब विचारशील
घट रही है; पर किन कारणोंसें घट रही है, इस
विषयमें मतभेद हो सकता है। संभव है कि लेखक मनुष्य इसे पसंद करेंगे। जैनधर्म अपने
महाशयके बतलाये हुए कारण और उनके दूर करनेके अनयायी यवकोंकी ओर आशाकी दृष्टिसे उपाय सर्वसम्मत न हों, ऐसी दशामें विरुद्ध मत देखता है। वे ही उसे नाशसे बचाकर रखनेवालों को दूसरे कारण और उपाय बतलाना जैनोंको अन्य भारतवासियोंके बराबरीके चाहिए-चुप होकर बैठ रहना ठीक नहीं है। बना सकते हैं । किन्तु जैन जाति जिस जुदा जुदा प्रान्तोंमें संख्याका हास जुदा जुदा प्रकार युवकोंके साहसको तोड रही है, जिस परिमाणमें हुआ है, अतः प्रत्येक प्रान्तकी और उस प्रकार वह सब उन्नतिके विचारों का हास्य प्रान्तमें बसनेवाली प्रत्येक जातिकी घटी आदिके
कारणोंपर भी विचार करनेकी जरूरत है। लेखमें करती है और जिस प्रकार नेतागण स्वाभा
- बतलाई हुई प्रान्तवार घटीके अंकोंसे मालूम होता विक अकर्मण्यतामें फँस कर इस ओर है कि सबसे अधिक संख्या दिगम्बर जैनोंकी घटी • ध्यान नहीं दे रहे हैं, इससे तो यही ज्ञात होगी। मध्य प्रदेशमें फी सदी २२ और ग्वालियर होता है कि भविष्य कुछ अच्छा नहीं है। राज्यमें फी सदी २६ घटी हुई है और इन प्रान्तोंमें यदि जैनधर्म जीवित रहेगा, यदि जैन लोग श्वेताम्बरसम्प्रदायक लोग बहुत ही कम-प्रायः चाहते हैं कि हम जीवित रहें, तो उन्हें साहस
नहीं के बराबर-हैं । इसी प्रकार युक्तप्रान्तमें भी
अधिकांश बस्ती दिगम्बरियोंकी है और वहाँ फी सदी पूर्वक निर्भयतासे कार्य करना होगा। मृत्युसे ।
१०.५ की कमी हुई है ! अतः यह भी एक विचारणीय बात है कि दिगम्बरियोंकी संख्याका
हास ही क्यों अधिक हुआ? यह उक्त प्रान्तोंकी अवलम्बन किया जाय-संसारमें अन्य जाति- विशेषता है या हमारी जातियोंके रीति-रिवाजोंकी ? योंने कैसे उन्नति की है उससे कुछ शिक्षा दिगम्बरसम्प्रदायके विद्वानोंको शायद श्वेताम्बरोंकी ग्रहण की जाय। आशा की जाती है कि जैन- चिन्ता न हो, पर जब उन्हींका सम्प्रदाय घट रहा जाति इस प्रश्नको हँसी खेल न समझकर इस है, तब तो उन्हें इस ओर अपनी बुद्धिको लगाना ओर कुछ ध्यान देगी और उपर्युक्त मार्गका चाहिए । अवलम्बन करनेमें हिचकिचाहट न दिखलावेगी।
-सम्पादक।
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मेरी भावना।
(नूतन सामायिक-पाठ।) ले०, श्रीयुत बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार ।
(१) जिसने रागद्वेषकामादिक, जीते, सब जग जान लिया, सब जीवोंको मोक्ष-मार्गका, निस्पृह हो उपदेश दिया। बुद्ध, बीर जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो, उसके पद-पंकजमें मेरा, मन-मधुकर लवलीन रहो।
विषयोंकी आशा नहिं जिनके, साम्य-भाव धन रखते हैं, निज-परके हितसाधनमें जो, निशदिन तत्पर रहते हैं। स्वार्थत्यागकी कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं, ऐसे ज्ञानी साधु जगतके दुख समूहको हरते हैं।
000000000CCC000000000000000000CCCC02996063000
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रहे सदा सत्संग उन्हींका, ध्यान उन्हींका नित्य रहे, उनही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे। नहीं सताऊँ किसी जीवको, झूठ कभी नहिं कहा करूँ, परधन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ ॥
अहंकारका भाव न रक्खू , नहीं किसी पर क्रोध करूँ, देख दूसरों की बढ़तीको, कभी न ईर्षा-भाव धरूँ। रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ, बने जहाँतक इस जीवनमें, औरोंका उपकार करूँ॥
मैत्री-भाव जगतमें मेरा, सब जीवोंसे नित्य रहे, दीन-दुखी जीवों पर मेरे, उरसे करुणा-स्रोत बहे । दुर्जन-क्रूर-कुमार्गरतों पर, क्षोभ न मेरेको आवे,
साम्य-भाव रक्यूँ मैं उनपर, ऐसी परिणति हो जावे ॥ CODBODOODeeeeeeeeeeeeeees@@@
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मेरी भावना। CHITREETEHETRIOSITIONEETTTTTTTTREETI
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गुणीजनोंको देख हृदयमें, मेरे प्रेम उमड़ आवे, बने जहाँतक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे, होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे, गुण-ग्रहणका भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे ॥
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे, लाखों वर्षोतक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आजावे । अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे, तो भी न्याय-मार्गसे मेरा, कभी न पद डिगने पावे ॥
होकर सुख में मग्न न फूले, दुखमें कभी न घबरावे, पर्वत-नदी-स्मशान-भयानक, अटवीसे नहिं भय खावे । रहे अडोल-अकम्प निरन्तर, यह मन, दृढतर बन जावे, इष्टवियोग-अनिष्ट योगमें, सहनशीलता दिखलावे॥
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सुखी रहें सब जीव जगतके, कोई कभी न घबरावे, बैर-पाप-अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे । घरघर चर्चा रहे धर्मकी, दुष्कृत दुष्कर हो जावें, ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, मनुज-जन्म-फल सब पावें ॥
(१०) ईति-भीति व्यापे नहिं जगमें, वृष्टि समय पर हुआ करे, धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजाका किया करे। रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्तिसे जिया करे, परम अर्हिसा धर्म जगतमें, फैल सर्व-हित किया करे ॥
फैले प्रेम परस्पर जगमें, मोह दूर पर रहा करे, अप्रिय कदुक कठोर शब्द नहिं, कोई मुखसे कहा करे । बनकर सब ‘युग-वीर ' हृदयसे देशोन्नति-रत रहा करें, वस्तु-स्वरूप विचार खुशीसे, सब दुख--संकट सहा करें ।
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इतिहास-प्रसङ्ग । ले०, श्रीयुत-बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार ।
(३३)
हुए लिखा है कि-" इति वसुनान्दसैद्धावसुनन्दिका समय। न्तिमतेन दर्शनप्रतिपायां प्रतिपन्नस्त· वसुनन्दि ' नामके अनेक आचार्य और स्येदं । तन्मतेनैव व्रतप्रतिमां बिभ्रतो भट्टारक होगये हैं जिन सबका समय अभी- ब्रह्माणुव्रतं स्यात्तद्यथा- पव्वेसुः इत्थितक प्रायः अनिश्चत है । जैनसमाजमें इस सेवा ...।' इस तरह पर पं० आशाधरनामके ग्रंथकार या ग्रंथकारोंके बनाये हुए जीके द्वारा वसुनन्द्याचार्य और उनके जो ग्रंथ प्रचलित हैं उनमेसे वसुनन्दिश्राव- श्रावकाचार दोनोंका उलेख किया जाता है । काचार, प्रतिष्ठासारसंग्रह ( वसुनन्दि- । प्रतिष्ठासारसंग्रहके कर्ता वसुनन्दिका संहिता ), मूलाचारकी आचारवृत्ति और ही
र भी उल्लेख पं० आशाधरने अपने जिनयज्ञआप्तमीमांसाकी · देवागमवृत्ति । नामके , ग्रंथोंको देखनेका मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। .
कल्प' नामके प्रतिष्ठापाठमें किया है, इन चारों ग्रंथोंमे ग्रंथोंके बननेका कोई सन् संवत् ।
- जो इस प्रकार है:नहीं दिया और न · वसुनन्दिश्रावकाचार' को
___जयाद्यष्टदलान्येके
कर्णिकवलयादहिः। छोड़कर अन्य तीन ग्रंथोंमें ग्रंथकारने अपनी गुरु-परम्पराका ही उल्लेख किया है । इससे मन्यन्ते वसुनन्धुक्तबिना किसी विशेष अनुसंधानके, अभी यह मूत्रज्ञेस्तदुपेक्ष्यते ॥१७४॥ निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये अथात्-कोई ऐसा मानते हैं कि कचारों ग्रंथ एक ही 'वसुनन्दि ' के बनाये र्णिकाके वलयसे बाहर जयादि अष्ट देवताहुए हैं या एकसे अधिकके । परन्तु इतना ओंके अष्ट दल बनाने चाहिए । परन्तु जरूर कहा जा सकता है कि ' श्रावकाचार । वसुनन्द्याचार्यके कहे हुए प्रतिष्ठा-सिद्धाके कर्ता वसुनन्दि ५० आशाधरसे पहले न्तको जाननेवाले विद्वान् उसकी उपेक्षा हो चुके हैं, क्योंकि पं० आशाधरने करते हैं-वैसा नहीं मानते । स्वयं पं० अपनी 'सागारधर्मामृत' की टीकामें, जो आशाधरने भी वसुनन्दिसंहिताके अनुकि विक्रमसंवत् १२५६ में बनकर समाप्त सार ही वेदिलेखनका विधान किया है और हुई है, वसुनन्दिश्रावकाचारकी ‘पंचुंबर. कर्णिकाके वलयके बाहर क्रमशः १६, २४ सहियाई....', इस गाथाका उल्लेख करते और ३२ दलोंके बनानेकी आज्ञा की है।
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इतिहास-प्रसंग।
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इससे उक्त 'प्रतिष्ठासारसंग्रह भी पं० चंद्र' दिया है और उन्हें जिनागमरूपी आशाधरसे पहले बन चुका है, ऐसा कह. समुद्रकी वेलातरंगोंसे धूयमान तथा समस्त नेमें कुछ संकोच नहीं होता । इसी प्रकार जगतमें विख्यात प्रगट किया है । हो सकता यह भी कहा जा सकता है कि, ' आचार- है कि ये नेमिचंद्र वे ही हों जो 'गोम्मटवृत्ति' के कर्ता वसुनन्दि श्रीअमितगति- सार' ग्रंथके कर्ता कहे जाते हैं। ऐसा होने के पीछे हुए हैं । क्योंकि उन्होंने आचार- पर उक्त श्रावकाचारका १२ वीं शताब्दिके वृत्तिके आठवें परिच्छेदमें, कायोत्सर्गके लगभग बनना और भी अधिक निश्चित हो चार भेदोंका वर्णन करते हुए, ‘त्यागो देह- जाता है। क्योंकि गोम्मटसारके कर्ता विक्रमममत्वस्य तनूत्सृतिरुदाहृता .... ...' की ११ वीं शताब्दिमें हुए हैं। इत्यादि पाँच श्लोक · उक्तं च ' रूपसे दिये
(३४) हैं और उनके अन्तमें लिखा है कि, 'उपा- अरुणमणि और अजितपुराण । सकाचारे उक्तमास्ते ' अर्थात् यह 'अरुणमणि' या 'लालमणि' नामके कथन 'उपासकाचार' का है । यह एक कवि हो गये हैं, जिन्होंने विक्रम संवत् 'उपासकाचार' ग्रन्थ श्रीअमितगति- १७१६ में · अजितपुराण' की रचना की सूरिका बनाया हुआ है जो विक्रमकी ११ है । यह पुराण उन्होंने औरंगजेब बादशाहके वीं शताब्दिमें हुए हैं । इस ग्रंथके आठवें राज्यमें, जहानाबाद नगरके पार्श्वनाथ चैत्यापरिच्छेदमें उक्त पाँचों श्लोक उसी क्रमको लयमें बनाकर समाप्त किया है । जैसा कि लिये हुए नं० १७ से ६१ तक दर्ज हैं। इस पुराणके निम्न पद्योंसे प्रगट है:'देवागमवृत्ति' प्रायः उन्हीं वसुनन्दिकी बनाई रसषयतिचंद्रे ख्यातसंवत्सरेऽस्मिन्, हुई मालूम होती है जो 'आचारवृत्ति के कर्ता नियमितसितवारे वैजयंतीदशम्याम् । हैं। इस तरहपर इन चारों ग्रंथोंमेंसे दो अजितजिनचरित्रं बोधपात्रं बुधानाम्, ग्रंथोंका अमितगति ( ११ वीं शताब्दि ) के विरचिममलवाग्मी रक्तरत्नेन तेन ॥ वाद और दो ग्रंथोंका आशाधर ( १३ वीं मुद्गले भूभुजा श्रेष्ठे राज्येऽवरंगशाहिके। शताब्दी ) के पहले बनना पाया जाता है। जहानाबादनगरे पार्श्वनाथ जिनालये।४१ इनमेंसे प्रत्येकका कर्ता वसुनन्दि 'सैद्धा- ग्रंथकर्ताने, इस ग्रंथमें, अपना परिचय न्तिक' कहलाता है । आश्चर्य नहीं कि देते हुए अपनेको काष्ठासंघके माथुर गच्छाये चारों ग्रंथ एक ही वसुनन्दिके बनाये हुए हों। न्तर्गत पुष्करगणका अनुयायी प्रगट किया मेरी रायमें ये सब ग्रंथ विक्रमकी १२ वी है और अपनी वंश-परम्परा लोहाचार्यसे शताब्दीके लगभगके बने हुए हैं । श्रावका- प्रारंभ की है। लोहाचार्यके वंशमें अनेक मुनिचारमें वसुनन्दिने अपने गुरुका नाम · नेमि- योंके पश्चात् धर्मसेन नामके गुरु हुए । फिर
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जैनहितैषी -
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उनके पट्टपर क्रमशः भावसेन, सहस्रकीर्ति, वीं शताब्दिमें हुए हैं जो सकल सिद्धान्तके पारगामी कहलाते थे । साथ ही यह भी मालूम होता है कि कनकनन्दि भी नेमि - चंद्रके गुरु थे और उन्होंने ' सत्वस्थान नामका कोई ग्रंथ बनाया है । श्रवणबेलगोलके शिलालेख नं० ४० में भी एक ' कनकनन्दि ' का जिकर आया है और उसमें उन्हें माघनन्दि सैद्धान्तिक के शिष्य गण्डविमुक्त देवके बड़े भाई बतलाया है । साथ 1 ही उनकी प्रशंसा में यह पद्य भी दिया है:
गुणकीर्ति, यशःकीर्ति और जिनचन्द्रका प्रतिष्ठित होना लिखा है । जिनचंद्रका शिष्य श्रुतकीर्ति साधु और श्रुतकीर्तिका शिष्य बुध राघव हुआ । इसके बाद राघवके तीन शिष्य प्रगट किये हैं; एक रत्नपाल, दूसरा श्रीवनमालि और तीसरा कान्हरसिंग और अन्तमें अपनेको कान्हरसिंहका पुत्र ‘लालमणि' लिखा है । इस परिचयका आदिम पद्य इस प्रकार है:श्रीमच्छ्रासं मुनिगणगणनातीतदिग्वस्त्रष्टे,
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तस्मिच्छ्रीमाथुराख्ये वृषभवृषयुते गच्छश्रेष्ठाधिपूज्ये । तन्मध्ये सर्वश्रेष्ठे परमपद
प्रदे पुष्कराख्ये गणेच, लोहाचार्यान्वये च विगतकलु
पिता संयतानेक जाताः ॥ ११ ॥ ( ३५ ) कनकनन्दि और इन्द्रनन्दि | ' गोम्मटसारके ' कर्मकाण्डमें श्रीमने मिचंद्राचार्यने लिखा है कि:वरददिगुरुणो
पासे सोऊन सयल सिद्धतं । सिरिकणयदिगुरुणा
——-
सत्ताणं समुद्दिद्धं ॥ ३९६ ॥ " अर्थात् - इंद्रनन्दि गुरुके पाससे सकल सिद्धान्तको सुनकर श्री कनकनन्दि गुरुने सत्वस्थानका कथन किया । इससे मालूम होता है कि एक इन्द्रनन्दि विक्रमकी ११
यो बौद्धक्षितिभ्रत्कराल - कुलिशाकमेघानलोमीमांसामतवर्त्तिवादिमदवन्मातङ्गकण्ठीरवः । स्याद्वादाव्धिशरत्समुद्गतसुधारोचिस्समस्तैस्स्तुतःस श्रीमान् भुवि भासते कनकनन्दी ख्यातयोगीश्वरः ॥ इस शिलालेख और शिलालेख नं० ३९ में गण्डविमुक्तदेवके शिष्य महामंडलाचार्य देवकीर्तिके स्वर्गवासका उल्लेख किया गया है जो शक संवत् १०८५ में हुआ है और जिसकी यादगारमें ये दोनों शिलालेख देवकीर्तिके शिष्यों द्वारा एक ही पत्थर पर खुदवाये गये हैं । इस शिलालेख के ' कनकनन्दि, और नेमिचंद्र के गुरु 'कनकनन्दि ' दोनोंका समय अनुमानसे एक ही बैठता है । बहुत संभव है कि ये दोनों कनकनन्दि एक ही व्यक्ति हों ।
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MAHARITAMILLIMATRIMALAIME इतिहास-प्रसंग ।
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(३६)
पालनेवाले थे और जिनका विशाखाचार्यनेमिचन्द्रसंहिता ( प्रतिष्ठातिलक ) । ने आदर किया था । यथाः
जैनसमाजमें, यद्यपि नेमिचंद्र' पुराकृतयुगस्यादानामके अनेक विद्वान्, आचार्य और भट्टारक वादिब्रह्मतनूभवः । हो गये हैं; परन्तु · गोम्मटसार' के कर्ता अन्त्यब्रह्मा स भरतो यानेमिचंद्रसिद्धान्त चक्रवर्तीका नाम सबसे समृज्य द्विजोत्तमान् ॥१॥ अधिक प्रसिद्ध है। इस प्रसिद्धि और नामसा- तेषु केचिदथात्यक्तम्यके कारण बहुतसे लोग — नेमिचंद्र' नामके जिनमार्गाविवेकिनः। दूसरे विद्वानोंके बनाये हुए कुछ ग्रंथोंको अविच्छिन्नान्वयाचारगोम्मटसारके कर्ताके ही बनाये हुए समझने परावत्तिरे द्विजाः॥२॥ लगे हैं । अनेक विद्वानोंको भी इस विषयमें तदन्वयभवाः केचिभ्रम हुआ है । नेमिचंद्रसहिता, जिसका कांची नामा महापुरे । दूसरा नाम 'प्रतिष्ठातिलक' है और जिसको त्रिपंचाशतक्रियानिष्ठा'नेमिचन्द्रप्रतिष्ठापाठ ' भी कहते हैं, स्तस्थुः षट्कर्मकर्मठाः ॥ ३ ॥ उन्हीं ग्रंथोंमेंसे एक है जो गोम्मटसारके तान् किलाद्रियतेस्मायोकर्तीके बनाये हुए समझे जाते हैं । इस ग्रंथकी विशाखाचार्यपुंगवः । एक पुरानी प्रति ताड़पत्रोंपर लिखी हुई श्रवण- उपासकमहावेदबेलगोलके पं० दौर्बलि शास्त्रीके भंडारमें रहस्यायुपदेशिनः ॥४॥ मौजूद है। उसके अन्तमें ' शास्त्रावतार' इसके आगे ( पद्य नं० १५ तक ) नामकी एक ४५ पद्योंकी प्रशस्ति है, जिसमें उन्हीं ब्राह्मणोंकी संतानमें अकलंक, इन्द्र. ग्रंथकर्ता नेमिचंद्रने अपने कुलादिकका नन्दि, अनंतवीर्य, वीरसेन, जिनसेन, अच्छा परिचय दिया है। इस प्रशस्तिको वादीभसिंह, वादिराज और हस्तिमल्ल देखनेसे साफ मालूम होता है कि यह ग्रंथ आदि अनेक विद्वानोंके अवतार लेनेका कथन गोम्मटसारके कर्ताका बनाया हुआ नहीं किया है और फिर इन विद्वानोंकी वंशपहै बल्कि इसके बनानेवाले : नेमिचंद्र, , रंपरामें अपने कुटुम्बका सिलसिला बतलाया मुनि न होकर, एक बहुकुटुम्बी गृहस्थ थे। है, जो इस प्रकार है:प्रशस्तिके आदिमें, ब्राह्मण कुलकी प्राचीन- 'लोकपाल' नामके एक ब्राह्मण हुए हैं ताको दिखलाते हुए यह प्रगट किया गया है जो 'गृहस्थाचार्य' कहलाते थे, चोल राजाके कि इस कुलके कुछ ब्राह्मण कांची नामके द्वारा पूजित थे और इस राजाके साथ अपने महानगरमें हुए हैं, जो ५३ क्रियाओंको बन्धुवर्गसहित कर्णाटक देशको चले गये थे।
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उनके पुत्रका नाम समयनाथ था । समयनाथका पुत्र राजमल, राजमलका पुत्र चिन्तामणि, चिन्तामणिका पुत्र अनन्तवीर्य, अनन्त वीर्यका पुत्र पार्श्वनाथ, पार्श्वनाथका पुत्र आदिनाथ, आदिनाथका पुत्र कोदण्डराम, कोदण्डमका पुत्र ब्रह्मदेव और ब्रह्मदेव - का पुत्र देवेन्द्र हुआ । इनमें समयनाथको तार्किक, राजमल्लको कवि, चिन्तामणिको वादि और वाग्मी, अनन्तवीर्यको घटवादवि शारद, पार्श्वनाथको गीत और आगम शास्त्रका जाननेवाला, आदिनाथको आयुर्वेद में निपुण, कोदण्ड रामको धनुर्वेदका वेत्ता, ब्रह्मदेव को बड़ा बुद्धिमान् तथा षट्कर्मकर्मठ और देवेन्द्रको संहिताशास्त्र में निष्णात तथा राजमान्यतादि गुणोंसे युक्त लिखा है । यथाःआसीत्तदन्वये लोक
पालाचार्य इति द्विजः । गृहस्थाचार्यां दो
विद्वान्निस्तारकोत्तमः || १६ चोलेन पूजितो राज्ञा तेन राज्ञा समं स च । प्रतिदेशाख्यकर्णाट
देशं प्रापत्स्वबन्धुभिः ॥ १७ ॥
पुत्रः समयं नाथाख्यः तस्यासीत्तर्ककर्कशः ।
तत्पुत्रः कविराजादि
मल्लतः कविशिखामणिः । १८
जैनहितैषी -
वादी वाग्मी च तत्पुत्रश्चिन्तामणिसमाह्वयः ।
अनन्तवीर्यस्तत्सूनुवादविशारदः ॥ १९ तदात्मजः पार्श्वनाथः संगीतागमशास्त्रवित् । आदिनाथस्तु तत्सूनुयुर्वेदविशारदः ॥ २० ॥ तस्यात्मजो धनुर्वेदPar कोदण्डमः | तनंदनो ब्रह्मदेवो
धीमान् षट्कर्मकर्मठः ॥ २१ ॥ देवेन्द्रस्तत्सुतो नाना देवेन्द्रोपमवभैवः ! संहिताशास्त्रनिष्णातः
कलासुकुशलः शुचिः ॥ २२ ॥ राजमान्यो वदान्यश्च
जिनधामादिकारकः । त्रिवर्गलक्ष्मी सम्पन्नः
चतुरो बन्धुवत्सलः || २३ ॥ देवेन्द्रकी धर्मपत्नी ' आर्यदेवी ' थी । आर्यदेवी के पिताका नाम विजयपार्य और माताका नाम श्रीमती था । चंद्रपार्य, ब्रह्मसूरि और पार्श्वनाथ ये तीनों आर्यदेवीके सगे भाई थे, जिनमें ब्रह्मसूरिको 'महाविद्वान्' लिखा है । यथाः
सद्धर्मचारिणी तस्य सैवाभूदार्यदेविका
या श्रीविजय पार्यस्य
श्रीमत्याश्च सुतां सती ॥ २४ ॥ यस्या सहोदरा धीराचंद्रपार्यो बुधोत्तमः ।
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HAIRATIONAIRY
इतिहास-प्रसंग। Pimprimantritimum
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महाविद्वान्ब्रह्ममूरिः
महोपाध्यायसन्निधौ ॥ २९ ॥ पार्श्वनाथ इति त्रयः ॥ २५॥ पदवाक्यप्रमाणदेवेन्द्रके आर्यदेवीसे तीन पुत्र उत्पन्न
रूढिं वाढमुपागतः। हुए;-१ आदिनाथ, २ नेमिचंद्र और पुत्रौद्वौ तस्य कल्याण३ विजयप । आदिनाथ नामका पुत्र
नाथाख्यो धर्मशेखरः ॥ ३० ॥ समस्त जैनसंहिताशास्त्रोंका पारगामी था
इति तत्रादिमः सर्वऔर उसके यहाँ त्रैलोक्यनाथ तथा जिन
शास्त्रवाराशिपारगः। चंद्रादिनामके पुत्रों का जन्म हुआ। विजयप
द्वितीयस्तदीयोभूनामका पुत्र ज्योतिषादि शास्त्रों में निपण था
___ च्छास्त्रेषु सकलेष्वपि ॥ ३१॥ और उसका पुत्रः समन्तभद्र साहित्यका ।
इसके बाद ग्रंथकर्ता नेमिचन्द्रने, अपना प्रेमी हुआ । नेमिचंद्र नामका पुत्र ( विवादस्थ कुछ विशेष परिचय देते हुए, ग्रंथ बननेका प्रतिष्ठापाठका कर्ता ) अभयचन्द्र नामके सम्बंध प्रगट किया है, जिससे मालूम होता महोपाध्यायसे तर्क, व्याकरण और आगमको है कि नेमिचंद्र सदा धर्मार्थियोंको शास्त्रका पढ़कर एक प्रसिद्ध विद्वान् हुआ । उसके व्याख्यान किया करते थे; उन्होंने सत्यकल्याणनाथ और धर्मशेखर नामके दो शासनपरीक्षा आदि ग्रंथोंकी रचना की पुत्र उत्पन्न हुए, जिन दोनोंको ही शास्त्र. थी, राजसभाओंमें अनेक प्रतिवादी नैयायिकोंसमुद्रके पारगामी लिखा है । यथाः-- को जीतकर वे जैनधर्मकी बहुत कुछ प्रभातद्देवेन्द्रार्यदेव्याख्य
वना करनेमें समर्थ हुए थे; उन्हें राजादिदम्पत्योरादिनाथकः । कोंके द्वारा आन्दोला, शिविका ( पालकी ) नेमिचंद्रो विजय इति
और छत्ररूपी वैभवकी प्राप्ति हुई थी; वे पुत्रास्त्रयोऽभवन् ॥२६॥ याचकोंको दान देते हुए अपने बन्धुवर्गतत्रादिनाथः सवोह
सहित भोगोंको भोगते थे, उन्होंने जैनत्संहिताशास्त्रपारंगः। मंदिर, मंडप और वीथियाँ बनबाई थीं तत्पुत्रात्रैलोक्यनाथ
और श्रीपार्श्वनाथभगवानके आगे गाने बजाने जिनचंद्रादयो बुधाः ॥ २७॥ आदिका सामान जोड़ा था । इस प्रकार धीमान्विजयपाख्यस्तु
नेमिचंद धर्म, अर्थ और कामरूपी ज्योतिःशास्त्रादिकोविदः। त्रिवर्ग-लक्ष्मीसे शोभित थे और राजाके समन्तभद्रस्तुतत्पुत्रः
द्वारा सन्मानित हुए स्थिरकदम्ब नामके साहित्यरससान्द्रधीः ॥ २८॥ नगरमें रहते थे। एक समय उनके मामा धीधना नेमिचंद्रस्तु
( संभवतः पार्श्वनाथ ) ने जो कि पार्श्वनाथ तर्कव्याकरणागमान् । भगवानका दृढ़ भक्त था, मामाके पुत्रोंने, अधीत्याभयचन्द्राख्य - पिताके भाइयोंने, स्वकीय भाइयोंने, भाई
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योंके पुत्रोंने, निज पुत्रों और अन्य बन्धुवर्ग तथा विद्वानोंने उनसे प्रीतिपूर्वक यह प्रार्थना की कि, ' हे आयुष्मन् सर्वशास्त्रविशारदसूरे ! आप एक उत्तम पंचकल्याके विस्तारको लिये हुए प्रतिष्ठाशास्त्र की रचना करो।' इस प्रार्थनाको सुनकर और जिनेंद्रकी भक्ति से प्रेरित होकर नेमिचंद्रने यह ' प्रतिष्ठातिलक' नामका प्रतिष्ठाशास्त्र बनाया है । यथा:
जैनहितैषी -
अथ यो नेमिचंद्रार्यः
शास्त्रं वेत्यखिलं स्फुटं । व्याखाति शास्त्रमर्थिभ्यो
यः सदा धर्मकाम्यया ॥ ३२॥ सत्यशासनपरीक्षा
मुख्यप्रकरणादिकं । यस्तु शास्त्रं विरचय
द्विश्वविद्वज्जनस्तुतं ॥ ३३ ॥ नृपास्थानेषु तर्केषु कर्कशान्प्रतिवादिनः । निर्जित्य बहुशोयस्तु
जैनं प्राभावयन्मतं ॥ ३४ ॥
यो नृपाद्यतान्दोलशिबिका छत्रवैभवः ।
यो ददात्यर्थमर्थिभ्यो
श्री पार्श्वनाथपादाब्जसेवावा मानसः ।
मातुलः स्वस्य तत्पुत्राः पितृव्याश्च सहोदराः ॥ ३८ ॥
तत्पुत्राश्च स्वपुत्राश्च rain विपश्चितः ।
कदाचित्प्रार्थयन्तेस्म
तमेनं प्रीतिमानसः ॥ ३९॥
आयुष्मन् श्रणु भोः सूरे सर्वशास्त्रविशारद ।
प्रतिष्ठाशास्त्रमेकं सत्
पंचकल्याणविस्तरं ॥ ४० ॥
विरच्यतामिति ततो
जिनभक्तया च चोदितः ।
सः चाहं नेमिचंद्राख्यो
निभिणोमि स्वशक्तितः ॥ ४१ ॥ प्रतिष्ठातिलकं नाम प्रतिष्ठाशास्त्रमुत्तमं शास्त्रेऽत्र स्खलितं यन्मे
तद्बुधाः क्षन्तुमर्हत ॥ ४२ ॥ ऊपरके इस संपूर्ण परिचय से इस विषय में कोई संदेह बाकी नहीं रहता कि यह प्रतिठापाठ गोम्मटसारके कर्ता उन नेमिचंद्र
भुंक्ते भोगान्स्वबन्धुभिः ॥ ३५ ॥ सिद्धान्त चक्रवर्तीका बनाया हुआ नहीं है अकारयच्च यो जैन
धाममंडपवीथिकाः । गीतं ( नृत्यं च ) वाद्यं च पार्श्वशाग्रे नियोजयत् ॥ ३६ ॥ एवं यो धर्मकामार्थ
जो मुनि थे और विक्रमकी ११ वीं शताब्दिमें हुए हैं। बल्कि इसके कर्ता नेमिचंद्र एक गृहस्थ थे और वे कवि हस्तिमल्लसे भी, जो विक्रमकी १३ वीँ ँ शताब्दि के अन्त में हुए हैं, कई शताब्दि पीछे के विद्वान् हैं और इस लिए मेरी रायमें - यह ग्रंथ लगभग १६ वीं शताब्दिका बना हुआ है ।
त्रिवर्गश्री विराजितः । आस्ते स्थिरकदम्बाख्यनगरे राजपूजितः ॥ ३७ ॥
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पुनर्जन्म। ले०, पं० रूपनारायण पाण्डेय ।
जाती है।
जान
लत भागता
जाती है।
(पिछले अंकसे आगे।) १ परोसिन यह कौन है रे !
उपरोसिन-मार तो सही। रेग्नें २ परोसिन-हम क्यों निकलें रे ? (ईट उठाना ।) ३ परोसिन क्यों निकलें ?
दौलत०-अरे बापरे ! (पीछे हटता है।) ४ परोसिन-बतला तो सही !
४ परोसिन-निकल मुर्दे निकल, नहीं ५ परोसिन–मर मुर्दे !
तो सिर तोड़ दूंगी! दौलत०-(अवाक् होकर ) वाह! । दौलत०-( डरकर ) नहीं नहीं मैं
१ परोसिन-कलमुहा मर गया, अच्छा जाता हूँ। हुआ । ( बैठती है।)
५ परोसिन नहीं तो ( झाडू उठाकर ) २ परोसिन-लोगोंकी जान बची । यह झाडू देखी है ? ( बैठती है।)
दौलत०-अरे बचाओ। ३ परोसिन-दोनों लड़के पेट भर (दौलत भागता है और उसके पीछे दौड़ती खायँगे । ( बैठती है।)
___ हुई परोसिनें जाती हैं।) ४ परोसिन लडकी मगर खानेको न (दौलतकी लड़कीका प्रवेश ।) पावेगी । ( बैठती है।)
लड़की-लालाजी ! लालाजी! अम्मा रो ५ परोसिन-बड़ेको नरकमें भी जगह न रहा है।
(दौलतरामका प्रवेश।) मिलेगी। (बैठती है।) दौलत०-बैठ गई !-दौलतराम सँभलो !
दौलत-कौन रो रहा है ? तुम्हारा अस्तित्व ही मिटाया जा रहा है !
लड़की०-अम्मा। अपनेको बचाओ-नहीं तो बस मरे !-(परोसि
दौलत०-क्यों ? नौसे) निकलो हरामजादियो यहाँसे; निकलो
लड़की०-मैं क्या जान ?
(नेपथ्यमें विलाप-) निकलो! न निकलोगी? अच्छा ठहरो-(बाह- "अरे तुम कहाँ चले गये-तैयार रसोई रसे लकड़ी लाकर ) निकल जाओ, इसीम छोडकर कहाँ चल दिये-ॐ हूँ हूँ हूँ !" खैर है, नहीं तो देखो इसी लकड़ीसे
दौलत०-वाहवाह, औरत तकने मरा समझ१ परोसिन-वाह, खूब बना है!
कर रोना शुरू कर दिया! अरे मुनुआकी • दौलत०-निकलो!
अम्मा-मैं जीता हूँ । आया । ( लड़कीसे) २ परोसिन-मारेगा क्या?
चलो बेटी। दौलत०-मार डालूंगा । (लाठी घुमाते (कन्याका जाना और उसके पीछे दौलतरामका हुए ) निकलो!
जानेकी चेष्य करना।)
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MAITHIMAL ARATIBIOTIBRARY
जैनहितैषी
(दौलतरामके सालेका प्रवेश उनके साथ (बिहारीके साथ दौलतरामका फिर प्रवेश ।) __ सन्दुक पिटारे ट्रंक वगैरह हैं।) दौलत०—बिहारी, देखो तो सही कैसा १ साला-ले चलो, ले चलो ! अन्धेर हैदौलत०-अब यह क्या है !
बिहारी-(दौलतके सालोंसे ) क्यों २ साला-अजी कुलीको बुलाओ।
साहब, आपलोग घरका असबाब कहाँ लिये जा ३ साला-कुली ! कुली ! (प्रस्थान । )
१साला-क्यों न ले जाँय ! ये सब चीजें दौलत०-अरे कुलीको क्यों पुकारते हो ? अब हमारी बहनकी हैं। सब सामान क्यों घरसे बाहर निकाले फेंके २ साला-वह अब हम लोगोंके पास. देते हो?
रहेगी। २ साला-ले जाँयगे।
३ साला-क्योंकि हमारे जीजाजी मर दौलत०-कहाँ ?
गये हैं। १ सालां-कहाँ और कहाँ! अपने घर !- दौलत०-देखते हो अंधेर ! मेरे जीतेजी
दौलत०-क्यों ? मेरा सामान अपने घर यह अत्याचार हो रहा है। उधर स्त्री जारही है क्यों ले जाओगे ?
और इधर मेरा सब कुछ-(रोता है). २ साला-तुम्हारा सामान ?
बिहारी-भाइयो ! दौलतरामकी विधवा दौलत०-जी।
इस समय मेरी स्त्री,है ! क्योंकि हाल ही मेरी १ साला-(व्यंग्यके तौरपर ) जी,-लो स्त्री मर गई है और तुम्हारी बहनका पति मर कुली आगये।
गया है। ( तीन चार कुलियोंके साथ तीसरे दौलत०-इससे यह प्रमाणित होता है कि सालेका फिर प्रवेश ।)
मेरी स्त्री तुम्हारी स्त्री है ? २साला-उठाओ । पहले यह लोहेका बिहारी-कमसे कम यह साबित करना सन्दूक उठाओ।
कुछ कठिन नहीं है । ( दौलतके सालोंसे ) (कुली लोग लोहेका सन्दूक उठानेकी आपलोग इस समय घर जाइए । इस लोहेके कोशिश करते हैं।)
सन्दूकको मैं अपने जिम्मेमें लेता हूँ। दौलत०-खबरदार ! ( आगे बढ़ता है)।
साले-यह क्या साहब ! १ साला-चुप रहो ! ( मारनेको तैयार
बिहारी-ज्यादह चालाकी न कीजिएगा। होता है) दौलत-बिहारी ! बिहारी ! (जाता है)
और मैं वकील हूँ । बस चले जाइए। ( सब सालोंका एक दूसरेको देखकर इशारा करना साले-अगर न जायँगे तो ? ___ और हाथकी ओटमें हँसना ।)
बिहारी–तो कानूनी बहससे तुमलोगोंको १ साला-बिहारीको लेकर फिर आरहा है। उड़ा दूंगा। गवाहोंके द्वारा खाकमें मिला दूंगा। २ साला-( कुलीसे ) यह उठाओ- साले-अरे बापरे ! चलो, चलो .. ३ साला-जल्दी जल्दी ।
(जाते हैं)
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पुनर्जन्म। DIRMITTERTITTIMES
___२०१
बिहारी-(दौलतसे ) अब आप भी
(चुन्नीका रोना) जाइए। यह घर अब मेरा है । सेठ दौलतराम मल मलकर नित्य खिजाब अजीब मसाले। मर गये।
___ सन ऐसे उजले बाल बनाकर काले ॥ दौलत०–लेकिन मैं तो मरा नहीं। ज्वानीका सा सब रंग ढंग दिखलाना।
सोनेके तारों बँधे दाँत चमकाना ॥ बिहारी इसके लिए प्रमाणकी आवश्य- सपने ऐसीह हँसी हुई दैयारे। कता है । कोई गवाह है ?
इस तरह छाड़कर कहाँ० ॥ दौलत०—क्यों, मेरी स्त्री गवाही देगी। दौलत० अरे मैं हँसूंगा । (दाँत निकालबिहारी-अच्छी बात है, अपनी स्त्रीको कर हँसता है) बुलाइए।
(चुन्नीका रोना ) दौलत०-सुनती हो मुनुआकी अम्मा ! आकर अब मुझको कौन कहेगा प्यारी। जरा इधर आओ। लज्जा करके अब क्या होगा! बढिया ला देगा कौन दुपट्टे सारी ॥ मैं जान और मालसे जा रहा हूँ। बाहर आओ। एसेंस, लवेंडर, टूथपाउडर साबन ।
(रोते रोते चुन्नीका प्रवेश ।) किससे अब माँD, राम, जड़ाऊ जोशन । मैं हुई अकेली छुटे सहारे सारे। मिलकर मरते तो रंजन कुछ फिर था रे। इस तरह छोड़ कर कहाँ सिधारे प्यारे ॥ इस तरह छोड़कर कहाँ० ॥ हूँ नहीं जानती राह, भटकना होगा। दौलत-मेरी प्यारी रो मत, मैं आता हूँ। ठोकर खाकर सिर-पैर पटकना होगा॥ (चुन्नीका हाथ पकड़ता है) हे प्राणनाथ, दो दरस, तरस कुछ खाओ। चुन्नी-अरे बापरे ! यह कौन है ! पैरोंसे ठेलो नहीं, नाथ, अपनाओ॥ दौलत-मैं तुम्हारा स्वामी हूँ-तुम्हारा प्यारा मैं व्याकुल रोती यहाँ तुम्हारे मारे। हूँ-तुम्हारा नाथ, तुम्हारा प्राणेश्वर, तुम्हारा . इस तरह छोड़कर कहाँ०॥
हृदयसर्बस्व सेठ दौलतराम हूँ । देखो, जरा इधर दौलत०–नहीं नहीं, मैं पैरोंसे नहीं देखो। ठेलूँगा । आहा, कैसी सती स्त्री है !
चुन्नी-( घूघट खोलकर देखकर ) अरे (चुन्नीका रोना)
बापरे ! ( मूर्छाका अभिनय करती है)
दौलत०--ऐं ? यह क्या बात है ! यह कढ़ी पकौड़ी बड़े, मुँगौरी भाजी।।
__ बिहारी--तू कौन पाजी है ! भले आदमीकी है सभी रसोई अभी बनाई ताजी ॥
औरतके बदनमें हाथ लगाता है ? बिधना, तूने क्या निठुर ठान ठाना है।
दौलत०--यह तो मेरी ही स्त्री है। अफसोस, अकेले मुझे सभी खाना है।
बिहारी-तुम्हारी! तमको न बदे थे खान-पान ये न्यारे।
दौलत-हाँ! इस तरह छोड़कर कहाँ० ॥
बिहारी-तुम बड़े भले आदमी हो ! दौलत-रसोई बनाई है ? मैं भी तुम्हारे दौलत-यह मेरी स्त्री है। साथ खाऊँगा ! आहा कैसी सती लक्ष्मी है!
(चुन्नीका उठना।)
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जैनहितैषी
दौलत-वह देखो, होश आगया। दौलत-किन्तु वह तो मेरी स्त्री है।
चुन्नी-मैं उनके बिना नहीं जी सकती। बिहारी-यह बात तो वह खुद नहीं बिहारी-धन्य पतिव्रता!
स्वीकार करती। चुनी-मैं अबला सरला विह्वला बाला- । दौलत०-ईश्वर ! (रोता है) बिहारी-आहा हा हा!
बिहारी-देखिए साहब, आपको देखकर चुन्नी-दैवकी सताई दुखपाई मुरझाई- मुझे दुःख होता है। शायद आप दौलतराम बिहारी-हाय हाय!
सेठ ही हों । किन्तु प्रमाण नहीं है। कानूनमें चुनी-मैं अलबेली नबेली अकेली कैसे आप टिक नहीं सकते । बतलाइए, क्या करूँ ? रह सकती हूँ!
दौलत०-वही तो । स्त्रीने नहीं पहचाना, बिहारी-अकेली क्यों रहोगी मोहिनी, या मैं सचमुच मर गया हूँ, देखू । समस्या यह मायाविनी, बिहारीके जीतेजी तुमको काहेकी है कि मैं मर गया हूँ या जीता हूँ ? मैं लहरोंमें चिन्ता है ?
पड़कर तूफानसे भरे संसार-सागरमें बहा-बहीं दालत०--बहारा, तुम्हारा यह हरकत . फिर रहा हूँ, या खेल खेल रहा हूँ ! मैं शेर रीछ
चुन्नी-अभी मेरे पतिका पीछा हुआ है-- साँप आदिसे परिपूर्ण बनके घोर घने अन्धकारमें बिहारी-मेरी भी स्त्री अभी मरी है- रो रहा हूँ, या गाना गाता हूँ? चुटकी काटकर चुन्नी-मनकी हालत--
दे ! ( चुटकी काटता है ) लगता तो है ! बिहारी-बहुत--
सिर हिला डुला कर देखू !( वैसा ही करता दौलत०-खराब है! सो तो समझा । है) कुछ भी समझमें नहीं आता !-नहीं यह न लेकिन
जीना है न मरना है। यह जीने-मरनेकी एक बिहारी- चुन्नीसे ) जाओ, अब तुम खिचडी है! कैसी आफत है! मैंने स्वममें भी भीतर जाओ ! मैं ब्याहकी तैयारी करने जाता हूँ। नहीं सोचा था कि ऐसी दशा मेरी होगी। ये (चुनीका जाना)
कौन हैं ? ये तो सब मेरे सगे हैं! अच्छा , दौलत० कैसे ! ब्याह और क्रियाकर्म एक
छिपकर देखू ये क्या करते हैं ! (छिपता है ) साथ ही होगा! हा जगदीश्वर !
(बाजेगाजेके साथ दौलतके नातेदारोंका प्रवेश।) _ बिहारी लाठी कहाँ है ? यह है । (लाठी
१ आदमी-यहीं बैठो ? ( बैठता है) लेना)
२ आदमी-हाँ, आज जरा जी भरकर दौलत०-लकड़ीकी क्या जरूरत है ? बिहारी-त्रीको वश करनेकी तैयारी में
र आनन्द मनालें। (बैठता है) पहलेहीसे कर लूँ। ५०००) रुपयका गहना है। ३ आदमी- (बैठकर ) बुड्डा अब जाकर १००००) रुपये नगद तो चुन्नीके पास हैं। मरा। दौलत०-देखो, तुम मेरे बहनोई हो-वकील ..४ आमा
४ आदमी-मैं तो बहुत खुश हुआ। हो। तुम ऐसे नीच नहीं हो सकते कि मेरे जीते (बैठता है) ही मेरी स्त्रीसे ब्याह करो।
. ५ आदमी---एक पैसा किसीको नहीं दिया। बिहारी-नीच कैसा ? विधवासे व्याह (बैठता है) करनेमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
१ आदमी--बड़ा कंजूस था !
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३ आदमी-वह समझे था कि मैं कभी
गजल। नहीं मरूँगा।
प्राण-रक्षामें सदा २ आदमी--तो यह प्रमाणित हुआ कि प्राणान्तका है सामना । दौलतराम सेठको भी मौत नहीं छोड़ती ! जानकर यह, कौन करता,
४ आदमी-खूब कहा-हाः हाः हाः हाः- जन्मकी फिर कामना ॥ ५ आदमी-हाः हाः हाः हाः
भोर होते नींद खुलती, दौलत०--ये लोग तो खूब खुश देख । हर घड़ी आफत खड़ी।
आयुको अपनी बिताना, १ आदमी-बुड्डा बड़ा सूम था।
घोर है शव-साधना ॥ २ आदमी-आफ़त गई।
स्नान करते भूख लगती दौलत०--एहसानमन्द हूँ।
है सुलगती आगसी। ३ आदमी-वसीयतनाममें ज़रूर हमलो- तब जुटाना अन्नका, गोंके लिए कुछ लिख गया होगा।
उसको निगलना चाबना ॥ दौलत०--(अँगूठा दिखाकर ) एक पैसा अन्न चुकजाता, न बुझती भी नहीं।
पेटकी ज्वाला अहो। : ५ आदमी--किसीको तो दे ही गया होगा। नोन है तो घी नहीं, दौलत०--किसीको नहीं ।
संयोग कुछ ऐसा बना ॥ ६ आदमी–साथ में ले जा सकेगा नहीं! लेटते ही मक्खियाँ दौलत०--सन्दूकें न ले जा सकूँगा, चा- दिनको हमेशा दिक करें। भीका गुच्छा तो ले जा सकूँगा।
रातको फिर मच्छड़ोंका २ आदमी- दूसरे जन्ममें सिर पीटेगा। __जुल्म होता है धना ॥ • दौलत०-सिर पीटनेको तो जी अभी हाय, आधी रातको चाहता है।
जेवर जड़ाऊके लिए। ३ आदमी-आप न कुछ खाया न पिया- रूठना रोना प्रियाका देखो तो!
मिनमिनाना माँगना ।। दौलत०-भाई अब ऐसा न होगा । दिनको चीज लो तो दाम उसके अंगूर वगैरह मेवा और रातको बढ़िया भोजन ! माँगते हैं फिर असभ्य । . ४ आदमी-अब उसके दोनों लड़के सारी राह रोके हैं महाजन दौलत उड़ावेंगे।
और करते लुचपना ॥ - दौलत०-छोड़ जाऊँगा, तब न ! ब्याह करते ही कई ५ आदमी-अच्छा अब गाओजी !
बच्चे भी हो जाते हैं ढेर । दौलत०–अच्छा गाओ, सुनूँ ।
ब्याहनेमें औ पढ़ानमें __ (सबका गाना)
दिवाला पीटना ॥
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२०४
aummmmmmmm
जैनहितेषीTHERETRETIREMETHEREINDI
(दौलतरामके दानों पुत्रोंका प्रवेश ।) १ नाते--वही जो मैंने जोड़ा है, 'बुड्डा १ पुत्र-जायदाद आधी मेरी है। मरा है।।
२ पुत्र-एक पैसा भी तुम्हारा नहीं है। दौलत०--इसी बीचमें गीत भी बनगया। लालाजी वसीयतनामेमें सब मेरे नाम लिख गये हैं। बलिहारी ! दौलत-लिख गया हूँ ! कहाँ ? मुझे तो
( सबका गाना) नहीं याद ?
बुड्ढा मरा है बुड्ढा मरा है १ पुत्र-वसीयतनामा जाली है। मैं साबित बुड्ढा मरा है मरा है मरा है। करूँगा।
दौलत०-बस, अब तो सहा नहीं जाता। २ पुत्र-कभी नहीं।
( सबका गाना) १ पुत्र-कभी नहीं।
बुड्डा मरा है मरा है मरा है.. २ पुत्र-मैं मिस्टर दासको अपनी ओरसे (दौलतराम लकड़ी हाथमें लिये आगे बढ़कर खड़ा करूँगा।
गाता है-) १ पुत्र-मैं बैरिस्टर जैक्सनसे पैरवी करा- बुड्ढा मरा नहिं बुड्ढा मरा नहिं ऊँगा।
देखो अजी अभी बुड्ढा मरा नहिं । २ पुत्र-मैं दस हजार रुपये खर्च करूँगा। १ पुत्र-ऐं ऐं ! यह कौन है ? १ पुत्र-मैं पन्द्रह हज़ार रुपये उठाऊँगा ।
२ पुत्र-हाँ, यह कौन है ? २ पुत्र~-तू बेईमान है !
दौलत०--(लड़कोंसे ) तुम चाहे जितना १ पुत्र-तू धोपेबाज है !
आश्चर्य प्रकट कसे, लेकिन मुझको विश्वास है २ पुत्र-तू मूसा है !
कि बुड्डा अभी नहीं मरा और वह सशरीर १ पुत्र-तूं मच्छड़ है !
तुम्हारे आगे खड़ा है। २ पुत्र-मेरे घरसे निकलजा !
१ पुत्र-कैसे! १ पुत्र-तेरा घर !-तेरे बापका घर है। २ पुत्र-ठीक तो है, कैसे ! २ पुत्र--निकलो
(दोनों भाग जाते हैं ) १ पुत्र--चुपरह
नातेदार लोग--(दौलतसे ) तुम कौन १ नातेदार-अजी झगडा क्यों करते हो जी, हमारे गानेमें खरमंडल डाल दिया ! हो ! आज खुशी मनाओ। ऐसा आनन्दका दिन, निकलो । तुम कौन हो ? तुम्हारे बाप मरे हैं !
दौलत०--मैं इन दोनों लड़कोंका बाप हूँ। . ३ नातेदार--हाँ, पेट भरकर खाओ।
नातेदार०--बाप! हो ही नहीं सकता। ४ नाते-जी भरकर आनन्द मनाओ।
हम विश्वास ही नहीं करते । तुम साबित करो ५ नाते०--नाचो !
कि बाप हो। २ नाते०--गाओ!
__ दौलत०--सब कुछ साबित ही करना १ नाते०-मैंने एक गीत जोड़ा है ! होगा! भाइयो! सुनो-इस बातको तो कोई साला २ नाते०–हाँ गाओ, वही गीत- नहीं साबित कर सकता कि वह बाप है । उस ३ नाते-कौन ?
बात पर तो विश्वास ही कर लिया जाता है।
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Emrnsrmनर्जन्म ramremam
२०५ नातेदार--नहीं, हम लोग विश्वास नहीं दौलत०--(भंगके नशेमें ) लेकिन मैं करते । निकल जाओ।
दौलतराम सेठदौलत०--कहाँ जाऊँ?
३ नाते--पहले मैं गाऊँगा !-खा-आनातेदार०-यह हम क्या जाने ? हम नहीं आ-आ-आ-। जानते।
४ नाते०--चुप । करूँ ऊँ-ऊँ। दौलत०-दोनों लड़कोंने पहचान लिया ५ नाते-गाओ जान, कोई नाटककी है, मगर मुँहसे स्वीकार नहीं किया । बाहरे चीज़ गाओ--- कलजुगी लड़के !
गौहर०-अच्छा, सुनिए· नातेदार--(दौलतसे ) अजी सोचते बूटी पिलाके लुभाय क्या हो ? दूधिया भंग है। पियोगे? लो ज़रासी। गया कोई मुझे।
दौलत०-(कुछ सोचकर ) मैं तो जीता १ नाते--वाह वाह, वाह वाह । हूँ, फिर दूधिया क्यों छोडूं । (भंग लेकर २ नाते०-ठहरो बीबी, अन्तरा मुझे पीता है)
कहने दो।(रण्डीका प्रवेश ।)
बड़े सबेरे जो कोई छाने १ नातेदार--लो बी गौहरजान आर्गई। बाकी लंबी दीठ । (गानेके ढंगसे ) “आओ आओ मित्र ।” उड़त चिरैया वह पहचाने
२ नातेदार-( उसी स्वरमें ) " बैठिए गिरी सड़कसे ईट ॥ सिर आँखोंपर "
१ नाते--सबेरे फेर छनेगी भंग सबेरे ३ नातेदार-( उसी स्वरमें ) फेर छनेगीइश्ककी गोली बना कर
३ नाते०---सुनोबाम पर फेंका करूँ।
दुसरे पहरे जो कोई छाने तू मुझे देखे-न देखे
वाके लंबे कान। मैं तुझे देखा करूँ ॥
तवा कटोरा कलसी बेची ४ नातेदार-ठीक नहीं हुआ ( दूसरे धर लोटे पर ध्यान ॥
१ नाते-सबेरे फेर छनेगी भंग सबेरे फेर इश्ककी गोली बनाकर
छनेगी।-- बाम पर फेंका करूं।
४ नाते०--अरे मेरी भी तो सुनो-- तू मुझे देखे-न-देखे
तिसरे पहरे जो कोई छाने मैं तुझे देखा करूँ ॥
ज्यों भादौंकी कीच। ५ नातेदार-दे-ए-ए-ए-ए-ए । घरके जाने मर गये और '. दौलत०-वाह, यहाँ तो सभी उस्ताद हैं। आप नशेके बीच ॥ १ नाते-देखते क्या हो!
दौलत--अरे घरके जानें तो जाना करें, - २ नाते-बी गौहरजानको गाने दो। पर न मैं मरा हूँ और न नशेके बीचमें हूँ !
स्वरमें )
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१ नाते ० -- अरे चुप, सबेरे फेर छनेगी भंग सबेरे
५ नाते ० -- मेरी क्या यहीं रह जायगी । सुनो-
चौथे पहरे जो कोई छाने
बच्चा आपी आप । बे-जोरू बे-ससुरेके हो छै बच्चेका बाप ॥
दौलत - वाह बेटा, तुम्हारी खूब रही ! १ नाते - अररररर सबेरे फेर छनेगी भंगगौहर -- मुझे कोई बूटी पिलाके लुभाय गया कोई मुझे । ( सबका नाचना । साथ ही साथ दौलतका भी नाचना और गिरना । ) नातेदार - लो बी गोहरजान, एक ढेर हुआ तुम्हारे गानेसे ।
दौलत ० -- ( पड़े ही पड़े नशेमें) अबे चुप- मैं सेठ - दौलतराम हूँ । या नहीं ? - फिर मैं कौन हूँ? कोने भाई दौलत, आगये !
( बिहारी, दारोगा के वेषमें रामचन्द्र और एक हवलदार दो सिपाहियोंके वैषमें नन्दू, मोहन और सुन्दरका प्रवेश । )
बिहारी -- हाँ आगया दादानातेदार -- अरे पुलिस आगई । भागो भाग ( भाग जाते हैं ! )
बिहारी - ( दारोगा से ) यही दौलतराम आया है - असामियोंको धोका
बनकर
देनेके लिए |
दारोगा - क्या तुम कहते हो कि मैं सेठ दौलतराम हूँ ?
दौलत ० -- ( हाथ जोड़कर ) जी जमादार
साहब ।
( सिपाहियों का पकड़लेना ! ) दारोगा - पकड़ो इसको ।
-
दौलत • - जी मैं-दारोगा - दौलतराम सेठ है !
दौलत ० -- ( काँपता हुआ ) जी, कभी
किसी जन्म में नहीं !
दारागो- -तब उसके जैसा रूप रखकर
क्यों आया ?
0
सच बोलो।
दौलत ० --जीदारोगा – झूठ, दौलत ० - दारोगा साहब, मेरे कहने के पहले ही आपने मेरी बातको झूठा ठहरा लिया ! दारोगा
-- वह मैं जानता हूँ ।
दौलत ० - दारोगा साहब, यह तो मैं जानता था कि पुलिस के आदमी सर्वशक्तिमान् होते हैं, लेकिन यह न जानता था कि सर्वज्ञ भी होते हैं। दारोगा -
- सच बोलो । ( रुलका हुला
मारना )
दौलत ० - जी वही कहनेवाला था, लेकिन इस मारसे तो सच बात भूली जाती है। अब मैं क्या कहूँ तो आप खुश हों ?
दारोगा -- कि मैं दौलत सेठ नहीं हूँ । ( रूल दिखाता है )
दौलत ० - कभी नहीं | मारो न बाबा ! दारोगा ० - फिर तुम कौन है ? दौलत ०- -संपत सेठदारोगा - संपत सेठ कौन ? दौलत ० -- दौलत सेठका छोटा भाई । दारोगा -- तो फिर दौलत सठेके जैसा चेहरा बनाकर क्यों आया ?
दौलत ० -- जी - ( सोचता है ) दारोगा -- सच बोलो । ( रूलका हूला मारता है ) उसका ऐसा चेहरा बनाकर - दौलत :० - हम दोनों जोड़िया भाई थे ।
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पुनर्जन्म ।
दारोगा -- चुप रह । दौलत ०[० - - अच्छा चुप रहूँगा । दारोगा -- ( बिहारीको दिखाकर ) ये कौन हैं ?
दौलत ० --- पहले थे मेरे--अर्थात् दौलतराम के बहनोई; लेकिन अब उसकी विधवा स्त्री के पति हैं !
देख लिया । गरीबोंको सताकर और अपनेको भी धोका देकर जो रुपया मैंने जमा किया है वह इन लोगोंके यों उड़ाने के लिए ! बस, अब नहीं ! अब अगर मैं अपना जीना साबित कर सका तो ग़रीबोंको अन्न-वस्त्र बाँदूँगा - और खुद भी पेट भरकर खाऊँगा । जबतक साबित नहीं करता तब तक हँस- लो-खालो । अगर अपना जीना साबित न करसका तो वनको । चला जाऊँगा और इस लिए तपस्या करूँगा कि पुनर्जन्म न हो ।
दारोगा -- यह तुम सच कह रहे हो ? दौलत ० - जी मैं झूठ कभी कभी बोलता हूँ दारोगा - नाक रगड़ो, कान पकड़ो । दौलत ० - - क्यों जमादार साहब ? दारोगा - चुप रहो, कान पकड़ो । दौलत ०. ० - अच्छा साहब । ( वही करता है ) दारोगा - कहो - मैं कभी किसी जन्ममें सेठ दौलतराम नहीं था ।
दौलत ० - ऐसा ही होगा साहब । मैं कभी
दारोगा - चुप रहो ! दौलत ०- ( डरकर ) जी !
न था ।
बिहारी - Barred by limitation. दारोगा - अच्छा, छोड़ दो ।
बिहारी - ( दारोगा से ) चलिए, कुछ जलपान कर लीजिए ।
दौलत ० -- और मेरी भूतपूर्व विधवा के साथ दारोगा साहबकी जान पहचान भी करा देना ।
( दौलतके सिवा सब चल देते हैं ) दौलत ०- ( आप ही आप ) अन्तको सलके हूलोंसे यह साबित होगया कि मैं दौलत सेठ नहीं हूँ । कहा ही है कि मारके आगे भूत भागते हैं । नहीं भाई, मैं मरगया था, यह बात झूठ नहीं है । मरगया था । यह मेरा पुनर्जन्म है ! आज नया अनुभव और नया विश्वास पाकर मैं फिर जी उठा हूँ | मरनेके बाद जो कुछ होनेवाला था वह जीतेजी अपनी आँखोंसे ही
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( बिहारी और चुन्नीका प्रवेश ) ( चुन्नीका गाना ) इसीसे रखूँ तुम्हें नजरोंमें | तनिक फिरी जो आँख पिया
तो देख न पड़ें घरों में | इसी ० रत्न समझ, आँचलमें बाँधू, पीतम तुम्हें नरोंमें । आओ, रसमें रीस भला क्या,
चलो चलें कमरोंमें ॥ इसी० ॥ चुन्नी - ( दौलत से ) क्या सोच रहे हो ? दौलत ० – यही कि ! ( हाथ जोड़कर बिहारी से ) प्रणाम । ( प्रणाम करना । फिर चुन्नीके हाथ जोड़ना ) क्या हुआ है ? बिहारी - दौलतरामजी ! दौलत - कौन दौलतराम ? बिहारी - तुम !
दौलत ० - कौन कहता है ! तुम लोगोंने मिलकर अभी साबित कर दिया है कि मैं सेठ दौलतराम नहीं हूँ । अब मैं दौलतराम हूँ ? नहीं, मैं दौलतराम नहीं हूँ ।
चुन्नी - अजी खफा क्यों होते हो। तुम तो मेरे प्राणनाथ हो ।
दौलत ० -- कैसे ! अभी तो सब साबित हो गया है । जन्मपत्र, डाक्टरका सर्टीफिकेट,
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जैनहितैषीultiffilimERINARHI
अखबार, गवाह-और सबसे बड़ा प्रमाण रूलका दौलत०-बड़ी कृपा हुई ! हूला । इतनेपर भी मैं तुम्हारा प्राणनाथ बना बिहारी-अच्छा सेठजी, आपको कुछ हुआ हूँ ! मैं कौन हूँ ? मैं नहीं हूँ। शिक्षा मिली या नहीं ? चुन्नी-नहीं, तुम हो।
दौलत०--बहुत कुछ । यह मेरा पुनर्जन्म दौलत०--यह सुनकर बहुत खुश हुआ। है। चुन्नी"तुम नाहक ख़फ़ा क्यों होते हो!
गाना। दौलत-मैं खफ़ा हूँ, चिढ़ गया हूँ, मुझे
ग़ज़ल ( सोहनी) हैरान न करो, मैं वनको जाऊँगा।
व्यर्थ ही तूने जमा जोड़ी चुन्नी-मैं भी जाऊँगी।
__ मिला सुख क्या भला? ... दौलत-मैं फ़कीर हो जाऊँगा।
हाय, इसके वास्ते काटा चुन्नी-मैं फ़कीरिन हो जाऊँगी। __ अनेकोंका गला ! दौलत०-और तपस्या करूँगा कि पुनर्ज- गाड़ना, संदूकमें रखना, न्ममें मुझे ब्याह न करना पड़े । और अगर जमाकरना, वृथा। ब्याह भी करना पड़े तो तुम्हारे ही साथ न कालके आगे कहीं चलती करना पड़े।
किसीकी है कला ? चनी-मैं तपस्या करूँगी कि तुम्हारे ही जो न परउपकारमें या साथ मेरा ब्याह हो ।
भोगमें दौलत लगी। दौलत-नहीं, तुम मुझे प्यार नहीं करतीं। तो कहो, फिर साथ चुन्नी-वाह, प्यार क्यों नहीं करती। उसको कौन अपने ले चला! ' . (बिहारी सिर हिलाता है ।) दान या तो भोग या फिर दौलत०--सिर हिलाते हो ! अब क्या कोई नाश धनकी गति कही। और उपद्रव सोच रहे हो।
जो न देता और खाता, बिहारी-तुम्हारा यही विश्वास है
नाश ही उसको फला॥ दौलत०-विश्वास ! अब क्या यह साबित सूमके पीछे सभी धन करना चाहते हो कि यह मेरी स्त्री भी नहीं है! दसजगह लुट जायगा। जन्मपत्र निकालोसार्टीफिकेट हासिल करो- इस लिए खाले, खिलाले अखबारमें लिखो।
और बनले मनचला ॥ बिहारी-अच्छा तुम्हारी स्त्री तुमको देता हूँ। (पर्दा गिरता है।)
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शिक्षा। (ले०, श्रीयुत बाबू खूबचन्दजी सोधिया
बी. ए, एल. टी. ।)
समाजके सामने यह महत्त्वका प्रश्न सदैव किये जायँ, चौथे नैतिकशिक्षा और औद्योगिक ही उपस्थित रहता है कि अपनी संतानको किस विभाग, पाँचवें स्कूलोंको बनवाना, छट्रे इस भाँति शिक्षा दी जाय, उन्हें ऐसे नागरिक किस विभागका ऐसा संगठन करना ताकि समाजका भाँति बनाया जाय जिसमें कि वे अपने जीव- प्रत्येक बच्चा उसे सरलतासे प्राप्त कर सके. नका सर्वोत्तम उपयोग कर सकें । समाजकी इत्यादि सब बातोंका योग्य संस्कार करना और सत्तामें हमेशा अदल बदल हुआ ही करती है। समय पर उसकी आलोचना करते रहना कोई नये नये परिवर्तन होते हैं और प्राचीन विचार- सरल काम नहीं है । जबतक देशके प्रत्येक प्रणाली तथा रीति-रिवाज अपने बलको खोकर व्यक्तिको शिक्षाका महत्त्व भलीभाँति विदित न धीरे धीरे मृतप्राय हो जाते हैं। समाजकी जरू- होगा, जबतक हम इस बातकी जिम्मेदारी अपने रतें भी समय समय बदला करती हैं । प्राचीन सिरपर लेनेके लिए राजी न होंगे-तबतक इस भारतको एक समय संतान-वृद्धि इष्ट थी, इसके विषयमें यथेष्ठ उन्नति होना संभव नहीं है। विपरीत आज हमें संतानवृद्धिको कम करना हमारे अगुओं और अधिकारियोंके चित्तपर यह ही ठीक ऊंचता है । इसी लिए समाजको समय बात भलीभाँति अंकित हो जाना चाहिए कि समयपर इन नवीन बलोंका विचार करके अपनी देशके जीवन-मरणका प्रश्न यही है। संतोषका जरूरतोंके माफिक अपने बालकोंकी शिक्षामें विषय है कि कुछ दिनोंसे सरकारने शिक्षा फर्क करना ही पड़ता है। यथार्थमें अपनी विस्तार करनेका निश्चय कर लिया है; परंतु आवश्यकताओंको पूर्णरूपसे पूरी करनेवाली भारत सरीखे भारी देशके लिए शिक्षाका यथेष्ठ शिक्षाप्रणालीका प्राप्त हो जाना कोई सरल बात बंदोवस्त कर देना कोई सहज बात नहीं है । नहीं है। जब कि इंग्लेंड सरीखे सुसभ्य और इस काममें प्रचुर धन और प्रचुर समयकी आवविचारशील देशमें भी राष्ट्रीय शिक्षा पूरी संतोष- श्यकता है । इसी लिए सरकार हमसे बार बार जनक नहीं है, तब भारत जैसा अवनति प्राप्त कहा करती है कि इस विषयमें हम लोग आगे देश यदि अपनी शिक्षाप्रणालीसे असंतुष्ट हो तो बढ़े । सर्वसाधारणको अब इस विषयमें सावधान कौनसा आश्चर्य है।
होकर विचार करना चाहिए। जरा जातीय शिक्षाकी गहनताका भी तो हर्षका विषय है कि थोड़े समयसे हमारा विचार करो । प्रथम तो योग्य शिक्षाका मतलब ध्यान भी इस ओर जाने लगा है । समाचारक्या है यही हल होना है, दूसरे कौन कौनसे पत्रों और सभाओंमें जहाँ तहाँ इस विषयकी विषय पढ़ाये जानेसे यह उद्देश्य सिद्ध होगा, चर्चा होने लगी है । सब लोग एक स्वरसे तीसरे शिक्षापद्धति और शिक्षक किस तरह प्राप्त प्रचलित प्रणालीके दोषोंको दिखला रहे हैं।
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जनहितैषी
HTTEminimit
किसी बातके दोषोंको देख लेना जितना सहज कृपासे इस विषयमें हमने खूब उन्नति कर ली है, उतना उन दोषोंका प्रतिकार करनेवाले है। जो कुछ बाकी है धीरे धीरे और भी पूरी उपायोंको बता देना सहज नहीं है । हमें एक होजायगी; परंतु अब सिर्फ नौकरकेि लिए ही बात यह भी ध्यानमें रखना चाहिए कि वस्तुके शिक्षा प्राप्त करनेका समय नहीं है । शिक्षाका गुण और दोषोंकी सच्ची आलोचना बिना विस्तार भी अब इतना होगया है कि सब उसकी परीक्षा किये नहीं हो सकती । समाज- शिक्षितोंको सरकारी नौकरी मिल जाना भी सुधारका क्षेत्र इतना विस्तीर्ण है कि इसमें संभव नहीं । इस बातको भी सब लोग मानते सहसा उतावली करके किसी कार्यको कर हैं कि शिक्षित मनुष्योंका बेकार बैठना अच्छा डालना अच्छा नहीं हो सकता । गिरते-पड़ते, नहीं । भूखे बैठे किसीसे रहा नहीं जा सकता। उठते-बैठते, साहसपूर्वक आशाके सहारे चलते कहावत है कि निठल्ले मनुष्यके हृदयमें शैताचलते उन्नतिका शिखर ही प्राप्त होता है। नका निवास होता है । समाजका उपकार
इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान प्रणालीमें करनेके बदले ऐसे लोग अक्सर उसे बड़ा कई बड़े बड़े दोष हैं; परंतु नवीन प्रणाली नुकसान पहुंचाते हैं । इस कठिन समस्याका कैसी होनी चाहिए इस विषयमें भी तो बड़ा कोई न कोई उपाय अवश्य ढूँढ़ना चाहिए । मतानैक्य है । एक ओर वर्तमान प्रणालीके अब ऐसा समय नहीं है कि इस विषयकी पृष्ठपोषक अधिकांश इसीको कायम रखकर
उपेक्षा की जाय। जहाँ तहाँ कुछ कुछ रद्दोबदल करनेसे ही शिक्षित युवाओंको रोजगार किस भाँति संतुष्ट हैं, दूसरी ओर कई लोग प्रचलित पद्ध- मिले-ऐसी शिक्षाकी व्यवस्था क्योंकर की जाय तिका नये सिरेसे संस्कार करना आवश्यक कि स्कूल और कालेजोंसे निकलकर हमारे समझते हैं । मतानैक्य होना तो कोई बुरी युवाओंको नौकरी के लिए भटकना न पड़े, यही बात नहीं है; परंतु विषयके महत्त्वको देखकर प्रश्न हमारे सामने उपस्थित है। कई लोग इसको जहाँ तक हो सुधार इस भाँति किया जाय कि हल करनेका एक विचित्र ही उपाय बताते हैं। जिसमें पैसे और परिश्रमकी बचतके साथ ही वे कहते हैं कि हर साल सरकारी नौकरकिी साथ आधिकसे अधिक लाभ मिल सके। जगहें कितनी खाली होती हैं यह गिन लो-अपने
वर्तमान प्रणालीमें क्या क्या दोष हैं ? स्कूल कालेजोंमें उसी प्रमाणसे विद्यार्थियोंकी पहला और सबसे भारी तो यही है कि स्कूलों संख्या रखलो अथवा कुछ नहीं तो परीक्षाओंको
और कालेजोंसे निकले हुए विद्यार्थी सिर्फ सख्त कर दो-ऐसा करनेसे काम हो जायगा। नौकरी पर ही अवलम्बित रहते हैं । कारण विद्यार्थी उतने ही पास होसकें जितने नौकरी इसका यह है कि उन्हें ऐसी कोई कला अथवा पा सकते हैं, पर यह उपाय कोई अच्छा उपाय उद्योग नहीं सिखाया जाता जिससे कि उनमें नहीं है। हम पछते हैं. भलावे विद्यार्थी जो कई बार स्वावलम्जनका नाना बढ़ इतन तन्दन नही लगाकर पर मान जान ता रोजगार कन!
नौकरियाँ करके राज्यप्रबन्ध-सम्बन्धी शिक्षा थियोंको भर्ती करेंगे ही नहीं, तो कहना होगा प्राप्त करनेकी आवश्यकता थी; परन्तु सरकारकी कि यह असंभव है। शिक्षा एक ऐसी मिठाई है
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पर
शिक्षा।
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कि जिसकी एक बार चाट लग जाने पर मनु- तरहसे नष्ट होता है । इसमें कोई संदेह नहीं ध्य उसे खाये बिना नहीं रह सकता । शिक्षाके कि मेट्रिकुलेशन तककी सात सालकी शिक्षाक्षेत्रको संकुचित करनेकी सलाह अच्छी नहीं में जो ज्ञान सम्पादित होता है यदि मातृभाषाहै, वह निराशा और असंतोषसे भरी हुई साफ के द्वारा शिक्षा दी जाय तो उतना ज्ञान दो सानजर आती है । इस सलाहको माननेके लिए लहीमें प्राप्त हो सकता है। बड़ा भारी नुकसान कोई तैयार न होगा।
तो इससे यह है कि बालकको कामयाबी ___ इस रोगका उत्तम उपाय यही है कि औद्यो- हासिल न होनेसे उसे शिक्षासे घृणा हो जाती गिक शिक्षाकी व्यवस्थाकी जाय । इसके दो है । यदि शिक्षा मातृभाषाके द्वारा दी जाय तो उपाय हैं या तो जिस भाँति साधारण शिक्षा- निस्संदेह बड़ा लाभ हो । यहाँ तक तो सब के छोटे स्कूलसे लगा कर बड़े बड़े कालेज तक लोगोंकी राय एक ही है; परंतु प्रश्न यह है कि हैं उसी भाँति औद्योगिक शिक्षाके लिए भी ऐसे क्या हमारी मातृभाषायें इतनी प्रौढ़ हो गई हैं स्कूल हो जहाँ निम्न श्रेणीके कौशलसे लगाकर कि उनके द्वारा शिक्षा दी जासके ? इस प्रश्नके ऊँची ऊँची कलाओंकी शिक्षा दी जाय । विषयमें लोगोंकी रायें भिन्न भिन्न हैं ! बहुतोंका प्रत्येक शहरमें एक एक औद्योगिक स्कूल खोलने- मत है कि मातृभाषायें इस कार्यके लिए सर्वथा -से बड़ा भारी लाभ होगा। अथवा यदि खर्चके उपयुक्त हैं । पुस्तकें तैयार की जासकती हैं और कारण ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती तो कमसे उनके द्वारा शिक्षा मजेसे दी जासकती है। कम इतना तो अवश्य होना चाहिए कि प्रत्येक इसके विरुद्ध कई लोगोंकी समझमें समय अभी स्कूलमें एक एक औद्योगिक कक्षा खोल दी नहीं आया है। कुछ भी हो, इस विषयमें आधिक जाय । ऐसे विद्यार्थी जो पढ़ने लिखने में कशल विवाद करनेकी आवश्यकता नहीं है । मातृभाषा नहीं हैं इन कक्षाओंमें स्थान पा सकेंगे। इस द्वारा शिक्षा प्राप्त करना यही प्राकृतिक नियम भाँति एक निशानेसे हम दो मतलब सिद्ध कर है । हर्षका विषय है कि सरकारका ध्यान भी - सकेंगे । पहला, हमारे विद्यार्थी नौकरीके लिए कुछ कुछ इस ओर झुकने लगा है । वह दिन 'चिल्लाहट न मचायेंगे, दूसरे हमारा उद्योग भी अब दूर नहीं है जब कि शिक्षा मातृभाषा द्वारा उन्नत हो जायगा । इस विषयमें सिर्फ एक ही दी जाने लगेगी। अड़चन नजर आती है । वह यह कि वर्ण- अँगरेजी भाषाने हमारा बड़ा उपकार किया व्यवस्थाके कारण क्या उच्च जातिके हिन्दू अपने हैं। हमारे संकुचित विचार-क्षेत्रको विस्तत कर लड़कोंको इन शालाओंमें भेजनेको राजी देना इसीका काम है। इस भाषाका साहित्य होगे ? जहाँ तक देखा जाता है, अब लोग वर्ण- कई अमूल्य भावेसे भरा हुआ है। मातृभाषाव्यवस्थाके उतने अंध-उपासक नहीं हैं और वे ओंका खजाना बढ़ानेके लिए भी अँगरेजीका इन शालाओंका उपयोग करनेमें न हिचकेंगे। ज्ञान आवश्यक है। संसारके सामयिक विचा
वर्तमान प्रणालीके विरुद्ध दूसरा दोष यह है रोंसे परिचित रहना भी अँगरेजी जाने बिना कि अँगरेजी भाषाके द्वारा शिक्षा प्राप्त करनेमें कठिन है और खास कर व्यापारमें तो इसके बिना आधिक श्रम और समय खर्च होता है । इससे बड़ी ही असुविधा होती है । इस लिए अँगरेजीबालकपनकी बहुमूल्य वर्षे और स्वास्थ्य बुरी की शिक्षा तो हमें अवश्य देना होगी; परंतु
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心
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जैनहितैषी -
अँगरेजी अन्य भाषाओं की तरह क्यों न पढ़ाई जाय ? इस विषय में भी हमें कई कठिनाइयोंका साम्हना करना होगा । कालेजोंकी उच्चशिक्षा अभी मातृभाषाओं में नहीं दी जा सकती। यदि हाईस्कूलों में शिक्षा अँगरेजीमें न दी जायतो क्या कालेजों की शिक्षा उसके द्वारा आसानसे प्राप्त की जासकेगी ? यथार्थमें इस विष यमें अधिक वादविवाद न करके समय ही की प्रतीक्षा करनी चाहिए ।
शिक्षापद्धतिके विषयमें भी बहुत कुछ सुधार करनेकी आवश्यकता है । कई विषय यथा - भूगोल इतिहास स्कूलोंमें बुरी रीतिसे पढ़ाये, जाते हैं । पहाड़ों और नदियोंके नाम तथा इतिहासकी तारीखें रटते रटते विद्यार्थियोंका जी ऊब आता है । विद्यार्थियों को इन विषयोंसे अभिरुचि उत्पन्न करानेका उद्देश्य शिक्षकोंको अपने सामने रखना चाहिए। शिक्षाको व्यवहा रोपयोगी बनाना हमारा कर्तव्य है ।
इस समयका बड़ा भारी प्रश्न शिक्षाका विस्तार है । देशमें अशिक्षाका राज्य फैला हुआ है। समाजको इससे बढ़कर हानि और क्या हो सकती है, जब कि अज्ञानमें हम इतने डूबे हुए हैं कि सौमेंसे ८० मनुष्योंको काला अक्षर भैंसे के बराबर है। तब बताओ उन्नति किस भाँति हो सकती है ? उन्नतिके जितने रास्ते हैं उन सबमें सबसे पहली और भारी अड़चन जनसमूहका अशिक्षित होना है । मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक उन्नति होनेका सर्वप्रधान उपाय शिक्षा ही है। निरक्षरताके समान देशका दूसरा भयानक शत्रु कोई नहीं है। इसलिए राजा और प्रजा दोनोंका कर्तव्य है कि जिस भाँति हो सके शिक्षाका विस्तार किया जाय। नैतिक शिक्षाका प्रश्न भी बड़े महत्त्वका है। परंतु नैतिक शिक्षाका मतलब हमें भलीभाँति
बाल
समझ लेना चाहिए । नैतिकशिक्षाका मतलब पुस्तकें पढ़ लेना ही नहीं है । चरित्रगठन करने - के लिए अच्छी आदतें डालना ही सबसे अच्छा उपाय है । यह बात निस्संदेह सत्य है कोंके सामने अच्छे आदर्श रक्खे जायँ; परंतु बालकोंकी आदतोंको सावधानी से देखना भी आवश्यक है । हमारे देशमें ज्योंही माता पिताओंने लड़केका नाम स्कूल में भर्ती करा पाया कि वे उसकी ओरसे बिलकुल निश्चिंत हो जाते हैं । यह बात ठीक नहीं है। यदि तुम बालककोंको २४ घंटे गुरुके सामने नहीं रख सकते तो जितने समय तक वह पाठशालामें नहीं है तुम्हीं उसके जिम्मेदार हो । प्रत्येक माता पिताका कर्तव्य है कि वह अपने बालकों के आचरण पर दृष्टि रक्खे ।
हमारे युवाओं का बड़ा भारी दोष यह है कि वे आलसी हो जाते हैं। अपना काम खुद करने की तो उनमें हिम्मत ही नहीं रहती । उसका सबब कुछ तो यह है कि विद्यार्थी समझते हैं कि अँगरेजी पढ़कर बाबू बनेंगे, खूब तनख्वाह मिलेगी - काम करना तो कुलीगिरी है । अक्सर माता पिता भी इस विषय में लापरवा रहते हैं । वे कहते हैं लड़का तो पढ़ता है बाजारका काम न लेना चाहिए। यह बड़ी गल्ती है । दूसरा कारण बोर्डिंगहाउसोंकी अव्यवस्था है जहाँ विद्यार्थियों को पानी भी बहुधा नौकर ही पिलाते हैं । इनके सिवाय और भी कई कारण हैं । यथा ( १ ) मानसिक श्रमकी अधिकता ( २ ) विषय विभागमें ऐसा कोई विषय नहीं जिसमें शारीरिक श्रम करना पड़े ( ३ ) परीक्षाफलोंकी कड़ाई ( ४ ) शारीरिक खेल कूदमें योग न देना । हमें आवश्यक है कि अपने बालकोंकी इस बुरी टेव पड़ जाने के कारणोंको देखें और उन्हें दूर करें ।
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वह क्यों न निराश हो? TRITTRINTERNATIO NAL
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शिक्षाका विषय बहुत ही गहन है । इस विषयमें वर्षों तक लगातार विचार करनेकी आवश्य- महाकवि वीरनन्दि ।। कता है । इसके विचारके लिए प्रत्येक ग्राममें एक एक शिक्षा समितिका होना आवश्यक है। इन सभाओंमें ग्रामके सभ्य इकठे होकर शिक्षा
___ मूलसंघ अर्थात् दिगम्बर सम्प्रदायकी चार
शाखायें हैं-नन्दि, सिंह, सेन और देव । इन विषयक बातोंकी आलोचना किया करें । सरकारने इसी अभिप्रायसे प्रत्येक स्कूलमें एक एक ..
शाखाओंकी भी प्रतिशाखायें हैं जो गण, गच्छ बोर्ड स्थापित किया है । दुखका विषय है कि
आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं । नन्दिसंघमें जो कई सरकारकी इस मंशाका लाभ हम न उठावें ।
गण गच्छादि हैं, उनमें से एक 'देशीय ' गण
' भी है। चन्द्रप्रभकाव्यके कर्त्ता महामना वीरनन्दि शहरोंमें तो इस प्रकारकी सभायें अवश्य ही होना चाहिए । ऐसी सभाओंका प्रचार होनेसे ,
' इसी देशीय गणमें हुए हैं । ग्रन्थके अन्तमें
" उन्होंने जो अपना थोड़ासा परिचय दिया है माता पिताओंकी शिक्षाके विषयमें रुचि बढ़ेगी।
- उससे मालूम होता है कि वे आचार्य अभयन___ लड़कियोंकी शिक्षाके विषयमें हमें बहुत कुछ करनेकी आवश्यकता है। जब तक मातायें ।
' न्दिके शिष्य थे और अभयनन्दिके गुरुका सुशिक्षित न होगी तब तक देश और समाजका ।
P L नाम गुणनन्दि तथा दादा-गुरुका नाम भी कल्याण न होगा। आनन्दका विषय है कि इस गुणनान्द था। विषयमें अब हम सचेत हो चले हैं; परंतु सच बभूव भव्याम्बुजपद्मबन्धुः पूछो तो हमने आज तक कुछ भी उन्नति नहीं पतिर्मुनीनां गणभृत्समानः । की है । याद सैकड़े पीछे हम एक या दो पुत्रियोंको शिक्षित कर सके तो मानना होगा कि हमने
ना होगा कि हमने १ जैनसिद्धान्तभास्करकी चौथी किरणमें देशीअभी तक भरे हुए समुद्र में सिर्फ मन दो मन शक्कर यगणको देवसंघका गण बतलाया है; परन्तु बाहुबही डाली है । परन्तु याद रहे कि शिक्षाकी लिचरितके निम्न श्लोकसे मालूम होता है कि वह जरूरतको जब तक हम पूरी न करेंगे, उन्नतिके नन्दिसंघका ही भेद या नामान्तर थाःलिए चिल्लाना मानो सघन जंगलमें रोना ही है। पूर्व जैनमतागमाब्धिविधुवSTARRANTARRARastar
चीनन्दिसंघऽभव
न्सुज्ञानर्द्धितपोधनाः वह क्यों न निराश हो ?
कुवलयानन्दा मयूखा इव । Kuuuuuuuuuu
सत्संघे भुवि देशदेशनिकरे ले-बाबू जुगल किशोरजी, मुख्तार । श्रीसुप्रसिद्ध सति प्रबल धैर्य नहीं जिस पास हो,
श्रीदेशीयगणो द्वितीयविलसन्
नाम्ना मिथः कथ्यते ॥ ८७ ॥ हृदयमें न विवेक-निवास हो।
२ छपी हुई, और दो हस्तलिखित प्रतियोंमें भी
गुणनन्दिके गुरुका नाम गुणनान्द ही लिखा है। जगतमें वह क्यों न निराश हो ? मालूम नहीं यह कहाँ तक ठीक है. कुछ पाठान्तर
न हो।
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सदग्रणीर्देशिगणाग्रगण्यो गुणाकरः श्रीगुणनन्दिनामा ॥ १ ॥ गुणग्रामाम्भोधेः सुकृतवसतेोमंत्रमहसामसाध्यं यस्यासीन्न किमपि महीशासितुरिव ।
स तच्छिष्यो ज्येष्ठः शिशिरकरसौम्यः समभवप्रविख्यातो नाम्ना विबुधगुणनन्दीति भुवने ॥ २ ॥ मुनिजननुतपादः प्रास्तमिथ्याप्रवादः
सकलगुणसमृद्ध
स्तस्य शिष्यः प्रसिद्धः । अभवदभयनन्दी
जैनहितैषी -
जैनधर्माभिनन्दी स्वमहिमजितसिन्धु
भव्यलोकैकबन्धुः ॥ ३॥ भव्याम्भोजविबोधनोद्यतमते
र्भास्वत्समानत्विषः
शिष्यस्तस्य गुणाकरस्य सुधियः श्रीवीरनन्दीत्यभूत् । स्वाधीनाखिलवाङ्मयस्य भुवनप्रख्यातकीर्त्तः सतां संसत्सु व्यजयन्त यस्य जयिनो वाचः कुतर्काङ्कुशाः ॥ ४ ॥ अर्थात् भव्यजनरूपी कमलोंको प्रफुल्लितहर्षित करनेवाले मुनिसंघके स्वामी, गणधरकी तरह ज्ञानवान्, सज्जनोंमें श्रेष्ठताका मान पाये हुए, देशिगण में प्रधान माने-जाने वाले और गुणकी खान ऐसे श्रीगुणनन्दि नामके एक आचार्य हुए। उन गुणसमुद्र सुकृतके स्थान गुणनन्दि आचार्य के लिए - राजाको जैसे कोई बात असाध्य या कठिन नहीं होती - कुछ कठिन
न था । इन गुणनन्दिके प्रधान शिष्य दूसरे गुणनन्दि हुए, जो चन्द्रमाके समान शान्त - स्वभाव और पृथ्वीमें प्रसिद्ध थे । जिनके चरणोंको मुनिजन नमस्कार करते हैं, मिथ्यावाद जिन्होंने नष्ट कर दिया है, जो सब श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त हैं, जैनधर्मका प्रभाव बढ़ानेवाले हैं, जिन्होंने अपनी गंभीरतारूप महिमासे समुको जीत लिया है और जो भव्यजनोंके एकमात्र बन्धु - हितकर्त्ता थे ऐसे अभयनन्दि मुनि उन दूसरे गुणनन्दि आचार्यके शिष्य हुए । उन भव्यजनरूपी कमलोंको विकसित - आनन्दित करनेवाले, सूर्य के समान तेजस्वी और गुणोंके धारी बुद्धिमान अभयनन्दि आचार्यके शिष्य वीरनन्दी हुए, जिन्होंने सम्पूर्ण वाङ्मयको अपने अधीन कर लिया था -जो अपनी रचना में अपनी इच्छा के अनुसार अर्थगाम्भीर्य, शब्द-सौन्दर्य आदि गुण ला सकते थे और जिनकी कीर्ति संसारमें प्रख्यात थी उन वीरनन्दिके वचन कुतर्कका नाश करनेको अंकुश ́ समान थे । सभाओं में उन्हीं के वचनोंकी विजय होती थी ।
अपने विषयमें उन्होंने इससे अधिक परिचय देनेकी आवश्यकता नहीं समझी। परन्तु आजकलके पाठक एक प्रसिद्ध महाकविके सम्बन्धमें इतनेसे सन्तुष्ट नहीं हो सकते । उन्हें अधिक नहीं तो कमसे कम इतना तो अवश्य मालूम हो जाना चाहिए कि वे किस समय हुए हैं ।
एकीभाव-स्तोत्र के कर्ता महाकवि वादिराज - सूरने अपना पार्श्वनाथ काव्य शक संवत् ९४७ * बनाया है । इसके प्रारंभ में रचयिताने * शाकाब्दे नगवार्धिरन्ध्रगणने संवत्सरे क्रोधने,
मासे कार्तिकनानि बुद्धिमहिते शुद्धे तृतीयादिने ।
सिंहे पाति जयादिके वसुमतीं जैनी कथेयं मया, निष्पत्तिं गमिता सती भवतु वः कल्याणनिष्पत्तये ॥
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HAMARITALIATIMILAIMI LAIMIRDS
महाकवि वीरनन्दि। timirmittinimurnimmitmntAINS
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पूर्वके अनेक ग्रन्थकर्ताओंका स्तवन करते हुए धारक इन्द्रनन्दि गुरुको नमस्कार करो लिखा है:
॥८९६॥ जिनके चरणोंके प्रसादसे वीरनन्दि और चन्द्रप्रभाभिसम्बद्धा
इन्द्रनन्दि शिष्य अनन्त संसारसे पार हुए उन रसपुष्टा मनः प्रियम् ।
श्री अभयनन्दि गुरुको नमस्कार करता हूँ।।४३६।। कुमुद्वतीव नो धत्ते
___इन गाथाओंमें इन्द्रनन्दि वीरनन्दि और भारती वीरनन्दिनः ॥ ३०॥ अभयनन्दि इन आचार्योंका उल्लेख है और इस श्लोकमें महाकवि वीरनन्दिके चन्द्रप्रभ- अन्तिम गाथासे मालूम होता है कि इन्द्रनन्दि चरितका स्पष्ट उल्लेख है। इससे मालूम होता है और वीरनन्दि ये दोनों अभयनन्दिके शिष्य कि चन्द्रप्रभकाव्य पार्श्वनाथकाव्यकी रचनाके थे । इन्द्रनन्दिको नेमिचन्द्रने अपने गुरुके समयसे अर्थात् शक संवत् ९४७ से पहले रूपमें स्मरण किया है और साथ ही वीरनबना है। .
न्दिको भी जगह जगह नमस्कार किया है। आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीने अपने इससे भी जान पड़ता है कि वीरनन्दि और गोम्मटसार ग्रन्थमें नीचे लिखी गाथायें कही हैं:- इन्द्रनन्दि ये दोनों अभयनन्दि गुरुके सहाध्यायी णमिऊण अभयणादि
शिष्य होंगे। सुदसागरपारगिंदणंदिगुरुं ।
चन्द्रप्रभके कर्ता अपनेको भी अभयनन्दिका वरवीरणंदिणाहं
शिष्य बतलाते हैं, इससे जान पड़ता है कि पयडीणं पच्चयं वोच्छं ॥७८५ ॥
नेमिचन्द्रने जिन वीरनन्दिका स्मरण किया है
वे ही चन्द्रप्रभकाव्यके कर्ता हैं। -कर्मकाण्ड, अ०६।
गोम्मटसार-कर्मकाण्डमें ३९६ नम्बरकी एक णमह गुणरयणभूसण
गाथा इस प्रकार है:सिद्धतामियमहब्धिभवभावं। .
वरइंदणंदिगुरुणो वरवीरणदिचंदं
पासे सोऊण सयलसिद्धतं । णिम्मलगुणमिंदणंदिगुरुं ॥ ८९६ ॥
सिरिकणयणंदिगुरुणा -कर्मकाण्ड, अ०८
सत्तहाणं समुदिहं॥ जस्स य पायपसाएण-णंतसंसारजलहिमुत्तिण्णो।
अर्थात्-श्रीकनकनन्दिगुरुने इन्द्रनंदिगुरुके वीरिंदणंदिवच्छो
पास सारे सिद्धान्तको सुनकर सत्त्वस्थानका
कथन किया। णमामि तं अभयणंदिगुरुं ॥ ४३६ ॥
___ इसमें जिन कनकनन्दिका उल्लेख है, वे कर्मकाण्ड, अ० ४।
संभवतः वे ही हैं जिनका वर्णन श्रवणबेल्गोलके अर्थात्-अभयनन्दिको, शास्त्रसमुद्रके पार ४७ वें शिलालेखमें है । शिलालेखमें लिखा है पहुँचे हुए इन्द्रनन्दि गुरुको और वीरनन्दि कि गुणनन्दि आचार्यके ३०० शिष्य थे, उनमें नाथको नमस्कार करके प्रकृति-प्रत्यय अध्यायको ७२ शिष्य बहुत ही बड़े सिद्धान्तशास्त्री थे और कहता हूँ ॥७८५ ॥ हे गुणरूप रत्नोंके भूषण उन सबमें देवेन्द्र सैद्धान्तिक सबसे अधिक चामुण्डराय ! सिद्धान्तरूप अमृतसमुद्रके बढ़ाने- प्रसिद्ध थे । इन देवेन्द्र मुनिके शिष्य कलधौतवाले वीरनन्दि चन्द्रमाको और निर्मल गुणोंके नन्दि या कनकनन्दि सिद्धान्तचक्रवर्ती थे।
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MARATH AMARIBANAAT
जैनहितैषीHAImmTTTTTTTTHIDEEIN
चन्द्रप्रभकी प्रशस्तिके अनुसार गुणनन्दिके ऊपर यह कहा ही जा चुका है कि शक शिष्य अभयनन्दि और उनके वीरनन्दि हैं। संवत् ९४७ में वादिराजने वीरनन्दिका उल्लेख जान पड़ता है उन्हीं गुणनंदिकी परम्परामें ही किया है । अतएव इससे पहले शक संवत् ९०० पूर्वोक्त कनकनन्दि हैं । अर्थात् गुणनंदिके ३०० या विक्रम संवत् १०३५ के लगभग वीरनन्दिका शिष्योंमेंसे जिस तरह एक देवेन्द्र होंगे उसी समय समझना चाहिए । विक्रमकी ग्यारहवीं प्रकार अभयनन्दि भी होंगे। देवेन्द्रके शिष्य
। शताब्दिके प्रारंभमें वे इस धरामण्डलको सुशोकनकनन्दि हुए और अभयनन्दिके वीरनन्दि हुए। __आचार्य नेमिचन्द्रकी लिखावटसे जान पड़ता
मित करते थे। है कि वीरनंदि, इंद्रनन्दि अभयनन्दि, कनकनन्दि वीरनन्दि नामके अनेक विद्वान् हो गये हैं। आदि सब उनके समकालीन थे। अतएव यदि एक वीरनन्दि 'आचारसार ' नामक यत्याचारनेमिचन्द्रका समय मालूम हो जाय तो लगभग ग्रन्थके प्रणेता भी हैं; बृहद्व्यसंग्रहकी भूमिकामें वही समय वीरनन्दिका सिद्ध हो जायगा। पं. जवाहरलालजी शास्त्रीने उन्हें और चन्द्रप्र___ गोम्मटसारकी अन्तिम गाथाओंसे मालूम होता भकाव्यके कर्ताको एक ही बतला दिया है; है कि नेमिचन्द्र आचार्यने यह ग्रन्थ चामुण्ड, परन्तु यह भ्रम है । वे मेघचन्द्र विद्यदेवके रायकी प्रेरणासे बनाया था और चामुण्डरायने शिष्य थे जिनका कि स्वर्गवास शक संवत् स्वयं इस ग्रन्थकी एक कर्णाटकी-वृत्ति बनाई १०३७ में हुआ था । एक वीरनन्दिका जिकर थी । अतः चामुण्डरायके समयमें ही नेमिचन्द्र श्रवणबेल्गुलके ४७ वें शिलालेखमें है; परन्तु हुए हैं, यह निर्विवाद है।
वे महेन्द्रकीर्तिके शिष्य थे। चामण्डराय गंगवंशीय राजा राचमल्लके महाकवि वीरनन्दिका केवल एक चन्द्रप्रभप्रधान मंत्री और सेनापति थे । राचमल्लके भाई चरित नामका काव्य उपलब्ध है । उन्होंने इसके रक्कस गंगराजने शक संवत् ९०६ से ९२१ सिवाय और कोई ग्रन्थ रचा या नहीं, इसका तक राज्य किया है और शायद रक्कस गंगरा- पता नहीं। जके बाद ही राचमल्लको सिंहासन मिला था। इस ग्रन्थकी अन्तप्रशस्तिसे और आचार्य कनडीभाषाके प्रसिद्ध कवि रन्नने शक संवत् नेमिचन्द्रने उन्हें जिन शब्दोंमें स्मरण किया है ९१५ में 'पुराणतिलक' नामक ग्रन्थकी रचना उनसे, मालूम होता है कि वे केवल कवि ही की है और उसने आपको रक्कस गंगराजका नहीं थे-अखिल वाङ्मय पर उनका अधिकार आश्रेित बतलाया है। चामुण्डरायकी भी अपने था, वे सभाओंमें बोलनेवाले अच्छे वक्ता थे और पर विशेष कृपा रहनेका वह जिकर करता है । सिद्धान्तशास्त्रोंके ज्ञाता भी थे । कर्णाटकाकविचरितके कर्त्ताने चामुण्डरायका जन्म कविने अपने स्थानादिका उल्लेख कहीं भी शक संवत् ९०० के लगभग बतलाया है। इन सब नहीं किया है । तो भी जान पड़ता है कि वे बातोंसे शक संवत् ९०० के लगभग चामुण्डरायका कर्णाटकप्रान्तके ही रहनेवाले होंगे । क्योंकि समय सिद्ध होता है और यही समय नेमिचन्द्र नेमिचन्द्र, चामुण्डराय आदि सब उसी प्रान्तमें सिद्धान्तचक्रवर्तीका भी समझना चाहिए । हुए हैं।
नोट--सम्पादकने यह लेख पं. उदयलालजी * बृहदाव्यसंग्रहकी भूमिकामें साहित्यशास्त्री पं० जवाहरलालजीने नेमिचन्द्रका समय शक संवत् ६०० काशलावाल द्वारा त्र
काशलीवाल द्वारा प्रकाशित हिन्दी-चन्द्रप्रभचरितसिद्ध किया है। परन्तु उसमें जो प्रमाण दिये गये हैं. की भूमिकाके लिए लिखा था; उपयोगी समझवे सब ऊँटपटाँग हैं-उनमें कोई तथ्य नहीं। कर हितैषीमें भी प्रकाशित कर दिया जाता है।
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सहनशीलता और प्रेम। (ले०–श्रीयुत बाबू भैयालालजी जैन।)
कोई भी मनुष्य जो अपने जीवनको इस जड़ तथा डाली काटते हैं; उनकी छाल निकासंसारमें, सुखमय करना चाहता हो और अपना लते हैं, तथा उनके ऊपर चढ़कर फल और वर्तमान शरीर छोड़नेके पश्चात् अपने जीवात्माको फूलोंको तोड़ते हैं । किन्तु वे वृक्ष उनपर न तो सुखी बनाना चाहता हो, उसे अपने निकट तथा लेश मात्र क्रोध करते हैं और न बैर ही बाँधदूरके सम्बन्धियोंकी ओरसे, अपने पड़ोसियोंकी नेका प्रयत्न करते हैं-सब दुःखोंको प्रसन्न मनसे ओरसे तथा अन्य परिचित या अपरिचित सहन करते हैं। इतना ही नहीं किन्तु वे ही लोग लोगोंकी ओरसे, अपने मन्द प्रारब्धकर्मके उद- यदि धूपसे संतप्त हो उनकी छायामें बैठने आते हैं यसे जो दुःख आ पड़ें उन्हें चिन्ता या विलाप तो बिना किसी प्रकारकी आना-कानी किये किये बिना प्रसन्न मनसे सहन करनेका स्वभाव बैठने देते हैं और अपनी छायाकी शीतलतासे डालना चाहिए । इतना ही नहीं किन्तु जो उनके शरीरकी संतप्तताको दूर करते हैं। अपनेको योग्य कारणके बिना ही दुःख देता हो जो वृक्षको पत्थर या लकड़ी मारता है, उसे न तो उससे द्वेष करना चाहिए और न बैर वह उल्टा फल फूल देता है। पत्थर, धातु बाँधना चाहिए; न उसे शाप देना चाहिए और अथवा रत्नोंके लिए कई लोग पर्वतको खोदते हैं; न किसीके समक्ष उसकी निन्दा करनी चाहिए। परन्तु वह उन खोदनेवाले लोगोंपर क्रोध न मनुष्योंका एक बड़ा भाग अज्ञानवश होनेके करके उल्टा उन्हें उनकी इच्छित वस्तयें कारण भूलका पात्र है । जो दुःख मिलता है, देकर सन्तोष करता है । पृथ्वीपर लोग कई अपवह अपने पूर्वके कोई दुष्कर्मोंके फलरूप प्राप्त वित्र वस्तुयें डालते हैं तथा स्वार्थवश होकर, स्थान होता है । ऐसा समझ कर अपनेको जो दुःख स्थान पर उसका छेदन भेदन करते हैं, किन्तु वह देता हो, उसपर मनमें किसी प्रकारका खेद न उनपर किसी प्रकारका क्रोध नहीं करती वरन् लाकर, विशुद्ध प्रीति रखना चाहिए । इस संसा- उन्हें अमूल्य पदार्थ देकर प्रसन्न होती है । देखो, रमें सब प्रकारसे सुखी कोई भी नहीं है । सब वृक्षादि जड़ कहलानेवाले पदार्थोंमें कितनी भारी मनुष्योंको दुःख भोगना ही पड़ता है । इसलिए सहनशीलता है ! अपकार करनेवालोंके ऊपर दुःखके समय मनुष्य ऊपर कहे गये दो शुभ भी उनकी कितनी भारी प्रीति रहती है !! गुणोंका आचारण करे तो वह दु:खमें भी सुख कहावत है कि “जितनी आकृतियाँ उतनी और शान्तिका अनुभव कर सकता है। प्रकृतियाँ।" इस लिए इस जगत्में अपने ही
सुखी होनेके लिए मनुष्यको पर्वतों तथा समान सबका स्वभाव हो, यह सम्भव नहीं है । पृथ्वीकी स्थितिका विवेकपूर्वक अवलोकन करके जिस प्रकार अपनी मुखाकृति पूर्णतया किसीसे उनके धैर्यका सावधानीसे अनुसरण करना चाहिए। नहीं मिलती, उसी प्रकार अपना स्वभाव भी कितने मनुष्य अपने प्रयोजनके लिए वृक्षोंकी सर्वाशमें किसीसे मिलना सम्भव नहीं है। जिसके
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स्वभावके साथ अपना स्वभाव न मिले और वह बना सकता है वह सर्वदा प्रसन्नताका अनुभव कदाचित् अपनी शक्ति भर हमको दुःख पहुँचावे, करने के लिए, भाग्यशाली होता है । जिस प्रकार उस समय भी विवेकपूर्वक यदि हम अपने मनको अपनेको दुःख प्रिय नहीं है, उसी प्रकार प्राणी उत्तम प्रकारसे समाधान कर सकें तो उस दुःखका मात्रको दुःख प्रिय नहीं है। ऐसा समझकर बुरा असर होनेके बदले हमको सुखका अनुभव बुद्धिमान् पुरुष किसी भी प्राणीको दुःख नहीं होगा। कोई भी मनुष्य, जो अपने मनमें सच्चा देता और अपनी सामर्थ्यानुसार सब प्राणियोंविवेक रखता है, उसे इस पृथ्वीपर लेश मात्र भी को सुख हो ऐसे विचार और प्रवृत्तिका सेवन दुःखकी प्रतीति होना सम्भव नहीं है। इसके करता है। विपरीत यदि उसके मनमें सच्चे विवेकका अभाव यह सर्वदा स्मरण रखना चाहिए कि, इस हो तो उसको प्राप्त हुए सुखमें भी दु:खका भान संसारमें, प्रायः सब मनुष्योंको न्यूनाधिक होना सम्भव है । वस्तुओंकी ऐसी दशा होनेसे दुःख भोगना पड़ता है। किसी भी प्रकारका हमें सर्वदा उत्तम सहवासमें रहना चाहिए, दुःख आनेपर मनुष्यको अपने मनमें ग्लानि अवकाशके अनुसार उत्तम पुस्तकाका श्रवण, व चिन्ता न लानी चाहिए; और न किसीके पठन तथा मनन करना चाहिए और सर्वदा साम्हने इस सम्बन्धमें विलाप करना चाहिए । शुभ विचार करके, अपने हृदयमें सच्चे और अपनी मन्दप्रारब्धसे जो दुःख आपड़े, उसको उच्च प्रकारके ज्ञानकी वृद्धि करना चाहिए। प्रसन्न मनसे सहन करनेकी आदत डालना ऊँचे ज्ञानकी वृद्धि होनेसे हमको प्रत्येक प्रतिकूल चाहिए। ऐसा स्वभाव बनानेसे लौकिक कार्योमें प्रसंगमें सहनशील होने तथा प्रसन्न रहनेका बल भी वाधा नहीं पड़ती और पारलौकिकमें भी प्राप्त होगा । जिस मनुष्यको परमात्माको प्रसन्न उन्नति होती है। चिन्ता और विलाप मनुष्यके तन करनेकी इच्छा हो, उसे प्रत्येक प्राणीके हृद- और मन दोनोंकी शक्तिको क्षीण करते हैं। यमें परमात्माका वास है, ऐसा विचार कर, यह कदापि न भूलना चाहिए कि आये हुए दुःखनिर्दोष मार्गपर चलके, सब प्राणियोंको प्रसन्न की निवृत्तिके लिए सज्जन लोग जो जो उपाय करनेका प्रयत्न करना चाहिए । परमात्माकी बतावें अथवा जो निर्दोष उपाय अपने मनमें कृपा सम्पादन करनेके इच्छुकको तो कीड़े उत्पन्न हों उनको कार्यमें परिणत करनेमें कोई मकोड़े सदृश क्षुद्र प्राणियोंपर भी विशुद्ध प्रीति- हानि नहीं है । जैसे, उस प्रसंग पर सुपात्रको, रखना चाहिए, फिर सब मनुष्योंपर और विशे- यथाशक्ति दान देना, अथवा परम पवित्र परषकर अपने सम्बन्धियों तथा इष्ट मित्रोंपर सच्चा मात्माका ध्यान या स्मरण करना बहुत लाभदाप्रेम करना चाहिए, इसमें तो कहना ही क्या है ? यक है। अपत्ति पड़ने पर शोकसे आपघात
विवेकी मनुष्यको अपना हृदय संकीर्ण न करनेका विचार करना मनकी निर्बलता है। रखकर जितना हो सके उतना उसे विशाल मनमें आपघात करनेके विचार मात्रसे पापबनानेका प्रयत्न करना चाहिए, अर्थात् सब का बन्ध होता है । इसलिए ऐसे समय सत्संजगत् अपने स्वरूपके एक स्थानमें समा जाय गमें रहकर, आपघातका विचार ही मनमें न इतनी विशालता हमको अपने हृदयकी करना आने देना चाहिए । दुःखके समय मनुष्य धैर्य चाहिए । जो मनुष्य अपने हृदयको इतना बृहत् न रखके आत्मघात करता है, परन्तु उसे स्म
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सिंहान्योक्ति।
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TITIATI
रण रखना चाहिए कि पापका फल भविष्यमें देख सके तथा अपने मनमें उसपर क्रोधके भाव अवश्य भोगना पड़ता है, इस लिए मनुष्यको उत्पन्न न होने दे, उतना उतना उसे उन्नत दुःख आ पड़ने पर और कोई उपायकी शरण होता हुआ जानना चाहिए । लेना चाहिए । परन्तु ऐसा पाप भूलकर भी कोई भी मनुष्य जो इस लोक तथा परलोकन करना चाहिए । अपने किये हुए पाप कर्मोंसे में सुख भोगना चाहता है, उसे चाहिए कि वह ही मनुष्यको दुःख भोगना पड़ता है। इस लिए बहुत सहनशील बने । अर्थात् दुःख आपड़ने । उन दुःखोंको सहनशीलता और प्रसन्नतासे भोग पर लेशमात्र भी दुखित न हो कर लेनेमें ही उसका लाभ है, क्योंकि किसी लौकिक अपने मनमें प्रसन्नता रक्खे । अपने दुःखको उपायसेतो वह उससे छुटकारा पा ही नहीं कोई पाप संस्कारका उपभोग समझकर, अपने सकता।
दुःख पहुँचानेवाले पर क्रोध न करके, उस विवेकी मनुष्यको अपना हृदय सर्वदा जाग्रत पर दया तथा प्रेम रक्खे । बुरे प्रसंग पर सहनरखना चाहिए । हृदयको इतना सहनशील शीलता धारण करना तथा उपकार करनेवाले बनावे कि चाहे आकाश टूट पड़े पर उसे लेश पर प्रेम करनेका कार्य आरम्भमें तो बहुत त्रासमात्र भी क्लेशानुभव न हो । मनुष्यको अन्य दायक जान पड़ेगा किन्तु दयासागर परमात्मा प्राणियोंकी ओरसे जो जो दुःख मिलते हुए पर विश्वास रखके, जो कोई सर्वदा इस शुभ प्रतीत हों, वे सब उसकी मंदप्रारब्धसे प्राप्त प्रयत्नको चालू रक्खेगा तो योग्य कालमें, वह हुए हैं, उनका देनेवाला तो किसी कारणसे उपयुक्त दोनों शुभ गुणोंको प्राप्त कर सकेगा; निमित्तरूप ही हुआ है, ऐसा मानना चाहिए। और उनका फलरूप वह इस लोक तथा परलोक अपने दुःख देनेवाले तथा अपने शत्रु पर, दोनों में सुखानुभव करनेको भाग्यशाली होगा । जितना जितना मनुष्य दया तथा प्रेमकी दृष्टिसे 'सांज वर्तमान' के पटेटी-अंकसे अनुवादित ।
सिंहान्योक्ति।
ले०-श्रीयुत 'मीर' जाने कीन्हों दमन है,
मत्त मतंगन मान। हाय ! दैववश सिंह सो,
परोपींजरे आन ॥ परो पीजरे आन,
श्वानके गन ढिग भूके। विहसें ससा-सियार,
कान पै आके कूकें ॥ 'मीर' बात है सत्य,
लोकमें कहिगे स्याने। का पै कैसो समय कबै परि है को जाने ॥
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कषाय-वासना । । (लेखक, श्रीयुत बाबू दयाचन्द्रजी गोयलीय बी. ए.। )
मनुष्यके जीवन कषाय * सबसे नीची और कषाय ( बासना ) का क्षेत्र सबसे नीचा है । बुरी चीज है । इससे नीची और बुरी और कोई उससे नीचा और कोई स्थान नहीं है । उसमें प्रवृत्ति नहीं है । कषायरूपी नरक-कुण्डमें राग, पड़े हुए जीवोंको अनेक कष्टोंको भोगना पड़ता द्वेष, काम, क्रोध, माह, लोभ, मान, माया, द्रोह, है। जिनको अपना हित अभीष्ट है, उन्हें उसमेंमात्सर्य, प्रतीकार,मिथ्या अपवाद, मिथ्या भाषण, से निकलकर ऊपर ऊपर चढ़ना उचित है । उन्नहिंसा, चौर्य, अदया,संदेह, ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंका ति-मार्ग कुछ कठिन या दूर नहीं है । बहुत ही बास रहता है । ये दुर्गुण मनुष्यके मनरूपी सहज और पास है. । अपने ऊपर विजय प्राप्त वनमें सदा भ्रमण किया करते हैं । इनके अति- कर लो, अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें करलो रिक्त शोक, दुःख, संताप, पश्चात्तापकी भीषण बस उन्नति-मार्ग मिल जायगा । जिस मनुष्यमेंभयंकर मूर्तियाँ भी मन पर सदा अधिकार से स्वार्थकी गंध निकल गई है, जिसने अपनी जमाये रखती हैं। ऐसे अंधकारमय जगत्के इच्छाओंको वशमें करना और अपने चंचल निवासी वे अज्ञानी जन होते हैं जिन्हें शांतिकी मनपर आधिकार प्राप्त करना शुरू कर दिया है, पवित्रता और परमात्मप्रकाशके परमानंदसे अन- उसने उन्नत्ति मार्गको प्राप्त कर लिया है। भिज्ञता होती है जो सदा उनके ऊपर दैदीप्य- कषाय मनुष्य जातिका शत्रु है, शांतिका मान रहता है परंतु उनके लिए कुछ भी लाभ- घातक है और आनंदका नाशक है । कषायोंके दायक नहीं; कारण कि उनकी दृष्टि उस पर वशीभूत होकर मनुष्य नीचसे नीच और अधनहीं पड़ती, किंतु सदा भूमिकी ओर भौतिक मसे अधम काम करनेपर उतारू हो जाता है । पदार्थो पर लगी रहती है।
कषाय दुखका मूल है और पापकी खानि है। ___ हाँ, ज्ञानी पुरुष ऊपरको दृष्टि उठाकर मनुष्यके अतरंगमें स्वार्थकी उत्पत्ति, ईश्वरीय देखते हैं । उन्हें इस कषायरूपी जगतसे नियमोंकी और परमात्मगुणोंकी अज्ञानता और संतोष नहीं होता । वे ऊपरके शांतिमय जगत- शान्त और पवित्र मार्गकी अनभिज्ञताके कारण की ओर चढ़ते हैं। उसका प्रकाश और वैभव पहले होती है। कषाय अंधकाररूप है । इसकी बढ़ती तो उन्हें बहुत दूर मालूम होता है, परंतु ज्यों वहींपर होती है जहाँ ब्रह्मज्ञानका अभाव है । जहाँ ज्यों वे ऊपरको चढ़ते जाते हैं वह निकट और ब्रह्मज्ञान है वहाँ इसका प्रवेश नहीं होसकता। ज्ञानी निकटतर होता जाता है।
पुरुषके मनसे अज्ञान अंधकार नष्ट होजाता है। __* कषायसे तात्पर्य यहाँ वासना, मनोविकारसे विशुद्ध हृदयम वासनाका अभाव रहता है। है। अंगरेजीके Passion से जो बोध होता है, कषाय प्रत्येकरूप और प्रत्येक अवस्थामें दु:वही यहाँ कषायसे समझना चाहिए।
ख, आपत्ति और अशांतिका कारण है । जिस
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कषाय- वासना ।
प्रकार अग्नि बड़ी बड़ी विशाल इमारतोंको देखते देखते जलाकर राख कर देती है उसी प्रकार कषायकी अग्नि मनुष्योंको भस्म कर देती है और उनके कार्योंको नष्ट-भ्रष्ट कर डालती है ।
यदि तुम्हें शांतिकी अभिलाषा है, तो कषायो क्ष कर दो । ज्ञानी पुरुष कषायों को शमन करते हैं, परन्तु मूर्खजन कषायोंके वशीभूत होते हैं । जिन मनुष्योंको ज्ञान और बुद्धिकी चाह होती है, वे मूर्खता और अज्ञानता से दूर रहते हैं । शान्तिका इच्छुक शान्तिके मार्ग - को ग्रहण करता है और ज्यों ज्यों वह उस मार्ग पर बढ़ता जाता है, त्यों त्यों कषाय, दुःख और निराशाके अंधेरे गुप्त स्थानको पीछे छोड़ा जाता है।
ज्ञान और शांतिके प्राप्त करनेके लिए मनुयको पहले कषायके स्वरूपको जान लेना उचित है । जिस समय उसका वास्तविक ज्ञान हो जायगा उसी समय से उसको दूर करना और उससे मुक्त होना मनुष्य शुरू कर देगा । देरी उसी समय तक है, जब तक मनुष्य स्वार्थमें लीन है और कषायके आधीन है ।
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आवश्यकता है। दूसरोंके स्वार्थादि अवगुणोंको दूर कराने की चेष्टामें लगे रहनेसे हम कषायसे रहित नहीं हो सकते; किंतु अपने अवगुणों के दूर करनेसे हमें स्वाधीनताकी प्राप्ति होती है । वही मनुष्य दूसरोंपर विजय प्राप्त कर सकता है, उनको अपने वशमें कर सकता है जिसने अपने ऊपर विजय प्राप्त करली है। ऐसा मनुष्य
दूसरोंको कषायसे अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभसे वशमें नहीं करता, किंतु प्रेम और प्रीतिसे करता है I
मूर्खजन अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा किया करते हैं; परंतु बुद्धिमान् मनुष्य अपनी निंदा और दूसरोंकी प्रशंसा करते हैं । शांतिमार्ग मनुष्योंके बाहिरी जगतमें नहीं है, किंतु परिवर्तन करानेसे इसकी प्राप्ति नहीं होती, विचारोंके अंतरंग संसारमें है । दूसरोंके कार्यों में किंतु इसकी प्राप्ति अपने निजी कार्योंके विशुद्ध और पवित्र बनाने से होती है ।
कषाययुक्त मनुष्य प्रायः दूसरोंके सुधारने में लगा रहता है, परंतु ज्ञानी पुरुष अपनेको सुधारनेकी धुन में रहता है । संसारको सुधारने के लिए पहले अपने आपको सुधारना आवश्यक है। अपना सुधार केवल विषयवासनाओंके दूर
करने पर ही समाप्त नहीं हो जाता, किंतु
तनिक भी अंश है तथा स्वार्थका सर्वनाश इसके लिए उस प्रत्येक विचारका - जिसमें मानका कर देना होता है । इससे ऊँचे चढ़कर पूर्ण विशुद्धता से पहले एक प्रकारका शय और होता है, उसे भी दूर करना जरूरी है ।
कषायसे केवल यही नहीं होता, कि मनुष्य क्रोधी अथवा लोभी होता है, किंतु उसके वशीभूत हुआ मनुष्य अपने उच्च और दूसरोंको तुच्छ समझने लगता है । दूसरोंमें सदा अवगुण निकाला करता है और उन्हें स्वार्थी और मायावी बताया करता है । दूसरोंकी निंदा करने से, दूसरोंको स्वार्थी बनानेसे मनुष्य अपने स्वार्थको नहीं त्याग सकता । स्वार्थसे बचनेके लिए अपने आपको पवित्र करना मनुष्यका काम मनुष्यका जीवन एक प्रकारका पहाड़ है। है। दूसरों पर दोषारोपण करनेसे शांतिमार्ग- जिसकी तलहटी कषाय है और शान्ति चोटी की प्राप्ति नहीं हो सकती । शांतिमार्गके लिए है । कषायको घटाता घटाता ही मनुष्य शास्वार्थत्याग, इंद्रिय-दमन और आत्मसंयमकी न्तिके उच्च शिखिर पर चढ़ सकता है।
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क
जैनहितैषी
a
कषायमें शक्ति होती है, परंतु शाक्त कुमार्गकी की
ओर लगी रहती है। उससे दुःख होता है। जीवन और मृत्यु । मनमें सदैव इच्छायें उत्पन्न हुआ करती हैं।
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0 याद वे शुभरूप होती हैं तो सुखकर होती हैं
MT और यदि अशुभरूप होती हैं तो दुःखकर वास्तवमें जीवन और मृत्यु भिन्न भिन्न नहीं होती हैं । इच्छायें एक प्रकारकी जलती हुई हैं-एक ही व्यापारके भिन्न भिन्न नाम मात्र हैं। तलवारें हैं जो स्वर्गके द्वार पर रक्षकका काम कर ,
एक रुपयेके ऊपर दोनों ओर जैसे भिन्न भिन्न रंही हैं । मूर्योको वे जलाकर भस्म कर डालती हैं और बुद्धिमानोंको स्वर्गमें दाखिल कर छाएँ रहती हैं, उसी तरह जीवन और मृत्यु ये लेती हैं।
दोनों व्यापारकी जुदी जुदी अवस्थायें हैं। ___ वह मनुष्य मूर्ख हैं जो अपनी अज्ञानताकी जगत्में यदि कोई पाप है तो वह दुर्बलताके सीमाको नहीं जानता, जो केवल अपने विचा- सिवाय और दूसरा नहीं है। इस लिए सब रोंका गुलाम है और जो सदा अपनी इच्छा- प्रकारकी दुर्बलताओंको त्यागो । दुर्बलता ही ओंके अनुसार काम करता है। इसके विपरीत मृत्यु है, दुर्बलता ही पाप है। . वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो अपनी अज्ञानताको जानता है, अपने विचारोंकी निरर्थकताको ।
जीवनका अर्थ उन्नति और उन्नतिका अर्थ - समझता है और जो अपने कषायोंको शमन हृदय-विस्तार है । हृदय-विस्तार कहो या प्रेमकरता है।
भावना कहो, दोनों एक ही वस्तु हैं। मतलब यह ___ मूर्ख अज्ञानताके नीचेसे नीचे कपमें गिरता कि प्रेम ही जीवन है और प्रेम ही जीवन-नियामक जाता है परंतु बुद्धिमान ज्ञानके ऊँचे ऊँचे क्षेत्रमें वस्तु है । स्वार्थान्धताको मत्यु समझना चाहिए। प्रवेश करता जाता है । मूर्ख इच्छा करता है, जहाँ स्वार्थवासना होती है-वहाँ जीवन टिक कष्ट उठाता है और मर जाता है; परंतु बुद्धिमान ही नहीं सकता। उच्च अभिलाषा रखता है, प्रसन्न होता है और जीवनका नाम विस्तार है और मृत्युका नाम जीवित रहता है।
संकोच; अथवा प्रेम ही जीवन है और द्वेष ही __ आत्मोन्नतिका अभिलाषी वीर योद्धा मान- , सिक उन्नति करता हुआ ज्ञानप्राप्तिमें लीन
मृत्यु । जिस दिनसे हम संकुचित बनने लगेंगे होकर शांतिके उच्चतम शिखरकी ओर दृष्टि और अन्यान्य मनुष्योंका तिरस्कार करने लगेंगे लगाये हुए, ऊँचे ऊँचे चढता जाता है और एक उसी दिनसे हमारी मृत्युका प्रारंभ होगा। जब तक दिन उस अभीष्ट स्थानपर पहुँचकर परमसख- हमारा हृदय उदार और विशाल रहेगा तब तक परमानंदका भोग करता है।*
मृत्युकी शक्ति नहीं है कि वह हमारा स्पर्श
कर सके। * जेम्स एलन की Passion to Peace नामक
स्वामी विवेकानन्द । पुस्तकके Passion शीर्षक निबंधका भावानुवाद ।
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गाँधीका सत्याग्रह - आश्रम ।
थोडे दिन पहले मद्रास में श्रीयुत मोहनचन्द्र कर्मचन्द्र गाँधीका जो महत्त्वपूर्ण भाषण हुआ था, उसका सारांश यह है
आज मैं अपने उस आन्तरिक भावको बतलाना चाहता हूँ जिसे मैंने अपने हृदय में बहुत दिनसे स्थान दे रक्खा है और जो मेरे लिए सब कुछ है । और वह है क्या ? वह है अपने उस आश्रम के विषय पर विचार करना जिसे मैं भारतमें कहीं न कहीं स्थापित करना चाहता था, और जिसे वे बहुतसे विद्यार्थी जो मुझे पारसाल मिले थे जानते भी होंगे। सर्व्वसाधारणके कामोंमें योग देकर जो कुछ भी मैंने अनुभव किया है वह बस केवल यही है कि हमारे लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है चरि-गठनकी, हमारे लिए ही नहीं बल्कि हर जाति के लिए, यदि वह अपना अस्तित्व संसारमें कायम रखना चाहती है ।
सत्यव्रत ।
और इसी चरित्रगठनके लिए इस आश्रम में कुछ नियमों का पालन कराया जायगा और उन सबमें सबसे प्रथम है सत्यकी प्रतिज्ञा । यह सत्य वह सत्य नहीं है जिसे हम आम तौर से आज दिन व्यवहारमें ला रहे हैं, किन्तु इस सत्य द्वारा हमें अपने जीवनको सत्यमय बनाना होगा। दृष्टान्तके लिए बहुत दूर न जाइए। प्रह्लादको ही लीजिए और देखिए कि उसने केवल सत्यही के कारण अपने पिता पर विजय पाई थी । इस आश्रमका यह नियम होगा कि जिस बात - को हम ' नहीं करना चाहते, उसके विषय हम स्पष्ट रीतिसे नहीं कर देंगे, नतीजा कुछ भी क्यों न हो ।
चाहे
अहिंसा
-व्रत ।
दूसरा नियम है अहिंसा की प्रतिज्ञा । यों तो अहिंसाका अर्थ हिंसा न करना ही है किन्तु यदि आप इसके तह तक जायँ तो आपको पता चलेगा कि अहिंसाका अर्थ है किसीको किसी प्रकारका भी दुख न देना, यहाँ तक कि उस व्यक्तिके विषयमें भी, जो अपनेको तुम्हारा शत्रु मानता हो, कोई भी बुरा विचार हृदयमें न लाया जाय । जिसने अहिंसा के मर्मको समझ लिया है उसके हृदयमें शत्रुभावका स्थान ही नहीं, और इस सिद्वान्तके अनुसार मान मर्यादा तथा देशकी रक्षा तकके लिए न हत्याओंके लिए स्थान है और न उत्पातहीके लिए । अहिंसाका यह सिद्धान्त हमसे कहता है कि हम उन आदमियोंके हाथों में जो अत्याचार कर रहे हों, आत्म-समर्पण करके उनके मानकी रक्षा करें जिनका भार हमारे ऊपर है, और इस काममें उस बलसे शारीरिक और मानसिक बलकी अधिक आवश्यकता है जिसकी आवश्यकता घूँसेका उत्तर घूँसेमें देनेमें होता है । मानलो, तुममें शारीरिक बल है, तुमने उसका प्रयोग किया, तो जानते हो कि आगे क्या होगा ? क्रोध और घृणासे पागल विपक्षी तुम्हारे इस प्रकार के मुकाबलेसे और भी पागल हो जायगा, और जब वह तुम्हें समाप्त कर चुकेगा तो उसकी उद्दण्डता तुम्हारी धरोहर पर झपटेगी । परन्तु, यदि तुम उसका इस प्रकारका मुकाबला न करो, केवल अपने स्थान पर घूँसा खाने के लिए अपनी धरोहर और अपने विपक्षीके बीचमें जमे रहो, तो मैं तुमसे कहता हूँ कि विपक्षीकी
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जैनहितैषी ।
सारी शक्ति तुम्हारे ऊपर खर्च हो जायगी और तुम्हारी पवित्र धरोहर ज्योंकी त्यों बनी रहेगी ब्रह्मचर्य्य-व्रत |
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तीसरी प्रतिज्ञा है ब्रह्मचर्य की। जिनमें जातीय - जीवन की लहर है, जो जातिकी सेवा करना चाहते हैं वे ब्रह्मचर्य व्रत धारण करें । यदि उनका व्याह हो गया हो तो भी कोई हर्ज नहीं । विवाहसे तो घनिष्ठताका एक ऐसा सम्बन्ध हो जाता है कि स्त्री और पुरुष कभी और किसी जन्ममें एक दूसरेसे पृथक् न हों, क्या आवश्यकता है कि इस बन्धनमें रति-कार्य अनिवार्य ही हो !
स्वादका संयम
चौथी बात है चिटोरापन छोड़ना, रुचिको अपने वश में करना । इसकी भी वैसी ही प्रतिज्ञा करनी होगी जैसे औरों के लिए, और यद्यपि इसका वशमें लाना तनिक कठिन है किन्तु यह हो जाता है बड़ी आसानीसे । आप स्वादके गुलाम न बनिए। बस, फिर सीधे ही पिण्ड छूट जायगा । मैं अभी विक्टोरिया होस्टेल देख कर आ रहा हूँ । वहाँ मैंने बहुत से भोजनालय देखे और वे केवल स्वादोंके लिए ही इतनी अधिकतासे हैं । जबतक कि हम उन खाद्य पदार्थों पर सन्तुष्ट न होंगे जिनके ग्रहण न करनेसे ही हमारा जीवन नहीं चल सकता, तबतक चटोरे - पनकी आदन नहीं जा सकती । खाया तो के वल प्राणरक्षा और शरीररक्षाके लिए ही जाता है, और जानवर भी इसी लिए खाते हैं, फिर क्या कारण है कि वे इतने चटोरे नहीं दिखलाई देते ? बस, यही कि वे अपने जीभके गुलाम नहीं । उनकी जीभ उनके काबू में है । चोरी न करना ।
पाँचवी बात है चोरी न करनेकी । यह वह चोरी नहीं कि किसीका माल हड़प बैठें। किसी
एक ऐसी वस्तुको लेना भी, जिसकी अपन पास तत्काल कोई आवश्यकता नहीं और यदि वह दूसरे के पास रहे तो उसका बहुत कुछ कष्ट दूर हो जाय, एक प्रकारकी चोरी ही है। प्रकृति माता इतनी चीजें पैदा करती हैं कि यदि प्रत्येक आदमी अपनी आवश्यकतासे अधिक उन्हें न ले; . तो संसारमें गरीबी रह न जाय, और कोई भी आदमी भूख न मरे । और जब तक यह असमानता दूर न होगी तब तक मुझे कहना पड़ता है, कि हम सब चोर हैं। मैं 'सोशियालिस्ट' नहीं हूँ और इसलिए धनवानोंको धनसे वंचित नहीं करना चाहता, परन्तु जो लोग देश के अधपेट रहनेवाले करोड़ों आदमियोंका दुख दूर करना चाहते हैं उन्हें इस सिद्धान्तअनुसार कार्य करना पड़ेगा । स्वदेशी - व्रत |
छट्ठी प्रतिज्ञा है स्वदेशीकी । हर एक मनुष्यमें स्वदेशाभिमान होना चाहिए । यदि एक व्यापारी बम्बई से तुम्हारे पास इस गरज से आवे कि तुम उसे आश्रय दो, तो जब तक तुम्हारे यहाँ उसी प्रकारका व्यापारी मौजूद है तब तक उसे छोड़ कर तुम्हें बम्बई के व्यापारीकी मदद करना उचित नहीं । स्वदेशीके विषय में मेरी यही राय है । मेरा यही कहना है कि यदि तुम्हारे गाँवका नाई तुम्हारी हजामत बनाने के लिए तुम्हारे द्वार पर आता हो तो कोई कारण नहीं कि तुम उससे तो हजामत न बनवाओ और जरासी भड़कीली शान के लिए शहर से आनेवाले नाईके पास दौड़ो । तुम अपने नाईको योग्य बनाओ यदि वह पहले से योग्य नहीं है । उसमें वह बात पैदा करो जो एक शहराती नाईमें तुम देखते हो । और उसको उस समय तक, जब तक कि तुम पूरी तौरसे अपने कामके बिल्कुल अयोग्य न पा लो, हर
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गिज हरगिज अपने पाससे, अपने आश्रयसे, पृथक् न करो ।
गाँधीका सत्याग्रह आश्रम
निर्भयताका व्रत |
देश भरमें मैंने खूब घूम कर देखा कि शिक्षित भारत पर भय छाया हुआ है। लोगों में हृदयकी बातें खुल्लमखुल्ला कहने का साहस नहीं है । गुपचुप चहारदीवारी के भीतर हम अपना मत प्रकट करते हैं, परन्तु लोगों के सामने नहीं। जो खुल्लमखुल्ला कहेंगे उसे हृदयसे न चाहेंगे । यह हाल सभीने देखा होगा । मैं तुमसे कहता हूँ कि ईश्वर के सिवा किसीसे डरने की आवश्यकता नहीं, यदि तुम सत्यका किसी भी रूपमें पालन करना चाहते हो तो निर्भय होना पड़ेगा |
अछूतोद्धार ।
आठवीं बात है अछूतों के विषय में । यह रोग हिन्दुओं में बेतरह घुस बहुत पड़ा है । हम अछूतोंके साथ इस प्रकारका व्यवहार करके अत्यन्त पापके भागी बन रहे हैं । तुममें इतनी शिक्षा ग्रहण करने पर भी यह कमजोरी ऐसी ही बनी है तो मैं कहता हूँ . कि तुम्हारा यह ज्ञानोपार्जन करना, यह पढ़ना और लिखना बिल्कुल फिजूल है । यह सच हो सकता है कि तुम शिक्षा विदेशी भाषा में ग्रहण करनेके कारण अपने सच्चे भावोंको अपने उन कुटुम्बियोंमें, जिनके जंजीर में तुम बँधे हो, न डाल सको । पर इसी लिए हमने इस आश्रमकी शिक्षाका माध्यम देशी भाषा रक्खा है । और इसमें जितनी देशी भाषाओं की शिक्षा हो सकेगी दी जायगी और वह भी जो विदेशीय भाषा के शिक्षा के लिए जितने कष्ट उठाने पड़ते हैं उनसे कमही में ।
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राजनीति |
इसके लिए तुम्हें उस समय तैयार होना चाहिए जब उपर्युक्त नियमोंको भली प्रकार दृढ़तापूर्वक निबाह लो । धर्मसे बिछुड़ी हुई राजनीतिक कोई अर्थ नहीं होते । यदि देश के सभी विद्यार्थी राजनैतिक क्षेत्रकी ओर झुक जाँय तो यह कोई अच्छा चिह्न नहीं, परन्तु इसके ये अर्थ नहीं है कि हम विद्यार्थी-जीवनमें राजनीति न सीखें । राजनीति भी हमारे जीवनका एक अंग है । राष्ट्रीय संस्थाओं और लिए राष्ट्रीय विकास के समझने के प्रत्येक आश्रमवासी बालकको राजनैतिक संस्थाओं और देशमें प्रसारित नये भावों और नये जीवनकी बातें बतलाई जाती हैं, परन्तु साथ ही हमें हृदय और बुद्धिके धार्मिक - विश्वासके अक्षयप्रकाशकी भी आवश्यकता है । आजकल तो युवकोंकी यह हालत है कि जहाँ विद्यार्थी - जीवन समाप्त हुआ कि फिर वे मिट्टीमें मिल गये । टुटपुंजिया नौकरी कर ली, थोड़ी तनख्वाहोंमें फँस गये । वे परमात्माको नहीं जानते, ताजी हवा और ताजे उजेलेका उन्हें क्या पता, , उन्हें क्या पता उस तेज - पूर्ण स्वाधीनताका जो इन नियमों के पालनसे प्राप्त होती है, जो मैं तुम्हें बतला चुका | अन्त में ।
मैं तुमसे आश्रम में आनेके लिए नहीं कहता क्योंकि उसमें स्थान ही नहीं । हाँ अलग अलग आश्रमका-सा जीवन व्यतीत करो । मेरी बातोंमेंसे जो बात तुम्हें पसन्द आई हो उसी - के अनुसार काम करो । यदि तुम खयाल करते हो कि यह एक पागलकी बातें हैं तो स्पष्ट कह दो, मुझे तुम्हारे इस फैसले से कोई आश्चर्य न होगा । ( प्रतापसे उद्धृत )
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ROSESES69202626921 वायुयानों का इतिहास |
(ले० पं० शिवसहाय चतुर्वेदी । )
DROGEOCACOPOBOACOU
शमें घूमने की इच्छा चली आ रही है । प्रत्येक जाति के इतिहास में इसके कई स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं । हिन्दुओंके महाकाव्य रामायण में लिखा है कि रामचन्द्रजी पुष्पक विमानके द्वारा आकाशमार्गसे स्वदेशको लौटे थे । ग्रीक पुरा - णोंमें लिखा है - फिक्माश और हेल अपनी सौतेलीमा इनोरके दुःखों से छुटकारा पाने के लिए एक सोनेके रोमोंवाले मेष ( भेड़ ) पर चढ़ कर स्वर्गलोकको भाग गये थे । जैनग्रंथोंमें जीवन्धर स्वामी कथा बहुत प्रसिद्ध है । उनके पिता सत्यंधरने अपने मंत्री काष्ठाङ्गारके द्वारा अपने वंशच्छेद होनेके भयसे अपनी गर्भवती पत्नीको मयूरयंत्रमें बिठाकर आकाशमार्ग से उड़ा दिया था । जीवंधरचरितसे मालूम होता है कि यह यंत्र मोरके आकारका होता था और शायद चावीके बलसे चलाया जाता था । अँगरेजी ग्रंथों में भी ऐसी बहुतेरी कहानियाँ पाई जाती हैं । जाटलेंडके राजा निडाङ्गके आदेशसे उनके नौकरोंने जब बयेलैंड नामके एक अपराधी के दोनों पैरोंके पंजे काट डाले थे, तब वह राजाके अत्याचारोंसे रक्षा पानेके लिए एक प्रकारका जामा तैयार करके उसकी सहायतासे अपने देशको उड़ गया था। आरब्य उपन्यासों के उड़ने वाले गलीचे और पारस्य उपन्यासोंके उड़नेवाले सन्दूकोंकी कहानियाँ सभी जानते हैं । इस तरह प्रत्येक जातिके पौराणिक ग्रन्थों आकाशभ्रमणकी दो चार कहानियाँ अवश्य
बहुत पुराने समय से मनुष्य के हृदयमें आका - मिलती हैं ! इन सब बातोंसे जाना जाता है कि मनुष्योंके मनमें आदिम काल से पक्षियों के समान आकाशमें भ्रमण करनेकी इच्छा चली आती है और वायु मंडलंपर प्रभुत्व जमाने के लिए बहुत से काल्पनिक उपायोंकी उद्भावना करके उन्होंने बहुत कुछ परितृप्ति भी प्राप्त की है। एक समयका उक्त काल्पनिक विषय कालक्रमसे आज सत्यके रूपमें बदल गया है - मनुष्यों का बहुत दिनोंका परिश्रम सफल हो गया है । मनुब्यने साधनाके बलसे न जाने कितने बाधा विघ्नोंको हटाकर, कितने जीवनसंग्रामों में विजयलाभ करके सफलता पाई है - संसारका इति हास इस बातका साक्षी है । मनुष्य किस तरह क्रम क्रमसे प्राकृतिक - शक्तियों को अपने वशमें क्रिया है, इसके रहस्यमय इतिहासकी खोजपर मनुष्य सदैव उत्सुकता प्रगट करता रहेगा । मनुष्य के कल्पना -जगत से बाहर होकर व्योमयानने किस प्रकार वास्तविक स्वरूप धारण किया और मनुष्यों के परिश्रमको सफल किया - इसका विवरण बहुत ही कौतूहल बढ़ानेवाला है
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इटली देशके लेखक ' लियोनार्दो दा भिश्चि' ने सबसे पहले ( सन् १४५२ - १५१९ ) अपनी ग्रंथावलीमें आकाशमार्ग में भ्रमण करनेका एक उपाय लिखा था । कहा जाता है कि उसीने सबसे पहले कल्पनाकी वस्तुको वास्तविकरूप देनेका उपाय लिखा है । वह लिखता है-पक्षियोंके समान कई एक पंखे मनुष्यके
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IHARITALIKBARARIAILABIMAMMATHAARAMATI
वायुयानोंका इतिहास । animumifinitiffinfifini tion
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शरीरमें लगा कर उन सबको हाथ और पैरोंके इस समय तक आकाशभ्रमणके लिए जितने द्वारा संचालित करनेसे शून्य पथमें उड़ा जा यंत्र बने थे, वे सब पक्षियोंके पंखोंके अनुकरण सकता है । ऊपर चढ़ने के लिए पंखों ( डानों ) पर निर्माण किये गये थे। को फैली हुई दशासे सिकुड़ाना पड़ता है और सन् १६७० ई० में फान्सिस्को डिलानाने फिर नीचे उतरनेके लिए सिकड़े हुए पंखोंको आकाश-नौका या हवाई-जहाज प्रस्तुत करफैलाना पड़ता है। कई लोगोंने कागजकी सहा- नेके लिए एक उपाय लिखा । उसके मतसे यतासे उपरिलिखित प्रणालीके अनसार परीक्षा चार वायुशून्य ताँबेके गोलोंको एक हल्की नौकाकी; परन्तु कोई कृतकार्य नहीं हुआ । इसके के ऊपरी किनारों पर लकड़ी आदिकी. मठमें कछ समय बाद ही फाउष्ट वेराजिने नये
र लंगा कुछ ऊँचाई पर रखना चाहिए और नाव उपायोंके द्वारा इस कार्यमें कई अंशोंमें सफलता
पर पाल भी तान देना चाहिए। ऐसा करनेसेप्राप्तकी । चार बराबरीके लकड़ीके. टुकड़ोंको
" गोले वायुशन्य होनेके कारण ऊपर उठनेकी
चेष्टा करेंगे । ताँबेके गोले कितने बड़े होना चतुर्भुजाकारमें मजबूत कस देनेसे और सघन
चाहिए, इसके लिए उसने हिसाब लगा कर कपड़ेको उसके चारों ओर संयुक्त कर देनेसे छाताके आकारका एक बेलून ( गुब्बारा ) मटाईके गोलोंकी सहायतासे बहुत अच्छी तरह
देखा कि २५ फुट व्यास और २३५ इंच बन जाता है । ऐसे बेलून पर चढ़कर वह वनि- काम निकल सकता है। ऐसे चार वायुशून्य स नगरके एक बहुत ऊँचे स्तंभ परसे जमीन पर गोले प्रायः १५ मन वजन खींच कर ऊपर उतरा था।
ले जा सकते हैं। किन्तु इतने पतले गोलोंका सन् १६७८ ई० में वेनिये नामके एक वायुके दबाबसे एकदम फट जाना बहुत संभव व्याक्तिने अपने दोनों कधों पर दो समानान्तर था । मि० डानने अनेक युक्तियाँ देकर इस लकड़ीके डंडे रखकर उनके दोनों छोरों पर आपत्तिको दूर करनेकी चेष्टा की, परन्तु लोगोंपुस्तकके समान दो परस्पर मिले हुए समतल को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। तख्ते लगा दिये । उक्त दोनों लकड़ीके डंडे सन् १७८३ ई० में लियन नगरके समीपवर्ती ऊपर नीचे करनेसे वे समतल तख्ते एक बार किसी गाँवमें रहनेवाले एक कागजके व्यापारीके खलते और एक बार बंद होते थे। उसने दो पत्र स्टीफेन और योसफ मेंटगलाफयेने इस इसी यंत्रके डानोंको बारबार खोल और बंद बातकी ओर लक्ष्य देकर अनुसन्धान करना करके उड़नेकी चेष्टा की थी।
प्रारंभ किया कि वायुमंडलमें मेघ किस .. कुछ दिनोंके बाद मार्कुई दी वाकेविलने तत्त्वके आधार पर रहते हैं। उन्होंने सोचा कि यदि इस यंत्रमें सुधार किया। वह सन् १७४२ ई० में एक थैलीमें किसी वायवीय पदार्थको भरकर अपने ऊँचे भवनकी छतपरसे उस पर बैठा हवामें छोड़ दें तो वह मेघके समान आकाशमें और समीपवर्ती एक उपवनको लाँघता हुआ तैरती रहेगी। पहले पहल उन्होंने भाफकी सहायसीन नदीके पास जाकर उतरा । इस तरह वह तासे परीक्षा करके देखा; परन्तु इसमें वे सफलमनोइस विषयमें औरोंकी अपेक्षा अधिक कृत- रथ न हुए । फिर उन्होंने एक थैलीको अग्निके कार्य हुआ।
मुँहपर रखकर उससे उठते हुए धुएँ और गैस
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SELIAARIBAG DAILIBARBALAG २२८
जैनहितषीसे उसको भरकर हवामें छोड़ दिया और देखा उसे उष्ण गैससे परिपूर्ण करके दर्शक-मंडलीके कि वह वायुमंडलमें कुछ दूर तक गई । फिर सामने उड़ाया । वह बहुत ऊँचाई तक गया उन्होंने और भी प्रशस्त प्रणालीके अनुसार उक्त और इस तरह उसने अपनी कृतकार्यताका अच्छा परीक्षा करना प्रारंभ किया और एकबार परिचय दिया। १०५ फुट परिधिवाली एक कपड़ेकी थैलीको सन् १७८३ ई० में योसिओ पिलाने दी घासके घाँसे परिपूर्ण करके हवामें छोड़ दिया। रोजिये नामक एक व्यक्तिने पृथ्वीसे रस्सी आथैली बहुत ऊँचे तक उड़ी, हवामें १० मिनिट दिके द्वारा कोई सम्बन्ध न रखकर सबसे पहले तक स्थिर रही और फिर १॥ मीलकी दूरी पर जा एक मुक्त व्योमयान आकाशमें उड़ाया था। इस गिरी ।ज्योंही यह खबर चारों और फैली त्यों दुःसाहसिक विमानविहारीकी मृत्यु इससे दो ही भिन्न भिन्न लोगोंने भिन्न भिन्न रीतियोंसे वर्ष वाद ३००० फुटकी ऊँचाईसे विमान गिर परीक्षा करना प्रारंभ कर दिया । इसके कुछ पड़नेके कारण हो गई । उसने मरनेके पहले समय पहले सन् १७७६ ई० में सबसे हलके हैड्रोजन और उष्ण वायुकी सहायतासे एक गैस हैड्रोजनका आविष्कार हो चुका था । जब नये ढंगका यान तैयार किया था। उस यास्टीफेन और योसफकी परीक्षाका समाचार नमें दो गोले एक हैड्रोजनसे और दूसरा उष्णपारी पहँचा, तब विज्ञानवेत्ता चार्लस साहबने वायसे भर कर तर ऊपर लगाये गये थे। क्योंकहा कि शीतल वायुकी अपेक्षा गरम वायु कि उसको विश्वास था कि हैड्रोजन गैस हलहलकी होती है और वह हमेशा ऊपर उठनेकी की होनेके कारण स्वभावतः ऊपर उठनेकी चेष्टा किया करती है, इस लिए किसी व्योमयान- चेष्टा करेगी और नीचेके गोलेको गरम करनेमें हैड्रोजन भरकर परीक्षा करनेसे पूर्ण सफलता से उसकी हवा फेलनेकी चेष्टा करेगी । फलतः प्राप्त हो सकती है। अतः१३ फुट व्यासवाले एक यान ऊपर उठेगा और पीछे ज्यों ज्यों वार्निश किये हुए रेशमके व्योमयानको उक्त वह उष्ण वायु ठंडी होती जावेगी, त्यों गैससे परिपूर्ण करके हवामें छोड़ा-वह ३००० त्यों वह भारी होकर नीचेकी ओर आने फुट ऊपरतक गया और प्रायः ४५ मिनिट तक लगेगा। किन्तु ऐसे यंत्रमें जो विपत्ति थी, उसवायुमंडलमें परिभ्रमण करके १५ मील दूरीपर की ओर उसका ध्यान नहीं पहुँचा । इस यानमें जा गिरा ! कहते हैं, जिस जगह यह वायुयान विपद यह थी कि वायुके साथ हैड्रोजन मिलते गिरा-वहाँके किसानोंने इस अनदेखी घटनाको समय यदि अग्निसंयोग हो जाय तो वह आवाकिसी शैतानके आगमनकी सूचना समझा और ज करके एकदम फट जावेगा । आखिर यही इस कारण उन्होंने उसे डरते डरते उठाया और हआ। उसने इस यानको उडाया और वह फिर एक हलसे बाँध कर चारों ओर घुमाया। आध घंटा आकाशमें भ्रमण करनेके बाद इस तरह जब तक वह फट-फटाकर चिन्दी हैडोजनके फटनेसे नष्ट होकर जमीनपर गिर चिन्दी न हो गया तब तक उन लोगोंने चैन पडा और उसके साथ ही विमान-विहारीकी भी नहीं लिया!
मृत्यु हो गई। इस घटनाके कई महीने बाद योसफ माण्ट- व्योमयानको इच्छानुसार चलानेके लिए गलाफयेने एक नवीन व्योमयान बनाकर और जिन लोगोंने अपनी अपार शक्ति व्यय की थी
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SHARMATIBILITATALAILABLETELLIGHTLIRAIMEDIA
वायुयानोंका इतिहास । Uயோகாாாாாாாாாாசா
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उन लोगोंमेंसे जनरल मयेसनियका नाम एक व्योमयान बनाया। यह व्योमयान जुलाहके विशेष उल्लेखनीय है । वह आजसे प्रायः डेढ़ सौ करघेके सिटलके आकारका था । इसकी लम्बाई वर्ष पहले व्योमयानको स्वेच्छापूर्वक चलानेके १४४ फुट थी। इसके मध्यके फूले भागकी परिधि लिए जिन सब उपायोंका उल्लेख कर गया है, ४० फुट थी और भीतर ९००० घन फुट जगह वर्तमान समयके व्योमयान उन्हीं सब उपायोंके थी। इसका ऊपरी भाग रस्सियोंके जालसे आअवलम्बनसे बनाये जाते हैं। उसके मतसे च्छादित था और नीचेभागमें ६० फुट लम्बी बलूनको लम्बी आकृतिका बनाकर उसके उप- एक लकड़ी कई रस्सियोंकी सहायतासे लटकती रिभागको आवरणसे ढंक देना चाहिए, फिर हुई ऊपरी जालके दोनों छोरोंसे जुड़ी थी। कई उसमें एक त्रिकोण पालको जोडकर उसमें गरम रास्सयोंकी सहायतासे इस लकड़ीमें एक नौका वायुसे भरी हुई थैलियाँ बाँध देना चाहिए और लटकाकर उसपर ३ घोड़ोंकी शक्तिवाला एक बेलूनके पिछले भागमें स्टीमरके चाकके समान एंजिन रक्खा जाता था। यह एंजिन बिजलीके एक चाक लगाना चाहिए । मयेसनियकी
पंखेके समान तीन फलके एक पंखेको हर एक पद्धति पर बनाये हुए बेलूनका चाक मनुष्य
मिनिटमें ११० बार घुमाता था।
गिफार्डके आविष्कृत व्योमयानमें दो दोष द्वारा घुमाया जाता था। सन् १७८४ इ० में पारी नगरके राबर्ट
थे-पहला, व्योमयानसे नौका जिसतरह लटकाई नामके दो भाइयोंने एक बेलुन बनाया । उसका
गई थी, उससे चलते समय व्योमयान कम्पित न
होने पर भी एंजिनके काँपनेसे सारा व्योमयान आकार खंभेके समान था, परन्तु उसके दोनों छोर अर्धगोल ( Hemispherical ) थे ।
कंपित हो उठता था; दूसरा, व्योमयानमें हैड्रोउन्होंने इस बेलूनको दांड़े (पतवार ) की
जन वा कोयलेकी गैस ( Coal gas ) के स.
मान किसी गैसको भरकर उसके पास अग्नि रस्वसहायतासे चलानेकी चेष्टा की थी। पहली साल
० नेसे जो अनर्थ हो सकता है, उसे सभी अनुमान तो उनकी मिहनत सफल न हुई, परन्तु दूसरी कर सकते हैं। मि० गिफार्डने इन दोषोंको भी सालके उद्यमसे उनका बेलून आकाशमें गोला- बहत कछ दूर कर दिया था। उनका यह व्योमकृतिमार्गसे घूमने लगा।
यान प्रतिसेकंड ६ से ८ फुट तक चल वैज्ञानिक जगतमें भाफ पैदा करनेवाले यंत्र सकता था। ( Steam boiler) और जल पहुँचानेवाले तीन वर्षके बाद इस वायुयानमें और भी कई यंत्र ( Injector ) का आविष्कार करनेके सुधार हुए । आकाशमार्गमें चलते समय व्योमकारण मि. गिफार्डका नाम सर्वत्र परिचित है। यानके प्रतिकूल चलनेवाली हवाके वेगको कम वे बहुत दिनोंसे एक हल्के और बहुत शक्तिवाले करनेके लिए इसके आकार और अनेक भाएंजिनको बनानेमें व्यस्त थे और उसके फल- गोंमें बहुत परिवर्तन किया गया । मि० गिफार्ड स्वरूप उन्होंने १ मन दस सेर भारी, और ५ इस वायुयानमें बैठकर हवाकी गतिके विरुद्ध चघोड़ोंकी शक्तिवाला एक एंजिन तैयार किया लनेमें समर्थ तो हुए परन्तु उतरते समय पृथा। उसने देखा कि ऐसे एंजिनकी सहायतासे थ्वीसे टकराकर वह सारा यान नष्टभ्रष्ट होगया। व्योमयान स्वेच्छापूर्वक चलाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने और भी कई व्योमयान बअतएव उसने सन् १८५२ ई० में पारी नगरमें नाये; परन्तु उनमें और कोई विशेषता नहीं थी ।
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HOLIDAmmam
जैनहितैषी
सन् १८७२ ई० में पाउल हेनलाइनने एक डिगरी तक दिशाओंको बदलकर उड़ाया जा नई तर्जका विमान बनाया, इसकी आकृति एक सकता था । . विचित्र ढंगकी थी।
फाँसमें डि लोमके बाद तीन चार और भी पहले करघेके सिटलके आकारके जिस व्योम- वायुयान बने, वे प्रायः बिजलीकी शक्तिसे चलनेयानका वर्णन लिखा है उसके दोनों सिरे सकरे थे वाली मोटरकी सहायतासे भ्रमण करते थे ! परंतु यह केवल एक ही ओर सकरा था और इसके पश्चात् सेनापति रेनार्ड और केवसने जिन उस जगहसे वह क्रमशः चौंड़ा होता गया था। व्योमयानोंका आविष्कार किया उन्होंने मानों इसके नीचे कोयलेकी गैस (Coal gas ) स्वेच्छासे चलनेवाले व्योमयानोंका रास्ता खोल से परिपूर्ण एक एंजिन लगाया जाता था । दिया। उन्होंने १८८४ ई० में जो व्योमयान यह ऍजिन गैसको जला कर चलाया जाता बनाया था वह देखने में मछलीक आकारका था । पूर्वोक्त व्योमयान गैस कम हो जानेपर और पहले बने हुए विमानोंसे बहुत बड़ा था ! आकृतिमें छोटा हो जाता था। इसी दोषको ९ घोड़ोंके ताकतकी एक बहुत हल्की बिजलीकी दूर करनेके लिए व्योमयानके एक मध्यस्थ माटर एक पंखेको प्रति मिनिटमें ५० वार गोलेको एक पंपकी सहायतासे सदैव वायुपूर्ण घुमाती थी । यह पंखा सामनेकी ओर लगा रखते थे। उक्त ऍजिनके एक Trapezium के रहता था । इस पंखेके चलनेसे समस्त यंत्र आकारके डानेको घुमानेसे सब यंत्र चलते थे। वायमें सहज ही उड़ सकता था। बेलनके नीचके यह व्योमयान प्रति सेकंडमें प्रायः पाँच फुटके भागमें जो बैठनेकी जगह थी, वह रस्सीकी बगेसे चल सकता था। इसके निर्माता धनाभावके सहायतासे खूब मजबूतीके साथ उपर मत्स्याकृकारण और परीक्षा करनेमें समर्थ नहीं हुए। तियंत्रसे बँधी रहती थी । यदि बेलुनके वजनका
सन् १८७२ ई० में फ्रान्स और प्रशियाके केन्द्र किसी तरफ हट जावे, तो उसको ठीक युद्धके समय फ्रान्सके अधिकारियोंने इपय टि करने के लिए एक झूला लगा रहता था । उसे लोमको व्योममान निर्माण करनेके लिए नियुक्त एक बाजूसे दूसरी बाजूतक ले जाकर यंत्रके किया था। उस समय तक जितने व्योमयान वजनको समतोलकर देते थे और इसके द्वारा बने थे वे सब बिजलीकी शक्तिसे चलनेवाली यंत्रका हिलना डुलना या किसी एक ओरका मोटर या गैससे चलनेवाले ऍजिनोंकी सहाय- झुकना बंद हो जाता था । इस बेलूनका नाम तासे वायुमें विचरण करते थे किन्तु डिलोमने 'ला-फ्रांस ' रक्खा गया था। पहले इस के fiउन उपायोंका अवलम्बन न करके मनुष्यशक्तिसे मार्ता लोग किसी निर्दिष्ट स्थानसे उक्त यापही चलानेका उपाय निकाला था । उन्होंने अपने बैठकर परिस नगरके ऊपरसे अनेक चक्कर वह नवीन व्योमयानमें एक वायुपूर्ण गोलेका व्यव- कर वापिस लौट जाते थे । किसी स्थ वाद हार किया था । उस गोलेके साथ रस्सीकी यात्राकरके फिर उसे अपनी शक्तिसे उगर सहायतासे एक पंखोंवाला यंत्र नीचे लटका स्थानपर लेजाना-इसका आविष्कार सबसे पह। रहता है । आठ आदमी ताकतके साथ उन इसी यानके निर्माताओंने किया था। यह विमा पंखोंको घुमाते थे। इससे यंत्र प्रति सेकंड ४ प्रति सेकंड २१ फुटके हिसाबसे-हिले डुले य - फटकी गतिसे चलता था और इच्छानुसार १० कंपित हुए बिना चल सकता था।
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1
।
मि० वेनहोमने बहुत दितोंतक पक्षियोंके उड़ने की प्रणालीका अनुसंधान करके सन् १८६६ में यह निश्चय किया कि जब कोई समतल चीज वायुमण्डलमेंसे होकर जाती है तब वायु उसके ऊपरकी ओर जो दवाव डालता है वह उक्त सब स्थानोंमें एकसा प्रयुक्त नहीं होता; केवल सामने के कुछ ही अंशोंमें प्रयुक्त हुआ करता इस लिए विमान के सामनेके भागको विस्तृत न बनाके उसे लम्बाई देकर बनाना उचित है उन्होंने इस बातपर भी लक्ष्य किया कि एक बड़ा पक्षी अपने दोनों पंखोंको एक ही साथ हिलाकर शान्त भावसे सहज ही चला जा सकता है । इससे उन्होंने यह सिद्धांत निकाला कि पक्षीके उक्त अवस्थामें उड़ते समय वायुकी अत्यन्त पतली तह अपने स्थान से हट जाती है; अतएव वायुमण्डलमें चलने के समय यदि किसी भारी पदार्थको ले जाना हो तो पूर्वोक्त सामने के भागके समतलोंकी संख्या बढ़ानी होगी और उन सबको समान्तराल भावसे, बीचमें थोड़ेसे लम्बाईके भागको छोड़कर, एकके ऊपर एक स्थापित करना होगा ।
मालूम पड़ता है कि इसी आधार पर ट्राईप्लेन आदि सृष्टि हुई है । मि० वेनहोमने गंभीर पर्यवेक्षण करके उपरिलिखित जिन सत्य
का आविष्कार किया था उनसे वैमानिकों को बहुत लाभ पहुँचा और इसी कारण, मि० वेनहो की कीर्ति संसारमें अचल रहेगी ।
मि० वेनहोमके आविष्कृत तत्त्वोंकी परीक्षा करके फिलिप्सने एक यंत्र निर्माण किया । परीक्षा द्वारा देखा गया कि वह यंत्र जमीन से सहज ही आकाश में उड़ सकता है किन्तु उड़ते समय साम्यावस्थाभें नहीं रह सकता था । ऐसे बेलूनको Captive Baloon या 'बन्दी - बेलून ' कहते हैं। क्योंकि उसे एक स्थान पर
इतिहास ।
रस्सीसे बाँधकर चारों ओर घूमकर देखभाल करने के काम में ला सकते हैं- आने जानेके काममें नहीं । इसके बाद ही अमेरिका, जर्मनी, इंग्लेंड, फ्राँस आदि देशों में बेलूनकी उन्नति के लिए खूब ही प्रयत्न होने लगे । अमेरिका और जर्मनीने इस काम में सबसे पीछे हाथ डाला था ।
२३१
अमेरिका के प्रसिद्ध पदार्थविज्ञानविद् मि० एस. पी. लेङ्गलिने गहरी गवेषणा करके व्योममानोंकी खूब उन्नति की थी, इसी समय से परीक्षक लोग पक्षीके आकारके छोटे छोटे और फिर बड़े बड़े यान प्रस्तुत करके पर्वत या किसी ऊँचे स्थानोंपरसे बैठकर नीचे जमीनमें आनेकी चेष्टा करने लगे ।
इस काम में सबसे पहले अटो लिलियेन्थाल नामक एक जर्मन इंजीनियरने प्रयत्न किया ! उसकी परीक्षा-प्रणाली अभीतक संसारभर में प्रसिद्ध है । उसने पक्षियों के परोंके समान दो पर अपनी पीठपर लगाकर देखा कि वह ४५ फुट ऊँची जगहसे उड़ कर प्रायः ४५० फुट दूरीतक अपनी इच्छानुसार हाथ पैर हिलाकर और दिशा बदल कर उड़ सकता है । फिर उसने मोटरकी सहायता से परीक्षा करने के लिए प्रत्येक बाजू पर दो समतल पठिवाले वायुयानों को निर्माण किया ।
उसकी इस प्रणालीको ग्रहण करके अमेरिकामें हेरिंग, इंग्लेंडमें पिल्सार और फ्राँसमें फारवार नामक व्यक्तियोंने वायुयानोंकी खूब उन्नति और सुधारणा की ।
पिल्सारकी इस गवेषणा के बाद इंग्लेंडमें और कोई मौलिक गवेषणा नहीं हुई । केवल कोड और ए. वी. रो इन दोनों विमान - विहारियोंने एक ट्राईप्लेनका उपयोग किया था ।
राईट नामके दो भाइयोंने लिलियेन्थालकी गवेषणा ( खोज ) प्रणालीका अध्ययन करके
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२३२.
AIIMILAIMULA.
जैनहितैषी
एक उच्चश्रेणीका वाईप्लेन तैयार किया था । सन् नगरके ऊपर एक स्तम्भके चारों ओर १००० १८९४ ई० में फारवार नामक एक फरासीसी फुट ऊँचाई पर भ्रमण किया और १९०९ की सेनापतिने भी लिलियेन्थाल की प्रणालीके अनु- ३१ वीं दिसम्बरको मरिस फारमेनने ४० मिनटमें सार व्योमयान बनाया था।
४७ मीलकी यात्रा तय की। सन् १९०६ ई० में सेन्टच्-डूमण्ट नामक
___ इसके पश्चात् पहले कही हुई रीतिके अनु
सार कई लोगोंने आकाशभ्रमण किया और एक गगनविहारी परीक्षा-भूमिमें अवतीर्ण हुआ।
इसके बाद व्योमयानके द्वारा लम्बी लम्बी यात्रायें उसे ८३ फुट लम्बे स्थानका भ्रमण करनेके
करना भी सहज हो गया । आकाशमें जो लोग उपलक्षमें आकंडेकन-पुरस्कार मिला। कहा जाता
बहुत ऊँचे तक उड़े हैं, उन सबमें लेथम और है कि एडके सिवा सबसे पहले पूरी पूरी सफ
केवेजरका नाम ही सबसे प्रथम उल्लेखनीय है । लताके साथ इसीने आकाशभ्रमण किया था।
इनके बाद भी लेगान्न १०७४६ फुट ऊँर्चाइ एक महीनके बाद वह प्रायः ७४० फुट तक जानेमें समर्थ हए थे। टरीतक भ्रमण करने लगा था । इसके बाद लिलियेन्थालके समयसे ही जर्मनी में सबसे सन् १९०८ में हेनरी फारमेनको ३३०० फुट पहले बेलन-रचनाका काम प्रारंभ हुआ था। परिधिकी एक त्रिकोणाकृति भूमि परिभ्रमण क- इसके पश्चात् ही जर्मनीमें वायुयान-निर्माणका रने के उपलक्ष्यमें ३ लाख रुपयेका आर्कडेकन काम बड़ी तेजीके साथ चलने लगा । बहुत पुरस्कार मिला।
संभव है कि जर्मनीने अपने पक्षके देशोंमें गुप्त- इसी समय व्योमविहारके लिए फाँसमें बहु- रीतिसे युद्धविभागके व्यवहारके लिए व्योमयातसे यंत्र बनें, जिनमेंसे अनेक यंत्र परीक्षाके समय नोंके बनानेका उत्साह दिया हो । उसने नष्ट हो गये और इस काममें बहुतेरे मनुष्योंके अगणित अर्थव्यय और भगीरथ प्रयत्नके बलसे प्राण भी गये । सन् १९०८में अमेरिकाके विलवर बहत थोडे समयमें ही वायुयानोंको इतनी उन्नत राइटने व्योमयानकी सहायतासे अनेक आश्चर्य
* आश्चय- अवस्थामें करके संसारको चकित कर दिया है। जनक काम दिखाकर कुछ समयके लिए सब १९ वीं शताब्दीके शेष भागसे जर्मनीमें व्योमलोगोंकी दृष्टि अमेरिकाकी ओर खींच ली । किन्तु यानोंकी उन्नतिके लिए बड़े बड़े आयोजन हुए, इसके बाद जब मि. फारमनने सेलनस्से रिम्स बड़ी बड़ी परीक्षा हुई । इसी समय इस आन्दोनगर तक २१ मीलकी उड़ान भरी, तब सबकी दृष्टि लनके क्षेत्रमें काउंट जेपेलिन उतरे और यरोपकी ओर आकर्षित हुई । इसके बाद लुईस उन्होंने व्योमविहारके लिए एक अद्भुतयंत्र निर्माब्लेरियट १९ मीलका भ्रमण करके अपने स्थान ण करके सबको विस्मित कर दिया। उन्होंने पर लौट आया। सन् १९०९ के जुलाई महीनमें अपने नामके अनुसार इस यंत्रका नाम भी मि. लेथामने इंग्लिशचेनलको लाँघनेकी ‘जेपेलियन ' रक्खा । इनकी जीवन-कहानी चेष्टा की थी, परन्तु पहली वार विफलमनोरथ बड़ी आश्चर्यमय है । आत्मविश्वासके बलपर होनेपर उन्होंने अपने व्योमयानको ब्लेरिमट मनुष्य किस तरह अनेक बाधा-विघ्नोंको हटाकर नामक व्यक्तिको बेच डाला । २५ वीं जुलाई- निर्भय मनसे अपने कार्य-साधनमें अग्रसर हो को सबसे पहले मि० ब्लेरियटने इंग्लिशचेनलको सकता है-उनके जीवनसे इसकी अच्छी शिक्षा लाँघा । इसके पश्चात् कोम डि लामवार्टने पारी- मिलती है ।
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CHODIOBAITHILIORAILI
वायुयानोंका इतिहास । huminimittimfilmmittinine
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काँउट जेपेलिनका जन्म सन् १८२४ ई० में व्योंमयान पर गिर कर अनिष्ट पैदा कर सकता कनष्टेन्स हृदके एक गिरजाघरमें हुआ था । युवा- था, इसी आशंकाको दूर करनेके लिए उस वस्थामें किसी व्यापारकी लालसासे आप अमे- जहाजी पुलको इच्छानुसार घुमाकर वायुप्रवाहके रिका गये थे, और २५ वर्षतक वहीं रहकर आपने सन्मुख कर लेते थे। अमेरिकाके प्रसिद्ध घरूयुद्धमें योग दिया था। परीक्षा आरंभ करनेके पहले काउंटके पास इसी समय आपको जीवनमें सबसे पहले व्योम- ३७५०००) की सम्पत्ति थी, परन्तु यह सम्पयानपर बैठनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ और इसीके त्ति थोड़े ही दिनों में पूरी हो गई । तब आपने फलसे आप व्योमयानविद्यामें साधारण जान- उक्त विषयमें और भी अनुशीलन करनेके लिए कारी प्राप्त करके भविष्य जीवनके जगतव्यापी अपने भाई-बंधुओं, समस्त स्वदेशहितैषी लोगों यशको अर्जन करनेमें समर्थ हुए । अमेरिकाका और सबके पीछे सम्राट्से सहायताकी प्रार्थना युद्ध बंद होते ही आप जर्मनी लौट आये और की। अंतमें १९०८ में उनका भाग्य प्रसन्न हुआ। इसके बाद आस्ट्रियो और प्रशिया तथा आस्ट्रिया जर्मन-गवर्नमेण्ट बहुत दिनोंसे काउंटकी शीघ्रताऔर फ्रांसमें जो युद्ध हुए उन दोनों युद्धोंमें से उन्नति करनेवाली कार्यप्रणालीको देखती आपने उपस्थित रहकर अपना वीरत्व दिखाया। आती थी । अतः जर्मन सम्राट कैसरकी अनु__यद्यपि युद्धकार्यमें आप बहुत दक्ष और कूलतासे जर्मनीके समस्त शहरों और नगरोंमें योग्य सैनिक थे; परन्तु आपका मन युद्धव्यव- जेपेलिन-अर्थभाण्डार स्थापित कर दिये गये सायकी अपेक्षा आविष्कारोंकी ओर अधिक और उनके द्वारा पहले ही महीनमें प्रायः ४५ आकर्षित रहता था। फलतः २५ वर्ष सेनावि- लाख रुपया भंडारमें जमा हो. गये ! भागमें काम करनेके पश्चात् व्योमयानके वि- इस सहायताको पाकर काउंट अपनी कार्यषयमें अनुशीलन करनेके हेतु आप जनरलके प्रणालीको और अधिक परिमाणमें विस्तृत कपदको परित्याग करके इस काममें लग गये । इस रनेमें समर्थ हुए और उन्होंने थोड़े समयके लिए ५० वर्षसे अधिक उमरमें आपको विद्युत्- भीतर ही हजारों वायुयान बना डाले । शुरू विज्ञान, शक्तिविज्ञान (mechanics ) और शुरूमें परीक्षाके समय बहुतेरे यान तेज हवा वायुविज्ञान ( meteorology ) का भली- और ऐसे ही कई कारणोंसे नष्ट हो गये। करना पड़ा।
काउंट शुरू शुरूमें जब इस तरह अपने कार्य___ इसके पश्चात् आपको व्योययान रखने साधनमें लगे थे उससमय अनेक प्रतिद्वन्दी गवर्न
और नाना तरहकी व्ययसाध्य परीक्षाओंके मेण्टोंने उन्हें बहुत लोभ-लालच दिया था। परंतु करनेके लिए एक पृथक् भवन बनानेकी आ- लालचमें पड़ कर उन्होंने देशके साथ विश्वास- . वश्यकता हुई और तदनुसार आपने इस का- घात नहीं किया । और इस लिए कि उनके मके लिए कानष्ट्रेट हृदके समीपवर्ती फ्रिड्रिक आविष्कार किसी तरह विदेशियोंको प्रगट न साफेन नामक स्थान पर व्योमयोनोंके गिरने- हो जायँ, उन्होंने खूब सावधानी रक्खी । का भय निवारण करनेके लिए एक ऐसा जहा- आज्ञाके अतिरिक्त कोई आदमी उनके कारखाजीपुल बनाया जो इच्छानुसार चारों ओर घुमा- नेके पास नहीं जा सकता था । कारीगरों और या जा सकता था। परीक्षाके समय वायुप्रवाह व्योमसंचालकोंसे व्योमयान और उसके आवि
भा
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ALBRITAILORCALLL
जैनहितैषी।
ष्कारके संबंधी कोई बात प्रगट न करनेके लिए प्रतिज्ञा कराई गई थी । परन्तु इतनी सावधानी रखने पर भी सौभाग्यवश फरासीसियोंको इनकी प्रणालीका पता लग गया । १९१२ ई० में एक जेपेलियनको लाचार होकर फ्रांसके लूभ्याँ नामक स्थानमें उतरना पड़ा और उस समय वहाँके व्योमयानविद्याके जाननेवाले लोगोंने उसे रोक कर २४ घंटे तक उसके प्रत्येक अंग प्रत्यंग और कल पुरजेकी बारीकीसे जाँच कर डाली । तथापि इस समय जर्मनी ही आकाशयानोंकी उन्नतिमें सबसे आगे है । एक नये किस्मके बलिष्ट ट्राइ- प्लेनके बननेका सम्बाद अभी हाल ही जर्मनीसे . आया है *।
कुछ मनोहर गर्दन मोड़ तू,
सुभग ! देख रहा शुभ दृष्टिसे। नच रहा कुछ बोल रहा गिरा, छबि रहा दिखला कुछ पाँखकी ।
(४) प्रिय मनोहर पाँख हरी हरी,
अरुण है अति उत्तम चोंच भी। शुक ! मनोहर श्याम लकीर है, कुछ ललास लिये तव कंठमें।
इधर भोजनको फल हैं नये,
उधर है जल निर्मल पानको। शुक ! तुझे यह आसन है मिला, महलमें इस नौ-लख बागके ।
पराधीन तोतेके प्रति।
कर रहे मलको कुछ दूर हैं,
कुछ खगेश ! तुझे नहला रहे। न कितने प्रिय सेवक-सेविका,
लग रहे जन यों तव दास्यमें ।
( कवि, श्रीयुत पं० गिरिधर शर्मा ।) ( मुमुक्षु भारतीय बन्धुओंको सादर समर्पित ।
विभव जो मिलते सबको नहीं,
सब वे तुझको यहाँ, महिप भी जिसको कर दें, वहीमुख नृपेश्वर देखरहा तव ।
विविध सुन्दर रत्न जड़ा हुआ,
कनकका शुक! है यह पीजरा। मलिनता मनकी कर दूर क्याहृदयमें भरता तव मोद है।
(२) यह मनोहर कांचन-यष्टिका;
जड़ रहीं मणियाँ जिसमें भलीं। चरण तू रखके इस पै सदा, न कितना मनमें खुश हो रहा।
अति कृतज्ञ विहङ्गम तू सही,
कि नयनोज्वल पाकर नाथका। मृदु गिरा पहले पढ़ ली वही, कह रहा प्रभुको मुद दे रहा।
शुक ! बड़ी कितनी यह बात है,
कि इस पंजरमें रहते हुए- । भय नहीं तुझको कुछ बाज़का, न चिर शत्रु विशाल विड़ालका।
* बंगला प्रवासीके लेखका अनुवाद ।
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SHARBARBITRAINITALIORAILHAARY
पराधीन तीतेके प्रति ।
Sो
(१७) विभव सुन्दर पाकर ये यहाँ,
विहगराज ! रहो सुख भोगते । मम कुतूहलके वश हो मन, वचन यों तुमको कहला रहा ।
(१८) पर विचार करें यदि सूक्ष्म तो,
स्थिति यही तव तप्त करे हम। न कुछ भी अफसोस ! स्वतंत्र तू, न इसका कुछ बोध रहा तुझे !
(१०) भटकते फिरना वनमें कहाँ ?
सुख कहाँ यह जो मिलता यहाँ ? सुकृतसे तुझको यह है मिला, न जगमें तुझसा पर धन्य है।
(११) जगतमें बरसे जल या नहीं,
रुचिर शस्य फले अथवा नहीं। पर अनुग्रहसे तव नाथके, सुख नहीं कम हो अणु मात्र भी।
(१२) विपिनमें दुसरे खगवृन्द ये,
कर रहे तन तोड़ परिश्रम। तदपि है मिलता इनको नहीं, नियत, वक्त हुए पर भोजन ।
(१३) नियत काल हुए, हर रोज ये
शुक ! तुझे मिलते फल मिष्ट हैं। चख रहा इनको धर चंचुमें: तज रहा कुछ झूठनमें यहाँ ।
(१४) शकुनि ! 'पेट भरे' इसके लिए
श्रम हजार करें जग जीव य बिन परिश्रम ही तुझको यहाँ, अयि कृतार्थ : मिला सब भोज्य है।
(१५) न तुझको श्रम हो जगमें कहीं,
न उड़ना, चलना, फिरना पड़े। इस लिए प्रभु है तव काटता,
युगलपंख दयालुशिरोमणि ।
कनकके जिस पंजरमें यहाँ,
शकुनराज ! सखे ! तुम बंद हो । कर नहीं सकता वह साम्य है, विपिनके तरु-कोटरकी कभी ।
(२०) रख पदद्वय कांचन-यष्टिपै,
हँस रहा शुक ! क्या खगवृन्दको। मृदुल पल्लव शोभित-बेलकी यह कहीं सम हो सकती नहीं।
(२१) जरठता जब हे शुक! आयगी,
मधुर-भाषण-शक्ति नसायगी। तब विपत्ति नितान्त सतायगी, कि जिसकी सुध भी दुख दे रही।
(२२) अब बिलोक रहे अति प्रेमसे. __ सुन रहे तव हैं वचनावली । फिर यही सबके सब मानव, शकुनि ! दानवसे बन जाँयगे।
(२३) तव समीप कभी नहीं आयेंगे,
वचन यो अति तीक्ष्ण सुनायँगे ! "न इसको कुछ बोध, न कामका,
जरठ पिंजड़ है यह चामका !"
चरणमें प्रभुने तव डाल दी, __ कनककी अति सुन्दर पैजनी। जब कभी उठता पद है तव, रणन है करती आति सुन्दर ।
१ हे पक्षिराज । २ बुढ़ापा ।
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Imammu
जैनहितैषी।
(२४) विविध नीति कला पढ़ते हुए ,
शुक! कभी यह भी प्रभुसे पढ़ा,। "सुखमयी सब भाँति स्वतंत्रता, सकल दुःखभरी परतंत्रता।"
(२५) निपुणतायुत हो कुछ सोच तो,
शकुन ! है सुख भी कितना तुझे। यदि यही सुख है परतंत्रता, __ जगतमें फिर है कह दुःख क्या ?
विभव है कुछ ही दिनके लिए,
स्थिर नहीं रहती शुक ! ये कभी। कमलिनी-दलके जल-बिन्दु क्यापवनके चलते स्थिर हैं रहे ?
(२७) निकल जाय नहीं करसे कहीं, __ हृदयमें दुख पाकर तू कभी। यह विचार सदा धर चित्तमें, कतरता प्रभु है तव पक्षको !
(२८) यह मनोरम सुन्दर भाजन,
शुक ! तभीतक है मिलता तुझे, सुमधुर-स्वरसे जबलों गिरा, श्रवणमें प्रभुके तव आरही।
(२९) हृदय-वल्लभ, जीवनप्राण तू ,
विहग ! तू जिसका सिरमौर है। कुछ विचार वही सुपतिव्रता, तव शुकी कितना दुख पारही।
(३०) अति विषाद भरी जननी तव,
सतत दुर्बल है शुक ! होरही। धर महा आंभमान परान्नका, स्मरण भी करता उसको न तू।
(३१) सुमतिकी मतिके प्रतिकूल जो,
हृदयको लगता अतिशूल जो, जब यही सुख है, तब, दुःखकाबस अभाव शुकोत्तम ! हो लिया।
(३२) शक : सवर्ण-सुशोभित पींजरा. ___ मत विचार इसे प्रिय तू कभी । समझ तू इसको मुख ब्यालका, __ सकल-वस्तु-विनाशक कालका।
(३३) . जनक पूज्य कहाँ ? जननी कहाँ ? __ सुहृदवृन्द कहाँ ? गृह है कहाँ ? कि जिनसे तव जन्म हुआ, तथासुख मिला तुझको अति बाल्यमें ।
(३४) स्वजन आदि जिसे मिल भोगते,
विभव हैं कहते उसको सुधी। रह जुदा सबसे शुक भोगता, विभव नाम कहीं इसका नहीं।
(३५) अब विचार किये फल क्या ? नहीं।
स्ववश तू, सब भाँति बँधा हुआ। न सहता विधि भी परतंत्रकी, इसप्रकार विचार-परम्परा ।
(३६) स्वजनसे तुझको जिस करने,
कर जुदा शुक! बंद किया यहाँ। अशन तू उसके करका दिया, कर रहा हह भूल सभी कथा।
(३७) कुपित होकर, या, कर भूल जो,
न तुझको जल भोजन दे प्रभु । मर रहे शुक ! तो पिंजरे पड़ा,
खबर भी तब हो जगकों नहीं।
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AAITITIONALAIMAILIMILAIILD
विविध प्रसङ्ग । Mmmmmumtutifuinfinition
२३७
स्वजनका तुझसे न भला हुआ,
कर सका कुछ काम न जातिका। अहह ! पेट भरा पड़ पीजरे, स्व-पुरुषार्थ विनष्ट किया सभी !!
(३९) मिल नहीं सकता निज जातिस,
नहिं मिटा सकता मनकी व्यथा। परम सुन्दर कुंजनिकुंजमेंन दिखला सकता, अपनी छटा।
(४०) अति मनोज्ञ छटा वन-कुंजकी,
स्वजन-मित्र-सुहृज्जनमें स्थिति। वह विचार, सुकर्म, स्वतंत्रता, सब हुए सपना तव हेतु हैं।
(४१) सुन गिरा मम क्या इस चंचुसे, . लग गया शुक ! पंजर तोड़ने । विफल ही यह यत्न नहीं सखे ! विहग! चंचु-विघातक भी बड़ा।
(४२) शुक ! न रो, धर धीर, सुचित्त हो,
न कर शांक, लगा मन योगमें। कर भला जगका, भज कृष्ण' को, रह सदा परमारथमें रँगा।
(४३) समय पाकर यो भगवानकी,
विहग ! तू प्रियता अति पायगा, सकल बंधनसे छुट जायगा, सब कहीं सुख चैन उड़ायगा।
Rarriantarrantsartan
विविध प्रसङ्ग। MEEMSELSEISEMISEvere
१ जाली जैन-ग्रन्थ । प्रत्येक धर्म और सम्प्रदायमें बीसों ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं, जिन्हें जाली कह सकते हैं; जो उस सम्प्रदायके किसी प्रसिद्ध पुरुषके नामसे प्रसिद्ध किये गये हैं और इस कारण सर्वसाधारण लोग उन्हें मानने लगे हैं। उदाहरणके लिए हिन्दुओंके 'भविष्यत्पुराण' का उल्लेख किया जा सकता है । यह व्यासजीका बनाया हुआ कह लाता है; परन्तु इसमें अभी अँगरेजी राज्यतकका वर्णन लिखा हुआ है ! यदि कोई शंका करे कि व्यासजीकी रचनामें अँगरेजी राज्यके लार्डीका वर्णन कहाँसे आया ? तो पौराणिक लोग उत्तर देते हैं कि व्यासजी सर्वदर्शी थे-उनके ज्ञानमें ये सब घटनायें पहले ही झलक गई थीं ! पाठक यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि जैनधर्ममें-दिगम्बरजैनसम्प्रदायमें भी ऐसे कई ग्रन्थ हैं जिन्हें जाली कह सकते हैं और जो प्राचीन आचार्योंके नामसे उनके बहुत पीछे गढ़े गये हैं । ऐसे एक दो ग्रन्थोंकी चर्चा जैनहितैषीमें हो चुकी है । अब ऐसे एक और भी प्रन्थका पता लगा है जिसका नाम 'भद्रबाहुसंहिता' है। यह अन्तिम श्रुतकेवली श्रीभद्रबाहु स्वामीकाआजसे लगभग २२०० वर्ष पहलेका-रचा हुआ समझा जाता है ! बहुतसे श्रद्धालु सज्जन इसे बड़े ही महत्त्वकी चीज समझते हैं; परन्तु श्रीयुत बाबू जुगलकिशोर के पत्रसे मालूम हुआ कि यह ग्रन्थ विक्रमकी तेरहवीं शताब्दिके बादका बना हुआ है ! वे बहुत ही जल्दी इसकी एक विस्तृत समालोचना प्रकाशित करेंगे और उसमें बतलायँगे कि उक्त ग्रन्थ जाली क्यों है और
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ABORATITAMIDIORAIL
जैनहितैषी
लगभग किस समयमें इसकी रचना हुई होगी। हिन्दू विश्वविद्यालयके पाठ्य-ग्रन्थोंमें जैनग्रन्थोंको इसमें भी बहुतसी बातें भविष्यत्कथनके रूपमें स्थान देनेके विषय प्रेरणा करने और जैनमिलिखी गई हैं और यह प्रकट करनेकी कोशिश को आगामी वर्षसे साप्ताहिक कर देनेके प्रस्ताव की गई है कि ग्रन्थकर्ता सचमुच ही भद्रबाहु भी उल्लेख योग्य हैं। श्रुतकेवली हैं ! आशा है कि अन्यान्य विद्वान् ३ सेठीजीका प्रस्ताव । भी इस ग्रन्थकी परीक्षा करेंगे और उसका फल सर्वसाधारणपर प्रकाशित करनेकी कृपा करेंगे। सेठीजीके विषयमें जैनसमाजमें जो आन्दो
लन हुआ है जान पड़ता है उसका परिणाम २ प्रान्तिक-सभाका अधिवेशन। अच्छा हुआ है । उसने लोकमतको उनके
दिगम्बर-जैन-प्रान्तिक सभा बम्बईका चौदहवाँ अनुकूल बना दिया है और वह इतना प्रभाव • अधिवेशन इस वर्ष नासिकके निकट गजपंथ तीर्थ डाल चुका है कि जो लोग पहले विरुद्ध थे वे
पर ता० ८ और ९ अप्रैलको सकुशल हो गया। भी अनुकूल हो गये हैं । यही कारण है जो गजपन्थ तीर्थपर सभाका यह दूसरा अधिवेशन प्रान्तिक सभामें यह प्रस्ताव सर्वसम्मतिसे पास है-इसके ७-८ वर्ष पहले वहाँ एक अधिवेशन होगया कि उनके छुटकारेकी प्रार्थना करनेके लिए
और भी हो चुका है। अबकी बार जनसंख्या वायसराय साहबके पास एक डेप्यूटेशन भेजा पहलेसे भी कम रही। लगभग ५००-६०० जाय। श्रीयुक्त सेठ हीराचन्द अमीचन्दजी शोलास्त्री पुरुष एकत्र हुए थे । पहले दिन तो मेम्ब- पुर और श्रीयुत जयकुमार देवीदास चवरे बी. रोंका कोरम ही पूरा न हो पाया था, इस कारण ए. बी. एल. ने डेप्यूटेशनमें जाना स्वीकार सभाका अधिवेशन न हो सका । ये ऐसी बातें हैं किया । श्रीयुत बाबू अजितप्रसादजी एम. ए. जिनसे लोगोंकी रुचिका पता लगता है। सभाओं एल. एल. बी. डेप्युटेशनमें जाना पहले ही
और व्याख्यानोंसे अब लोगोंको उतना प्रेम नहीं स्वीकार कर चुके हैं। इस विषयमें सभाकी रहा है जितना कुछ समय पहले दिखलाई देता जितनी प्रशंसा की जाय उतनी थोड़ी है । जिस था। अब ये रोज रोज काम हो गये हैं और इस प्रस्तावके लिए उच्चशिक्षा प्राप्त लोगोंके भारतकारण इनकी 'अतिपरिचयादवज्ञा' होने लगी है। जैनमहामण्डलका साहस न पड़ा, उसीको जब तक इन कामोंमें कोई नई जान न डाल दी साधारण पढ़े लिखे लोगोंकी सभाने विना जाय और इनके मार्गों में कोई उत्साहवर्धन परि. विरोध पास कर डाला ! यद्यपि इस प्रस्तावके वर्तन न किया जाय तब तक यह शिथिलता अनुकूल बहुमत तो महामण्डलकी सब्जैक्ट बढ़ती ही जायगी । अधिवेशनकी सबसे कमेटीमें भी था; परन्तु वहाँ प्रस्ताव पास न हो बड़ी सफलता यह समझना चाहिए कि जुदी सका था । यहाँ हो गया, इसका सबसे बड़ा जुदी संस्थाओंको लगभग ढाई हजार रुपयोंकी कारण यह जान पड़ता है कि यहाँ न तो सभाप्राप्ति हो गई । सब मिलाकर १३ प्रस्ताव पास पति ही सरकारी नौकर थे और न दूसरे कार्यहुए जिनमें दो उल्लेख योग्य हैं । एक पं० कर्त्ता । भारतके एक प्रसिद्ध नेताका मत है अर्जुनलालजीके सम्बन्धका और दूसरा जैन- कि उच्चशिक्षाप्राप्त लोगोंके हृदय जितने कमजोर हितैषी और जैनतत्त्वप्रकाशकके सम्बन्धका। और भयभीत हैं, उतने साधारणजनताके नहीं
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KaMILAIMIMOIROID
विविध प्रसङ्ग । iffffffffffffffffffifffim mm
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हैं । इस मतकी सत्यता मण्डल और प्रान्तिक- उठ हैं-उसपर विचार करनेका उनकी गतानुगसभाके कार्योंसे बहुत कुछ स्पष्ट हो जाती है। तिक बुद्धिको अवकाश ही नहीं मिलता है। और
इसी कारण हम इसके पास होनेको कुछ महत्त्व भी ४ जनहितैषीके आन्दोलनका
नहीं देते हैं। यह तो पास होना ही चाहिए था। निषेध ।
यदि यह पास न होता तो आश्चर्य होता । इस दूसरा महत्त्वका प्रस्ताव इन शब्दोंमें पास प्रस्तावको पेश करनेवालों, अनुमोदन करनेवालों हुआ है-“जैनतत्त्वप्रकाशक और जैनहितै- और सम्मति देनेवालोंमेंसे किसीने भी इस बातकी धीमें जो विधवाविवाहके मण्डनका आन्दोलन जरूरत नहीं समझी कि जैनहितैषीके प्रथम शुरू हुआ है-यह कार्य जैनधर्मसे अत्यन्त अंकका वह लेख-जिसके कारण यह उछल विरुद्ध है । अतएव यह सभा इस दुष्कृत्यका कूद शुरू हुई है-एक बार अच्छी तरह बाँच निषेध करती है और पत्रसम्पादकों तथा विद्वा- तो लिया जाय । हमें बहुत अधिक सन्देह है नोंको प्रेरणा करती है कि वे इसके विरुद्ध लेख कि उक्त लेख बाँचा गया है अथवा उसका अभिप्रकाशित करें ।" इस प्रस्तावके अनुमोदनके प्राय समझनेकी चेष्टा की गई है । लिए न्यायाचार्य पं० माणिकचन्दजी, पं०
५ जैनहितैषीके लेखका सारांश। पीताम्बरदासजी और पं० कश्तूरचन्दजीके . लगभग १॥ घंटे तक व्याख्यान हुए और जिसके जैनहितैषीके उक्त लेखका सारांश यह है कि मनमें जो आया उसने वही कहा । पिछले उप- स्त्री और पुरुष दोनोंको जन्मभर ब्रह्मचर्यपूर्वक देशक महाशयने तो जोशमें आकर यहाँतक रहना चाहिए । यह श्रेष्ठ मार्ग है । जो ऐसा कह डाला कि जो लोग जैनहितैषी खरीदते हैं वे नहीं कर सकते उन्हें शादी कर लेना चाहिए अपने पैसेको पानीमें फेंकते हैं । सब भाइयोंको और पुरुषको अपनी एक मात्र स्त्रीमें और स्त्रीको इसी समय प्रतिज्ञा कर लेना चाहिए कि जैनहितै- एक मात्र अपने पुरुषमें सन्तुष्ट रहना चाहिए । षीको न कभी मँगायँगे और न कभी पढ़ेंगे। यदि बीचमें पुरुष मर जाय तो स्त्रीको और स्त्री कई सज्जनोंने कहा था कि इस प्रस्तावकी मर जाय तो पुरुषको जीवन भर ब्रह्मचर्यसे जरूरत नहीं है, अनेक लोग इसके विरुद्ध रहना चाहिए । यह मध्यम मार्ग है। जिन भी थे, परन्तु अन्तमें प्रस्ताव रखा गया लोगोंसे यह नहीं बन सकता है-जिन्हें ब्रह्मऔर जनरल सभामें पास भी हो गया। चर्यसे जीवन बिताना कठिन जान
हमें इस प्रस्तावके पास हो जानेमें जरा भी पड़ता है उनके लिए तीसरा निकृष्ट मार्ग यह है आश्चर्य नहीं हुआ। जहाँ स्वतंत्र विचारकोंकी- कि स्त्रीके मरनेपर पुरुष दूसरी शादी करले और अपनी सदसद्विवेक बुद्धिपर विश्वास रखने पुरुषके मरनेपर स्त्री अपने लिए कोई आश्रय ढूँढ़ वालोंकी-संख्या थोड़ी होती है; दूसरोंके पीछे ले । उक्त सारे लेखका यही आशय था और चलनेवाले-हाँमें हाँ मिलानेवाले अथवा दूसरोंके जिनके जरा भी विचार शक्ति शेष है, जो धर्म प्रभावसे दब जानेवाले ही अधिक होते हैं, वहाँ और समाजशास्त्रके स्वरूपको जानते हैं, वे इसमें ऐसा होना ही चाहिए और फिर यह तो एक ऐसा कोई भी दोष या अन्याय नहीं देख सकते। विषय है कि जिसका नाम सुनते ही लोग भड़क लेख भरमें यह कहीं नहीं कहा गया है कि प्र
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HAMARILALBOATNA
जैनहितैषी
विवाह करना कोई पुण्यका कार्य है, अतएव उसे इसे धर्मविरुद्ध बतलाते हैं वे धर्मका स्वरूप ही करना ही चाहिए। यह अवश्य कहा गया है कि नहीं समझते हैं । जैनधर्ममें प्रत्येक मनुष्यको जिन बालविधवाओंसे ब्रह्मचर्यका पालन नहीं उसकी शक्तिके और स्थिति के अनुसार धीरे धीरे हो सकता है, जो अपने विचारोंपर विजय नहीं सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ानेकी विधि है। जो जिस पा सकती हैं, और इस कारण गुप्त पाप करनेके योग्य होता है उसे उसी चरित्रके धारण करनेका लिए लाचार होती हैं, उनको बलपूर्वक एकाकिनी विधान किया जाता है । जो अगणित प्रकारके रहनेके लिए मजबूर करनेकी अपेक्षा यह अच्छा जीवोंका मांस खाता था, उसे एक कौएके है कि उन्हें दूसरा पति करनेकी आज्ञा दे दी जाय। मांसको छोड़नेका उपदेश दिया गया था। जो स्त्री पापोंसे डरती है और इस कारण हाथीको छना हुआ पानी नसीब नहीं होता था, एक बड़े भारी पापकी परम्पराको छोड़ देती है; इस कारण वह तालाबके पानीको मचाकरपरन्तु सर्वथा निष्पाप ब्रह्मचारिणी होकर रहनेमें बिलोकर-प्रासुक कर लेता था और फिर उसे लाचार है, इस कारण एक छोटासा पाप कर पीता था। लेती है, अर्थात् निरन्तर छुपकर पाप करना पण्डित प्रवर आशाधर और सोमदेवसूरिने छोड़कर किसी एककी हो जाती है; निःशङ्कः ..
" ब्रह्मचर्यके तीन भेद किये हैं-एक स्त्री मात्रका होकर कहा जा सकता है कि वह अच्छा काम
त्यागी, और दूसरा अपनीको छोड़कर शेष करती है । बड़े बड़े कुलीन सेठ साहूकारोंके
सबका त्यागी और तीसरा अपनी स्त्री और घरकी उन विधवाओंसे जो जीवन भर पापके
१ वेश्याको छोड़कर अन्य सबका त्यागी । इस घडे फोड़ा करती हैं, उन साधारण घरोंकी तीसरेको आचार्य सोमदेवने गृहीका ब्रह्मचर्य विधवायें अच्छी हैं जो अपनी प्रवृत्तियोंको दमन ,
न कहा है:न कर सकनेके कारण पुनर्विवाह कर लेती हैं
और दस्सा या विनैकया बनकर जीवन व्यतीत वधू-वित्तस्त्रियौ मुक्त्वा सर्वत्रान्यत्र तज्जने। करती हैं।
माता स्वसा तनूजेति मतिर्ब्रह्म गृहाश्रमे ॥ ६ जैनधर्म और पुनर्विवाह ।।
पं० आशाधरके शब्द ये हैं:- “ यस्तु
स्वदारवत्साधारणस्त्रियोऽपि व्रतयितुमप्रस्तावके शब्दोंमें कहा गया है कि 'यह शक्तः परदारानेव वर्जयति सोऽपि ब्रह्माकार्य जैनधर्मसे अत्यन्त विरुद्ध है। अवश्य ही णुव्रतीष्यते । ” अर्थात् जो, जिस तरह जो विधवा ब्रह्मचर्यसे रहना चाहती है उसे अपनी स्त्रीका त्याग नहीं कर सकता है उसी पुनर्विवाहके लिए लाचार करना, अथवा जो प्रकार वेश्याका भी त्याग नहीं कर सकत कई बालबच्चोंका बाप परलोककी तैयारी कर केवल पराई स्त्रियोंका त्याग करता है वह भी रहा है उसे १०-११ वर्षकी कन्याके साथ ब्रह्मचर्याणुव्रती है । जो लोग गतानुगतिक पुनर्विवाह करनेकी इजाजत देना पापका कार्य और विचारबद्धिसे रहित हैं, वे इस बातको है और इस कारण जैनधर्मसे अत्यन्त विरुद्ध है। कभी नहीं मान सकते कि वेश्यागामी भी बड़े पापसे बचाकर छोटे पापकी इजाजत देना ब्रह्मचारी कहल सकता है । वे सोमदेव और जैनधर्मसे विरुद्ध कभी नहीं हो सकती। जो आशाधरको सैकड़ों गालियाँ सुनायँगे और
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MAD
CatfilmiBITAMITHALI
विविध प्रसङ्ग । AmirmirmirmiTERE
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अभी कुछ समय पहले जैनगजटके किसी लेख- है ? एक ब्रह्मचारिणी बालविधवाकी इज्जत क्या कने सुनाई भी थीं; परन्तु जो मर्मज्ञ हैं वे इसे बाजारू वेश्याके भी बराबर नहीं हो सकती है ? माननेसे कभी इंकार नहीं कर सकते। उक्त हमें आशा है कि विद्वान जन इस विषयमें निरविद्वानोंने ब्रह्मचर्यकी जुदा जुदा सीढ़ियाँ बत- पेक्ष होकर विचार करनेका कष्ट उठायेंगे । लाई हैं । जो वेश्यासे सम्बन्ध करता है वह ७ जनहितैषीका निषेध । पापी है इसमें कोई सन्देह नहीं; परन्तु यहाँ जनहितैषीके किसी एक लेखका निषेध तो केवल पापका विचार नहीं है--पापके दर्जाका किया जा सकता है; परन्तु यह समझमें नहीं आया विचार है । यह देखना है कि कौन पाप छोटा किपं० कश्तरचन्दजीने जैनहितैषीका निषेध क्या है और कौन बड़ा है। जैनधर्मकी दृष्टिसे तो समझकर कर डाला ! क्या आपकी उपदेश-मुवेश्यागमन ही क्यों स्वस्त्रीगमन भी पाप है। खरा बद्धिमें अभी तक यह बात नहीं आई कि परन्तु सबसे बड़ा पाप है, पराई स्त्रियोंसे पत्रसम्पादक अपने पत्रके प्रत्येक लेखका उत्तरसम्बन्ध, उससे छोटा है वेश्याओंसे सम्बन्ध, दाता नहीं होता है ? वह किसी एक विषयके
और उससे छोटा है अपनी स्त्रीसे सम्बन्ध । निर्णयके लिए अपने अनुकूल और प्रतिकूल अतः परस्त्रीगमनकी अपेक्षा वेश्यागमन और दोनों प्रकारके विचारोंका प्रकाश करता है। वेश्यागमनकी अपेक्षा स्वदारसन्तोष अच्छा है; यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक लेख उसीके वि. पर स्वतः तीनों ही अच्छे नहीं हैं-तीनों ही- चारोंके अनुकल हो । उसका सबसे बड़ा उद्देश्य पाप हैं।जो उत्तम पात्र है, उसे शुद्ध ब्रह्मचर्यका, · सत्य ' के निर्णयका रहता है, आप लोगोंजो मध्यम है उसे स्वदारसंतोषका और जो के समान लकीरके फकीर बने रहनेका नहीं । निकृष्ट है उसे परदारनिवृत्तिका उपदेश दिया यदि हितैषीमें एक लेख पुनर्विवाहके अनुकल जाता है । ठीक इसी दृष्टिसे पुनर्विवाहका प्रकाशित हुआ है तो आप चिन्ता क्यों करते हैं विचार होना चाहिए । विधवाविवाह या विधुर- प्रतिकूल लेख भी प्रकाशित होंगे । अभी तो विवाहको कोई पुण्य नहीं बतलाता है । अवश्य इस विषयका प्रारंभ ही हुआ है। यदि आप प्रही यह पाप है; परन्तु उस पापकी अपेक्षा तिकूल लिख सकते हैं, तो कुछ लिखअच्छा है-ऊँचे दर्जेका है जिसके कि कारण प्रति नेकी कोशिश कीजिए । पर यहाँ उन दिन सैकड़ों भ्रूणहत्यायें और गर्भपात किये पुरानी जंग खाई हुई युक्तियोंसे काम न जाते हैं और इसी कारण जो अपनी इन्द्रियोंके चलेगा जिन्हें सुनकर आपके भोले भाले श्रोता गुलाम हैं उनके लिए यह आचरणीय है । जिन तालियाँ पीटने लगते हैं । क्योंकि जनहितैषीके पण्डित और उपदेशक महाशयोंने इसे जैनधर्मसे पाठक इस बीसवीं शताब्दिके हैं और आपकी अत्यन्त विरुद्ध और दुष्कृत्य बतलाया है, वे युक्तियाँ दशवीं शताब्दिके कामकी हैं। आपको क्या कृपा करके बतलावेंगे कि वेश्यागामी यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आपके उपगृहस्थका ब्रह्मचर्य जैनधर्मसे अत्यन्त अविरुद्ध देशोंसे और प्रतिज्ञाओंके करानेसे हितैषीके
और सत्कृत्य कैसे हो सकता है ? क्या उनकी ग्राहक कम नहीं हो सकते; क्योंकि जिन समझमें किसी विधवाके साथ पुनर्विवाह करने- लोगोंपर आपका प्रभाव पड़ता है-जो लोग आधाला गृहस्थ उक्त वेश्यागामी गृहस्थसे भी बुरा पके संकीर्ण विचारोंपर श्रद्धा रखते हैं, उन
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जैनहितैषी -
ढूँढने पर भी जैनहितैषीका कोई ग्राहक न मिले - गा । हितैषीके प्रायः ग्राहक ऐसे ही हैं जिन तक आपके प्रभाव की पहुँच नहीं और जो आपसे अधिक विवेक-बुद्धि रखते हैं । और अपने ग्राहकों की योग्यता पर हमें यथेष्ट अभिमान है । यदि दश बीस आपहीकी योग्यताके ग्राहक आपकी प्रेरणा से घट जायँगे, तो इससे हमें यह समझकर खुशी ही होगी कि विधाताके निकट हमारी यह प्रार्थना स्वीकृत हो गई- अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख । "
।
८ प्रगति - सम्पादकका मार्मिक नोट सहयोगी 'प्रगति आणि जिनविजय' में उसके सुयोग्य सम्पादक गजपंथक्षेत्र के अधिवेशनकी समालोचना करते हुए लिखते हैं
!
“ दिगम्बर जैन प्रान्तिकसभा के अधिवेशन में एक विदुषी स्त्रीका व्याख्यान होनेवाला था, परन्तु उसे पं धन्नालालजीके आग्रहके कारण आज्ञा नहीं दी गई और इस तरह जैनधर्मपर आया हुआ एक भयंकर संकट टल गया ! नहीं तो भला कितना बड़ा अनर्थ हो गया होता अच्छा हुआ जो पण्डितजीने जैनसमाजको इस संकटसे मुक्त कर दिया ! इस सभा में दूसरा महत्त्वका प्रस्ताव यह हुआ कि विधवाविवाहके अनुकूल लेख लिखनेवाले पत्रोंका निषेध किया जाय ! यह प्रस्ताव भी बहुत दूरदर्शिता का हुआ जैनसमाज में स्त्रियोंकी संख्या कम है । इसके कारण हजारों जैनपुरुषोंको अविवाहित रहना पड़ता है । रहने दो; इससे कुछ हानि नहीं ! इससे पुरुषोंमें अनाचार बढ़ता है । तो भी कुछ हानि नहीं ! इसके कारण विधवाओंमें दुराचार फैलता है । तो भी क्या हुआ ? इस विषयमें कुछ कहना ही न चाहिए । इससे जैनसमाजका हास होता है । होने दो; जो होनेवाला है वह
!
होकर रहेगा। इस तरह शंका-समाधान हो जाने पर भी जैनहितैषी आदि पत्र विधवाविवाहके विषय में लेख क्यों प्रकाशित करते हैं? उनका निषेध होना ही चाहिए । जैनमित्र के कथनानुसार तो विधवाविवाहका समर्थन करनेवालों को मौन धारण करना चाहिए। वे आपस में चर्चा करें, गुप्तरूपसे सम्मतियाँ दें अथवा बाला बाला उत्तेजन दें, कुछ हर्ज नहीं; पर दश आदमियों में - सभा - सोसाइटियोंमें इस विषयकी चर्चा करनेकी क्या जरूरत ? ”
९ यज्ञोपवीत और जैनधर्म 1 हितैषी के पिछले संयुक्त अंकमें उक्त विषयका एक लेख प्रकाशित हुआ है । उसमें हमने लिखा था कि एक दो श्वेताम्बर विद्वानोंसे मालूम हुआ कि श्वेताम्बर सम्प्रदाय के शास्त्रों में भी यज्ञोपवीतकी क्रियाका विधान नहीं है । इसपर सहयोगी 'जैन' के गत २ अप्रैल के अंक में 'सत्याकांक्षी' की सहीसे किसी महाशयने लिखा है कि " श्वेताम्बर - साहित्यमें 'आचार दिनकर' इत्यादि बहुतसे ग्रन्थोंमें यज्ञोपवीतकी क्रियाका लेने की कृपा करें जिससे खुलासा होगा और सहेतुक विवरण है । लेखक महाशय उसमें देख आगामी अंक में अपनी भूल सुधारनेकी कृपा करें। ” इसके उत्तरमें हम श्वेताम्बरसम्प्रदाय एक विद्वान् साधु महाशय के पत्रको प्रकाशित कर देते हैं जिसे उन्होंने हमारी जिज्ञासानिवृत्तिके लिए अभी कुछ ही दिनों पहले भेजा था । साधु महोदय जैनधर्मके और इतिहास के बहुत अच्छे ज्ञाता हैं । इससे यज्ञोपवीतके मूलविषयपर भी बहुत अच्छा प्रकाश पड़ेगा -
" यज्ञोपवीतविषयक लेख पढ़ा। मेरे विचारसे यह प्रथा बहुत पुरानी नहीं; ब्राह्मणोंके संसर्गसे मध्यकाल में प्रविष्ट हो गई है । श्वेतांच में जनेऊ पहननेका रिवाज नहीं है । पुराने जमाने में भी पहननेका कोई उल्लेख नहीं मिलता ।
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CHITRALIACTICALCOHOLD
विविध प्रसङ्ग।
या
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" संवत् १५०० के आसपास वर्धमानसूरि नामके और समाजोंके रीति-रिवाज जुदा जुदा प्रकारएक आचार्य हो गये हैं । उन्होंने : आचार के हैं । किसी देश और जातिवाले मुर्देको जला
देते हैं, कोई जमीनमें खड्डा खोदकर गाड़ देते दिनकर ' नामका विस्तृत ग्रन्थ गृहस्थोंके
हैं और कोई यों ही जंगल में फेंक आते हैं। आचार विषयमें लिखा है । इस ग्रन्थम अन्यान्य जैनधर्मके सिद्धान्तानुरूप इन सब. जातियों के आचारों के साथ १६ संस्कारोंका भी विधान है । मनुष्य जैनधर्मका आराधन उत्कृष्टतया कर सकते आधुनिक ब्रह्मसमाज और आर्यसमाजने जैसे अप- हैं, तो अब फिर इनके लिए कौन सी रीति ने अपने मन्तव्यानुसार नये ढंगसे संस्कारोंका नियमित की जाय ? जैनदृष्टि से तीनों कृत्य- जला विधान किया है वैसे ये संस्कार भी जैनदृष्टिसे देना, गाड़ देना या फेंक देना-एकसे हैं । जैनधर्म जैनत्व लानेके लिए बिहित किये गये हैं । इन व्यवहारके विषयमें बिल्कुल मौन है । चाहे मुर्दा संस्कारोंमें एक ' उपनयन , संस्कार है जिसमें जलाया जाय, चाहे गड़ाया जाय, वह इस विषयमें जैनधर्मका आराधन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और किसी भी विधिको धर्म्य नहीं बतलाता । एसी वैश्यको ‘ जिनोपवीत' देनेका विधान है। ('य- अवस्थामें जैनधर्मसे व्यावहारिक नियम बनाये ज्ञोपवीत ' के स्थानपर 'जिनोपवीत ' नाम रक्खा नहीं जा सकते । जो मनुष्य जिस देश है जो ग्रन्थकारके कौशलका सूचन करता है। ) और जातिका हो वह अपना लौकिक व्यव
" केवल इस एक ग्रन्थके सिवा अन्य किसी हार अपने देशजात्यनुसार चलावे, धर्म उसमें कुछ पुराने या नये ग्रन्थमें न कहीं इस विषयका विधान नहीं कहता । केवल धर्माचरणमें जैनत्वकी आवहै और न कोई उल्लेख ही मिलता है । इस ग्रन्थमें श्यकता है । जैनधर्म केवल 'निवृत्तिमार्गविधायक, विहित विधान आदरणीय है या अनादरणीय,
है प्रवृत्तिका उपदेशक नहीं । हाँ, यह अवश्य वह
, कह देगा कि अमुक प्रवृत्ति अधिक कर्मजनक है इसका जिक्र आजतक किसीने नहीं किया । स्वर्गीय और अमक अल्प पापवाली। श्रीमदात्मारामजी महाराजने, सबसे पहले इन वैदिक धर्मकी दृष्टिमें और जैनधर्मकी दृष्टिमें संस्कारोंका प्रकाशन अपने 'तत्त्वनिर्णयप्रासाद ' बडा अन्तर है। यह बात हमेशा ध्यानमें रहनी में किया है । इसके बाद कुछ लोगों के विचार इन चाहिए । वैदिक धर्म व्यवहारप्रवृत्तिको भी धर्मके संस्कारोंको प्रचलित करनेके पक्षमें सुनाई देते हैं । साथ संलग्न रखना चाहता है । वह व्यवहार और ___“ इतिहास और तत्त्वकी दृष्टिसे देखा जाय धर्मका अभेद संबन्ध मानता है, इसलिए कुल व्यवतो जैनत्वकी छापवाले व्यवहारोंका अस्तित्व हो हारोंमें वह अपना दखल रखना चाहता है । जैनही नहीं सकता। जैन एक प्रकारका धर्म विशेष धर्मकी यह मानता नहीं । जैनधर्म तो कहता है कि है , समाज या जाति-विशेष नहीं । व्यवहार जितने कर्मजनक सब ही प्रवृत्तियाँ अधर्ममें शामिल हैं। हैं वे सब, समाज और जातिविशेषके साथ सम्बन्ध ऐसी प्रवृत्तियोंका विधान निवृत्तिपरायण जैनधर्म में रखते हैं । जैन-जीवन जगत् मात्रके मनुष्य- कैसे हो सकता है ! इत्यादि बहुत कुछ बातें विचापशुतक भी धारण कर सकते हैं । ऐसी दशामें रने लायक हैं । वर्णाश्रमके विषयमें भी यही हाल व्यावहारिक नियमोंके विषयमें किसी प्रकारका है। मैं अभी मुसाफिरीमें हूँ साथमें किसी भी प्रकास्वतंत्र नियम जैनधर्म नहीं बना सकता; उसका रका साहित्य नहीं है-लिखनेके लिए कागज भी यह कार्य नहीं । जगतकी भिन्न भिन्न जातियों यथेष्ट नहीं है ! .........."
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MARATHIIIII
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जैनहितषी
___ आशा है कि सत्याकांक्षी महाशयको इस पत्रसे उमरके युवकोंको मातृ-भाषासे पराङ्मुख होकर सन्तोष हो जायगा और अन्यान्य पाठकोंको पर-भाषा पर इतना मुग्ध होना शोभा नहीं देता। यज्ञोपवीतके मर्मको समझनेमें सहायता मिलेगी। यह बड़ी ही शोकजनक स्थिति है । विदेशी १. महात्मा गाँधी और मातृभाषा। संसर्गके कारण देशमें नवीन युग उपस्थित हुआ
हितैषीके पाठकोंको मालम होगा कि 'भारत- सही; पर इसका यह अर्थ नहीं है कि हमें जैनमहामण्डल' के गत दिसम्बरके अधिवेश- अपनी भाषा छोड़कर विदेशी भाषाहीमें अपने नमें हमारे अंगरेजीभक्त भाइयोंने लगभग एक विचार प्रकट करना चाहिए । जिस भाषाको हजार श्रोताओंके सामने-जिनमें अंगरेजी व्याख्यान देनेवालोंके माता-पिता नहीं जानते, जाननेवालोंकी संख्या मुश्किलसे १०० होगी- जिसको उनके बहन-भाई नहीं समझ सकते और अपने विचार अँगरेजीमें प्रकट किये थे। एक जिसको उनके स्त्री-पुत्र तथा नौकर-चाकर नहीं दिनकी तो सारी कार्रवाई अँगरेजीहीमें की गई समझ सकते, उसका सेवन करनेसे नवीन युग थी और उस समय थोडेसे इने गिने लोगोंको समीप आयेगा कि दूर चला जायगा, इसपर छोड़कर शेष सभी उनका मुँह ताकते रहे थे। उनको अवश्य विचार करना चाहिए । कितने ही ठीक यही हाल संगामपुर-सरतकी एक सभामें मनुष्योंका ख्याल है कि अँगरेजी अब हमारी भी हुआ। महात्मा गाँधीके हाथसे वहाँ एक मातृ-भाषा है । परन्तु यह ख्याल मुझे ठीक नहीं जैनपुस्तकालय खोला जानेवाला था । और इस- मालूम पड़ता । यदि अँगरेजी जाननेवाले के लिए एक सभा की गई थी । यद्यपि उस मुट्ठीभर लोगोंको हम 'देश' मानलें तो यह सभामें भी अधिकांश श्रोता अँगरेजीसे अनभिज्ञ कहना पड़ेगा कि 'देश' शब्दका ठीक अर्थ ही थे, तो भी कुछ जैनविद्यार्थियोंका जी नहीं हमने नहीं समझा । मेरा तो यह माना-उन्होंने अपने विचार अँगरेजीमें ही प्रकट सिद्धान्त है कि ३२ करोड़ मनुष्योंका करना उचित समझा । जब उनके अँगरेजी अँगरेजी सीखना और अँगरेजीका देशभाषा व्याख्यान हो चुके तब माहात्मा गाँधीने अनेक होजाना नितान्त असम्भव है। जिन नव-युवउपदेश देते हुए जो कुछ कहा उसे हम 'सर- कोंने नई विद्या सीखी है और जिन्होंने नये स्वती । से यहाँ उद्धृत कर देते हैं । हम आशा विचारोंसे लाभ उठाया है, उनको अपने विचार करते हैं कि मण्डलके सभासद महात्मा गाँधीके अपने देशभाइयोंपर अवश्य प्रकट करना चाबहुमूल्य शब्दोंपर ध्यान देनेकी कृपा करेंगेः- हिए। यह बात अपनी ही भाषाद्वारा हो सकती __“ यह अत्यन्त आश्चर्यका विषय है कि है । जो युवक यह कहते हैं कि हम अपने अंग्रेजीमें व्याख्यान देनेवाले विद्यार्थी इतना भी विचार मातृभाषाद्वारा नहीं प्रकट कर सकते विचार नहीं करते कि जिनके सन्मुख वे बोल उनसे मैं यही निवेदन करूँगा कि आप मातृरहे हैं वे उनका व्याख्यान समझ सकेंगे या भूमिके लिए भाररूप हैं । मातृ-भाषाकी अपूर्णता नहीं । वे नहीं सोचते कि यहाँपर जो अँगरेजी दूर करनेके बदले उसका अनादर करना-उससे समझनेवाले उपस्थित हैं वे इस त्रुटिपूर्ण अशु- हाथ ही घो बैठना-किसी सच्चे सपूतको द्ध अँगरेजी-भाषासे आनन्द प्राप्त करेंगे, या शोभादायक नहीं । वर्तमान जनसमुदाय उनके हृदयमें अरुचि उत्पन्न होगी । चढ़ती मातृ-भाषाकी उन्नतिके विषयमें चुप रहेगा
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HOMMITICALMOTIAURATIOD
विविध प्रसङ्ग। Ra maitrinturniturthiRITERESS
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तो भावी प्रजाको चिरकाल तक पछताना पड़ेगा। हैं, हमारे ही घरोंकी चोरियाँ करते हैं और उलहनेसे वे कभी नहीं बचेंगे । मैं आशा करता हमारे ही पशुओंको मारकर खाजाते हैं । अतः हूँ कि यहाँ बैठे हुए समस्त विद्यार्थी प्रतिज्ञा करेंगे यदि उन्हें शिक्षा दी जायगी, तो वे अपनी कि निरुपाय दशाके सिवा और कभी भी हम आजीविका न्यायमार्गसे करने लगेंगे। इससे उनका अपने घर पर अँगरेजी न बोलेंगे। विद्यार्थियोंके कल्याण होगा और हमारे घरोंमें चोरी आदि माता पिता भी समयकी खरतर धारामें बह उपद्रव न होंगे । हमारे तीर्थक्षेत्रोंके निकट जानेसे सावधान रहें । अँगरेजी भाषा हमे पढ़ना रहनेवाले जो भील आदि अनार्य्य लोग हैं, उनके अवश्य चाहिए, किन्तु मातृभाषाको भुलाकर लड़कोंके लिए यदि हम पाठशालायें खोल देंगे, नहीं । हमारे जनसमाजका सुधार हमारी तो वे लड़के बड़े होनेपर नौकरी चाकरी या मातृभाषा द्वारा ही होगा । मातृभाषाकी उन्नति और कोई व्यापार करके अपना पेट भरने लगेंगे।" करना विद्यार्थियों और उनके माता पिताओंका जैनोंकी जनसंख्या कम होती जाती है, इस भी कर्तव्य है । मैं प्रसन्न हूँ कि यह पुस्तकालय विषयमें सेठजीने दो कारण बतलाये हैं एक मेरे हाथसे खोला जा रहा है । पर, यदि यह जैनधर्मानुयायी अन्य धर्म स्वीकार करने लगे हैं अपनी भाषाकी पुष्टि न करके उसे क्षीण करेगा और दूसरा प्लेग । पहले कारणको ठीक बतलाते तो मुझे अत्यन्त दुःख होगा।"
हुए कहा है कि " सतारा, पूना, अहमदनगरके ११ प्रान्तिक सभाके सभापतिका कासार लोग धर्मोपदेशके अभावसे अपनेको
व्याख्यान । ___हिन्दू कहलवाते हैं और निजाम स्टेटके जैनोंका दिगम्बर-जैन-प्रान्तिक सभा बम्बईके इस भी यही हाल है ।" यह हम मानते हैं कि कुछ अधिवेशनमें सभापतिका आसन आलन्दनिवासी लोगोंने पिछले १० वर्षों में जैनधर्म छोड़ दिया शेठ माणिकचन्द मोतीचन्द शहाने स्वीकार होगा; परन्तु वह इतना बड़ा कारण नहीं है । किया था । मालूम नहीं स्वयं आपको जैन- इस विषय पर विशेष विचार इसी अंकमें प्रकासमाजसे कितना परिचय है और आपकी शित हुए श्रीयुत बाबू निहालकरणजी सेठीके योग्यता कैसी है; परन्तु आपने जो व्याख्यान लेखमें किया गया है । उसमें यह भी बतलाया पढ़ा, वह अच्छा लिखा गया है । यद्यपि गया है कि प्लेग भी जनसंख्याकी हानिका उसमें विशेष जोश या उत्तेजना नहीं है, तो भी प्रधान कारण नहीं है। जैनसमाजका उसमें खासा परिचय दिया गया १२ रोटी-बेटी व्यवहार । है। कहीं कहीं नये विचारों और सुधारोंकी प्रान्तिक सभाके स्वागतकारिणी कमेटीके ' ढंगके साथ ' हिमायत की गई है । अछूत सभापति सेठ नवलचन्द-हीराचन्दजीने अपने
और नीच जातियोंको शिक्षित बनानेके लिए कहा व्याख्यानमें कहा कि “ प्राचीन कालमें जब गया है-" नीच मानी हुई जातियोंके लड़कोंको रेल, तार, डाँक, आदिके सुभीते न थे, तब ज्ञान दिया जायगा तो उसमें स्वार्थ और परमार्थ लोग रोजगार-धंधेका तथा ब्याह शादियोंका दोनों सफेंगे । इस समय वे अशिक्षित हैं, इस सम्बन्ध अपने समीपके ग्रामोंसे ही रखना लिए हिंसा, चोरी, डकैती आदि नीच कर्म चाहते थे और इस कारण एक भागके करके पेट भरते हैं-हमारे ही घरोंपर डाँके डालते रीति रिवाज, वेष-भूषा आदि दूसरे भार
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जैनहितैषी
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से जुदा प्रकारके हो गये थे ! जातियोंकी इसीका यह फल था कि एक घरमें जैन, बौद्ध छोटी छोटी संस्थायें भी उसी समय स्थापित और ब्राह्मण-धर्म साथ साथ प्रेमपूर्वक पाले जाते हुई होंगी, ऐसा मालूम होता है । परन्तु अब थे। राजा श्रेणिक बौद्ध थे और उनकी रानी समय बदल गया है। यह सुधारका जमाना है। चेलना जैन थी। यह बहुत ही प्रसिद्ध कथा जब रहन-सहन, वेष-भूषा, भाषा आदि सभी है। ये सम्बन्ध किसीतरह हानिकारक नहीं बातें बदल गई हैं; तब पुराने रीती-रिवाज ही हो सकते । ये हमारे महत्त्वके द्योतक हैं। इनके कैसे स्थिर रहेंगे ? उस समयकी रहन-सहन, बढ़ानेका प्रयत्न करना चाहिए, न कि घटानेका। वेषभूषा, आचार-विचार तो बदल जावें; परन्तु १३ श्वेताम्बर-जैन-कान्फरेन्स । उस समयकी परिस्थितियोंके अनुसार बनाये हुए गत २३. २४ और २५ अप्रैलको श्वेरीतिरिवाज न बदले जावें, इसके समान मूर्खता- ताम्बर जैन कान्फरेन्सका दशवाँ अधिवेशन पूर्ण कार्य और क्या हो सकता है ? इन रिवा- धमधामके साथ हो गया। सभामें दो ढाई जोंमें सबसे प्रधान रिवाज ' ब्याह ' का है। हजार श्रोता उपस्थित होते थे । बाहरसे भी जातियोंके छोटे छोटे टुकड़े हो गये हैं, इस बहतसे लोग आये थे। हमारी दिगम्बरसभाओंके कारण वरके योग्य कन्या और कन्याके योग्य अधिवेशनोंकी अपेक्षा इस कान्फरेन्सके अधिवेशवर नहीं मिलते हैं। जिन जातियोंमें कन्यायें नमें कई एक विशेषतायें थीं। सबसे बड़ी विशेकम हैं, उनमें बेजोड़ ब्याह अधिक होते हैं और षता सभा-शुल्ककी थी । दो, तीन, पाँच और सैकड़ों युवाओंको जीवन भर कुआँरा रहना दश रुपयेके टिकिट थे । साधारण दर्शकोंका पड़ता है। इसके सिवाय कहीं कहीं श्वेताम्बर टिकिट दो रुपयाका था । इससे कमका या वैष्णव कन्यायें लानी पड़ती हैं । इन सब टिकिट कोई भी न था । बिना टिकिटके संकटोंके दूर करनेके लिए दिगम्बरजैनसमाजमें किसीको भी भीतर जानेका आधिकार न था। जातियोंकी भिन्नताके बिना ब्याह होना चाहिए। इस नियमकी पालना भी कड़ाई से होती थी। जहाँ रोटी-व्यवहार है वहाँ बेटी-व्यवहार भी टिकिटोंसे सुनते हैं कि लगभग छह हजार होना चाहिए । " इसमें श्वेताम्बर और वैष्णवोंकी रुपयेकी आमदनी हो गई ! यदि हमारी महाकन्याओंके साथ विवाह करना अच्छा नहीं सभा या प्रान्तिक सभाके किसी जल्सेमें इस बतलाया गया । परन्तु हम इस सम्बन्धको बुरा प्रकारका प्रबन्ध किया जाय, तो शायद नहीं समझते । अग्रवाल ओसवाल आदि जाति- सभामंडपमें २०० श्रोता भी उपस्थित न योंके समान जो ऐसी जातियाँ हैं जिनमें जैन हों । एक तो बम्बई अहमदाबाद जैसे बड़े शहऔर वैष्णव, अथवा श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों रोंमें रहनेवाले लोग यों ही खर्चीले होते हैं और धर्म पाले जाते हैं उनमें इस प्रकारके सम्बन्ध दूसरे इन स्थानोंमें श्वेताम्बर धनिकोंकी संख्या अकसर होते हैं और ये सम्बन्ध हमें प्राचीन भी अधिक है । यही कारण है जो यहाँ टिकिट भारतकी धार्मिक स्वतंत्रता और उदारताका होने पर भी लगभग दो ढाई हजार श्रोता सभामें आज भी स्मरण कराते हैं । भारतमें एक समय उपस्थित हो गये । हो जायँ, पर यह रीति ऐसा था जब मनुष्य अपनी इच्छानुसार चाहे अच्छी नहीं । कमसे कम जनसमाजमें तो जिस धर्मको पालन करनेके लिए स्वतंत्र था और अभी इसके प्रचलित करनेकी जरूरत नहीं है।
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SHITTALALIMITALITILALJHALALIHINium
विविध प्रसङ्ग।
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इससे वे लोग सभाके लाभोंसे वंचित रह जाते अपनेको भाग्यशाली समझते हैं, उस ज्ञान और हैं जो धनहीन हैं अथवा उपदेशको मूल्य देकर धर्मके ग्रन्थोंको अन्धेरेमें डाल रखनेमें हमें जरा लेने योग्य अभिरुचि नहीं रखते हैं । शिक्षा भी संकोच नहीं होता है । यह बहुत ही शोकऔर समाजोन्नतिके विचारोंको हम जितना की बात है । पुस्तकोंकी रक्षा और प्रचारके लिए सुलभ और सहज कर सकें उतना करना चाहिए। तो हमें धन नहीं मिलता; परन्तु ज्योनारोंके लिए, दूसरी विशेषता यह देखी कि धनी और पुराने ब्याह शादियों के जुलूसोंके लिए और निरर्थक धाख़यालके लोगों के साथ अनेक ग्रेज्युएट-वकील, र्मिक मुकद्दमे लड़नेके लिए रुपयोंकी कभी कमी बैरिस्टर, सालीसिटर, डाक्टर काम करते थे। नहीं पड़ती ! “ समाज-संगठनके विषयमें आपने हमारे दिगम्बर समाजमें यह बात नहीं है। कहा-" हमारी वर्तमान सामाजिक रचना ऐसी है हमारे यहाँ पण्डितों और बाबुओं तथा धनियोंमें कि हम धार्मिक और आर्थिक उन्नति करनेके लिए इतना मतभेद तथा मतासहिष्णुता है कि वे बिना चाहे जितना प्रयत्न करें तो भी अच्छी स्थिति लड़े-झगड़े मिलकर काम कर ही नहीं सकते। प्राप्त नहीं कर सकते; क्योंकि हम अपने धर्मके हमारे यहाँ कट्टरता ज्यादा है और हमारी सिद्धान्तोंके और समाजरचनाके विरुद्ध छोटी जनता नवीन सुधारके विचारोंसे बहुत ही अन- छोटी जातियों और उपजातियोंमें बँट गये हैं भिज्ञ है । साथ ही हमारे यहाँ धर्मतत्त्वोंके जान- और इससे एक साथ काम करनेकी शक्ति घटती नेकी डीग हाँकनेवाले अर्द्धदग्ध लोग बहुत हैं जाती है । अनेक बातोंमें हमारे विचार भी जो हर जगह धर्मके डब जानेका रोरा मचानेके संकुचित होते जाते हैं और समाजबल कम होता लिए तैयार रहते हैं । सभापतिका आसन बड़ौ- जाता है । इससे जब हम सारे जैनसमाजके दाके डाक्टर श्रीयुक्त बालाभाई मगनलाल प्रश्नोंको हाथमें लेना चाहते हैं, तब हमारे कार्यनाणावटीने सुशोभित किया था। आप बडोदा में तरह तरहके विघ्न आ पड़ते हैं । गत पचास महाराजके खास डाक्टर हैं और देशोपकारके वर्षके इतिहाससे मालूम होता है कि हमारी जुदी कामोंमें हमेशा योग दिया करते हैं। जुदी जातियाँ परस्पर मिलती तो नहीं हैं, उलटी १४ सभापतिके व्याख्यानकी कुछ
उपजातियाँ बढ़ती जाती हैं, और तड़ें पड़ती
जाती हैं ! जैनजातिको छोड़कर अन्य जातिबातें।
योंके साथका सम्बन्ध कम होता जाता है और डाक्टर साहबका व्याख्यान खासा था। पुस्तको- जैनधर्मका पालन करनेवाली एक ही जातिकी द्धारके विषयमें कहते हुए आप बोले- फिजलके अन्तर्जातियोंके साथका सम्बन्ध भी घटता जाता मुकद्दमें लड़नेमें, जैनधर्मकी झूठी प्रभावना प्रकट है । अर्थात् एक ही जातिके जुदा जुदा प्रदेशोंमें करनेमें और जाति-रिवाजोंकी खर्चीली सेवा रहनेवाले लोगोंका सम्बन्ध वर्तमान डाँक, रेल, तार बजाने में हमारा जैनसमाज प्रति वर्ष लाखों रुपया आदिके उत्तम साधन मिलने पर भी बढ़नेके बदले खर्च कर डालता है; परन्तु जिस ज्ञान के लिए संकुचित होता जाता है । व्यवहारका क्षेत्र इस हम अभिमान करते हैं, जिस धर्मकी प्राप्तिके तरह संकीर्ण होनेके कारण कन्याविक्रय, वरविकारण हम अपने जन्मको सार्थक मानते हैं और क्रय, बाल्यविवाह, वृद्धविबाह आदि हानिभगवान महावीर स्वामीके अनुयार्य कहलाने में कारक रिवाजोंको उत्तेजन मिला है। इस
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जैनहितैषी -
हमारी सामाजिक और शारीरिक दशा बिगड़ती जा रही है, तथा बन्धुभावका कार्यक्षेत्र संकुचित होकर एकता होनेके बदले फूट बढ़ती जाती है । हमें समझना चाहिए कि वर्तमान का जातिसंगठन हमारे धर्म और समाजशास्त्र के नियमोंसे विरुद्ध है। अतः इस मुख्य और महत्त्व - के प्रश्नकी ओर सबको ध्यान देना चाहिए। " अपना दूसरे सम्प्रदायों के साथ और देशके साथ सम्बन्ध बतलाते हुए आपने कहा - " हमें यह न भूलजाना चाहिए कि हमें जैनसमाजके दूसरे पन्थोंके साथ हिल मिलकर रहना है तथा भारतनिवासी होने के कारण हमें अपने देश संबन्धी कर्तव्य भी करने हैं और अनेक सत्व प्राप्त करने हैं । सारी जैनजातिके हितके लिए 'जैन एसोसियेशन आफ इंडिया ' तथा 'भारत जैनमहामण्डल' आदि संस्थायें स्थापित हुई हैं । इन संस्थाओं के साथ रहकर भी हमें काम करना है। हम सब भगवान् महावीर स्वामीके पुत्र हैं और थोड़ेसे मत मतान्तरोंको यदि हम न गिनें तो हम सबकी मानता भी एक ही है । सबका अन्तिम साध्य मोक्षप्राप्ति ही है | अतएव बन्धुभावकी विशाल भावनाके साथ हम सबको मिल कर जैनजातिकी भलाई करनेके यत्न करना चाहिए । ” व्याख्यानके अन्त में आपने निम्नलिखित बहुमूल्य इच्छा प्रकट की “मेरी आन्तरिक अभिलाषा है कि हमारा समाज धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक विषयोंमें आगे बढ़े, एकताके सूत्रमें बँधे और उच्च जीवन व्यतीत करने लगे । उसकी प्रत्येक व्यक्ति पहले मनुष्यत्वके और पीछे जैनत्व के कर्तव्योंका पालन करने के लिए शक्तिवान् बने और अन्तमें इस भव और परभवके सुधारने के लिए बुद्धिपूर्वक तत्पर हो । "
१५ कान्फरेंस के प्रस्ताव | कान्फरेंस ने सब मिलाकर १८ प्रस्ताव पास
किये, जिनमें दश प्रस्ताव केवल शिक्षासम्बन्धी थे । यह अब अच्छी तरहसे निश्चित होता है कि उन्नति के तमाम साधन शिक्षा के हाथ में हैं, इसलिए सबसे अधिक जोर शिक्षा पर ही देने की जरूरत है । बम्बईके शिक्षाखातेके डायरेक्टरने जैन विद्यार्थियों के शिक्षासम्बन्धी अंक प्रकाशित करनेकी स्वीकारता दे दी है । इसलिए कान्फरेंस ने बम्बईके शिक्षाखातेको धन्यवाद देने और अन्यप्रान्तोंके शिक्षाखातेको प्रेरणा करने का भी एक प्रस्ताव पास किया । दिगम्बर कान्फरेंस को भी इस विषय में प्रयत्न करना चाहिए । इससे हमें अपनी शिक्षाकी दशाका ज्ञान होगा। एक प्रस्ताव हिन्दी यूनीवर्सिटीके सम्बन्धका था । उसमें यूनीवर्सिटीकी स्थापना पर प्रसन्नता प्रकट की गई और उसके संचालकोंसे आग्रह किया गया कि हिन्दूधर्मके समान जैनधर्मकी शिक्षाका भी वे प्रबन्ध करें । इसी प्रकारका एक प्रस्ताव बम्बई प्रान्तिक सभा के अधिवेशनमें भी पास हुआ है । आशा है कि इस ओर ध्यान दिया जायगा । १५वाँ प्रस्ताव जैनों की संख्यावृद्धि के सम्बन्ध में था । घटती हुई संख्याको बढ़ाने के लिए पाँच उपाय बतलाये गये - १ जिन लोगोंने अपना असली धर्म छोड़कर अन्य धर्म स्वीकार कर लिया हो उन्हें फिरसे जैनधर्म में लानेका प्रयत्न करना, २ जैनधर्म में रुचि रखनेवाले उच्चवर्णके आर्यों को साधुमहाशयोंकी सम्मति से जैनधर्ममें दाखिल करनेका यत्न करना, ३ आरोग्यविद्या के निय मोंका ज्ञान जैनसमाजमें फैलाना, ४ सघन वस्तीवाले बड़े शहरोंमें गरीब और साधारण स्थिति के लोगोंके लिए कम किरायके हवादार मकान और कोठरियाँ बनाने के लिए जैनधनिकोंको प्रेरणा करना । कान्फरेंसने अपने
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UmmmmmmOIRITUALI
विविध प्रसङ्ग।
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गत अधिवेशनमें जैनीमें मृत्युसंख्या अधिक था कि पं० लालनके स्टेजपर व्याख्यान हों; क्यों हाती है, इसकी जाँचके लिए एक कमेटी परन्तु दूसरा पक्ष इसका विरोधी था । सभापति बनाई थी। उक्त कमेटीने इससमय अपनी महाशयने बड़ी काठनाईसे विरोध शान्त किया रिपोर्ट छपाकर बाँटी थी । पाँचवाँ उपाय इस और उस दिनका काम ज्यों त्यों करके समाप्त रिपोर्टकी सूचना पर ध्यान देना बतलाया गया। किया । पं० लालन स्वयं ही उस दिन न आये; रिपोर्ट बड़े महत्त्वकी है; परन्तु अफसोस है कि उन्होंने अपने कारण कान्फरेंसके काममें बाधा वह केवल बम्बई शहरकी है। सारे देशके जै- पहुँचे, यह पसन्द न किया। उनके व्याख्यानोंके नियोंकी मृत्युसंख्याक विषयमें भी इसी प्रकारकी विना कान्फरेंसकी स्टेज सूनीसी रही। अवश्य एक रिपोर्ट प्रकाशित करनेकी जरूरत है। ही वीतराग साधुओंको-धर्मके सर्वाधिकारियोंको आशा है कि इसकी ओर और और सभायें भी इससे सन्तोष हुआ होगा । ध्यान देंगी।
१७ एक सेठजीके पत्रका उत्तर । १६ तीसरी बैठकमें कुछ विघ्न। हमारे एक शुभचिन्तक सेठजीने-जो जैनस
ता० २३ अप्रैलको सभाका काम ११ बजेसे माजके बहुत ही प्रतिष्ठित पुरुष समझे जाते हैंशुरू होनेवाला था और लोग ठीक समयपर अभी कुछ ही दिन पहले हमें एक पत्र लिखेनेकी उपस्थित भी होगये थे; परन्तु ढाई बजेतक काम कृपा की थी जिसमें उन्होंने जैनहितैषीके पहले बन्द रहा । श्रीयुत पं० फतहचन्द कपूरचन्द अंकमें प्रकाशित हुए 'जनोंकी वर्तमान दशाका लालनका नाम पाठकोंने सुना होगा। आप श्वे- चित्र' शीर्षक लेखके सम्बन्धमें हमें उलहना दिया ताम्बर समाजके बड़े नामी वक्ता, निःस्वार्थ था और हमें सदिच्छावश अनेक उपदेश देनेका सेवक और विद्वान् पुरुष हैं । आप कई बार कष्ट भी उठाया था। पत्रका उत्तर हमने जो कुछ यूरोप और अमेरिकाकी सफर कर आये हैं। दिया था, वह यहाँ प्रकाशित कर दिया जाता आपका हृदय बहुत उदार है और समस्त है । इससे उन सज्जनाको भी संतोष हो जायगा जैनसमाजकी उन्नतिके लिए आप निरन्तर जिन्होंने हमें सेठजीके ही समान उलहने देने या प्रयत्न किया करते हैं । कई वर्ष हुए उपदेश देनेका कष्ट उठाया था और हम अवपालीतानेमें आपकी इच्छाके विरुद्ध कुछ जैन काशाभावके कारण सबको पृथक् पृथक् उत्तर न विद्यार्थियोंने आपकी पादपूजा की थी, इस लिख सके थे । इससे हमारे पाठकोंकी भी अनेक कारण पादपूजाके रजिस्टर्ड अधिकारी कुछ शंकाओंका समाधान हो जायगाःश्वेताम्बर साधुओंने आपके विरुद्ध आन्दोलन “महाशय, धर्मस्नेहपूर्वक जुहारु । आपका ता. शुरू किया था और उन्हें संघसे बाहर निकाल २६.३-१६ का कृपापत्र मिला । आपका पत्र पढ़डालनेके लिए कमर कसी थी। इसका फल यह नेसे चार बातोंका पता लगता है-एक तो आपको हुआ कि श्वेताम्बरसमाजमें दो बड़े भारी पक्ष जैनधर्मकी उन्नतिकी बड़ी चिन्ता है, दूसरे आप पड़ गये-एक पं० लालनका अनुयायी और दूसरा स्वयं यह मानते हैं कि विधवाविवाह जैन समाजको साधुओंका । यह फूट अभी तक चली आती है अत्यन्त हानि पहुँचानेवाला और जैनधर्मके पवित्र और उसीके कारण उस दिनकी बैठकका काम- आदर्शको मिटानेवाला है, तीसरे आपकी समझमें ढाई बजेतक शुरू न होसका । एक पक्ष चाहता विधवाविवाहके प्रश्नकी चर्चा करना मन्दबुद्धिर
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AIImmumI
जैनहितैषीfition
लोंका काम है और चौथे आपकी आशा है कि जानकर आश्चर्य होता है । मान्यवर ! हमारे समा मैं पहले अंकमें प्रकाशित हुए विधवाविवाहसम्बन्धी जके अगुए और धर्मात्मा कहलानेवाले लोग ऐसी लेखका खंडन करूँ। मैं इन चारों ही बातोंपर नम्रता- गाढ़ निद्रामें सोये हुए पड़े हैं कि उनको जगानेके पूर्वक निवेदन करना चाहता हूँ जिससे आपको मेरे लिए इस तरहकी उत्तेजना फैलानेवाली भयदायक विचारोंका पता लग जाय और आपके पत्रका चर्चा उठाना बहुत आवश्यक है । ऐसी भयंकर उत्तर हो जाय ।
चर्चाके विना वे जागनेवाले नहीं । विधवाविवाह __ यह बड़े ही आनन्दका विषय है कि धर्मदृष्टिसे बुरा है या भला यह दूसरा प्रश्न है, आपको जैनधर्मकी उन्नतिकी चिन्ता है । सचमुच- इसका विचार आगे होगा; पर इसमें तो कोई संदेह ही आपका यह कर्तव्य होना चाहिए कि जिन नहीं कि लोगोंको भयभीत करके जगानेके लिए विचारों या प्रवृत्तियोंसे समाज या धर्मको हानि इससे अच्छा नुसखा और दूसरा नहीं । भला यह पहुँचती हो, उन सबको रोकनेका उद्योग करते भी कोई जैनधर्मका न्याय है कि पुरुष तो पचास रहें । हितैषीके जिस लेखपर आपको आक्षेप है और पचपन वर्षकी उम्र तक विषय-भोग करते उसके विषयमें तो मैं आगे चलकर विचार करूँगा। हुए भी सन्तुष्ट न होकर बारह वर्षकी नासमझ लड़यहाँ आपका लक्ष्य इस ओर आकर्षित करना चा. कीका जन्म मिट्टी में मिला दें और बारह वर्षकी हता है कि वे विचार जो उक्त लेखमें प्रकट किये अनाथ विधवा इन्द्रियनिग्रह करनेके लिए लाचार गये हैं थोड़ी देरके लिए मान भी लिया जाय कि की जाय ? हम लोग तो ऐशो-आराममें जिन्दगी हानिकारक हैं; परंतु यह भी तो सोचिए कि उनकी बितावे और स्त्रियोंको दुःखके गढ़ेमें ढकेलकर उत्पत्ति किस कारणसे हुई ? मेरी समझमें बालवि- उनकी ओर नजर उठाकर भी न देखें ? इसका वाह, बृद्धविवाह, कन्याविक्रय और विधवाओं नाम क्या धर्म है ? यदि हम सच्चे जैनी हैं और पर होनेवाले अत्याचार, ये ही कारण हैं जिन्होंने जैन-धर्मके गौरवका रक्षण करना चाहते हैं तो हमें विधवाविवाहकी चर्चाको जन्म दिया है । मैं पूछ- बालविवाह, वृद्धविवाह, कन्याविक्रय और छोटी ता हूँ कि विधवाविवाहकी तो चर्चा भी आपको छोटी उपजातियोंका अस्तित्व मिटाना ही पड़ेगा। असह्य मालूम होती है. पर बाल और वद्भविवाह- जबतक य बात न मिटगा तबतक इनस उत्पन्न के कार्य क्यों असह्य मालूम नहीं होते ? उसकी होनेवाला विधवा-विवाहका पाप रुक नहीं सकता। तो चर्चा में भी अधर्म है और इनके प्रत्यक्ष कार्योंमें जबतक पापोंका मूल बना है, तबतक उनका फल भी अधर्म नहीं है ! आप कहेंगे कि इन कार्यामें चखना ही होगा । अतः आप जैसे सच्चे समाज-सेव. अधर्म तो है, पर किया क्या जाय ? लोग माने कों-अग्रेसरोंको चाहिए कि विधवाविवाहकी तब न ? पर यह उत्तर सन्तोष-जनक नहीं है। चर्चाको सुनकर क्रोधित न हों, बल्कि इसकी आवआप जैसे प्रतिष्ठित अगुए यदि चाहें-कमर कस लें श्यकताको खड़ी करनेवाले वृद्धविवाहादि कुकतो ये पाप-प्रवृत्तियाँ अवश्य बन्द हो सकती हैं। र्मोको-कमसे कम अपने अपने प्रान्तोंमें-शीघ्र ही हितैषीमें चर्चा न होने पावे, इसके लिए बन्द करनेकी कोशिश करें, जिससे कि विधवातो आप कटिबद्ध जान पड़ते हैं, पर इस चर्चा के विवाहकी आवश्यकता ही न रहे। जन्मदाता पापकार्योंके रोकनेके लिए-आप समर्थ “अब मैं जैनहितैष के लेखके मुद्देपर आता होते हुए भी कुछ भी उद्योग नहीं करते हैं, यह हूँ । इस विषयमें पहले यह जानना चाहिए कि
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विविध प्रसङ्ग
हैं,
पत्रसम्पादकों का कर्तव्य क्या है ? प्रबल युक्तिवाले और गालीगलौज जिसमें न हो ऐसा कोई भी लेख कोई प्रसिद्ध लेखक भेजे तो सम्पादकको चाहे वह उससे सहमत हो या न हो; लोगों को स्वयं विचार करनेका मौका देनेके लिए उसे अपने पत्रमें अवश्य प्रकाशित करना चाहिए । यही पत्र - सम्पादकों का धर्म है । जिस लेखके विषयमें आप शिकायत करते हैं, वह लेख खास विधवाविवाह के विषय में नहीं है । जैनसमाजकी तमाम परिस्थिति - योंके अनुभवसे उन्नति के मार्गको बतलाना उस लेखका आशय है । स्त्रियोंके सिवाय और भी बहुतसी बातोंकी - शास्त्रोद्धार, ऐक्य, आत्मबलि आदिकी भी उसमें चर्चा है । इन सब चर्चाओं के पढ़नेंसे आपको स्वतः मालूम होजायगा कि लेखक महाशय जैनधर्म और जैनसमाज के सच्चे सेवक, भक्त और शुभेच्छुक हैं । उनके अन्यान्य अनेक लेखों ग्रंथों, और व्याख्यानोंसे मैं परिचित हूँ और उनके निजी वा सार्वजनिक जीवनका भी मुझे बहुत कुछ अनुभव है । मैं कह सकता हूँ कि उनका आशय हमेशा निर्मल और समाजसेवा करने का रहता है । उनकी युक्तियाँ और अनुभव भी विस्तृत है । ऐसे पुरुषके विचारोंको हम अपने पत्र में स्थान न दें तो फिर और किसके विचारोंको स्थान दें ? मुझे भय है कि आपने वह लेख शान्तिसे नहीं पढ़ा, यदि पढ़ा होता तो आपको मालूम होता कि - " उन्होंने पुनर्विवाहको धर्मकार्य नहीं किन्तु पाप ही माना है; इतना ही नहीं, उन्होंने तो प्रथम विवाहको भी धर्म नहीं किन्तु व्यवहार माना है वे अखंड-ब्रह्मचर्य्यको ही धर्म समझते हैं और अखंड-ब्रह्मचर्य्य पालनेवालोंको ही वे पवित्र, उच्चतम जैन और पूज्य ठहराते हैं । परन्तु जिनसे अखंड - ब्रह्मचर्य पालन न हो सके उनके लिए समाजने विवाहकी व्यवस्था की है और उसे धर्मविवाह ठहराया है । इस शुभ हेतुसे कि लोग स्वप
" फिर जो लोग पहली और दूसरी कक्षा के नहीं अर्थात् तीसरी कक्षाके - कनिष्ठ आत्मबल - वाले हैं- या यों कहिए कि जो एकबार विवाहित हो चुकनेपर विधवा या विधुरकी अवस्था में नहीं रह सकते, उनके लिए क्या करना चाहिए ? इस प्रश्नका उत्तर लेखक महाशय अनेक स्थितियोंका विचार करके भिन्न भिन्न स्थितिवाले स्त्री पुरुषों के लिए भिन्न भिन्न रूप से देते हैं । उनकी प्रथम और सर्वोत्तम सलाह तो यह है कि सुयोग्य पुरुष और सुयोग्य स्त्रीका ही विवाह हो, अयोग्य स्त्रीपुरुषको समाज विवाह करने की आज्ञा ही न दे; जिससे कि छोटी उमरमें विधवा होने की संभावना ही न रहे । यदि हजारमें कोई एक दो विधावायें जायँ, तो उनके लिए कोई खास कानून ( विधवाविवाह के समान ) रखने की जरूरत नहीं है । उनका मत है कि जब बहुतसे स्त्री पुरुष पुख्त उमरमें और गृह संसार चलानेकी योग्यता प्राप्त करके विवाह करेंगे तब विवाह ऐसा सुखमय हो जायगा कि स्त्रीको अपने प्यारे पति की मृत्यु के बाद ट
।
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त्नीसे भी केवल विषयसेवनके ही अभिप्रायसे संबंध न करें । प्रकृतिकी वास्तविक मंशा यह है कि स्त्री पुरुष संभोगके विषयमें मितव्ययी हों और उनमें शारीरिक तथा मानसिक आरोग्य और बलकी वृद्धि हो । इस तरह मितसंभोग के द्वारा संतान भी बलिष्ठ होती है । परन्तु ऐसा उपदेश सुनकर लोग विषयसेवनमें मितव्ययी नहीं हो सकते, यह समझकर विवाहको धर्मविवाह ठहराना पड़ा, ताकि धर्म के डरसे लोग स्वस्त्री सम्बन्ध में भी नियमित रहें और विषय वासनाओं को रोकें ।
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इस तरह लेखक ने
ब्रह्मचर्यको ही धर्म माना है और विवाहको धर्म नहीं; किन्तु व्यवहारकी दृष्टिसे माना हुआ धर्म ठहराया है । इतना ही नहीं परन्तु स्वस्त्री से भी नियमित रहनेका उपदेश दिया है ।
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THAmausammam जैनहितेषी
in ATTUOR
पुरुषकी शय्यापर जानेका विचार भी पसंद न उसे पुनर्विवाह करनेकी इजाजत दे या उसका निषेध आयगा । ( इस बात परसे लेखककी शुभानष्ठाका करे । तात्पर्य यह है कि समाजकी आज्ञाके सिवाय ख्याल आप कर सकेंगे ) इसके सिवा उनका यह स्त्री-पुरुष खुदमुख्तारीसे पुनर्विवाह न करें। उनकी भी कहना है कि विधवाओंको केवल उदरपोषणके यह बात भी उनकी शुभनिष्ठाको प्रकट कर रही है । लिए ही पुनर्विवाहका आश्रय न लेना पड़े, इसके "इस कथनका उद्देश्य क्या है सो भी ध्यानमें लिए समाजको चाहिए कि वह जगह जगह विध- रखना चाहिए । उनका मत है कि, हम यदि सभावाश्रम खोले और उनमें उनके उदरपोषणके सिवा के कानून बहुत सख्त रक्खेंगे तो लोग इस उन्हें आत्मज्ञान देनेका प्रबंध भी किया जाय, जिससे धर्मको छोड़कर अपने सुभीतेवाले किसी अन्य वे उस ज्ञानके जोरसे अपने विकारोंपर जय प्राप्त धर्ममें चले जायेंगे । इस लिए यह उचित समझ कर सकें।
पड़ता है कि पहली दूसरी और तीसरी इन तीनों " अब यह देखना चाहिए कि लेखक महा- श्रेणियोंमें समाजके सारे मनुष्योंका समावेश किया शयने विवाहकी बकालत किस रूपसे की है। उ- जाय । ब्रह्मचारियोंका दर्जा सबसे ऊँचा है। विवान्होंने कहा है कि यदि हम लोग बालविवाह या वृद्ध हित स्त्रीपुरुषोंकी गणना दूसरे दर्जेमें की जा सकती विवाहको बंद न रख सकेंगे, तो बालविधवाओंकी है और जो पुनर्विवाह करते हैं वे तीसरे दर्जेमें हैं। संख्या बढ़ती ही जायगी और उनके उदरपोषण- क्या यह न्यायसंगत नहीं हैं ? ऐसा करनेसे उत्तम के लिए कुछ न कुछ विचार करना ही पड़ेगा। अतः मध्यम और कनिष्ठ तीनों ही प्रकारके लोग जैन एव लेखककी राय है कि उनके लिए विधवाश्रम धर्मको पालन कर सकेंगे । यदि ऐसा न किया खोलकर उन्हें इन्द्रियनिग्रहकी शिक्षा दी जाय। जायगा आपद्धर्मके रूपमें भी विधवाविवाहकी पर जिन बहुत ही कम उम्रवाली स्त्रियोंसे इन्द्रिय- आज्ञा न दी जायगी तो बहुतसे स्त्रीपुरुष आर्यनिग्रह न हो सके, उन्हें समाज को चाहिए कि पुन- समाजी या किश्चियन आदि बन जायँगे और विवाह की आज्ञा दे। यह बात ध्यानमें रखने बनते हैं। योग्य है कि यदि बालविधवायें न हों तो विधवा-वि- “यहाँपर मैं आपको एक बात याद कराता वाह की जरूरत ही न रह जाय। विधवाविवाह पस- हूँ कि हिन्दूधर्मवालोंने भी ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, न्द न हो तो ऐसा प्रबंध करना चाहिए जिससे बाल- शूद्र ऐसे चार दर्जे योग्यतानुसार रक्खे हैं और विधवायें ही न होने पावें और ऐसा प्रबंध करना स- उत्तम ब्राह्मणसे कनिष्ठ शूद्रतक को हिन्दूधर्ममें माजके हाथमें है।
स्थान दिया है । ऐसी व्यवस्था करनेसे जैनसंख्याकी " एक ध्यान देने योग्य बात लेखक महाशय कमी रुक जायगी । यदि आप कहेंगे कि क्या यह लिखते हैं कि मुझे यह बात पसंद नहीं विधवाविवाह जैसे नीच काम करनेवालोंको हम है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपनी इच्छासे जैनसमाजमें रक्खेंगे ? तो मैं पूछता हूँ कि क्या पुनर्विवाह करें । ऐसा करनेसे समाजमें अव्यवस्था हो व्यभिचार, शराब खोरी, चोरी, दगाबाजी इत्यादि जायगी । समाजको चाहिए कि जो स्त्री फिरसे महानीच पाप जैनियोंमें कम होते है ? और ऐसे विवाह करना चाहती है उसकी उम्र क्या है, स्थिति पाप करनेवाले क्या जैनसमाजसे बहिष क्या है, उसकी विवाहित स्थिति कितने समयतक किये जाते हैं ? क्या यह बात सच नहीं है कि कायम रही थी इत्यादि बातोंका विचार करके फिर सच्चे जैन तो हजारमें एक दो ही हैं? तथापि व्यव
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JUMARITHALALIBAITHAIMIRAIMIMALA
_ विविध प्रसङ्ग। ifinitititifiilfiminimun
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हार रक्षाके लिए हमने यही ठहरा लिया है कि १८ आचार-दिनकर और मनुष्य चाहे जैसी अनीतिका सेवन करे परन्तु वह
यज्ञोपवीत । जबतक अपने मुँहसे तीर्थंकरोंका नाम जपता यज्ञोपवीत और जैनधर्म' शीर्षक नोट (पृष्ठ रहे और जैनधर्म सच्चा है' ऐसा कहता रहे तबतक २४२) में जिन साधु महोदयके पत्रका एक अंश उसे जैनी ही कहना चाहिए। जब ऐसी धारणा है उद्धत किया गया है, उन्हींके दूसरे पत्रमें लिखा हैतब उत्तम मध्यम और कनिष्ठ इन तीन प्रकारके यहाँ पर मझे 'आचार-दिनकर' मिल गया। लोगोंके जैनधर्ममें स्थान देने से क्या हानि है ? देखनेसे मालूम हुआ कि ग्रन्थान्तमें, कर्तीने अपनी
"इन बातोंका विचार बहुत कुछ शान्तिके गच्छपरम्परा वगैरहका उल्लेख करनेवाली लम्बी साथ करने की आवश्यकता है। और और सधार.. प्रशस्ति लिखी है। इस प्रशास्तिमें यह भी लिखा
है कि इस ग्रन्थकी रचना इवताम्बर और दिगम्बर कोंके समान हमारे लेखकने विषयसेवनको पुष्टि .
सम्प्रदायके अनेक आचारविषयक ग्रन्थोंका अव. देने या अधर्म सेवनका पक्ष नहीं किया है । लेखक
लोकन करके की गई है। इससे यह अनुमान -निश्चितयह बतलाना चाहते हैं कि विधवाओंकी दशा
॥ रूपसे-हो सकता है कि इसमें जो श्रावकोंको 'जनेऊ' सुधारने के लिए समाजका संगठन फिर नये सिरेसे पहननेका विधान बताया गया है वह किसी दिगकरना होगा, तथापि यदि आपको और दूसरे धर्म- म्बर ग्रन्थका ही अनुसरण है । क्योंकि दिगम्बर प्रेमी महाशयों को उनकी किसी दलीलमें कोई दोष सम्प्रदायमें एककी अपेक्षा अधिक ग्रन्थोंमें 'जनेऊ' मालूम पड़े, तो उसकी निनी तौरसे या सामयिक पत्रों पहननेका विधान है और श्वेताम्बरसम्प्रदायकेद्वारा चर्च होनी चाहिए। इससे समाजको लाभ ही होगा। आचारदिनकरको छोड़कर एकमें भी नहीं।" - "सेठजी, अंतमें मैं आपसे एक ही विनय करना १९ 'दिगम्बरजन ' के लेखक । चाहता हूँ और वह यह कि जब गत कई वर्षों में उक्त साधु महोदय अपने इसी पत्रमें लिखते हैंआपने या किसी जैनभाईने मेरे लेखोंमें, विचारोंमें " हितैषी और हितेच्छुमें जो पुनर्विवाहविषयक या व्यवहारमें कोई दोष नहीं देखा तब क्या केवल गंभीर और तात्त्विक विचार प्रकट किये जाते हैं एक ही लेखको स्थान देनेसे मैं अधर्मका हिमायती हो उनके सम्बन्धमें सूरतके 'दिगम्बर जैन ' के पिछले गया ? जिन महाशयने यह लेख लिखा है अंकमें एक महाशय के कुछ उद्गार मेरे पढ़नेमें आये, वे जैनसमाजके एक प्रसिद्ध लेखक. विचारक और तो मुझे बड़ी हँसी आई । लेखक अपने विचारसे धर्मसंघक हैं, उन्होंने धर्मसेवा के लिए अनेक कष्ट सहे
र खण्डन तो करने चले हे पुनर्विवाहका और सारे
लेखमें श्लोक भर दिये हैं पतिव्रता सीता आदिके हैं, उनकी महात्मा तिलक, खापर्डे आदि देशभक्तोंने
वृत्तान्तके। जो मनुष्य इस प्रकार पुराने ग्रन्थोंक प्रशसा का है । एस पुरुषका भा एक विषयक एक श्लोकोंकी सेनाको विना समझे ही दिन विचारकों लेखके लिए अधर्मी समझना मेरी दृष्टि से तो साहस सामने लड़ने के लिए भेजता है उसे इतना तो विचाही है । इस चर्चासे न उनका कोई निजी स्वार्थ है रना चाहिए था कि शत्रु किस दिशामें खड़ा है और और न मेरा ही तो भी मैं आपलागों की दलीलें इन निर्जीव सिपाहियोंमें बन्दूक उठानेकी भी शक्ति
तत्पर हैं और आप की समाजसेवा- है या नहीं। 'शत्रु आया' इतने शब्दोंको सुनकर की जिज्ञासाको-जो कि आपकी चिहीसे प्रत्यक्ष मा. .
___ ही, चाहे जिस दिशामें दौड़ पड़नेसे और आँख मीच.
कर जो हाथमें आया उसे उठाकर फेंक देनेसे ही लम पडती है-देखकर आपको हार्दिक धन्यवाद जो कात्र परास्त यदि हो सकता तो जर्मन शत्रुका परादेता हूँ। मैं चाहता हूँ कि हमारे समाजभ विचार जय करनेमें मित्रों को इतना बिलम्ब न लगता। सहिष्णुताका उदय हो और निजी रागद्वेष आदिसे परन्तु इतनी विचारशक्ति यदि हमारे इन श्रुतज्ञादर रहकर शुभनिष्ठा और समाजसेवाके आशयसे नियों में होती तो ये इस जड़समाजमें कुछ न कुछ प्रत्येक विषयका भलीभाँति ऊहापोह होता रहे चैतन्यका संचार अवश्य करते।"
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जनरल आर्मस्ट्राँग। (ले०- पं० शिवसहाय चतुर्वेदी।)
संसारमें लोकसेवासे बढ़कर दूसरा कोई पुण्य- देकर उनकी उन्नति करनेकी इच्छा रखते थे। वे काय नहीं है। आज हम एक ऐसे महापुरुषकी जानते थे कि यद्यपि उन लोगोंकी सामाजिक जीवनी पाठकोंको भेट करते हैं कि जिसने दास्य- अवस्था हीन है, परन्तु उनकी आत्मिक स्थिति पंक और अज्ञानान्धकारमें पड़ी हुई एक काली हम लोगोंहीके समान है । यदि उनको सहायता अनार्यजातिके लिए अपार श्रम किया था, जि- दी जावे-उनकी उन्नतिका मार्ग उन्मुक्त कर सने उनको दास्यपंकसे उद्धार करने के लिए शस्त्र- दिया जाय तो वे बहुत शीघ्र उन्नतं हो सकते हैं। धारण किया था और उन्हें सब तरहसे सुशिक्षित सन् १८६० ई० में कालेज छोड़नेपर आर्म
और स्वाबलम्बी बनाने में अपना जीवनतक उ- स्ट्राँगने मिशनकी नौकरी करली। साथ ही उन्होंने त्सर्ग कर दिया था ! इस महात्माका पूरा नाम हवाई-भाषामें 'ही-हवाई' नामका एक समाचार'सेमुएल चेपमेन आर्मस्ट्राँग 'था। इनका जन्म पत्र निकाला। उसके द्वारा वे हवाई लोगोंकी जनवरी सन् १८३९ को हवाई-द्वीपम हुआ सुधारणाका प्रयत्न करने लगे। कुछ समयके था। इनके माता पिता धर्मोपदेशक (पादरा ) बाद वे इस कामको छोड़कर अमेरिका-संयुक्तराथे। माता विदुषी थी इस लिए वह स्त्रियोंकी स- ज्यके विलियम्सटाउन नगरमें गये और वहाँ डा० हायता करती थी और पिता धर्मोपदेशक, अ- हाप्किन्स नामक तत्त्ववेत्ताके समीप रहकर अपने ध्यापकी और डाक्टरी-इन तीनों कामोंको कर- ज्ञानको परिमार्जित करने लगे । जिस समय वे ते थे। माता पिताके लोकसेवा सम्बन्धी इन का- वहाँ रहते थे उस समय बीच बीचमें उनकी इच्छा मोंका पुत्र पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा । हवा
धर्मोपदेशक बननेकी होती थी, परन्तु उनकी ई-द्वीपमें यूरोपियन लड़कोंकी शिक्षाके लिए जो
" वह इच्छ पूर्ण न हुई और उन्हें सन् १८६२ में पाठशाला थी आर्मस्ट्राँगकी प्रारंभिक शिक्षा उसी
o लड़ाईके मैदानमें जाना पड़ा। जगह हुई थी । आर्मस्ट्राँग हवाई लोगोंपर हार्दिक प्रेम रखते थे। बहुत दिनोंतक उनके सं. उस समय अमारका-सयुक्तराज्यमे दास्यप्रथा सर्गमें रहकर उनकी धारणा हो गई थी कि-ह- या गुलामगीरीके विषयमें बड़े जोरका आन्दोलन वाईलोग दयाल और विश्वासी होते हैं , अति- हो रहा था। इस स्थलपर पाठकोंको गुलामीके थि और मेहमानोंका आदर-सत्कार प्रेमपूर्वक प्रारंभिक इतिहासकी कुछ बातें सुनाना उचित करते हैं : वे खेती आदि परिश्रमके काम बहत जान पड़ता है । लगभग चारसौ वर्ष पहले अमेउत्तमता और ईमानदारीके साथ करते हैं
- रिका एक बीरान और जंगली देश था। सत्रहवीं चोरी कभी नहीं करते।
__ शताब्दीके प्रारंभमें यूरोपीय लोगोंकी दृष्टि उस ___ आर्मस्ट्राँगके हृदयमें उनके प्रति बड़ी सहानु- पर पड़ी और यूरोपसे भिन्न भिन्न देशोंके लोग भूति थी और वे उनको सब तरहसे सहायता जाकर वहाँ बसने लगे। वहाँ खेती आदिके
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जनरल आर्मस्ट्राँग ।
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लिए खूब जगह पड़ी थी, पर वह जंगलमय थी और उसके साफ करनेके लिए बहुत परिश्रमकी जरूरत थी । अतएव इन यूरोपीय लोगों को - जो वहाँ जाकर जमींदार बन गये थे - खेती आदिके कामोंके लिए मज दूरों की जरूरत हुई । इस कामके लिए आफ्रिका - के नीग्रो या हबशी लोग जहाजों में भर भरकर लाये जाने लगे । यह छँदा खूब चल पड़ा व्यापारी लोग आफ्रिका जाकर वहाँसे बेचारे नीग्रो लोगोंको भेड़-बकरीके समान बलपूर्वक भर लाते थे और अमेरिका आकर उन्हें मनमानें दामोंपर बेचते थे । पहले यह रोजगार पोर्तुगीजों के हाथमें था, पर पीछेसे अँगरेजों के हाथमें आग या । यह दास्य-विक्रयका रोजगार दिनपर दिन बढ़ता ही गया और लगभग ढाईसौ वर्षोंतक जारी रहा । उस समय इन दासों की संख्या ४० लाख से ऊपर हो गई थी । नीग्रोलोगोंपर उनके प्रभु या मालिक जो जो अत्त्याचार करते थे उ नको सुनकर रोमांच हो आता है । वे बेचारे पशुओं के समान बाजार में खड़े करके बेचे जाते थे, निर्दयतापूर्वक मारेपीटे और कभी कभी बध तक किये जाते थे ! और उनकी स्त्रियोंपर पैशाचिक अत्याचार होते थे ! कोई उनकी रक्षा करनेवाला न था । कहनेका तात्पर्य यह है कि न तो वे मनुष्य समझे जाते थे और न उसके प्रा णों का कोई मूल्य गिना जाता था। यह आसुरिक अत्याचार कैसा भयंकर होगा, इसका पाठक स्वतः अनुभव कर सकते हैं । इसी अमानुषिक अत्याचारको दूर करनेके लिए अमेरिका के कुछ सहदय सज्जनोंने उक्त आन्दोलन उठाया था ।
उत्तर प्रांत निवासी गोरे तो नीग्रोलोगोंको दासत्वसे मुक्त कर देना चाहते थे पर दक्षिणप्रान्त निवासी इसके घोर विरोधी थे । यह विरोध यहाँ तक बढ़ा कि अंतमें उत्तर और दक्षिण प्रान्तों में
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परस्पर युद्धकी भेरी बजने लगी और दक्षिणप्रांतनिवासी धनी लोगों के चुंगल से लगभग ४० लाख नीग्रोलोगों को छुड़ाने के लिए युद्ध प्रारंभ हो गया । अंत में उनका यह उद्देश सफल हुआ और पहली जनवरी सन् १८६३ को ढाईसौ वर्षोंकी गुलामी के बाद नीग्रोलोगों को स्वाधीनता दे दी गई ।
इस युद्धके समय अमेरिकाके प्रेसीडेण्ट लिंकनको युद्धोपयोगी मनुष्यों की बड़ी जरूरत थी, इस लिए उस समय हमारे चरितनायकने आगे बढ़कर नीग्रो लोगों की सहायतार्थ युद्धभूमि पर पैर रक्खा । कप्तान आर्मस्ट्राँगने इस कामको बड़े उत्साह और प्रेमके साथ किया - सुशिक्षित और धर्मवान् लोगोंको ऐसे ही काम से प्रेम होता है । " नीग्रोलोग हमारे भाई हैं और उनको दासत्वसे छुड़ाने के लिए हम लड़ रहे हैं । " हृदयमें रखकर वे अपने कर्तव्यपालनमें लगे हुए थे । वे कभी निराशा नहीं हुए । इस भावनाका उल्लेख उन्होंने अपने एक पत्र में इस तरह किया है
इस भाव
“ मैं किस लिए लड़ रहा हूँ ? कानूनके अनुसार नीम्रो लोग मुक्त हो चुके हैं, परन्तु दक्षिण प्रांतवाले इस कानूनको मान्य नहीं करते हैं । मैं दीन जनों के लिए उनकी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा हूँ । यदि मैं इस युद्धमें मारा जाऊँगा तो समझँगा कि मेरे जीवनका उपयोग एक सत्कार्य के लिए हुआ । क्योंकि यह महायुद्ध पवित्र तत्व के लिए हो रहा है । इस समय दक्षिण के लोगोंकी जगह जगह विजय हो रही है; परन्तु मुझे दृढ़ भरोसा है कि हमारी बाजू सत्यकी है, अतः अन्तमें हमें ही यश मिलेगा । जब मैं इन नीग्रो लोगों की ओर देखता हूँ, तब मुझे यही भावना होती है कि ये मनुष्य हैं - स्वाधीनता के अधिकारी हैं; इन्हें गुलामीमें रखनेका न किसीको अधिकार
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और न ये सदा इस हालत में रह ही सकते हैं। मैं इस युद्धभूमिपर जो कुछ करता हूँ उसे ईश्वरीय आज्ञा - ईश्वरीय काम समझकर करता हूँ । मेरा दृढ़ निश्वय है कि अपने प्रयत्नमें किसी तरहकी न्यूनता न होने देकर उसे अंतिमसीमा तक पहुँचाऊँगा और जो कुछ संकट आपड़ेंगे उन्हें धीरतापूर्वक सहन करके अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहूँगा । युद्धभूमि पर अगणित कष्ट होते हैं, परन्तु मैं उन्हें कष्ट नहीं गिनता । नीग्रोलोगों को दासत्बसे मुक्त करना-गुलामी से छुड़ाना बहुत उत्तम और पुण्यकर्म है । इस समय वे हमारे साथ हमारे समान ही युद्धभूमि पर लड़ रहे हैं । उनके गुणों को देखकर कौन कह सकता है कि वे गुलामीके योग्य हैं ? मुझे उनके उद्धार के लिए लड़नेका मौका मिला इस कारण मैं अपनेको धन्य समझता हूँ । हम मनुष्यों की मनुष्यता के लिए लड़ रहे हैं । आजके युद्धमें मेरी सेनाके दो नीग्रोभाई काम आये हैं और मैंने उनको सच्चे नागरिकोंके समान बड़े सन्मानसे मिट्टी दी है । जो पहले तुच्छ समझे जाते थे उनको आजमैं बराबरी के नागरिक मानता हूँ । उनको नागरिकों और सिपाहियोंका सन्मान देनेसे उनमें अच्छे अच्छे गुण प्रकट होंगे । इस युद्धके परिणाम पर४०लाख नीम्रो भाइयों की गुलामी या स्वाधीनता अवलंबित है, इस लिए मैं प्राणपनसे लड़ रहा हूँ और इस कामके लिए अपने सर्वस्वकी आहुति देने को तैयार हूँ । परसोंकी बात है नीम्रो लोग युद्धभूमिपर हमला करने जा रहे थे उस समय शत्रु सैन्यकी ओरसे गोलियोंकी मार पड़ रही थी, तो भी जब तक उन्हें सेनापतिकी आज्ञा महीं मिली, तब तक वे रुके नहीं बराबर शत्रुकी ओर बढ़ते गये । न वे पीछे हटे और न किसी प्रकार भयभीत हुए | ये क्या उनके प्रशंसनीय गुण नहीं हैं ? शाबास नीग्रोवीरो ! तुम्हारे इस गुणको देखकर मुझे अतिशय आनंद होता है । "
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जैनहितैषी -
उक्त पत्रको पढ़नेसे - जो उन्होंने युद्धक्षेत्र अपने घर भेजा था - कप्तान आर्मस्टाँगके उदार हृदयका पता लग जाता है ।
कुछ दिनों में युद्ध समाप्त होने का समय आगया । दक्षिण प्रान्तकी सेनाका नायक - ९ अप्रैल सन् १८६३ को शरण आगया और इस तरह इस गृह कलह के समाप्त होनेपर कप्तान आर्मस्टाँगको इस काम से छुट्टी मिल गई। थोड़े ही दिनोंके बाद जब अमेरिकन सरकारने इनके युद्धकौशलको सुनकर इन्हें सेनाविभागमें उच्चपद देने के लिए बुलाया तब आर्मस्टांगने सोचा अब क्या करना चाहिए ? नौकरी करके सुख - शान्तिपूर्वक जीवन बिताना अच्छा है या रूखी-सूखी रोटी खाकर दीन, असहाय और अज्ञानान्धकारमें पड़े हुए लोगों के हितसाधनमें अपने जीवनको उत्ससर्ग करदेना । इस विषयमें उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा है।
""मैं सोच रहा था कि अब कौनसा काम करना चाहिए । मुझे जैसा मैं चाहता था वैसा ही काम मिल गया । इस देशमें दीनों के उद्धार के लिए जो कार्य चल रहे हैं उनमें योग देना ही उचित समझ शक्ति काम आवे तो इससे बढ़कर अच्छा काम और पड़ता है | लोकसेवाके लिए याद मेरी बुद्धि और और इस कामको न करना ईश्वर की आज्ञाका उल्लं क्या हो सकता है ? जनसेवा ईश्वरसेवा ही है, घन करना है - उसके प्रतिकूल चलना है । मैं जनसेबारूपी इस ईश्वरीय आज्ञाको पालन करना सर्वथा उचित और अपना कर्तव्य समझता हूँ । युद्ध में परमेश्वरकी कृपासे बचे हुए इस शरीर को किसी परोपकार या जनसेवाके काममें लगाना ही उचित है । कोरा धर्मोपदेशक होना मुझे पसंद नहीं हैं, क्योंकि उपदेशक होनेकी अपेक्षा किसी अच्छे कामको करना लाख तरह अच्छा है । "
जिस समय मनुष्य विचार तरंगों से व्याकुल हो जाता है उस समय वह बहुधा कुछ निश्चय नहीं कर सकता; परन्तु कई बार ऐसा होता है।
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dation
Janmidarsha
MILAIMIMLAI LALIA जनरल आर्मस्ट्राँग। intinuiffiffill
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कि जिस समय मनुष्यके मनमें क्रान्तिकारक थे । उनको न तो अपने सुखोंका ख्याल था विचार धूम मचाते हैं उस समय उसे एकाएक और न स्वार्थों का; केवल नीग्रोलोगोंका उद्धार, अपना अभीष्ट काम सूझ जाता है । हमारे यह एक ही विचार-एक ही ध्येय-एक ही कामना चरितनायकको भी ऐसा ही हुआ । यह सच है उनके मनमें जागरित रहती थी। कि ४० लाख नीग्रो कानूनके अनुसार दासत्वसे दूसरोंको दासत्वके फंदसे छुड़ानेवाला स्वतः मुक्त होगये, परन्तु अब उन्हें क्या करना चाहिए? ही अपने बलवान् विचारोंका दास बनगया। उनके भरण पोषण और रहनेके लिए क्या क्या करना चाहिए ? क्या करनेसे एक पतित व्यवस्था करना चाहिए? इस समय राष्ट्र के साम्हने जातिका उद्धार होगा-वे निरंतर इन्हीं विचारोंयही प्रश्न खड़ा था । पहलेके मालिकोंने अपने में रहा करते थे और जो यक्तियाँ उन्हें सझ पड़दासोंको सरकारके जिम्मेंकरके रसीद लेली। ती थीं उन्हींके अनुसार काम करने में लग जाते कुछ समय पहले जो दास सनाथ थे वे अब थे। उन कामोंको पूर्ण करने के लिए वे पत्र लिखते अनाथ हो गये-उन्हें कोई सहारा देनेवाला न थे, मित्रोंसे प्रार्थनायें करते थे, व्याख्यान देते थे, रहा । स्वाधीनताप्राप्त नीग्रो लोगोंमेंसे अधिकांश और समाचार पत्रों में लेख लिखते थे। इस तरह इस दक्षिणप्रान्तोंही में रहते थे और वहाँके निवासी दीनवत्सल महापरुषका सारा समय इसी परोपउन्हें किसी तरहकी सहायता नहीं देना कार चिन्तामें बीतता था। इस तरहके प्रयत्नोंसे चाहते थे । अंतको उत्तरप्रान्तबालोंका इस नीग्रो लोगोंको खूब सहायता मिलने लगी; ओर ध्यान गया और उन्होंने इनके लिए योग्य किसीने उनको घरपर नौकर रख लिया, किसीने सहायता देना शुरू कर दिया । सरकारने भी खेतोंमें तनरव्वाहसे काम करनेके लिए नियुक्त उनके लिए अन्न पानीका कुछ सुभीताकर दिया। किया और किसी किसीने उनको अपने कारखा. इसके सिवा एक 'नीग्रो-हितेच्छु-मंडल' भी नोंमें रखकर उनको काम सिखाना शुरू कर स्थापित किया गया। उसके सभासद उनकी हर दिया। इतना हो चुकने पर नीग्रो बालक बालि. तरहसे मदद करनेके लिए तैयार हो गये। काओंको पढाने लिखानेकी व्यवस्था करनेका कप्तान आर्मस्ट्राँगने यह सब देखकर और यह विचार हमारे चरितनायकके मनमें उत्पन्न हुआ समझकर कि हमारे सोचे हुए सभी काम चालू और उसके लिए उन्होंने प्रयत्न भी शुरू कर होगये हैं-बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। उन्होंने उन दिया। पढ़ लिखकर सुशिक्षित होना ही नीग्रोलोसब कामोंमें तन मन धनसे योग देना प्रारंभ गोंका सच्चा दास्यविमोचन या गुलामीसे छुटकर दिया । और इस तरह सन् १८६६ से कारा पाना था । परन्तु अभीतक इस बातकी १८९३ तक उन्होंने अपने आयुष्यकी २७ वर्षे ओर किसीका ध्यान नहीं गया था । आर्मस्ट्राँएकनिष्ठासे नीग्रोलोगोंकी सेवामें व्यतीत की। गने नीग्रोबालक बलिकाओंकी शिक्षाके लिए
दूसरे और भी कई आदमी व्यक्तिशः या अनेक लोगोंकी सहानुभूति सम्पादन की और संस्थायें स्थापित करके इस कार्यमें लग गये थे, उनमेंसे बहुतोंने उनको द्रव्यकी सहायता देनेका तो भी आर्मस्ट्रांगका भाव और उत्साह आलौकिक वचन भी दिया । पाठशालाके लिए स्थान और था-उसमें जरा भी शिथिलता न आई । वे भूख पढ़ानके लिए योग्य विषयोंका चुनना, ये दो बाप्यास भूलकर एक पतितजातिके उद्धारमें लगे तें ही महत्त्वकी थीं । इन दोनों बातों पर खूब
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विचार करके उन्होंने स्वतः ही उनका निर्णय कर समीप हुई थी। पहले नीग्रो लोग जब दास लिया। थोड़ा लिखना पढ़ना सिखलाना, स्वच्छ- बनाकर लाये गये थे तब वे भी इसी जगह ता और आरोग्यताके नियमोंका ज्ञान कराना उतारे गये थे। सिविल-वारमें सरकारी सेनापति और लड़के लड़कियोंको अपने निर्वाहके योग्य जनरल गाँटकी मुख्य छावनी इसी जगह थी जुदेजदे काम धंदों में निपुण बना देना ही उनकी और इसी जगहपर जनरल बटलरने नीग्रो निर्धारित की हुई शिक्षाका उद्देश्य था । विषयोंकी लोगोंके दास्यविमोचनकी घोषणा की थी। योजना हो चुकनेपर पाठशालाके लिए स्थान इस पुण्यक्षेत्रमें आर्मस्ट्राँगने अपने विद्यालयको चुननेका काम और बाकी रह गया। स्थापित करके मानो उसे तीर्थराज बना दिया ।
हेम्पटन-विद्यालयमें नीग्रो बालक बालिकाओंकी पाठशालाके लिए वस्तीसे कुछ दूर स्वच्छ
शिक्षाके लिए जो योजना की थी, उसके विषयमें आरोग्यप्रद और मनोहर स्थान होना चाहिए ।
: आर्मस्ट्राँगने एक जगह लिखा हैआर्मस्ट्राँग किसी ऐसे ही स्थानकी फिकरमें थे ।
नीग्रो बालक बालिकाओंको धंदा सिखानेका परिप्रवासके समय उन्होंने हेम्पटन नदीके किनारे
णाम अच्छा होगा, इससे वे बहुत बुद्धिमान् और तीएक अत्यन्त मनोहर मैदान देखा और वह स्थान क्षण बद्धि होंगे। स्वावलम्बनका महत्त्व समझ जाने उन्हें पसंद आगया। उन्हें तत्काल ही यह भावना पर 'यह काम हलका है-यह हमारे करने होने लगी कि मानो वह जगह हजारों विद्या- योग्य नहीं है ।' इत्यादि बातोंको वे भूल जावेंगे । र्थियोंकी शिक्षाभूमि है। इस भावी शिक्षाभूमिके सुशिक्षासे उनको नियमितरूपसे काम करनेकी आदत मनोहर दर्शन करके उनका मन आनंदसे नाच पड़ जावेगी । जो विद्यार्थी उच्चशिक्षा प्राप्त करेंगे उठा । उन्होंने उसी भूमिको अपनी तपोभमि वे पढ़लिखकर शिक्षक या उपदेशक बनकर जातिउबनानेकी ठान कर काम करना शुरू कर दिया।
द्वारके के लिए कटिबद्ध होंगे। इसमें कुछ भी
संदेह नहीं है कि नीग्रोबालक शिक्षा पाकर उद्योएक मिशनरी संस्थाने १६० एकर जमीन खरीद दी, एक मित्रने ७००००) रुपया दिये और ।
गी, सुशील और कामकाजमें चतुर निकलेंगे।"
सरकारीतौरसे भी नीयोलोगोंको शिक्षा देनेके एक मिशनसे ३००००) रु. मिलनेका आभव- लिप प्रयत्न चल रहा था। इस कामकी व्यवस्था चन मिला । इतनी तैयारी हो चुकनेपर १ अक्टूबर करने के लिए महात्मा आर्मस्ट्राँग ही चुने गये सन् १८६७ को इमारत बननेका काम शुरू और उन्हें 'जनरल' की उपाधि प्रदान की गई। किया गया । एक ही काममें पूर्ण उद्योग करते आपने इस कामको बहुत सुन्दर रीतिसे चलाया रहनेके कारण लोकमत विरुद्ध रहनेपर भी परंत आपके मनमें सदैव यह बात जागरित रहा आर्मस्ट्राँगको यश मिले विना नहीं रहा । केवल करती थी कि कब हेम्पटन विद्यालय बनेगा और इतना ही नहीं बरन् आगेके लिए उनका मार्ग कब मैं नीग्रो बालकोंको शिक्षा 'दूंगा । पढ़ाने भी प्रशस्त होगया।
लिखानेके कामको वे बहुत पसंद करते थे। हेम्पटन एक मनोहर स्थान है । वह उत्तर अतएव हेम्पटन-विद्यालयका भवन तैयार हो और दक्षिणप्रान्तोंके मध्यमें है। इस स्थानका जाने पर उन्होंने और सब कामोंको छोड़ कर ऐतिहासिक महत्त्व भी कुछ कम नहीं है । यूरो- केवल उसीकी ओर चित्त लगाया । सन् १८६८ पियन लोगोंकी पहली आबादी इसी स्थानके की पहली अप्रैलके शुभ मुहूर्तमें विद्यालय खोला
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जनरल आर्मस्ट्राँग ।
गया । इस शुभ अवसर पर आर्मस्ट्रॉंग के गुरु भी उपस्थित थे । पहले पहल विद्यालय बहुत छोटे स्कीम पर खोला गया था - पहले दिन विद्यार्थियोंकी संख्या केवल १५ थी । विद्यार्थियों को सबेरे हाथके काम करनेकी और दो पहरको पढ़ने लिखने की शिक्षा दी जाती थी। न तो विद्यार्थियोंसे फीस ली जाती थी और न अध्यापकोंको बेतन दिया जाता था । इस तरह पाठशा - लाका काम चलने लगा । धीरे धीरे विद्या र्थियोंकी संख्या जैसे जैसे बढ़ती गई, सहायता और एकत्रित हुए द्रव्यसे अध्यापक भी बढ़ाये जाने लगे । जनरल स्ट्रांगके कुछ मित्रोंने उनसे वेतन लेनेके अनुरोध किया था । इस विषय में उन्होंने जगह लिखा है:
मित्रोंकी वैसे वैसे
आर्म -
लिए एक
“ मेरे मित्र मुझे वेतन लेनेके लिए कहते हैं; परन्तु निरपेक्ष काम करना ही अच्छा और श्रेयस्कर होता है। युद्धके समय शत्रुसैन्यके अधिकारी बिना तनख्वाह लिए लड़ते थे; तब क्या मैं विद्यादान के कामको बिना बेतन लिए नहीं कर सकूँगा ? यह मेरा व्रत है, इस व्रतको मैं बिलकुल निरपेक्षतासे करता रहूँगा "
।
हेम्पटन विद्यालय के लिए जब जब नये मकान बनवानेका अवसर आता था या जब जब किसी दूसरे कामके लिए मजदूर लगाये जाते थे तब तब जनरल आर्मस्ट्रॉंग आधे यूरोपियन और आधे नीग्रो लोगोंको कामपर लगाते थे और जातिविषयक भेदभावको भूलकर सबको समान वेतन देते थे । जनरल आर्मस्ट्राँगने सन् १८६९ में एमा वाँकर नामक एक महिलासे पाणिग्रहण किया । इस महिला के विचार बहुत ही उदार थे। उसे निष्काम कर्मोंसे बहुत प्रेम था । अब एककी जगह दो कार्यकर्त्ता हो गये । श्रीमती एमा और आर्मस्ट्रॉंग दोनोंके परिश्रम से हेम्पटन संस्थाका काम बहुत अच्छी तरह से चलने लगा |
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सत्कार्योंमें विरोध हुआ ही करता है, स्वार्थ का मोह अपना जाल फैलाता ही है, माया मोहकरूप धारण करके साम्हने आतीही है और इसी तरह न जाने क्या क्या विघ्न आया करते हैं। ऐसा ही यहाँ हुआ । अनरल. . आर्मस्ट्राँग उनके कई मित्रोंने अमेरिका - काँग्रेस के सभासद होने और उसके द्वारा कीर्ति सम्पादन करने की सलाह दी थी; परन्तु उन्होंने उसे अस्वीकार की और गरीब शिक्षक रहने और केवल शिक्षकका ही काम करने की इच्छा प्रगट की। कई लोग उनके इस कामको पसंद नहीं करते थे; वे पूर्व की भाँति सदैव काले - गोरों में भेदभाव रखना चाहते थे । इस कारण दक्षिणके वर्जिनिया स्टेटकी ओरसे विद्यालयके रजिस्टर्ड कराने में अड़चन उपस्थित की गई । सभासदोंके मनमें पुराना क्रोध तो था ही, वे अनेक विघ्न खड़े करने लगे । वे गोरे बालकोंको पाठशाला में लेनेसे रोकने लगे । जनरल आर्मस्ट्रॉंग कहते थे कि यद्यपि पाठशाला काले लड़कों के लिए है; परन्तु गोरे लड़कोंके आने पर मैं उनके साथ सबको समान शिक्षा देनेका पक्षपाती हूँ। ऐसा होना अर्थात् भेदभावको मिटाना काले-गोरे दोनों को लाभकारी है । अंत में कर्मवीर आर्मस्ट्रॉंगको सफलता प्राप्त हुई और ४ जून सन् १९७० को पाठशाला रजिस्टर्ड होगई । इस तरह पाठ - शालाका काम फिर निर्विघ्न रीति से चलने लगा ।
सन् १८७० से १८९० ई० तक २० वर्ष पर्यंत जनरल आर्मस्ट्राँगने हेम्पटन - संस्थाकी उन्नति के लिए अविश्रान्त परिश्रम किया । 'मनुष्य जातिका उपकार करना ही परम पुण्यकार्य है और इसीसे ईश्वरकी प्रसन्नता प्राप्त होती है' । इस भावनासे उन्होंने लगातार काम किया । नीग्रो लोगोंको सब तरहसे उत्तेजन
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TILARIAAMAILOOLERATOILE
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देकर उनमें स्वाभिमान जाग्रत किया, उनके जा पहुँची । उसने सोचा कि झाड़पर चढ़नेके आज्ञानान्धकारको दूर करके उनमें विद्याभिरु- सिवा रक्षाका और कोई उपाय नहीं है । चढ़ना चि उत्पन्नकी, गुलामीके भावोंसे भरे हुए उनके तो आता नहीं है पर अब तो किसी तरह चढ़ना दिलोंमें स्वाधीनताका जोश डाला, पाठशालाको ही होगा, नहीं तो बस मरी। अब चढ़ना ही होउन्नत करने, सुन्दर इमारतें बनाने और शिक्षाको गा, ऐसा सोचकर वह झाड़पर चढ़नेका प्रयत्न फलवती बनानेके लिए उन्होंने भरपूर प्रयन्न करने लगी और चढ़ गई । विद्यार्थियो ! तुम्हें भी किया । वे बारह बारह घंटे तक संस्थाका काम सदैव ऐसा ही प्रयत्न करना चाहिए।" किया करते थे। आर्मस्ट्राँगका मत था कि ल- महात्मा आर्मस्ट्रांग सच्चे कर्मवीर थे। वे एक डके लड़कियोंके साथ पढ़नेसे दोनोंके विचारोंमें बड़ी संस्थाको बड़ी ही उत्तम रीतिसे चलाते थे। गंभीरता और आचारोंमें सभ्यता आती है; अत- इससे कोई यह न समझे कि उस संस्थांके लिए एव उनके विद्यालयमें लड़के लड़कियाँ दोनों उनके पास कोई खजाना भरा पड़ा था, या कोई साथ पढ़ा करती थीं। वे अपने विद्यार्थियोंको उन्हें घर बैठे द्रव्य दे जाता । नहीं, संस्थाके. शिक्षा दिया करते थे कि जिसको जो काम खर्चके लिए उन्हें प्रवास करना पडता था, गाँव. आता हो और जो जिस कामको अच्छी तरह गाँव नगरों-नगरों भटकना पड़ता था, व्याख्यान कर सकता हो, वह उसे ही करे और सदा देना पड़ते थे, लोगोंको अपना उद्देश समझाना उद्योगशील रहे । जो सीखना जानता हो वह पड़ता था और समाचार पत्रोंमें लेख लिखना पड़ते अच्छी तरह सीखे, जो सिखाना जानता हो वह थे। आप स्वतः समझ सकते हैं कि किसी आश्रअच्छी तरह सिखावे । जिसे बढ़ईके काममें म या संस्थाके लिए पैसे इकटे करना कोई सहरुचि हो वह बढ़ईका काम करे और जिसे ज काम नहीं है-उसके लिए बड़ी सरगर्मी, अपार जूतोंपर पालिश करना आता हो वह पालिश बुद्धिमत्ता, सच्चरित्रता और चतुराईकी आवश्यकता करे । जनरल आर्मस्ट्राँग ऐसे ही सत्कर्मों के ध्येय है । उन्होंने १२ वर्षों में संस्थाके लिए १८ इमारविद्यार्थियोंके सन्मुख उपस्थित किया करते थे । तें बनवाई और बहुतसा शिक्षणापयोगी वे कहते थे कि नीग्रो मनुष्य हैं; यद्यपि वे सदोष सामान खरीदा । इन सब कामोंके लिए उन्होंने हैं, अशिक्षित हैं, परन्तु उनमें दोषोंके दूर करने, इसी तरह पैसा एकत्रित किया था। इस तरहके अपार शिक्षित और सुसभ्य होने की योग्यता भी है। और आविश्रान्त परिश्रम द्वारा उन्होंने नीयोलोगोंवे लड़कोंको धर्म और नीतिकी शिक्षा देकर उन्हें में योग्यता बढ़ाई और उनको हीनावस्थासे धर्मात्मा और सदाचारी बनानेका सदैव प्रयत्न खींच कर उन्नत अवस्थाके मार्गपर आरूढ़ किया करते थे। उनमें उत्साह लानेके लिए कभी कर दिया। कभी वे कहानियाँ भी सुनाया करते थे। उनकी जनरल आर्मस्ट्राँगको इस काममें सफलता एक कहानी नीचे लिखी जाती है:- मिलते देखकर और भी कई लोगोंने उनका अनु
" विद्यार्थियो, एक बिल्ली थी, उसे अभीतक करण किया । हेम्पटन विद्यालय एक प्रकारकी झाड़पर चढ़ना नहीं आता था । एकवार उसके प्रयोगशाला या अनुभव प्राप्त करनेकी जगह थी। पीछे कुत्ता लगा,तब वह भागते भागतेपेड़के समीप इसमें शिक्षा पाकर और काम सीखकर और
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m amamaMP जनरल आर्मस्ट्राँग।
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और लोगोंने भी कई विद्यालय खोले । इस किया करते थे । विश्राम क्या वस्तु है इसे वे काममें सबसे अधिक सफलता बुकर टी. वाशिं- जानते ही न थे। इस तरह आवश्रान्त परिश्रम गटन नामक उनके एक नीग्रो-शिष्यको हुई। करनेसे उनका शरीर क्षीण हो गया । वे मरनेके उन्होंने टस्केजीमें एक नीग्रो-संस्था खोलकर पहले सन् १८९३ ई. में अपने प्रिय शिष्य अपनी जातिका जो कल्याण किया, उसकी बुकर टी. वाशिंगटनकी 'टस्केजी-संस्था । शतमखसे भी प्रशंसा नहीं की जा सकती है। देख आये थे । उन्होंने उस समय कहा था कि बुकर टी. वाशिंगटनकी टस्केजी-संस्थाको देख बस अब हमारा काम हो चुका अब हम सुखके कर उन्हें बहुत संतोष होता था । सन् १८८७ साथ चिरशान्ति-लाभ कर सकेंगे । उसी वर्ष और १८८९ इन दोनों बर्षों में दो विश्वविद्याल- इस महात्माका स्वर्गवास हो गया। याँने इन्हें एल. एल. डी. की बहुत ही बडी आर्मस्ट्राँग लोकसेवा और परोपकारकी जीऔर सन्मानसूचक पदवी दी थी।
ती जागती मूर्ति थे । उनका चरित प्रत्येक धर्मआर्मस्टाँगका मत था कि नीग्रो लोगोंके लिए
सेवक और देशसेवकके लिए अनुकरणीय है।
प्रत्येक देश और प्रत्येक जातिमें ऐसे महापराजकीय अधिकार प्राप्त करा देनेकी अपेक्षा उनमें ज्ञान फैलानेकी जियादा जरूरत है । वे
रुषोंके जन्म लेनेकी आवश्यकता है। हमारे भारजैसे जैसे सुशिक्षित होते जायेंगे उनको वैसे वैसे .
तमें तो इस समय एक नहीं सैकड़ों आर्मस्ट्राँगों
रंग उनका वस वस की जरूरत है । अमेरिकामें तो केवल ४० लाख अधिकार भी मिलते जायेंगे । आखिर ऐसा ही नीग्रोलोगोंके उद्धारका कार्य था; परन्तु हुआ । नीग्रोलोग लुजियाना प्रान्तमें बड़े बड़े इस देशमें नीग्रो लोगोंके ही समान तुच्छ दृष्टिसे ओहदोंपर नियुक्त होकर गोरे और काले लोगों देखे जानेवाले कई करोड़ अस्पृश्य या अछूत पर समान रूपसे शासन करने लगे। जातिके लोग हैं जिन्हें हस्तावलम्बन देकर . महात्मा आर्मस्ट्राँगने जीवन भर लोकसेवा- ऊपर उठानेका बहुत बड़ा कार्यक्षेत्र पड़ा का काम किया । वे सदैव एक समान परिश्रम हुआ है।
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दिगम्बर और श्वेताम्बर समा
जका ग्रन्थप्रकाशनकार्य ।
आत्मानन्द-ग्रन्थरत्नमाला। शायद ही कोई धर्म या सम्प्रदाय होगा, किसी भी धर्मकी रक्षा और प्रसारके लिए
जिसने इसका विरोध न किया हो; परन्तु इसकी
आश्चर्यजनक सुविधाओंके आगे सभीको सिर यह आवश्यक है कि उस धर्मका साहित्यग्रन्थभण्डार प्रकाशित किया जाय और इतना
झुकाना पड़ा-किसीने कुछ वर्ष आगे और किसीने
पीछे-इसे स्वीकार कर ही लिया। सुलभ कर दिया जाय कि केवल उस धर्मके पालनेवालोंको ही नहीं; किन्तु इतर जिज्ञा- औरोंके समान जैनधर्मके अनुयायियोंने भी सुओंको भी वह विना कष्टके प्राप्त हो सके । इसका विरोध किया और खूब किया । पर जबसे मुद्रणकलाका-छापेकी कलाका आवि- छापेका प्रबल प्रवाह रुका नहीं -पक्केसे पक्के ष्कार हुआ है, तबसे ग्रन्थ-प्रसारका काम बहुत धर्मात्माओंकी भी कट्टरता उसके पूरमें बह गई। ही सहज-आश्चर्यजनक सुगम -हो गया है । जहाँतक हम जानते हैं, सबसे पहले श्वेताम्बर इसकी कृपासे बड़ेसे बड़े ग्रन्थकी लाखों प्रतियाँ सम्प्रदायके ग्रन्थोंका ही छपना शुरू हुआ । कुछ ही दिनोंमें या महीनों में तैयार हो सकती दिगम्बीरयोंमें इसकी चर्चा बहुत पीछे हुई । हैं, जब कि पहले एक ग्रन्थकी एक ही प्रति जिस समय दिगम्बरों के १०-२० ही ग्रन्थ करानेमें महीनों लग जाते थे । यह छापेकी ही छपे थे उस समय श्वेताम्बरसम्प्रदायका विरोध कृपाका फल है जो ईसाइयोंकी धर्मपुस्तक प्रायः शान्त हो चुका था। इसी कारण इस बायबिलकी करोड़ों प्रतियाँ-शताधिक भाषाओंमें विषयमें श्वेताम्बरोंकी अपेक्षा दिगम्बर समाज छप कर प्रतिवर्ष बिकती हैं और आज दुनियामें बहुत पीछे है । यद्यपि दिगम्बर समाजमें भी ईसाई धर्मके स्वरूपको समझनेवालोंकी संख्या छापेका विरोध निर्जीव हो चुका है-यहाँ तक सबसे अधिक है।
कि मालवा जैसा कट्टर शुद्धाम्नायी प्रान्त भी छापे___ यूरोपकी देखादेखी हमारे देशवासियोंका ध्यान का अनुमोदक हो गया है, तो भी अभी इस भी छापेकी कलसे लाभ उठानेकी ओर गया;
विरोधका सर्वथा निमूलन करनेमें दिगम्बर परन्तु जिस तरह और सब सुधारोंको हमने विना सम्प्रदायको दो चार वर्ष और भी लग जायगे। विरोध किये ग्रहण नहीं किया, उसी तरह परन्तु अब विरोधी लोग बहुत ही थोड़े रह इसको भी नहीं किया । भारतमें जितने धर्म हैं, गये हैं और जो हैं वे समाजके हानिलाभकी उन सबही धर्मके अनुयायियोंने शुरूशुरूमें अपने बहुत ही कम परवा करनेवाले अथवा 'संसारमें धर्मग्रन्थोंके छपानेका विरोध किया । यहाँका क्या हो रहा है' इससे एकदम अज्ञान रहने
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ATIRLIAMAIRALAYARILALLAGALLAHABALILITAMARHILAHABHARA
दिगम्बर और इवेताम्बरसमाजका ग्रन्थप्रकाशन कार्य । - amalitimifinitifiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii
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वाले हैं । तब इनकी परवा न करके कहा जा हमने स्वयं देखे हैं जिन्होंने अपनी चार पाँच सकता है कि दिगम्बरसमाजमें छापेकी जीत हजारकी पूँजीमेंसे दो तीन हजार रुपया लगाहो चुकी है-उसकी उपयोगिताको प्रायः कर मन्दिर बनवानेका पुण्य लूट लिया ! बुन्देलसभीने स्वीकार कर लिया है । तो भी खण्ड प्रान्तने तो इस विषयमें सबका नम्बर ले दिगम्बरसमाजमें ग्रन्थ-प्रकाशनका काम लिया है । यदि वहाँके तमाम मन्दिरोंमेंकी जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा जिन-प्रतिमाओंकी गणनाकी जाय, तो वह है-बहुत ही कम हो रहा है। और संस्कृत, जैनोंकी संख्याकी अपेक्षा अधिक ही निकलेगी, प्राकृतके ग्रन्थोंके उद्धारके लिए तो अभी तक कम नहीं ! सोनागिर तीर्थपर मन्दिरोंके मारे हमने कुछ भी नहीं किया है। ऐसी संस्था तो जगह नहीं है-सारा पर्वत मन्दिरोंसे ढक हमारे यहाँ एक भी नहीं है जो अनवरत रूपसे गया है, तो भी किसी धर्मात्माने अभी हाल ही बिना किसी प्रकारके कष्टके इस कामको करती वहाँ एक और मन्दिर बनवानेका शुभ संकल्प हो । पाठकोंको आगे चलकर मालूम होगा कि किया है ! परन्तु श्वेताम्बर-समाजमें यह बात श्वेताम्बर सम्प्रदायमें ऐसी अनेक संस्थायें हैं जो नहीं है । मन्दिर और प्रतिष्ठाओंका रिवाज इस संस्कृत, प्राकृतके कई सौ ग्रन्थ प्रकाशित कर समाजमें बहुत ही कम है । यही कारण है कि चुकी हैं।
उनके पास पुस्तकोद्धार जैसे अच्छे कार्यों में
खर्च करनेके लिए धन रह जाता है, परन्तु . इसका कारण क्या है ? क्या दिगम्बर-सम्प्र- हमारे समाजके पास ईंट पत्थर चूना और लड्डुदायके लोग कंजूस हैं ? अपने श्वेताम्बर भाइयोंकी ओंमें खर्च होकर इतना थोड़ा धर्मार्थधन रह अपेक्षा क्या वे धार्मिक कार्योंमें कम पैसा खर्च जाता है कि उससे पुस्तकोद्धारका कार्य जैसा करते हैं ? नहीं, इस विषयमें वे अपने भाइयों
माश्या चलना चाहिए वैसा नहीं चल सकता। की अपेक्षा अधिक नहीं तो कम उदार भी नहीं ।
दिगम्बरसम्प्रदायका अभी तक जितना हैं। इस बातको हम दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं साहित्य प्रकाशित हुआ है उसका अधिकांश उन कि यदि दोनों संम्प्रदायोंके धार्मिक खर्चेका जोड़ लोगोंके द्वारा हुआ है जो इस कार्यको व्यवसायकी लगाया जायगा, तो वह प्राय बराबर ही निकले- दृष्टिसे करते हैं: परन्तु इस ओर गहरी दृष्टि गा। परन्तु खर्चके मार्ग दोनोंके भिन्न भिन्न है। डालनेसे मलम होता है कि व्यवसायियोंके द्वारा दिगम्बरसमाजका सबसे अधिक रुपया मन्दिर जैनसाहित्यका उद्धार होना असंभव नहीं तो बनवाने और प्रतिष्ठा करवानेमें खर्च होता है। कष्टसाध्य अवश्य है । जैनसाहित्यका आधिक ऐसा कोई वर्ष नहीं जाता है जिसमें कमसे कम भाग संस्कृत और प्राकृत भाषामें है और इन दोनों पचास मान्दिर न बनते हों और बीस पच्चीस प्रति- भाषाओंके जाननेवाले हमारे यहाँ इतने कम हैं ठायें न होती हों! अभी थोड़े दिन पहले जबलपु- कि उनके लिए ग्रन्थ छपवाकर कोई भी व्यवरके पास एक रथप्रतिष्ठा हुई थी । कहते हैं कि सायी लाभ नहीं उठा सकता ! अतः जब तक प्रतिष्ठा करानेवालेने अपनी प्रायः सबकी सब पूँजी ऐसी संस्थायें न खोली जायँगी, जो केवल ग्रन्थोलगा दी-मुश्किलसे हजार दो हजारकी पूँजी द्धारकी दृष्टिसे इस कामको करें तब तक जैनउसके पास शेष रही होगी ! ऐसे कई धर्मात्मा साहित्यका उद्धार नहीं हो सकता, यह निश्चय है।
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ராமாயாயாயாயாயாயாயாய
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हर्षका विषय है कि हमारे श्वेताम्बरी भाइ- उत्साही मंत्री महाशयने नीचे लिए २९ ग्रन्थ योंने इस बातको समझ लिया है और उन्होंने हमारे पास समालोचनाके लिए भेजनकी कृपा है अभी अभी ऐसी कई संस्थायें स्थापित कर डाली जिन्हें हम कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हैं:हैं। बम्बईके 'सेठ देवचन्द लालचन्द-पुस्त- १पंचसूत्र-आचार्य हरिभद्रकृतव्याख्याकोद्धार भण्डार' का परिचय हम पहले कई सहित । पत्रसंख्या २९। इसकी व्याख्या विक्रमकी बार दे चुके हैं जिसमें एक लाख रुपयेसे अधि- छठी शताब्दीकी लिखी हुई है । मूल ग्रन्थ इससे ककी पँजी है और जिसके द्वारा अभी तक भी पहलेका होना चाहिए। कोई ३२-३३ ग्रन्थ छपकर प्रकाशित हो चुके २ धर्मरत्नप्रकरण-श्रीशान्तिसृरिकृत । पत्र हैं। आज हम एक और ऐसी ही श्वेताम्बर ८४ । यह विक्रमसंवत् ११६१ का रचा संस्थाका परिचय देना चाहते हैं जो अपने ढंग. हुआ है। की एक ही है और जिसने थोड़े ही समयमें ३ देवबन्दन-गुरुबन्दन-प्रत्याख्यानआशासे आधिक काम करके दिखलाया है। देवेन्द्रसरिकृत मूल और सोमसुन्दरकृत टीका ___ इस संस्थाका नाम, 'आत्मानन्द जैन सहित । ५०७० । सभा ' है । सुप्रसिद्ध श्वेताम्बर साधु स्वर्गीय ४ सिद्धपंचाशिका-देवेन्द्रसूरिकृत । आत्मानन्दजीकी स्मृतिमें लगभग १३-१४ प० १४। वर्ष पहले भावनगरमें इसकी स्थापना हुई थी। ५ विचारसप्ततिका-महेन्द्रसरिकृत । इसके मंत्री श्रीयुत सेठ वल्लभदास त्रिभुवन पत्र १७ । उक्त तीनों ग्रन्थ विक्रमकी १३ वीं दासजी गाँधी हैं । सभाकी ओरसे आत्मानन्द सदीके हैं। नामका एक मासिकपत्र भी निकलता है । भाव-
६ कुमारपालप्रबन्ध- पत्र १२० और
मारवाला नगरमें एक और संस्था है जिसका नाम, जन- ७ श्राद्धगुणविवरण-पत्र ८४ । श्रीजिधर्मप्रसारक सभा है। यह सभा बहुत पुरानी नमण्डनगणिकृत । है और जैनग्रन्थोद्धारके कार्यमें उसने सबसे ।
८ श्रावकव्रतभंगप्रकरण–पत्र ८ । आधक कार्य किया है। वह अब तक सैकड़ा समयसारप्रकरण-देवनन्दाचार्य कत ग्रन्थ प्रकाशित कर चुकी है । उसीका अनुसरण स्वोपज्ञटीकायुक्त । प० ४४। करके आत्मानन्दजैनसभाने भी दो तीन वर्षसे जैनग्रन्थोंके छपानेका काम शुरू कर ।
१० धन्यकथानक-दयावर्द्धनवत । पत्र ९। दिया है और इस कार्यमें उसने बहुत बड़ी ११ सम्यक्त्वकौमुदी-जिनहर्षगाणसफलता प्राप्त की है।
कृत। पत्रं ९०। अब तक इस सभाकी ओरसे कोई ५० ग्रंथ १२ रत्नपालनृपकथा-सोममण्डनगाणप्रकाशित हो चुके हैं जो संस्कृत और मागधीभाषा- कृत । पत्र ३२ । में मूल या संस्कृतटीका सहित हैं । इनके सिवा १३ गुरुगुणषत्रिंशत्षट्त्रिंशिका-रत्नसभाके मुखपत्र आत्मानन्द प्रकाशके पौषके अंक शेखरसूरिकृत । प० ९०। जिन छपे हुए ग्रन्थोंकी सूची दी है उनकी ये नौ ग्रन्थ विक्रमकी १६ वीं शताब्दिके संख्या ३४ है । छपे हुए ग्रन्थोंमेंसे सभाके बने हुए हैं।
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fierम्बर और saarम्बरसमाजका ग्रन्थप्रकाशन कार्य ।
१४ उपदेशसप्तति--सोमधर्मगणिकृत पत्र १०२ । इसकी रचना वि० संवत्, १५०३ में
१५ विचारपंचाशिका - पत्र १० और १६बन्धषट्त्रिंशिकासावचूरि - पत्र १० । वार्षिकृत |
१७ ज्ञानसारसूत्र - यशोविजयकृत मूल • और देवचन्द्रकृत टीका सहित । पत्र ११० । १८ प्रतिमाशतक - यशोविजयकृत मूल और भावप्रभसूरिकृत टीका सहित । प० ४५ । १९ सूक्तिरत्नावली – विजयसेन सूरिकृत
|
।
पृष्ठ ४८ ।
२० महादण्डकस्तोत्र - समय सुन्दरकृत | पत्र १२ । ये छह ग्रन्थ विक्रमकी सत्रहवीं शताब्दि बने हुए हैं । २१ मेघदूतसमस्यालेख :- मेघविजय कृत । पृष्ठ २८ ।
२२
चम्पकमालाकथा - भावविजयगणिकृत | पत्र ३० । ये दो ग्रन्थ अठारहवीं शब्द के हैं ।
२३ धम्मिल्ल कथा । पत्रं ७ | २४ चतुर्विंशतिजिनस्तुतिसंग्रह - शीलरत्नसूरिकृत । प० १२ ।
२५ चेतोदूत । पृष्ठसंख्या ३० । २६ परमाणुखण्ड-पुद्गल - निगोदषत्रिशिका - रत्नसिंहरिकृत वृत्तिसहित | पत्र२२ । २७ रोहिणी - अशोकचन्द्र कथा - कनककुशल कृत । प० १६ ।
२८
पर्युषण पर्वाष्टाह्निकाव्याख्यान - बिजयलक्ष्मीसूरि । प० १२ । २९ अन्नाय उंछकुलक- आनन्दविजयकृत । प० १० । पिछले नौ ग्रन्थोंका समय आदि अज्ञात है ।
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दो चार को छोड़ कर प्रायः सभी ग्रन्थ बम्बईके निर्णयसागर प्रेस में, बढ़िया और बहुमूल्य मजबूत कागज पर, खुले पत्रों में सुपररायल बारह पेजी साइजमें छपे हुए हैं। प्राय: प्रत्येक ही ग्रन्थ के प्रारंभ में ग्रन्थकर्ताका परिचय या रचनाका समय आदि दिया गया है । सम्पादन और संशोधन योग्यतापूर्वक हुआ है । इस विषय में सबसे अधिक उल्लेख योग्य बात यह है कि प्रायः सब ही ग्रन्थ चार चार पाँच पाँच प्रतियों की सहायता से संशोधन किये गये हैं 1 किसी किसी ग्रन्थकी तो सात सात प्रतियाँ संग्रह करके सम्पादन किया गया है ! इसका कारण यह है कि श्वेतम्बरसम्प्रदायके प्राचीन पुस्तक भण्डार पुस्तक-प्रकाशक-संस्थाओंके लिए प्रायः मुक्तद्वार रहते हैं। पर हमारे यहाँकी दशा इससे ठीक उलटी है । हम लोगों को एक एक प्रतिका प्राप्त करना भी बहुत कठिन है । डिपाजिट रुपया रखने पर भी ग्रन्थ नहीं मिलते । हमारे आराके सिद्धान्तभवनकी तो — जिसकी कीर्ति - दिग्विदिग्व्यापी हो रही है—अभीतक सूची ही तैयार नहीं हुई है, फिर उससे ग्रन्थोंकी सहायता ली जाय तो कैसे !
इस ग्रन्थमालाकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका कोई भी ग्रन्थ विक्री करनेकी इच्छासे नहीं छपाया जाता । इनका सबसे अधिक भाग साधु और साध्वियों को दान किया जाता है | सभा लाइफ - मेम्बरोंको एक एक प्रति मुफ्त दी जाती है । दूसरे विद्वानों और योग्य पुरुषों को भी ये ग्रन्थ बिना मूल्य दिये जाते हैं । कुछ ऐसे जैनपुस्तकालय और जैन - मन्दिरोंके भण्डार भी हैं जहाँ प्रत्येक ग्रन्थकी एक एक प्रति दानस्वरूप भेज दी जाती है ।
सभा के पास इस कार्य के लिए कितना फण्ड है और उसके कितने लाइफमम्बर हैं यह हमें
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MOHANI जैनहितैषी। iiiiiiiiiiiiiiiiii
मालूम नहीं; परन्तु श्वेताम्बरसमाजमें शास्त्र- सभाके कार्यकर्ताओंको हम उनके इस दानकी पद्धति इतनी अच्छी है कि बिना कि- पुण्यकार्यके उपलक्ष्यमें अनेकानेक धन्यवाद देते सी अच्छे फण्डके भी सभा इस कार्यको अच्छी हैं और चाहते हैं कि वह इसी तरह अनवरत परितरह चला सकती है। जितने ग्रन्थ हमारे पास श्रम करके सारे श्वेताम्बर साहित्यको सर्वसाधारसमालोचनार्थ आये हैं प्रायः उन सबके ही मुख- णके लिए सुलभ कर दे और अपने दिगम्बरपृष्ठोंपर लिखा है कि यह ग्रन्थ अमुक श्रावक समाजसे आग्रह करते हैं कि वह भी इस ओर या श्राविकाके दान-द्रव्यसे छपाया गया। देखिए शीघ्र ध्यान दे और अपने सबसे बड़े कर्तव्यकैसी अच्छी प्रथा है ! इस प्रथाका फल आप ग्रन्थप्रकाशन-का पालन करे । स्वर्गीय दानदेखेंगे कि कुछ ही वर्षों में हजारों ग्रन्थोंका उद्धार वीर सेठ माणिकचन्दजी जौहरीके स्मारकमें हो जायगा।
जो ग्रन्थमाला निकाली गई है उसका कार्य हमने श्वेताम्बर सम्प्रदायमें साधुओं या मनियोंकी उक्त आत्मानन्द-ग्रन्थमालाके ढंग पर ही शुरू संख्या अधिक है और धार्मिक कार्यों में ये ही किया है। यदि हमारा समाज इसकेद्वारा उक्त सम्प्रदायके नेता समझे जाते हैं । इनके शास्त्रदान करनेकी ओर अनुरक्त होगा तो दिगउपदेशों और शासनोंको लोग मानते भी बहत म्बर साहित्यका बहुत कुछ उद्धार होने लगेगा। हैं । एक तो शास्त्रदानकी प्राचीन प्रथा श्वेताम्बर का
" कलकत्तेकी सनातनजैनग्रन्थमालाकी ओर समाजमें अभीतक अस्खलित रीतिसे चली आर
भी हमारा ध्यान जाना चाहिए । उसके
द्वारा कई बड़े बड़े महत्त्वके ग्रन्थ प्रकाही है, दूसरे उनके कुछ साधुओंका ध्यान इस
शित हो चुके हैं । यदि उसकी आर्थिक स्थिति विषयकी ओर अधिक रहने लगा है । बहुत थोड़े
: अच्छी हो जाय तो उसके द्वारा भी बहुत प्रयत्नसे ही वे श्रावकोंको शास्त्रदानकी ओर
काम हो सकता है। प्रवृत्त कर सकते हैं । पर हमारे दिगम्बर सम्प्रदा
आत्मानन्द ग्रन्थमालाके संपादकोंका ध्यान यकी अवस्था इससे भिन्न है। एक तो मुनियोंके
कि एक बातकी ओर आकर्षित करके हम इस अभावसे हमारे यहाँ शास्त्रदानकी प्रथाका ही प्रायः लेखको समाप्त करेंगे । उसके जितने ग्रन्थ देखअभाव हो गया है, दूसरे जो थोड़े बहुत त्यागी नेका हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ है उनमें एक पंचब्रह्मचारी हैं उनमें प्रायः अक्षरशत्रु ही अधिक सत्रको छोडकर शेष सब ग्रन्थ विक्रमकी बारहै अतः वे इस कार्यकी ओर दृष्टि ही क्यों देने हवीं शताब्दिके बादके हैं और उनमें भी अधिलगे ? रहे पण्डित लोग-जिनका कि समाजके कांश पन्द्रहवीं शताब्दिके पीछेके रचे हुए हैं । ऊपर कुछ प्रभाव है-वे या तो ग्रन्थोंके छपानेको हम यह मानते हैं कि पिछले साहित्यको प्रकापाप समझते हैं, या कमसे कम अपने अन्न- शमें लानेकी भी कम आवश्यकता नहीं है, तो दाता सेठोंको खुश रखनेके लिए-छापेकी चर्चा- भी अभी हमें सबसे अधिक उद्योग प्राचीन साहिसे दूर रहना चाहते हैं । वे यदि चाहें तो प्रत्येक त्यको प्रकाशित करनेके लिए करना चाहिए । उत्सवमें, मन्दिरप्रतिष्ठामें, व्रतोद्यापनमें, तथा आशा है कि हमारी इस सूचना पर सभा ब्याह-शादियोंकी खुशीमें शास्त्रदान करनेकी विचार करेगी। पद्धतिको जारी कर सकते हैं।
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पुनर्विवाह विधेय नहीं निषिद्ध है।
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" जिस हेतुसे विवाहको आवश्यकता बतलाई गई इस विषयमें अपने कुछ विचार प्रकट किये थे। है उसकी पूर्तिके लिए यह आवश्यक है कि वह एक आज हम स्वर्गीय पं० मणिलाल नभू भाई द्विवेदी और अचल होना चाहिए। ये दोनों शर्ते इतनी अधिक बी.ए.के. विचार उनके एक पुराने लेख परसे यहाँ जरूरी हैं कि वे उस जगह भी-जहाँ कि स्त्र पुरुषका उद्धृत करते हैं । आशा है कि विचारशीलपाठअनुचित सम्बन्ध होता है-मालूम पड़ जाती हैं। प्रेममागेमें अचल न रहनेसे, तथा प्रेमको अपने सभी- क इनका गंभीरतापूर्वक अध्ययन करनेका कष्ट तेका एक साधारण साधन समझ लेनेसे सुखकी प्राप्ति हो सकती है, यह कहना व्यवहार तथा नी. विचारशील लेखक थे । वे पुराने आचार तिके सिद्धांतोंकी गहरी अज्ञानता प्रकट करना है। विचारोंके पोषक होनेपर भी नये विचारोंको सहन
.....मनुष्यकी स्वाभाविक अस्थिरता और तरंगोंको करनेवाले थे। नियममें रखनेके लिए आवश्यक है कि समाज उसके कार्योंमें हस्तक्षेप करे । यदि ऐसा न किया जायगा पुनर्विवाहका विषय बहुत ही विवादग्रस्त है। तो सुखके लिए एकके बाद एक व्यर्थ और दुःख- इसका निर्णय तब तक नहीं हो सकता है जब कारक प्रयत्न करते करते मनुष्यका जीवन सर्वथा तक इन बातोंका मर्म अच्छी तरह न समझ लिया निष्फल और नीचा बन जायगा।"
जायः-१ संसारमें नीति और धर्मकी रचनाके -आगस्ट काम्टी। सिद्धान्त किस प्रकारके हैं, २ संसारको सुखमय जैनसमाजमें पुनर्विवाहका प्रश्न बहुत सम- बनानेके लिए वे सिद्धान्त किस प्रकारके होने यसे दबाया जा रहा था। आवश्यक होने पर भी चाहिए ३ और हमारे देशके पूज्य स्त्रीपुरुषों में एक पक्षके प्रभावके कारण इसकी चर्चा खुलकर जो अनुकरणीय उत्साह, साहस, और शौर्य आदि नहीं होने पाती थी; परंतु देखते है कि अब इसकी गुण थे वे किस प्रकारके सिद्धान्तों पर चलनेसे चर्चा रुक नहीं सकती । चर्चाका न होना इस उत्पन्न हुए थे। बातका प्रमाण नहीं है कि जैनसमाजमें इस प्रश्नका जगतमें परंपरासे यही व्यवहार चला आ निर्णय हो चुका है अथवा सारा ही समाज पुनर्वि- रहा है कि धर्मनीतिका सदुपदेश एक ओर तो वाहके विरुद्ध है, इस लिए आवश्यक जान पड़ता कठिन, कष्टकर परन्तु शुभफलदायक मार्गकी है कि इस प्रश्नका खूब खुलकर विचार किया जाय योजना करता है और दूसरी ओर जिसे देख और इसकी अनुकूल और प्रतिकूल दोनों बाजु- कर दया आ जाय ऐसे कष्टमें पड़ा हुआ ऑकी अच्छी तरह जाँच की जाय। मनष्य उससे छुटकारा पानेका यत्न करता है।
हितैषीके पिछले प्रथम अंकमें जनहितेच्छुके परन्तु विचार करनेसे मालूम होता है कि सम्पादक श्रीयुत बाड़ीलाल मोतीलालजी शाहने हमारी धर्मबुद्धि हमें जो ऊँचा स्वरूप-पवित्र
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AAHALIBUILERHILABLEHATIHAR
जैनहितैषी। Saritriminititiminilini
मार्ग-बतलाती है वही सच्चा मार्ग है और उससे अनुचित, यह बात तब समझमें आयगी जब समाजका कल्याण हो सकता है । यद्यपि बहुत- इसके करनेमें जो हेतु है वह और इसका करसे उदाहरण ऐसे मिलते हैं जो इस नियमसे ना अनुचित समझनेमें जो सद्धर्म है वह, इन विरुद्ध जाते हैं, परंतु उन्हें अपवाद ही समझ- दोनोंकी तुलना की जायगी। ना चाहिए, और एक तरह वे मूल नियमको ही यद्यपि विवाहका उद्देश्य भरणपोषणरूप सबल करते हैं । एक साधारण उदाहरणसे यह स्वार्थका जान पड़ता है। परन्तु यह देखना बात अच्छी तरह समझमें आ जायगी। धर्मशा- चाहिए कि इस सम्बन्धमें सच्ची पवित्र गाँठ स्त्रोंकी आज्ञा है कि सत्य बोलना ही फलदायक काहेकी है ? स्त्री पोषकशक्तिका स्वरूप है और है,और उसीसे सब सुखोंकी प्राप्ति होती है । जिन पुरुष उत्पादक शक्तिका । पुरुष शरीरबलमें बढ़ा जिन देशोंमें इस तरहका दृढ उपदेश दिया गया चढ़ा है और स्त्री प्रेमवृत्तिमें । प्रेमवृत्तिमें 'पुरुष है वहाँ वहाँ कहना चाहिए कि सद्विद्या और उसकी बराबरी कदापि नहीं कर सकता और सद्विचारोंका ख़ब ही प्रचार हुआ है और इसके यही उसका ऐश्वर्य है जो उसे पूज्य बनाता है । विरूद्ध जिस देशमें सत्य बोलनेके विषयमें पूरा प्राचीन आचार्योने इसी लिए स्त्रियोंकों पूज्य जोर नहीं दिया गया है वह देश अधम स्थिति- कहा हः-- पर पहुँचा हुआ है। परन्तु ऐसा होनेपर भी प्रजनार्थ महाभागाः पूजाहाँ गृहदीप्तयः। क्या आप कह सकते हैं कि जहाँ सत्यका स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ उपदेश दिया गया है वहाँ कभी असत्यके अर्थात् प्रजाकी उत्पत्ति करनेवाली, महाभाग्यऔर जहाँ सत्यका उपदेश नहीं दिया गया है वाली और इसी कारण पूज्य, घरकी दीपिका वहाँ कभी सत्यके छोटे मोटे उदाहरण नहीं मिल रूप स्त्री और लक्ष्मी इन दोनोंमें कोई भेद नहीं जाते हैं ? परन्तु इससे क्या उन उन देशोंकी है । और भी कहा है :स्थापित रूढिको और उस रूढिके कारण प्राप्त यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । हुई प्रतिष्ठा या अप्रतिष्ठाको हानि पहँच सकती यत्रतास्तु न पूज्यन्ते सार्वस्तत्राफलाः है ? कभी नहीं । इस सारे विवेचनका सारांश
क्रियाः। यह है कि किसी तात्कालिक तीव दुःखके का- अर्थात् जहाँ स्त्रियोंकी पूजा होती है वहाँ रण व्याकुल होकर भले ही हम चाहे जिस मार्ग- देवता निवास करते हैं और जहाँ ये नहीं पुजती को पकड़ लेना उचित समझ लें, तथापि उस विष- वहाँ सारी क्रियायें निष्फल जाती हैं। याज्ञवयका जो मूल सद्रूप है वही सच्चा मार्ग है और ल्क्य ऋषिने भी कहा है:-- उसीके अनुसार चलनेसे संसार सुखमय बनेगा भर्तृमातृपितृज्ञातिश्वश्रुश्वसुरदेवरैः । यह स्वीकार किये विना नहीं चल सकता। बन्धुभिश्च स्त्रियःपूज्या भूषणाच्छानाशनैः।
पुनर्विवाहके सूक्ष्म विषयमें भी उपर्युक्त निय- पति, भाई, पिता, जातिवाले, सास, ससुर, मके अनुसार विचार करना चाहिए । स्त्रीको देवर और बन्धुओंको भूषण वस्त्र और भोजनाअपने पतिके अभावमें और पतिको अपनी स्त्री- दिसे स्त्रियोंकी सेवा करनी चाहिए । स्त्रियोंको के अभावमें फिरसे ब्याह करना उचित है या पूज्य बनानेवाले इस प्रेममय ऐश्वर्यकी पुरुषको
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विधेय नहीं निषिद्ध है ।
इतनी आवश्यकता है कि उसके बिना उसका जीवन कष्टमय है और उसके लिए मोक्षके मार्ग पर चलना कठिन है । इसी तरह पुरुषके बिना स्त्रीका निर्वाह होना कठिन है । तब स्त्री और पुरुष दोनों के योगसे पूरा मनुष्य बनता है और उसीका नाम विवाह है। विवाह केवल प्रेमकी गांठसे दृढ़ होता है ।इस प्रेमके बलको दृढ़ करने के लिए और उस बलसे उभयपक्षको जो मोक्षावधि महान् लाभ होता है उसकी प्राप्ति के लिए यह प्रेम होना कैसा चाहिए? हमारा मत है कि यह प्रेम एक ही और अखण्ड होना चाहिए; नहीं तो जिस अमूल्य फलकी आशा की जाती है उसे व्यर्थ है। समझना चाहिए । फ्रान्सका प्रसिद्ध विद्वान्, आगस्टकाम्टी भी यही कहता है कि " ऐसा प्रेमइष्ट फल दे इस लिए एक, , अविच्छिन्न और अखण्डमरणके बाद भी अखण्ड — होना चाहिए। यदि यह सिद्धान्त ठीक है तो फिर स्त्रीपुरुष के बीच मेंदोनोंमें पवित्र प्रेमका सम्बन्ध हो जाने के बाद किसी दूसरे के लिए अवकाश ही कहाँ रहता "है? ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने से गुजरा करते हैं कि बहुतसे स्त्री-पुरुष जिन्हें ऐसे प्रेममय विवाहका अनुभव हो गया है - मरणजन्यवियोगके संकटसे जरा भी नहीं डरते हैं; इतना ही नहीं बल्कि वे दूसरा सम्बन्ध करना अपनी पहली पवित्र गाँठको दूषित करनेके बराबर समझते हैं । ऐसी अवस्थामें पुनर्विवाहके होने में - ' प्रेम ' तो हेतु भूत हो ही नहीं सकता; क्योंकि यह वृत्ति जहाँ एकबार लग जाती है वहाँसे दूसरी जगह के लिए कभी हिलती भी नहीं है। अब यह समझमें सरलता पड़ेगी कि प्रेमसम्पादित विवाह और प्रेमके सिवाय दूसरी वृत्तिसे सम्पादित हुआ पुनर्विवाह, इन दोनोंमें क्या अन्तर है और यह भी समझमें आ जायगा कि यदि विवा
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हका सम्बन्ध एक और अखण्ड रक्खा जाय जिससे कि पुनर्विवाहका मौका ही न आने पावे तो अच्छा है, और इसीसे यह भी सिद्ध हो जायगा कि पुनर्विवाह एक निषिद्ध आचार है ।
जिन देशों में पुनर्विवाहका रिवाज लोकसम्मत है वहाँ, और हिन्दुओं की जिन जिन जातियों में यह जारी है उनमें भी, पुनर्विवाहका लाभ कितने स्त्रीपुरुष लेते हैं और उसे अच्छा समझते हैं, यदि इसकी गणना की जाय तो यह सिद्ध हुए बिना न रहेगा कि मनुष्य जातिकी स्वाभाविक वृत्ति ही प्रेमकी एकता पर दृढ़ है और उसीमें वह सुखका और महत्ताका अन्तिम परिणाम मान रही है । सुप्रसिद्ध बाबू प्रतापचन्द्र रायने अपने एक व्याख्यानमें कहा था कि " मनुष्यकी वृत्ति ही एक प्रेम करनेकी ओर बलवती जान पड़ती है । यदि कोई हिन्दुओंके लिए यह कहे कि इनमें प्रतिष्ठित समझे जानेवाले ब्राह्मणोंका अनुकरण करके वैश्य शूद्रादि वर्ण पुनर्विवाहको बुरा समझने लगे हैं, तो इस बात को स्वीकारते हुए भी यह प्रश्न होता है कि जिन देशों में यह जायज है वहाँ क्यों बहुत से स्त्री-पुरुष इसे पसन्द नहीं करते ? उत्तर यही है कि जनसमाजका झुकाव प्रेमकी एकता की ही ओर है । जैसे संसार के और और कामों में दृढ़ताकी मुख्य आवश्यकता है उसी प्रकार प्रेमसम्बन्ध के व्यवहार में भी है जिसके कि आधार से सारे सुखोंकी मर्यादा बँधती है। यदि यह दृढ़ता न होगी तो मनुष्य पुनर्विवाहके कारण जो बार बार विवाहान्वेषणकी आदत पड़ जायगी उससे किसी एक स्थितिमें सुख न मानकर, सारा जीवन सुख प्राप्त करनेकी एकके बाद एक परीक्षायें करनेमें ही व्यर्थ गवाँकर दुखी हुआ करेगा ।
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SHAILEELAMIRMILIATIALAITHLIBARAHIMARA
RamummitDEHETI
तब विवाहका बन्धन केवल प्रेमग्रन्थिसे होनेके ही है । पुनर्विवाह तो हमारी दुर्वृत्तिके कारण, लिए आवश्यक है कि दोनोंकी उम्र अच्छी हो हमारी दुर्बलताके कारण लाचार होकर ग्रहण (कमसे कम १६ और २५ वर्ष ) दोनों शिक्षि- किया हुआ-क्षमा करने योग्य और सबके त हों, ( वर्तमानमें स्त्रियोंके लिए जिस प्रकारकी सहन करने योग्य मार्ग है । शिक्षी दी जाती है उसकी अपेक्षा जुदे ही प्रकारकी पनर्विवाहको यदि कोई पाप माने, तो इसके शिक्षा उन्हें मिलना चाहिए, जिससे उनकी मान- लिए हम उसका आदर करेंगे । क्योंकि ऐसा सिक और नैतिक शक्तियोंका विकास हो।) माननेमें उसकी सदाद्वि-धर्मवृत्ति कारण है । पऔर दोनोंका विवाह मा बाप या गुरुजनोंकी
। रन्तु यदि कोई पुनर्विवाह करनेवालेको दुःख योग्य आज्ञानुसार उन दोनोंकी पसन्दगीक देनेके लिए या उसको जातिबहिष्कृत आदि का द्वारा हुआ हो । इस प्रकारके विवाहको ही सच्चा रनके लिए तैयार हो, तो इसे हम जरा भी सहन प्रेमग्रन्थियुक्त विवाह समझना चाहिए। नहीं कर सकेंगे। जब तुम प्राचीन आर्यधर्मके
विवाहका यही स्वरूप हमें मान्य है और इसी सिद्धान्तेकि विरूद्ध दूसरे न जाने कितने आचाकारण हम पुनर्विवाहको बुरा समझते हैं । परन्तु रोंको सहन कर रहे हो, तब इस एकको भी हमारे मित्र कहते हैं कि आप जैसे बतलाते हैं क्यों चुपचाप सहन नहीं कर लेते हो ? परन्तु वैसे विवाह आजकाल नहीं होते हैं । अपने रीति- वे लोग जो इस काममें उचित सहनशीलता रिवाज बिगड़ गये हैं, शिक्षा दी नहीं जाती, प्रकट नहीं कर सकते हैं अर्थात् पुनर्विवाहके बाल्यविवाहका जोर है और पसन्दगीका तो कोई रिवाजसे क्षुब्ध हो जाते हैं, उनकी अपेक्षा वे अभिप्राय भी नहीं समझता है; तब इन सारे लोग और भी अधिक दोषके भागी हैं जो दुष्टाचारोंके दुष्ट परिणामका निवारण कैसे किया पुनर्विवाहादि करनेको ही सच्चे सुधारका शृंगार जाय ? जिन लड़कियोंने अभी विवाहका अर्थ समझते हैं। जो आचार हमें पसन्द हैं उन्हीं भी नहीं सुना समझा है, उन्हें क्या विना अपराध आचारवाले लोगोंको अपने पास रखना और दूसरोंजीवन भर दुःखके गड्ढे ही डाले रखना चाहिए ? को न रखना, इसके लिए तो हर एक अदमी स्वतंत्र जिनके हृदय है, जो पराये दुःखोंका अनुभव कर है, परन्तु प्राचीन सत्सिद्धान्तोंके नष्ट भष्ट करनेका सकते हैं. वे दयाशील सज्जन इसका उत्तर देते किसीको भी अधिकार नहीं है। हमारे सधारक हुए कहते हैं-"विषस्य विषमौषधम्- भाई जितना परिश्रम इस अनिष्ट आचारको प्रविषकी दवा विष ही है। इस दु:खसे मक्त होने- चलित करनेके लिए करते हैं, उतना ही यदि
लिए यदि पनर्विवाहकी आवश्यकता है, तो विवाहके वास्तविक स्वरूपको समझानेमें, वि. उसे अपने दुष्टाचारोंका परिणाम समझकर होने वाहके सामाजिक नियमोंमें परिवर्तन करानेमें, दो-उसमें रुकावट मत डालो।" हम भी ऐसे और धर्मकी महत्ता समझानेमें करते तो यह दयार्द्र सज्जनोंका सर्वांशतः अनुमोदन करते हैं; व्यर्थका विवाद कभीका मिट गया होता । पुनपरन्तु साथ ही यह स्मरण रखनेकी प्रार्थना करते विवाहकी रातिको उत्तेजन देते समय वे यह हैं कि हमारा वास्तविक मार्ग तो-जैसा पहले बात भूल जाते हैं कि इस प्रकारके उत्तेजनकहा जा चुका है-विधाह करके वैधव्यधर्म पालना से, वे अव्यवस्थित विवाह भी स्थायी हो
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ATHAAHALIBULABILLLLLLLLLLLLLLABUALLAIMAITARA
पुनर्विवाह विधेय नहीं निषिद्ध है। mintinumbtimummimimifiniminiminine
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जायेंगे, जो कि अनेक अंशोंमें पुनर्विवाहको ज- शरीरका स्थायी आरोग्य सिद्ध नहीं होता है, न्म देनेवाले हैं और इससे दुःखकी परम्परा कभी उसी प्रकार समाज-शरीरके विषयमें भी समझना बन्द न होगी। जिन कारणोंसे हम छोटी छोटी चाहिए । तात्कालिक उपाय करनेसे जिस प्रकार लड़कियोंकी दयायोग्य दशाको देखकर, विष · कुछ आराम मिलता है, उसी प्रकार पुनर्विवाहसे की ओषधि विष समझकर, पुनर्विवाह करनेके मिलेगा-हम यह नहीं कहते कि न मिलेगा और लिए लाचार होते हैं उन कारणोंको किसी तरह वह मिले तो अच्छा, ऐसा हम चाहते हैं; परन्तु सबल न होने देना चाहिए । हमारा आचार ऐसा मूल दोषके दूर करनेकी ओर जो ध्यान नहीं न होना चाहिए जिससे कि वह बुरा रिवाज सदा- दिया जाता है उसे हम बहुत ही बुरा समझते हैं के लिए गढ़ बाँधकर रह जाय कि जिसके कार- और इससे भी बरी बात यह है जो यह निषिद्ध - ण इस समय हम पुनर्विवाहके लिए लाचार हुए आचार विधेयाचार समझा जाने लगा है और हैं । तात्कालिक दुःख दूर करनेके लिए लोगोंको इस समय सुधारका शुभचिह्न गिना जाने लगा है। अधिक सहनशीलता धारण करनेका उपदेश दो -ऐसा प्रयत्न करो जिससे वे पुनर्विवाहको सह- "
. सुधारकोंको चाहिए कि पुनर्विवाहका प्रचार न कर लें; परन्तु ऐसा प्रयत्न मत करो जिससे यह
करनेके पहले विवाहकी जो अव्यवस्था है उसे उपायरूप अनिष्ट आचार सदाके लिए हमारे गले व्यवस्थित करनेकी कोशिश करें। जब तक बँध जाय। पुनर्विवाहको विधेय कोटिमें मत ले जा जातियों और उपजातियोंके बन्धनके कारण ओ; परन्तु जिस निषेध कोटिमें वह है उसीमें रहने स्त्रीपुरुष वर कन्या पसन्द करनेमें स्वतंत्र नहीं देकर उसे सिर्फ आपद्धर्म-लाचारीके कारण धारण हैं तब तक विवाहपद्धति व्यवस्थित नहीं हो किया हुआ रिवाज-समझो। सुधारकोंका काम है सकती । हमे यहाँ फिर कहना पड़ता है कि सद्विचारकी प्रवृत्ति करना । उसे छोडकर अपनी मतमतांतरोंके कारण जो वर्तमान जातिभेद हो शक्तियोंको दूसरी ओर-असद्विचारों की प्रवत्तिकी गया है, उसे छोड़कर जब प्राचीन चातुर्वर्णिक ओर-लगाना हमें तो उचित नहीं जान पड़ता।अना- धर्म स्थिर किया जायगा तभी हमारी अनेक ड़ी वैद्योंकी पद्धतिपर चलना अच्छा नहीं। शरीरमें सांसारिक अडचनें दूर हो सकेंगी, नहीं तो जो दोष हो गये हैं उन्हें दूर करनेकी दवा न देकर नहीं । सुधारकोंके द्वारा विवाहके शुभ विचारके केवल उस दोषके कारण उत्पन्न हुए तात्कालिक साथ साथ जातिबन्धनके शुद्ध रूपका विवेचन कष्टोंको दूर करनेका प्रयत्न करनेसे जिस प्रकार होनेकी भी पूरी पूरी आवश्यकता है।
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________________ चित्रशाला स्टीम प्रेस, पूना सिटीकी अनोखी पुस्तकें। चित्रमयजगत्:-यह अपने ढंगका अद्वितीय सचित्र मासिकपत्र है / " इलेस्ट्रेटेड लंडन न्यूज के ढंग पर बड़े साइजमें निकलता है / एक एक पृष्टमें कई कई चित्र होते हैं / चित्रोंके अनुसार लेख भी विविध विषयके रहते हैं / साल भरकी 12 कापियोंको एकमें बंधा लेनेसे कोई 400,500 चित्रोका मनोहर अलबम बन जाता है / रंगीन चित्र भी इसमें रहते हैं। आर्टपेपरके संस्करणका वार्षिक मूल्य 5 // ) डॉ० व्य० सहित और एक संख्याका मूल्य // ) आना है / साधारण कागजका वा० मू० 3 // ) और एक संख्याका / ) है। राजा रविवर्माके प्रसिद्ध चित्रः-राजा साहबके चित्र संसारमें नाम पा चुके हैं / उन्हीं चित्रोंको अब हमने सबके सुभीतेके लिये आर्ट पपरपर पस्तकाकर प्रकाशित कर दिया है। इस पुस्तकमें 88 चित्र मय विवरणके हैं / राजा साहबका सचित्र चरित्र भी है / टाइटल पेज एक प्रसिद्ध रंगीन चित्रसे सुशोभित है / मूल्य है सिर्फ 1) रु.। चित्रमय जापान-घर बैठे जपानकी सैर / इस पुस्तकमें जापानके सृष्टिसौदर्य, रीतिरवाज, खाना पान, मृत्यु, गायनवादन, व्यवसाय, धर्मविषयक और राजकीय, इत्यादि विषयोंके 84 चित्र, संक्षिप्त विवरण सहित हैं / पुस्तक अव्वल नम्बरके आर्ट पेपर पर छपी है / मूल्य एक रुपया / सचित्र अक्षरबोध-छोटे 2 बच्चोंके वर्णपरिचय करानेमें यह पुस्तक बहुत नाम पा चुकी है। अक्षरोंके साथ साथ प्रत्येक अक्षरको बतानेवाली, उसी अक्षरके आदिवाली वस्तुका रंगीन चित्र भी दिया है / पुस्तकका आकार बड़ा है / जिससे चित्र और अक्षर सब सुशोभित देख पड़ते हैं। मूल्य छह आना। वर्णमालाके रंगीन ताश--ताशोंके खेलके साथ साथ बच्चोंके वर्णपरिचय करानेके लिये हमने ताश निकाले हैं / सब ताशोंमें अक्षरों के साथ रंगीन चित्र और खेलनेके चिन्ह भी हैं / अवश्य देखिये / फी सेट चार आने / सचित्र अक्षरलिपि-यह पुस्तक भी उपर्युक्त " सचित्र अक्षरबोध" के ढंगकी है / इसमें बाराखड़ी और छोटे छोटे शब्द भी दिये हैं / वस्तुचित्र सब रंगीन हैं। आकार उक्त पुस्तकसे छोटा है / इसीसे इसका मूल्य दो आने है। सस्ते रंगीन चित्र-श्रीदत्तात्रय, श्रीगणपति, रामपंचायतन, भरतभेट, हनुमान, शिवपंचायतन, सरस्वती, लक्ष्मी, मुरलीधर विष्णु, लक्ष्मी, गोपीचन्द, आहल्या, शाकुन्तला मेनका, तिलोत्तमा, रामवनवास गजेंद्रमोक्ष, हरिहरभेट, मार्कण्डेय, रम्भा, मानिनी, रामधनुर्विद्याशिक्षण, अहिल्योद्धार, विश्वामित्र मेनिका, गायत्री, मनोरमा, मालती, दमयन्ती और हंस, शेषशायी, दमयन्ती इत्यादिके सुन्दर रंगीन चित्र / आकार 7+5, मूल्य प्रति चित्र एक पैसा। श्री सयाजीराव गायकवाड़ बड़ोदा, महाराज पंचम जार्ज और महारानी मेरी, कृष्णशिष्टाई, स्वर्गीय महाराज सप्तम एडवर्डके रंगीन चित्र, आकार 8+10 मूल्य प्रति संख्या एक आने। लिथोके बढ़ियाँ रंगीन चित्र-गायत्री, प्रातःसन्ध्या, मध्याह्न सन्ध्या, सायंसन्ध्या प्रत्येक चित्र।) और चारों मिलकर // ) नानक पंथके दस गुरू, स्वामी दयानन्द सरस्वती, शिवपंचायतन, रामपंचायतन, महाराज जार्ज, महारानी मेरी / आकार 16+20 मूल्य प्रति चित्र चार आना / __ अन्य सामान-इसके सिवाय सचित्र कार्ड, रंगीन और सादे, स्वदेशी बटन, स्वदेशी दियासलाई, स्वदेशी चाक, ऐतिहासिक रंगीन खेलनेके ताश, आधुनिक देशभक्त, ऐतिहासिक रामा महाराजबादशाह, सरदार, अंग्रेजी राजकर्ता, गवर्नर जनरल इत्यादिके सादे चित्र सस्ते मूल्य पर मिलते हैं। स्कूलोंमें किंडरगार्डन सीतसे शिक्षा देनेके लिये जानवरों के चित्र सब प्रकारके रंगीन नकशे, ड्राईगका सामान भी योग्य मूल्यपर मिलता है / इस पतेपर पत्रव्यवहार कीजिये। मैनेजर-चित्रशाला प्रेस, पूना सिटी। For Personal & Private Use Only