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________________ २४० HAMARILALBOATNA जैनहितैषी विवाह करना कोई पुण्यका कार्य है, अतएव उसे इसे धर्मविरुद्ध बतलाते हैं वे धर्मका स्वरूप ही करना ही चाहिए। यह अवश्य कहा गया है कि नहीं समझते हैं । जैनधर्ममें प्रत्येक मनुष्यको जिन बालविधवाओंसे ब्रह्मचर्यका पालन नहीं उसकी शक्तिके और स्थिति के अनुसार धीरे धीरे हो सकता है, जो अपने विचारोंपर विजय नहीं सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ानेकी विधि है। जो जिस पा सकती हैं, और इस कारण गुप्त पाप करनेके योग्य होता है उसे उसी चरित्रके धारण करनेका लिए लाचार होती हैं, उनको बलपूर्वक एकाकिनी विधान किया जाता है । जो अगणित प्रकारके रहनेके लिए मजबूर करनेकी अपेक्षा यह अच्छा जीवोंका मांस खाता था, उसे एक कौएके है कि उन्हें दूसरा पति करनेकी आज्ञा दे दी जाय। मांसको छोड़नेका उपदेश दिया गया था। जो स्त्री पापोंसे डरती है और इस कारण हाथीको छना हुआ पानी नसीब नहीं होता था, एक बड़े भारी पापकी परम्पराको छोड़ देती है; इस कारण वह तालाबके पानीको मचाकरपरन्तु सर्वथा निष्पाप ब्रह्मचारिणी होकर रहनेमें बिलोकर-प्रासुक कर लेता था और फिर उसे लाचार है, इस कारण एक छोटासा पाप कर पीता था। लेती है, अर्थात् निरन्तर छुपकर पाप करना पण्डित प्रवर आशाधर और सोमदेवसूरिने छोड़कर किसी एककी हो जाती है; निःशङ्कः .. " ब्रह्मचर्यके तीन भेद किये हैं-एक स्त्री मात्रका होकर कहा जा सकता है कि वह अच्छा काम त्यागी, और दूसरा अपनीको छोड़कर शेष करती है । बड़े बड़े कुलीन सेठ साहूकारोंके सबका त्यागी और तीसरा अपनी स्त्री और घरकी उन विधवाओंसे जो जीवन भर पापके १ वेश्याको छोड़कर अन्य सबका त्यागी । इस घडे फोड़ा करती हैं, उन साधारण घरोंकी तीसरेको आचार्य सोमदेवने गृहीका ब्रह्मचर्य विधवायें अच्छी हैं जो अपनी प्रवृत्तियोंको दमन , न कहा है:न कर सकनेके कारण पुनर्विवाह कर लेती हैं और दस्सा या विनैकया बनकर जीवन व्यतीत वधू-वित्तस्त्रियौ मुक्त्वा सर्वत्रान्यत्र तज्जने। करती हैं। माता स्वसा तनूजेति मतिर्ब्रह्म गृहाश्रमे ॥ ६ जैनधर्म और पुनर्विवाह ।। पं० आशाधरके शब्द ये हैं:- “ यस्तु स्वदारवत्साधारणस्त्रियोऽपि व्रतयितुमप्रस्तावके शब्दोंमें कहा गया है कि 'यह शक्तः परदारानेव वर्जयति सोऽपि ब्रह्माकार्य जैनधर्मसे अत्यन्त विरुद्ध है। अवश्य ही णुव्रतीष्यते । ” अर्थात् जो, जिस तरह जो विधवा ब्रह्मचर्यसे रहना चाहती है उसे अपनी स्त्रीका त्याग नहीं कर सकता है उसी पुनर्विवाहके लिए लाचार करना, अथवा जो प्रकार वेश्याका भी त्याग नहीं कर सकत कई बालबच्चोंका बाप परलोककी तैयारी कर केवल पराई स्त्रियोंका त्याग करता है वह भी रहा है उसे १०-११ वर्षकी कन्याके साथ ब्रह्मचर्याणुव्रती है । जो लोग गतानुगतिक पुनर्विवाह करनेकी इजाजत देना पापका कार्य और विचारबद्धिसे रहित हैं, वे इस बातको है और इस कारण जैनधर्मसे अत्यन्त विरुद्ध है। कभी नहीं मान सकते कि वेश्यागामी भी बड़े पापसे बचाकर छोटे पापकी इजाजत देना ब्रह्मचारी कहल सकता है । वे सोमदेव और जैनधर्मसे विरुद्ध कभी नहीं हो सकती। जो आशाधरको सैकड़ों गालियाँ सुनायँगे और Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522825
Book TitleJain Hiteshi 1916 Ank 04 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1916
Total Pages96
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size10 MB
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