Book Title: Tirthankar 1974 04
Author(s): Nemichand Jain
Publisher: Hira Bhaiyya Prakashan Indore

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Page 15
________________ सवेरा हुआ। तिरंगा लहराने की खबर सुनकर गाँव के पटेल का माथा ठनका। पूछताछ हुई। सुरेन्द्र के नेतृत्व की जानकारी मिल गयी। सुरेन्द्र पटेल के यहाँ बुलाये गये। डाँट-डपट हुई, जेल का डर दिखाया गया, और अगले दिन तक झण्डा उतार लेने की धौंस दी गयी। मगर सुरेन्द्र तिरंगा उतारने के लिए तैयार नहीं थे। उस रात सुरेन्द्र सो न सके। झण्डा उतारने का तो सवाल ही नहीं था । परिणाम भुगतने की पूरी तैयारी भी थी मगर डर एक और था। इस घटना से सरकार घर के लोगों को भी तंग कर सकती है यह उन्हें मालूम था । दूसरे के कष्ट दूर करने वाले वे, परिजनों के लिए कष्ट के कारण कैसे बन सकते थे? अतः सुरेन्द्र ने घर छोड़ देने का फैसला कर लिया। स्वजनों को राज-कोप से बचाने के लिए उन्होंने प्रेम के रज्जु तोड़ डाले। ध्वजारोहण की यह घटना उनके अज्ञातवास का कारण बनी। उन्हें कित्तूर की शुगर फैक्टरी में तुरन्त काम भी मिल गया। तकनीकी कामों में रुचि और गति तो थी ही, काम अच्छा चलने लगा। दिन और महीने बीतते गये। घर जाने का या अपना पता सूचित करने का विचार भी मन में न आता। मोह-माया के बंधन तो तोड़ ही दिये थे। विवाह की बात भी जब चली थी तो सुरेन्द्र ने सदा मौन ही रखा था और किसी ने सीधे विवाह करने के लिए कहने की हिम्मत भी न की थी। माता-पिता अवश्य परेशान थे। हर जगह सुरेन्द्र ढूंढे जा रहे थे। माँ-बाप द्वारा भी और अंग्रेज सरकार द्वारा भी ! लेकिन सिखों के वेश में रहने वाले सुरेन्द्र को कौन पहचान सकता था ? तिरंगा फहराकर कोई भारी देश-सेवा कर डाली हो, ऐसा सुरेन्द्र बिलकुल नहीं समझते थे । उलटे यह विचार उन्हें सदा सताता कि लोग यही समझते होंगे कि झण्डा लगाने के कारण डर से भाग गया। उनकी उन्नत आत्मा सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती। कुछ अच्छा करने का मन्त्र रटती । मगर अब भी मार्ग नहीं मिल रहा था, ध्येय का निश्चय नहीं हो पाया था। इसी दौरान ऐनापुर के पटेल परिवार के एक युवक से दोस्ती हो गयी। छुट्टियों के दिन उसके घर बीतते । ऐनापुर महामुनि कुंथुसागरजी का जन्म-स्थान था। सुरेन्द्र वहाँ पर कुंथसागरजी के ग्रंथ पढ़ सके। धीरे-धीरे उनके विचारों को दिशा मिलने लगी। यही दिनचर्या शायद और चलती मगर नियति में कुछ और ही बदा था। सुरेन्द्र मोतीझरे से बीमार हो गये। मित्र ने उन्हें घर पहुँचा दिया। माँ-बाप भी बीमारी की दशा देखकर रो पड़े, मगर इन आँसुओं में पुत्र मिलने की खुशी भी शामिल थी। तबीयत काफी खराब थी। लोग चिन्तित थे। मगर सुरेन्द्र के मन में कुंथुसागरजी का अध्यात्म छाया हुआ था। णमोकार मन्त्र का मनन जारी था । रुग्णशैया पर पड़े तीर्थंकर | अप्रैल १९७४ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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