Book Title: Shripalmaynamrut Kavyam
Author(s): Naychandrasagar
Publisher: Agamoddharak Pratishthan

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Page 62
________________ श्रीपाल- काव्यम मयणामृत-8 靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈樂 चतुःपुत्रोपरी पुत्री मदनमञ्जूषाभिधा । तयोश्च रतिरूपाऽस्ति जिनधर्मैकनिश्चला ॥४५२॥ तत्रस्थश्रावकस्याहं जिनदेवस्य देहजः । जिनदासोऽभिधानेन चित्रं श्रुणु श्रुतिहरं ॥४५३॥ राजसुतान्यदास्वीये पितामहेन कारिते । महापूजां विरच्याऽथ भावेन जिनमन्दिरे ॥५४॥ | स्तौति यावच्छुभैर्भावै जिनेशं नाभिनन्दनम् । परिवार युतो भूपः जिनान्नन्तुं समागतः ॥४५५॥ संवीक्ष्याऽथ महापूजां जैनी निजात्मजाकृताम् । साश्चर्यो भूपति ईष्ट श्चित्ते दध्यौ तथानिजे ॥४५६॥ मत्पुत्र्या रचिता पूजाऽदृष्टपूर्वे अहो मया । कौशलं जिनपूजायां कीदृगस्याः वरं शुभं ॥४५७॥ धन्याऽसौ कृतपुण्याऽसौ सम्यक्त्व वासिता सती । वरोऽनुरूप एतस्या यदि भवेत्सुखं मम ॥४५८॥ एवं विमूढ चित्तत्वात् शल्ययुक्तो नृपोऽशुभः । क्षणमासीत् निषण्णश्च विस्तृते रंग मण्डपे ॥४५९॥ 盟靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈蒙靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈靈 283801 १. श्रुतिहरं = मनोहरं । का ५१ Jain Education inte sow.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only SAI 2010_05

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