Book Title: Dravyasangrah
Author(s): Nemichandramuni
Publisher: Bharatkumar Indarchand Papdiwal

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Page 21
________________ दव्यसंगह। भावार्थ : आत्मा के 9 अधिकार हैं। (1) जीव, (2) उपयोगमय, (3) अमूर्तिक, (4) कर्ता, (5) स्वदेहपरिमाण, (6) भोक्ता, (7) संसारस्थ, (8) सिद्ध और (9) ऊर्ध्वगमन ।। 2 ।। .-.-. उत्थानिका : सो जीवो व्यवहाररूपतया परमार्थरूपतया च द्विविध उव्यरो, इत्याह - गाथा : तिक्काले चदुपाणा इंदियबलमाउ आणपाणो य। विवहारा सो जीवो णिच्छयणयदो दु चेयणा जस्स॥३॥ टीका : विवहारा सो जीवो व्यवहारनयात् सो जीवो भण्यते। स कः? जस्स यस्य विद्यन्ते, के ते? चदु पाणा चत्वारः प्राणाः, किं नामानाः? इंदियबलमाउआणपाणो य इन्द्रियप्राणा: बलप्राणाः आयुप्राण आणपाणप्राणश्च एवं चत्वारो भेदेन। पुनर्दश कथम्? पंच इन्द्रियप्राणादिगाथाप्रथमसूत्रव्याख्यानेन प्रथमोक्तम्। इन्द्रियं पञ्चेन्द्रियसंज्ञिजीवापेक्षया प्रतिपादितं न पुनः सर्वजीवापेक्षया। कस्मिन् काले ते चत्वारः प्राणाः भवन्ति? तिक्काले अतीतानागतवर्तमानकालत्रयेऽपि, एकेन्द्रियापेक्षया विकल्पः, णिच्छयणयदो दु निश्चयनयात्पुनः चेयणा जस्स चैतन्यमेवोदयं यस्य। उत्थानिका : वह जीव व्यवहार और परमार्थ रूप से दो प्रकार का है, ऐसा कहते हैं। गाथार्थ : [ जस्स ] जिस के [ तिक्काले ] तीन काल में [ इंदिय बलमाउ] इन्द्रिय, बल, आयु [य] और [ आणपाणो] श्वासोच्छवास ये [चदु] चार [ पाणा] प्राण हैं | सो] वह [ विवहारा ] व्यवहारनय से [ जीवो] |

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