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धिकारः]
भाषाटीकोपेतः। -
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स्न्न्न्न्न् एतद्यथावलं पीत्वा हिकाश्वासौ जयेन्नरः ॥२३ ॥ पादावशेषे तस्मिस्तु गुडस्यार्धतुलां क्षिपेत् । शोथानिलाशीग्रहणीहत्पार्श्वरुज एव च ।
शीतीभूते च पक्के च मधुनोऽष्टौ पलानि च ॥३२॥ चव्य, वड़ी हर्रका छिल्का, कूठ, छोटी पीपल, कुटकी. अज-| षट् पलानि तुगाक्षीर्याः पिप्पल्याश्च पलद्वयम् । वाइन, पोहकरमूल, ढाकके बीज, चीतकी जड़, कचूर, काला
त्रिसुगन्धिकयुक्तं तत्खादेदग्निवलं प्रति ॥ ३३॥ नमक, भुंइआंवला, सेंधानमक, बेलका गूदा, तालीशपत्र,
श्वासं कासं ज्वरं हिक्कां नाशयेत्तमकं तथा । जीवन्ती, वचा प्रत्येक १ एक तोला, हींग ३ माशेका कल्क घी
प्रतिशतं द्रोणनियमाझंयं द्रोणत्रयं त्विह ॥ ३४ ॥ ६४ तोला और जल चतुर्गुण मिलाकर, पकाना चाहिये । इस घृतक बलानुसार सेवनसे हिका तथा :श्वास,शोथ, वातार्श, प्ररुणी, कुलथी, दशमूल, भारङ्गी प्रत्येक ५ सेर, जल ३ 'द्रोण हृदय तथा पार्श्वशूल नष्ट होता है ॥ २१-२३ ॥
(अर्थात् ३८ सेर ३२ तोला) मिलाकर पकाना, चतुर्थाश
शेष रहनेपर उतार छान गुड २॥ सेर मिलाकर अवलेह बनाना भाीगुडः।
चाहिये । सिद्ध हो जानेपर शहद ३२ ते.ला, वंशलोचन २४ शंतं संगह्य भागस्त दशमल्यास्तथापरम् ॥२४॥
तोला, छोटी पीपल ८ तोला, दालचीनी, तेजपात, इलायची
८ तोला प्रत्येक मिलाकर अग्निबलानुसार खाना चाहिये । यहशतं हरीतकीनां च पर्चत्तोये चतुर्गुणे।
श्वास, कास, ज्वर, हिका तथा निर्बलताको नष्ट करता है। पादावशेषे तस्मिंस्तु रसे वस्त्रपरिष्कृते ॥ २५ ॥
प्रतितुलापर १ द्रोणके सिद्धान्तसे जल ३ द्रोण ही आलोडथ च तुलां पूतां गुडस्य त्वभयां ततः।
पड़ेगा ॥ ३१-३४ ॥ पुनः पचेत्तु मृद्वनी यावल्लेहत्वमागतम् ॥ २६ ॥ सुशीते मधुनश्चात्र षट्पलानि प्रदापयेत् ।
इति हिक्काश्वासाधिकारः समाप्तः। त्रिकटु त्रिसुगन्धं च पलिकानि पृथक् पृथक्॥२७॥ कर्षद्वयं यत्रक्षारं संचूर्ण्य प्रक्षिपेत्ततः ।
अथ स्वरभेदाधिकारः। भक्षयेदभयामेकां लेहस्यार्धपलं लिहेत् ॥ २८ ।। श्वासं सुदारुणं हन्ति कासं पञ्चविधं तथा। स्वरवर्णप्रदो ह्येष जठरामेश्व दीपनः ॥२९॥
स्वरभेदे चिकित्साक्रमः। पलोल्लेखागते माने न द्वैगुण्यामिहेष्यते ।
वाते सलवणं तैलं पित्ते सर्पिः समाक्षिकम् । हरितकीशतस्यात्र प्रस्थत्वादाढकं जलम् ॥ ३० ॥ कफे सक्षारकटुकं क्षौद्र कवल इष्यते ॥ १ ॥ भारङ्गी ५ सेर, दशमूल मिलित ५ सेर, हर १०० सबसे गले तालुनि जिह्वायां दन्तमूलेषु चाश्रितः । चतुर्गुण जल मिलाकर पकाना चाहिये। चतुर्थांश शेष रहने- सेन निष्कृष्यते श्लेष्मा स्वरश्वास्य प्रसीदति ॥ २॥ पर उतार छान, हरें निकाल काथमें मिला उसीमें ५ सेर गुडा आधे कोष्णं जलं पेयं जग्ध्वा घृतगुडीदनम् । मिलाकर पकाना चाहिये । लेह सिद्ध हो जानेपर ठण्डाकर
क्षीरानपानं पित्तोत्थे पिबेत्सपिरतन्द्रितः ॥ ३॥ शहद २४ तोला, त्रिकटु, त्रिसुगन्ध (दालचीनी, तेजपात,
पिप्पली पिप्पलीमूलं मारेचं विश्वभेषजम् । इलायची) प्रत्येक पृथक् पृथक् ४ तोले तथा यवाखार २ तोले मिलाना चाहिये । फिर इससे १ हरै खाकर ऊपरसे २ तोला
पिबेन्मूत्रेण मतिमान्कफजे स्वरसंक्षये ॥ ४॥ चटनी चाटनी चाहिये । यह कास तथा श्वासको नष्ट करता, स्वरोपघाते मेदोजे कफवद्विधिरिष्यते । अग्नि दीप्त करता तथा स्वर व वर्णको उत्तम बनाता है। यहां क्षयजे सर्वजे चापि प्रत्याख्याय समाचरेत् ॥ ५॥ पलसे परिमाण लिखा है, अतः चतुर्गुणको ही छोडना चाहिये, चतुर्गुणको द्विगुण कर अष्टगुण नहीं डालना चाहिये । हरीतकी
वातजन्य स्वरभेदमें लवणके सहित तैल, पित्तजन्य स्वरभे१०० होनेसे १ प्रस्थ होगी, उनका भी चतुर्गुण एक आढ़क |
दमें शहदके सहित घी और ककजन्यमें क्षार और कटपदाही जल छोढ़ना चाहिये ॥ २४-३०॥
थोंके साथ शहदका कवल धारण करना चाहिये । इससे गला,
तालु, जिला तथा दन्तमूलामें जमा हुआ कफ निकलता है कुलत्थगुडः।
और स्वर उत्तम होता है । इसी प्रकार वातजन्यमें घी, गुड
मिलाकर भात खाना चाहिये, ऊपरसे गरम जल पाना चाहिये। कुलत्य दशमूलं च तथैव द्विजयष्टिका। पित्तजन्यमें दूधके साथ भोजन तथा दूध और घी पीना चाहिये। शतं शतं च संगम जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ३१॥ | कफजन्यमें छोटी पीपल, पिपरामूल, काली मिर्च, सोंठका पूर्ण