Book Title: Paia Sadda Mahannavo
Author(s): Hargovinddas T Seth
Publisher: Motilal Banarasidas

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Page 924
________________ ८५४ संवेहि ६४६) । [संवेष्टित] लपेटा हुआ (मा संवेद [संबंध] संयोगः 'मन्नन्नवरणसंये हरमरि (महा), 'अनन्नवन्नतये हमणहरं मोहणं पसूपि तग्गीयं सोऊणं (धर्मवि ६५) । संसक [स] खिसकना, गिरना । संसद (हे ४, ११७ प ) संस सक [शंस ] १ कहना । २ प्रशंसा करना । संसइ (चेइय ७३७; भवि), संसंति (सिर १०७) कु. संसणिज्य (पम ११८, ११४) । । साहवो सज्जहि संसरिंग । जम्हा विद्योगविर हिययस्स, न श्रोसवं प्रन्नं' (सुर २,२१६ ) 1 संसज्ज क [ सं + स ] संबन्ध करना, संसगं करना । संसज्जंति (सम्मत २२० ) । संसज्जिम वि [ संसक्तिमत् ] बीच में गिरे हुए जीवों से युक्त (पिड ५३८ ) 1संसद्ध [संसृष्ट] १ बरतविलिप्त २ न खररिटत हाथ से दी जाती भिक्षा मादि (प्री) देखो संसि संसण न [शंसन] १ कथन । २ प्रशंसा । ३ श्रास्वादन सुत्तविहीणं पुरण सुयमपक्क संवेहिअ - संसीव टी ( प ६४० उ संसार वि [संसारिन] नरक धादि संसारिण} योनि से परिभ्रमण करने वाला Jain Education International पाइअसणवी संस वि[सांश ] -युक्त, सावयव (धर्मसं ७०६) 1 संसद् वि [संशयिन] संशय-कर्ता शंकाशील (मिते १२५७ र १३, ७० युवा १४७) । ---- संसइअ [संशति] संशयाला संदिग्ध ( पात्र विसे १५५७; सम १०६; सुर १२, १०८ ) । संसय पुं [संशय ] संदेह, शंका (हे १, ३०६ भगः कुमाः श्रभि ११०६ महा; भवि ) । १, ४७) । संसइअ न [सांसविक] मिम्याहल-विशेष संसया श्री [ संवत् ] परिषत् सभा (उत्त (पंच ४, २३ श्रा ६ संबोध ५२ कम्म ४, ५१) संसग [संसर्ग] संबन्ध संग, सोहयत (पा २५ प्रासू १) श्री. ग्गी ( खाया १, १ टी - पत्र १७१: प्रासू ३३; सुपा १७१ ), एनिय फल संसणसर १६) 1 संसणिज देखी संस शंस् संसत्त वि[संसक] १ संयुक्त संवद्ध (खाया १५-पत्र १११० मोफ से उत्त २, १९ ) । २] श्वापद-जन्तुविशेष (कप्प) । संसन्ति त्री [संसक्ति ] संसर्ग ( सम्मत्त १५६) संसद्द [ संशब्द ] शब्द, श्रावाज (सुर २, ?10) Iv संसप्पग वि [संसर्पक] १ चलने-फिरनेवाला । २ पुं. चींटी आदि प्राणी ( श्राचा 2, 5, 5, 8) 1~ संसपिअन [ दे. संसर्पित ] कूद कर चलना (दे ८, १५) । ~ संसमण न [संशमन] उपशम शान्ति (पिड ४५६) 3 संसर तक [ सं + सृ] परिभ्रमण करना । संसरंग, संसरमाण (अनि १ संबोध ११ च ६७) Iv संसरण न [संस्मरण] स्मृति, याद (श्रु ७) । संसवण[सं] धरा. सुमना (सुर १२४२ रंभा ) 1 संसद् सक [ सं+सह ] सहन करना । etage (wild (43) संसा श्री [[शंसा] प्रशंसा, लापा ( प टी भग) । संसा व [] १ श्ररूढ । २ चूति । ३ पीत । ४ उद्विग्न (षड् ) 1संसार पुं [संसार ] १ नरक श्रादि गति में परिभ्रमण, एक जन्म से जन्मान्तर में गमन (प्राचाः ठा ४, १ - पत्र १६८ ४,२पत्र २१६ दसनि ४, ४६ उत्त २६, १; उनी ४४२ जगत् विश्व (उक कुमा गडप १०२ १४१) बंद वि [ यत् ] संसारवाला संसारस्थित जीव प्राणी (पउम २,६२ ) । W For Personal & Private Use Only ७३ जीव (जी २), 'संसारिणस्स जं पूरा जीवस्व सुहं तु करिसमादी (पाम १०२, १०४) संसारिय वि [संसारिक]] ऊपर देखो ( ४०२; उव) संसारिय वि[संसारिक ] संसार से संवन्ध रखनेवाला (पउम १०६. ४३ उप १४२ टी; स १७६६ सिक्खा ७१; सरण; काल) 1 संसारिय वि [संसारित] एक स्थान से दूसरे स्थान में स्थापित संचारिया बलयवाहामु (गाया १, ८ - पत्र १३३) । संसाण स्त्रीन [दे] अनुगमन (दे ८, १६; दसनि १० श्री. "णा (वय १) | संसाण न [ संकथन ] कथन (सुपा ४१५) । - संसार[संसाधित] सिद्ध किया हुआ (सुपा ३९७) । संसिअ वि [संखित्र] संसि वि [शंसिन] कहनेवाला (गड) संसिअ वि [शंसित] १ श्लाघित (सुर १३, ६८) । २ कथित ( उप पृ १६१) प्रात (वा १, श्राश्रित (विपा ३ – पत्र ३८ परह १, ४ – पत्र ७२ भौप ४८१५१) । संसिंच] [ [ [ सिच्] पूरा भरना । २ बढ़ाना। ३ सिंचन करना । कवकृ. संसिश्चमाण (धाचा पि ५४२ ) । संकृ. संसिंचियाणं (घाचा १, २, ३, ४ संसि क [ सं + सिध् ] अच्छी तरह सिद्ध होना संक्षित(७६७) । संसि देखो संसड (भाग) कप्पिस वि ["कल्पिक] खरष्टित हाथ अथवा भाजन से दी जाती भिक्षा को ही ग्रहण करने के नियमवाला मुनि ( परह २, १ - - पत्र १०० ) । संसित [संसित] सींचा हुधा (सुर ४, १४; महा; हे ४, ३६५) । संसिद्धिअवि [सांसिद्धिक] स्वभाव - सिद्ध (हे १,७० ) 1 संसिस देखो संसेस (राज) संसिलेसिया देखो संसीव तक [ सं करना । संसी विज्जा संसेसिय (राज) 1 सिव् ] सोना, खिलाई (घाचा २, ५, १, १ ) । www.jainelibrary.org

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