Book Title: Nandanvan Kalpataru 2006 00 SrNo 16
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 21
________________ दुःषमकालेऽस्मिन् भरते किल, न हि मुक्तेः संहननं रे; चमकोपल इव लोहं भक्तिः , कुरुते मुक्त्यानयनं रे..... ॥३॥ शुद्धसुवासनचूर्णं दत्तं, मिथ्यापविहननं रे; आनन्दमयभजनं तव सृजते, मानसमलापनयनं रे..... ॥४॥ प्राप्तेऽक्षयनिधिसम्यक्त्वे तव, देहे चलधनभरणं रे; शान्तसुधारसझरणैर्नयनैः, सिञ्चय सेवककरणं रे..... ॥५॥ बाह्याभ्यन्तरशत्रूणां किल, नाथ ! नाऽथ भयभवनं रे; दासः सुखितो यशोविलासी, तत्तव महिमोल्लसनं रे..... ॥६॥ नाममत्रमिव साधितमिह तव, सम्मोहयते भुवनं रे; तव मुखमुद्रां दृष्ट्वा प्रमुदे, चातक इव नवसुघनं रे..... ॥७॥ आदृत्याऽपरदेवं स्वामिन् !, नेहेऽथो भवभ्रमणं रे; ज्ञानविमल ! तारय भवजलधिं, कृत्वा मम करग्रहणं रे..... ॥८॥ ___ (३) स्तुति विमलाचलमंडन, ऋषभजिणंद दयाळ, मरुदेवानंदन, वंदन करुं त्रण काळ; ए तीरथ जाणी, पूर्व नब्वाणु वार; आदीश्वर आव्या, जाणी लाभ अपार ॥१॥ स्तुतिः विमलाचलमण्डन ! ऋषभजिनेन्द्र ! दयालं, मरुदेवानन्दन !, वन्दे त्वां त्रयकालम्; इह तीर्थ पूर्वस्यैकोनशतवारं, आगतवानृषभो, ज्ञात्वा लाभमपारम् ॥१॥ Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org

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