Book Title: Nandanvan Kalpataru 2006 00 SrNo 16
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 52
________________ E गुरुवे नमः ।। वासुदेव वि. पाठकः 'वागर्थ' करुणाकरं शान्तिप्रदं पापादिहं जन-शं-करम् । सद्बुद्धिदं श्रेयस्कर मस्मद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥१॥ अस्मद्गुरुं त्रिजगद्गुरुं विज्ञानदं संज्ञानदम् । भक्त्या यदेवाउपेक्षितं तत् सर्वदं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥२॥ प्रणवात्मकं परमात्मकं ब्रह्मेन्द्रविष्णुशिवात्मकम् । प्रणतोऽस्म्यहं विश्वात्मकं परमं शरण्यं सद्गुरुम् ॥३॥ गुरोस्सत्प्रसादात् शिवा सन्मतिस्स्यात् । शिवे सद्गतिस्स्यात् सदोर्ध्वं गतिस्स्यात् । कृते सद्भावसम्माने आशीर्वादैरुपकूताः । सह-प्रसादलब्ध्यर्थं प्रीत्या वः प्रार्थयामहे ॥५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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