Book Title: Dwatrinshada Dwatrinshika Prakran Part 4
Author(s): Yashovijay Upadhyay, Yashovijay of Jayaghoshsuri
Publisher: Andheri Jain Sangh

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Page 24
________________ 23 . ......... १०२८ १०३४ १०४ १०३५ .... .१०३७ द्वात्रिंशिका • विषयमाहाशी. तथाभव्यत्ववैचित्र्यसमर्थनम् . .................१०२७ | वर्तमानभवीयवेदप्रामाण्यग्रहप्रवेशनिराकरणम् .....१०५२ नयमतभेदेन तीर्थकरत्वादिभेदोहनम् ........... १०२८ | क्षेत्रज्ञवृत्तिवैशिष्ट्यघटितशिष्टलक्षणविचारः ....... १०५३ तीर्थकर-गणधरपदसाधनोद्योतनम् ...................१०२९ ઉત્કર્ષ-અપકર્ષ જાતિવિશેષરૂપ નથી - તીર્થંકર-ગણધર-સામાન્ય કેવલી થનારની उत्त२५क्ष. ....... ........ १०५3 मोगा .. क्षेत्रज्ञव्युत्पत्तिप्रदर्शनम् ................................ १०५४ नानाविधा संवेगव्याख्या ...........................१०३० उत्कर्षापकर्षयोरनवस्थितता ........................१०५५ संसारनिर्वेदविभावना ............................... | उत्कर्षापकर्षयोर्जातित्वाऽसम्भवः ............... १०५६ शिष्टलक्षणमीमांसा .. .......१०३२। तत्तदभावकूटघटितलक्षणस्य दुर्जेयता ........ १०५७ સમ્યગ્દષ્ટિમાં શિષ્ટવલક્ષણ હાજર ......... १०३२ ઉત્કર્ષ-અપકર્ષ પરિવર્તનશીલ ............... १०५७ उपचारनियामकोपदर्शनम् ............................१० ३३ एकजन्मावच्छिन्नवेदप्रामाण्यग्रहप्रवेशविमर्शः ......१०५८ कर्मणो मूर्तत्वादिसाधनम् ....... तत्तत् संबंधाभावडूटप्रवेश भीमांसा........ १०५८ अंशत: घोषक्षय सुशेय... વેદઅપ્રામાણ્યગ્રહāસઅનાધારતાઘટિત નૂતન कर्मण उपघातकत्वविचारः.... शिष्टसक्ष....... .......... १०५८ शिष्टत्वाक्ष! भीमांसा .... .........१०३५ | वेदाप्रामाण्यग्रहध्वंसानाधारकालशिष्टलक्षणेऽतिव्याप्त्यव्याप्ती .................. १०३६ घटितलक्षणविचार .............................१०५९ वेदवादिपरिष्कारः स्वापादिदशायामतिव्याप्तिनिराकरणप्रयासः .......१०६० वेदाऽप्रामाण्याभ्युपगमद्वैविध्यम् .......... १०३८ कृत्स्नवेदप्रामाण्याभ्युपगमाऽसम्भवः .............. १०६१ वेदत्वाऽज्ञानेऽव्याप्त्यापादनम् . आंशिकवेदप्रामाण्यग्रहनिवेशेऽतिव्याप्तिः .......... १०६२ वेदत्वेनाऽप्रामाण्यानभ्युपगविवक्षा . ................१०४० मिथोविरुद्धश्रुतिसमाधानम् ................... १०६३ भवानीपतिशिष्टतामीमांसा .................... १०४१ दुर्जेयश्रुतिपरामर्शः ...................................... १०६४ ईश्वरभ अशिष्टत्वनी समस्या.... ૧૦૪૧ यावन्तः परसमयाः तावन्तो नयाः ..............१०६५ काकेश्वरयोरतिव्याप्त्यव्याप्ती. वेभ ५५सापेक्ष प्रामाण्य भान्य ......... १०६५ ..........१०४२ विग्रहगतावतिव्याप्त्यापादनम् .......................१०४३ मिथ्यादृष्टिगृहीतं श्रुतं मिथ्या ....................१०६६ पानात्मनो हीपूर्व५६ .................... १०४३ સમકિતીએ સ્વીકારેલ મિથ્યાશ્રુત सभ्य बने .......... .........१०६६ देहान्तराग्रहणदशायामतिव्याप्तिनिराकरणम् ...... १०४४ | सम्यग्दृष्टिगृहीतं श्रुतं सम्यक् ....... सामानाधिकरण्यगर्भ शिष्टलक्षणम् .............. १०४५ वेदानां पूर्वमार्यत्वं पश्चादनार्यत्वम् ............... १०६८ शिष्टस्य परत्रापि दोषविरहे शिष्टत्वम् .......१०४६ प्रभावना भने २१३५ छे .............. १०६८ पद्मनाभलक्षणपरिष्कारः. .१०४७ | प्रमाणत्वं नानारूपम् ....१०६९ पद्मनाभलक्षणेऽव्याप्तिः. .... १०४८ | युति6५७व्यता तुल्य छ ...... .. १०६८ પદ્મનાભમત નિરાકરણ. ... १०४८ सर्वस्य जिनवचनस्य युक्तिग्राह्यता .............. १०७० यत्किञ्चिद्वेदप्रामाण्याभ्युपगमविमर्शः .......... १०४९ सर्वधर्माणां जैनधर्माश्रितत्वम् ......................१०७१ विप्रजन्मनोरन्तरालेऽतिव्याप्तिः ....................१०५० | ५२४14 संगत मर्थनो स्वी॥२ स्वापदशायामतिव्याप्तिः .................. निस्थान नथी......... Jain Education International www.jainelibrary.org .... १०७१ For Private & Personal Use Only

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