Book Title: Dwatrinshada Dwatrinshika Prakran Part 4
Author(s): Yashovijay Upadhyay, Yashovijay of Jayaghoshsuri
Publisher: Andheri Jain Sangh

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Page 23
________________ 22 ९८४ ९८६ .९८७ ९८८ વિષયમાર્ગદર્શિકા • द्वात्रिंशिका २५ १२ना अनुहान..................... ८८१ | सम्यग्दृष्टिलिङ्गवर्णनम् ... ...........१००६ विषय-स्वरूपाऽनुबन्धशुद्धानुष्ठाननिरूपणम् .......... ९८२ | नानाविधसम्यक्त्वलक्षणानि .........१००७ विषयशुद्ध अनुठान ........................ ८८२ | तत्पशुश्रूषानी मोगा ............ .......१००७ मिथ्यादृशां स्वख्मशुद्धकर्मव्याख्यानम् ......... ९८३ | शुश्रूषां विना सम्यक्त्वशुद्धययोगः ...........१००८ स्व३५शुद्ध मनुहान ..... ८८3 | शुश्रूषाद्वैविध्योपवर्णनम् .. ........................१००९ अनुयशुद्ध अनुहान.... ૯૮૩ | सम्यग्दर्शनोत्तरं सम्यग्ज्ञानाधिकारिता ..........१०१० अज्ञानबाहुल्ये दोषोच्छेदाऽसम्भवः .............. ध नी मोm ...................... १०१० मोक्षाशयाद् योगिकुलजन्मोपलब्धिः ............ ९८५ सम्बोध्युपलब्धावपि भोगप्रवृत्तिः ................. १०११ गुरुलाघवचिन्तनेन मूलतो दोषोच्छेदः .......... | संयम२॥२॥ जवान छत ५९..... ........ १०११ सानुप-निरनु पनि .............. ८८६ | भोगप्रवृत्तावपि संस्कारतः चारित्रकामना ..... १०१२ दोषोच्छेदद्वैविध्यप्रतिपादनम् ......................... | शक्त्यनतिक्रमणाऽनिगूहनाभ्यां गुर्वादिभक्तिः .... १०१३ अनुबन्धशुद्धकर्मफलविभावनम् ................... | शस्ति गोपच्या विन गुरु-४१ पूale ..... १०१3 सम्पूर्णासिद्धिसाधनसमीक्षणम् .९८९ सम्यक्त्वव्यावर्णनम् ...... ................१०१४ त्रिवि५ प्रत्यय प्रतिपाइन.. ............ ૯૮૯ नैश्चयिक यथाप्रवृत्तकरणपूर्वमपि पारमार्थिकसिद्धिस्वरूपस्फोरणम् ................. ९९० - प्रतिसमयमनन्तगुणशुद्धिः ......१०१५ निरनुबन्धसिद्ध: पतनरूपता ..................... ९९१ | त्रिवि५ ४२९॥नी सम४. .............. १०१५ बलात्कारेण कार्यसाधने वैफल्यम् .............. ९९२ | करणत्रयविभावनम् ....................................१०१६ जात्यमयूरोदाहरणव्याख्यानम् ........................... ९९३ | ग्रन्थिभेदोपायप्रज्ञापना ................ १०१७ धर्माधिकारिणो गर्भावस्थामहिमा.................. ९९४ | सम्यक्त्वप्राप्तौ वर्धमानशुभलेश्या पूर्वाऽऽनन्दौ ...१०१८ उत्तमयमयोग भतानी Gथतप्रवृत्ति ......... ८८४ | समातिना ५९ परिणाम प्रशस्त ....... १०१८ महापुरुषगुणानां स्वयमेव प्रादुर्भावः ........... ९९५ / 'बंधेणं न वोलइ कयाई' वचनविमर्शः ....... १०१९ योगधर्माधिकारिद्योतनम् ................................ ९९६ | सम्यक्त्वात्पतितस्याऽन्तर्मुहूर्त्तकाले मरणाभावः .१०२० प्रारमयी श्रेठ योगानी प्रति विaau ..... &CE | सम्यग्दृष्टेः बोधिसत्त्वरूपता .......................१०२१ अपुनर्जन्मने जायमान एव तात्त्विकबोधः ...... ९९७ | समातीमा भोपिसवलक्षणानुं समर्थन ....... १०२१ अपुनर्बन्धकस्याऽन्यगुणगणग्रथनम् ................ ९९८ | સમકિતીની સાંસારિક પ્રવૃત્તિ नानातन्त्रस्थाऽपुनर्बन्धकोत्थानप्रक्रिया ............. ९९९ ___desपन्यासतुल्य .................... १०२१ जात्या कस्याऽप्यनुष्ठाननैयत्याऽयोगः ............१००० | बोधिसत्त्वस्य कायपातेऽपि चित्तपाताभावः ......१०२२ लघुनोऽपि शुद्धस्य महत्ता ......................१००१ | बोधिसत्त्वस्य पञ्च लक्षणानि ...................१०२३ यादो पाराय शझे ................. १००२ | बोधिसत्त्वस्य विंशतिः गुणाः ....................१०२४ गति अवरोध ........................ १००३ | | बोधिसत्त्वव्युत्पत्तिस्फोरणम् .....१०२५ १५. सम्यग्दृष्टिद्वात्रिंशिका पोषिसत्वशन अर्थ .................१०२५ ग्रन्थिव्याख्यानम् .............१००५ | भव्यत्व-तथाभव्यत्वव्याख्यावैविध्यम् ....... १०२६ मष्यत्व सभ्य दृष्टिना ! लिंग ................... १००५ | तथामव्यत्व विया२९॥ ..................... १०२६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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