Book Title: Anuvad Kala
Author(s): Charudev Shastri
Publisher: Motilal Banarsidass Pvt Ltd

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Page 199
________________ (148 ) में तो वह पारंगत है / २-ऐसे शब्दों से मेरे पुत्र के उत्साह पर पानी फिर जाता है / ३–फिर कभी ऐसा मत करना / सारा प्रादर मान मिट्टी में मिल जायगा / ४-यदि राजा अपनी प्रजा पर भली प्रकार शासन करे तो प्रजा का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध हो जायगा और उसका राज्य देर तक रहेगा। 5-+ जंगल के जानवरों ने सिंह के साथ यह समझौता किया कि हम आपको प्रतिदिन एक जानवर भेज देंगे। ६-तुम इधर-उधर की क्यों हांकते हो ? प्रस्तुत विषय पर प्रायो / ७-चोर चोरी करता पकड़ा गया और पुलिस के हवाले कर दिया गया। ८-भगवान् च्यवन को मेरा प्रणाम कहना / -यह मेरे लिये कठिन काम है, फिर भी मैं इसे करने का यत्न करूंगा। १०-वह धीरे-धीरे चलता है, और लड़खड़ाता है, इसी लिये पीछे रह जाता है / ११-ब्रह्मचारियों को चटकीले भड़कीले वस्त्र नहीं पहनने चाहिये और उन्हें शरीर की सजावट में समय नहीं खोना चाहिये / १२–आश्चर्य है इसका अपनों में इतना प्रेम है, और वह भी अकारण। संकेत-२-ईदृशीभिरुक्तिभिर्भज्यते मत्-सुतस्योत्साहः / ३-मा तथा तथाः (मैवं स्म करोः)। यहां 'तथाः' तन् धातु का एक पक्ष में लुङ् लकार मध्यम पुरुष एकवचन है / अडागम सहित रूप 'अतथाः' है। 'मा' के योग में 'अ वा प्रा' का लोप हो जाता है / ५-वन्यैः पशुभिः सिंहेन समं समयः कृतःएकैकं पशुं प्रत्यहमुपढौकयिष्याम इति। ६-किमित्यप्रस्तुतमालपसि ? प्रस्तुतमनुसन्धीयताम् / ६-एष कार्यभारो मम (इदं मयाऽतिदुष्करम्), तथाप्येनं प्रयतिष्ये घटयितुम् (सम्पादयितुम्) / ११-ब्रह्मचारिभिरुल्बण प्राकल्पो न कल्पनीयः, न च परिकर्मणि कालः क्षेपणीयः। १२-अहो अस्य प्रणयप्राग्भारः सगन्धेषु ! सोऽप्यगृह्यमाणकारणः / अभ्यास-५ १-अपने बड़ों के उपदेश की अवहेलना न करो और उन पर क्रोध मत करो। २-अपने पड़ोसी से अच्छा व्यवहार करो, और उसके सुख दुःख 1. समय-पुं० / 2. उपढौकयिष्यामः / उप--ढोक भ्वा० 0 / ३-कर्मगृहीतः / 4. स्खलति /

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