Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 01
Author(s): Bechardas Doshi
Publisher: Dadar Aradhana Bhavan Jain Poshadhshala Trust

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Page 220
________________ २०० श्रीरायचन्द्र-जिनागमसंग्रहे शतक १. उद्देशक ९. दोहीकरेंति, एवं हस्सीकरेंति, एवं अणुपरियति, एवं वीतिवयंति. करे छे अने संसारने ओळंगी जाय छे–चार-हळवाप', संसारने पसत्था चतारि. अप्पसत्था चत्तारि. घटाडवो, संसारने टुको करवो अने संसारने ओळंगवो-प्रशस्त छे अने चार-भारेपणु, संसारने वधारवो, संसारने लांबो करवो अने संसारमा भमबुं-अप्रशस्त छे. २८३. प्र०-सत्तमे णं भंते । उवासंतरे किं गरुए, किं लहुए, २८३. प्र०—हे भगवन् ! शुं सातमो अवकाशांतर भारे छ, गरुयलहुए, अगरुयलहुए ? हळवो छ, भारेहळवो छे के अगुरुलघु-भारेहळवा सिवायनो छ ? २८३. उ०-गोयमा ! णो गरुए, णो लहुए, णो गुरुलहुए, २८३. उ०—हे गौतम ! ते भारे नथी, हळवो नथी, भारेअगुरुलहुए. हळवो नथी पण अगुरुलघु-भारेहळवा सिवायनो छे. २८४. प्र०-सत्तमे णं भंते ! तणुवाए किं गरुए, लहुए, २८४. प्र.- हे भगवन् ! शुं सातमो तनुवात भारे छे, गुरुयलहुए, अगुरुयलहुए ? हळवो छ, भारेहळवो छे के अगुरुलघु छे ? २८४. उ०-गोयमा ! णो गरुए, णो लहुए, गुरुयलहुए, २८४. उ०—हे गौतम! ते भारे नथी, हळवो नथी, भारेणो अगुरुयलहुये. एवं सत्तमे घणवाए, सत्तमे घणोदही, सत्तमा हळवो छ पण अगुरुलघु नथी. ए प्रमाणे सातमो धनवात, सातमो पुढवी, उवासंतराइं सव्वाइं. जहा सत्तमे उवासंतरे, जहा तणुवाए, घनोदधि, सातमी पृथिवी अने बधां अवकाशांतरो जाणवां. एवं गरुयलहुए, घणवाय, घणउदहि, पुढवी, दीवा य, सायरा, अवकाशांतर विषे जेम कहुं छे, तनुवात विषे जेम कह्यु छ ए प्रमाणे . वासा. घनोदधि, पृथिवी, द्वीप, समुद्रो अने क्षेत्रो विषे पण जाणवू. २८५.प्र०-णेरइया णं भंते। किं गरुया जाव-अगुरुय- २८५. प्र०-हे भगवन् ! शुं नैरयिको भारे छे, यावत्-अलहुया ? गुरुलघु छे ? २८५. उ०-गोयमा ! णो गरुया, णो लहुया, गरुयलहुया २८५. उ०-हे गौतम ! तेओ गुरु-भारे-नथी, हळवा नथी, वि, अगुरुयलहुया वि. भारेहळवा छे अने अगुरुलघु-भारेहळवा सिवायना-पण छे. २८६. प्र०—से केणटेणं ! २८६. प्र.---हे भगवन् ! तेनुं शुं कारण ? २८६. उ०-गोयमा! विउब्विय-तेयाई पडुच्च णो २८६. उ०-हे गौतम ! नैरयिको वैक्रिय अने तैजस शरीगरुया, णो लहुया, गरुयलहुया, णो अगरुयलहुया. जीवं च, रनी अपेक्षाए गुरु-भारे-नथी, लघु-हळवा-नथी अने अगुरुलघुकम्मं च पडुच्च णो गुरुया, णो लहुया, णो गुरुलहुआ, अगरुय- भारेहळवा सिवायना-नथी. पण भारेहळवा-गुरुलघु छे. अने लहुया. से तेणटेणं, एवं जाव-वेमाणिया. णवर-णाणत्तं जाणियव्वं जीव तथा कर्मनी अपेक्षाए भारे नथी, हळवा नथी, भारेहळवा सरीरेहिं. धम्मत्थिकाए, जाव-जीवस्थिकाए चउत्थपएणं. नथी, पण भारेहळवा सिवायना छे. हे गौतम! ते कारणथी पूर्व प्रमाणे का छे. अने ए प्रमाणे यावत्-वैमानिको सुधी जाणवू. विशेष ए के, शरीरोनो भेद जाणवो. तथा धर्मास्तिकाय. अने यावत्-जीवास्तिकाय चोथा पदवडे जाणवा अर्थात् ए बधा अगुरुलघु जाणवा. २८७. प्र०-पोग्गलत्थिकाए णं भंते । किं गरुए, लहए, २८७. प्र०-हे भगवन् ! शुं पुद्गलास्तिकाय गुरु छे, लघु गरुयलहुए, अगुरुयलहुए ? छे, गुरुलघु छे के अगुरुलघु छे ? - २८७.'उ०-गोयमा ! णो गरुए, णो लहुए, गरुयलहुए वि, २८७. उ०-हे गौतम! पुद्गलास्तिकाय गुरु नथी, लघु अगुरुयलहुए वि. नथी पण गुरुलघु छे. अने अगुरुलघु पण छे. २८८. प्र०-से केणटेणं ? २८८.प्र०—हे भगवन्! तेनु शुं कारण ? १. मूलच्छायाः-दीर्थीकुर्वन्ति, एवं हस्वीकुर्वन्ति, एवम् अनुपरिवर्तन्ते, एवं व्यतिव्रजन्ति. प्रशस्तानि चत्वारि. अप्रशस्तानि चत्वारि. सप्तम भगवन् । अवकाशान्तरं किं गुरुकम् , किं लघुकम् , गुरुकलघुकम्, .अगुरुकलघुकम् ? गौतम! नो गुरुकम्, नो लघुकम्, नो गुरुलघुकम्, अगुरुलघुकम्. सप्तमो भगवन् ! तनुवातः किं गुरुकः, लघुकः, गुरुकलघुकः, अगुरुकलघुकः ? गौतम! नो गुरुकः, नो लघुकः, गुरुलघुकः, नो अगुरुलघुकः, एवं सप्तमो धनवातः, सप्तमो घनोदधिः, सप्तमी पृथिवी, अवकाशान्तराणि सर्वाणि, यथा सप्तमम् अवकाशान्तरम् , यथा तनुवातः, एवं गुरुलघुको धनवातः, धनोदधिः, पृथिवी, द्वीपाथ, सागराः, वर्षाणि, नैरयिका भगवन्! कि गुरुकाः यावत्-अगुरुलघुकाः! गौतम! नो गुरुकाः, नो लघुकाः, गुरुकलघुका अपि, अगुरुकलघुका अपि. तत् केनार्थेन ? गौतम ! वैक्रिय-तैजसानि प्रतीत्य नो गुरुकाः, नो लघुकाः, गुरुकलघुकाः, नो अगुरुकलधुकः, जीवं च, कार्मणं च प्रतीत्य नो गुरुकाः नो लघुकाः नो गुरुकलघुकाः, अगुरुकलघुकाः, तत् तेनार्थेन, एवं यावत्-वैमानिकाः, नवरम्-नानात्वं ज्ञातव्यं शरीरैः. धर्मास्तिका यो यावत्-जीवास्तिकायः चतुर्धपदेन. पदलास्तिकायो भगवन् ! कि गुरुकः, लघुकः, गुरुकलघुकः, अगुरुकलघुकः ? गौतम ! नो गुरुकः, नो लघुकः, गुरुकलघुकोऽपि, अगुरुकलघुकोऽपि. तत् फेनार्थन:-अनु. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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