Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 01
Author(s): Bechardas Doshi
Publisher: Dadar Aradhana Bhavan Jain Poshadhshala Trust

View full book text
Previous | Next

Page 324
________________ ३०४ श्रीरायचन्द्र - जिनागमसंग्रहे शतक २० - उद्देशक ९. पबुच्चइ” - मनुष्यलोक उच्यते इत्यर्थः तथा 'अरिहन्ते' त्ति - "जावं च णं अरहंता, चकवट्टी जाव - सावियाओ मणुया पगईभद्दया विणीया तार्षं च णं अस्सि लोए त्ति पवुच्चइ" 'समय' त्ति - "जीवं च णं समयाइ वा, आवलियाइ वा जाव - अस्सि लोए ति पवुच्चइ. एवं च जावं बापरे विन्दुवारे, धावरे वणियसदे, जावं च महने उराला पाहया संसेति" 'अगणि' सिवाच णं मायरे तेउवाए जावं चणं आगराइ वा निहीइ वा, नईइ वा, ” 'उवराग' त्ति - "चंदोवेरागाइ वा सूरोवरागाइ वा तावं च णं अस्सि लोए त्ति पयुचइ उपरागो ग्रहणम्, 'निग्गमे बुडिवयणं च ' ति - यावच्च निर्गमादीनां वचनं प्रज्ञापनं तावन् मनुष्यलोक इति प्रकृतम् तत्र "जोवं चणं चंदमसूरियागं वाप-तारारूवाणं अगमणं, निग्गमणं, बुद्धि, निवुट्टी आपनि तावं च णं अस्सि टोए चि पनुचइति, अतिगमनमिहोत्तरायणम्, निर्गमनं दक्षिणायनम्, वृद्धिर्दिनस्य वर्धनम्, निवृद्धिस्तस्यैव हानिरिति " भगवत्सुधर्मस्वामिप्रणीये श्रीभगवतीचे द्वितीयद्यते नरम उद्देश श्री अभयदेवसूरिविरचितं विवरण समाप्तम्. ४. आगळना आठमा उदेशकमा समरपंचानामना क्षेत्र संबंधी हकीकत कही छे, तो हवे क्षेत्रनो अधिकार चालतो होवाथी भयमा उद्देशकमां समयक्षेत्र संबंधी इकीकत कहेबानी छे अने ए प्रमाणेना संबंधया आ नवमा उदेशकनुं आदि सूत्र आ छे' किमिदं इत्यादि. तेमां समय एटले काळ ते काळची उपक्षित ने क्षेत्र ते 'समयक्षेत्र' कहेवाय. सूर्यनी गतिथी ओळखतो दिवस अने मासादिरूप काळ मनुष्यक्षेत्रमां ज छे, पण आगळ गयी, कारण के आगळ रहेनारा सूर्यो गतिवाला नथी. एवं जीवाभिगमवरूपया नेयव्य' चि] ए प्रमाणे जीयानिगमनी वक्तव्यता देवी अने ते आ प्रमाणे छे० "एक हजार योजननो आवाम अने विष्कंम छे" इत्यादि. ['जोइसवि' ति ] ज्यां जीवाभिगम सूत्रमां जंबूद्वीप बगेरे मनुष्य क्षेत्रो संबंधी वक्तव्यता कही छे, त्यां ज्योतिषिको विषे पण हकीकत कही छे तो ते ( त्यां कहेली ) ज्योतिषिको विधेनी हकीकत अन कबी. बीजी वाचनामां तो ['जोइसअट्ठविहूणं' ति ] ए प्रकारनो घणो पाठ छे तेमां “हे भगवन् ! जंबूद्वीप नामना द्वीपमा केटला चंद्रो प्रभासे छे? केटा सूर्यो तपे छे। अने केलां नक्षत्रो झगमगे छे"? इत्यादि एक एक ज्योतिषिक संबंधी सुपो तथा "हे भगवन् ! ते कद्देवानुं शुं कारण के, आद्वीप जंबूद्वीप नामे छे ? हे गौतम मंदर पर्वतनी उत्तरे अने लवणसमुद्रनी दक्षिणे जंबूद्वीप नामे द्वीप छे अने यावत् त्यां त्यां-ते ते ठेकाणेघणावुदाना को छे, पण जांबुडानां पन छे अने यापत्ते शोभता शोभता रहे छे माटे हे गौतम 1 ते हेतुथी आ द्वीपने संवृद्वीप रुखो इत्यादि प्रत्येक अर्थसूत्रो छे. तो ए बात सिवायनी बीजी जीवाभिगनमां कहेली बातचडे आ उद्देशकन सूत्रो जनवां यावत् [ 'जाव इमा गाह' त्ति ] ए पद सुधी बधुं जाणवु. अहीं एक संग्रह गाथा छे ते आ छे: - [ 'अरिहंत' इत्यादि. ] त्यां आ संबंधवडे एनो अर्थ प्रसंगप्राप्त छे:अंबूद्वीप वगेरेथी मांडी मोनुषोचर सुमीना वर्णनने छेडे का प्रमाणे कछेयां सुषी मानुषोत्तर पर्वत हे त्यां सुधी आ सोक ( मनुष्यलोक) कद्देयाय छे.” 'आरिहंते' त्ति "ज्यां सुधी अर्हत छे, चक्रवर्ती छे, यावत्-आविकाओ छे, मनुष्यो मोळा अने विनीत छे. त्यां सुधी आ ठोक कवाय छे." 'समय' चि "ज्यां सुधी समयो छे, आमठिकाम छे, त्यां सुधी ठोक कहेनाव " " प्रमाणे ज्यां सुधी स्कूल विजली हे, मेघना स्कूल गडगडाट छे अने ज्यां सुधी स्कूल मेषो बरसे छे त्वां सुधी लोक कद्देवाय छे" 'अगणि' चियां सुधी स्थूल अधिकाय छे, ज्यां सुधी आगर, निधि, नंदी छे त्यां सुधी लोक कहेवाय छे" 'उवराग' त्ति "ज्यां सुधी चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण छे त्यां सुधी लोक कहेवाय छे.” “निग्गमे वुड्विवयणं · "सुधी चंद्र सूर्वोनुं अने ताराओनुं अतिगमन, निर्गमन वृद्धि अने निवृद्धि कद्देवाय छे त्यां सुधी ठोक छे" अर्थात् ज्यां सुधी मनुष्यलोक छे. निर्गन एटले दक्षिणायन, अतिगमन एटले उत्तरायण, वृद्धिं एटले दिवस बचचो अने निवृद्धि एटले दिवस घटदो ते. १. यावच्च अर्हन्तः, चक्रवर्तिनः यावत् श्राविका मनुजाः प्रकृतिभद्रकाः विनीताः तावच अस्मिन् लोक इति प्रोच्यते. २. यावच्च समया वा, आवलिकादयो वा यावत्-अस्मिन् लोक इति प्रोच्यते एवं च यावच बादरो विद्युच्चारः, बादरः स्तनितशब्दः, यावच बहव उदाराः बलाहकाः संखेदन्ते. ३. यावञ्च बादरः तेजःकायः, यावच्च आकरा वा, निधयो वा नद्यो वा. ४. चन्द्रोपरागा वा, सूर्योपरागा वा तावच अस्मिन् लोक इति प्रोच्यते. ५. याच चन्द्र-सूर्योद-सारारूपाणाम् अतिगमनम् निर्गमनम् वृद्धिः निवृद्धिः आख्यायते तावच अस्मिन् सोक इति प्रष्यः , १. अभी बधीत श्रीवाभिगमनम (० ० ७९२ ८०३) पीना मानुषोत्तर पतना अधिकारमा छेअनु० Jain Education International बेडारूपः समुद्रेऽखिलजच्चरिते क्षारभारे भवेऽस्मिन् दायी यः सगुणानां परकृतिकरणाद्वैतजीदी तपखी । अस्माकं वीरवरोऽनुतन बाइको दान्तो दया श्रीरदेयः समारदा चासमुयः ॥ १ ॥ " For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org/

Loading...

Page Navigation
1 ... 322 323 324 325 326 327 328 329 330 331 332 333 334 335 336 337 338 339 340 341 342 343 344 345 346 347 348 349 350 351 352 353 354 355 356 357 358 359 360 361 362 363 364 365 366 367 368 369 370 371 372