Book Title: Sramana 2016 04
Author(s): Shreeprakash Pandey, Rahulkumar Singh, Omprakash Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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श्रावक केश लोच : आगमेतर सोच 15 साधुचित मर्यादाओं को अपनाने मात्र में। बारह व्रतों के बाद ग्यारह प्रतिमाओं का ग्रहण
और आसेवन ही वर्तमान युग में लुप्त हो चुका है तो साधुओं के लोच आदि विधि विधान श्रावकों द्वारा कैसे पालनीय माने जा सकते हैं। अन्त में, सविनय निवेदन है कि किसी संघ, श्रावक या व्यक्ति विशेष के निजी जीवन का विरोध न मानकर जिन शासन के पारम्परिक प्रतीकों की सुरक्षा का प्रयत्न मानेंगे तो पूर्वोक्त विचारों से कषाय वृद्धि नहीं होगी।
आगमों के भावार्थ को समझने समझाने में कोताही हुई हो - तस्यमिच्छामि दुक्कडं।।
सन्दर्भ
उत्तराध्ययन सूत्र, सम्पा. मधुकर मुनि, अध्ययन २८, गाथा - तत्त्वार्थसूत्र, उमास्वाति, १/१ . उत्तराध्येयन सूत्र, अध्ययन ३०, गाथा १-६ अचेले लाघवियं आगममाणे। तवे से अभिसमण्णागते भवति।। आचारांग सूत्र, सम्पा. मधुकर मुनि, १/७/२२६ औपपातिक सूत्र, सूत्र ८९-११६, पृ. १४१-१५३
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