Book Title: Jain Hiteshi 1914 Ank 12
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

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Page 22
________________ *६९० प जैनहितैषी - लगे टहलने ले प्रहस्तकों, Jain Education International तीरों तीर पवनजय वीर ॥ ( ६९ ) वहाँ नजर आया चकवेकों, झपट ले गया पक्षी बाज | चकवी तड़प तड़प जी देती, करती हुई आर्त आवाज ॥ ( ७० ) उड़ती कभी कभी भूतल पर गिरती पड़ती चलती थी । अपनी छायाको जलमें लख, चकवा जान लपकती थी ॥ ( ७१ ) चकवा कहाँ कहाँ चकवी थी, चकवा तो तज गया जहान । चकवीका दुख लखा न जावे, थी संकटमें उसकी जान ॥ ( ७२ ) इस घटनासे पवनंजयके, दिलपर असर पड़ा भारी । लगा कोसने अपने को हीं, मैं हूँ दुष्ट बड़ा भारी ॥ (७३) मम वियोग में मेरी प्यारी, क्या क्या दुख न उठाती है । For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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