Book Title: Jain Hiteshi 1914 Ank 12
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

View full book text
Previous | Next

Page 96
________________ ७६४ जैनहितैषी वर्ष प्रारंभ होगा। अबतक इसका वर्ष दिवालीसे प्रारंभ होता था, परन्तु आगे अँगरेज़ी सालसे हुआ करेगा। इस दो महीनेके अवसरमें हम प्रतीक्षा करेंगे कि हितैषीके प्रेमी पाठक इस बीचमें कितने नये ग्राहक बनाकर भेजते हैं और कितने महाशय ग्राहकश्रेणीसे अपना नाम जुदा करवा लेते हैं । इस अंकके साथ छपा हुआ कार्ड भेजा जाता है, उसे भरवाकर भिजवानेकी प्रत्येक ग्राहक और पाठकसे पुनः पुनः प्रार्थना है। -सम्पादक। ___ मुफ्तमें जैनहितैषी। पिछले तीन चार वर्षोंके हमारे यहाँ बहुतसे अंक पड़े हैं। यह कहनेकी जरूरत नहीं कि हितैषीके प्रत्येक अंकमें अच्छे और पढ़ने योग्य लेख होते हैं। उसकी प्रत्येक लाइन कामकी होती हैं। इस लिए जो महाशय पिछले लेख पढ़ना चाहें, वे हमारे पास केवल डांक खर्चके लिए कुछ टिकिट भेज देवें। हम उनके पास पिछले अंकोंमेंसे कोई अंक उठाकर भेज देगें। उनके भेजे हुए टिकिटोंमें जितने वजनके अंक जा सकेंगे उतने ही भेज दिये जायेंगे। एक पैसेके टिकिटमें एक अंक जा सकता है । अमुक अंक ही भेजो ऐसी आज्ञाका पालन हम न कर सकेंगे, जो अंक मौजूद होंगे वे भेज दिये जावेंगे । ग्राहक महाशयोंको चाहिए कि पिछले अंक अपने मित्रोंको मुफ्तमें मँगा दें और यदि उन्हें लेख पसन्द आ जायँ तो ग्राहक बननेकी प्रेरणा कर दें। .. मैनेजर । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 94 95 96 97 98 99 100