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४० - ४५ वर्षोका अन्तराल श्री विठ्ठल भट्ट उनके शिष्य रघुनाथजी और अनुपानमंजरीकार स्वयं तथा उनके गुरु पीताम्बर ये सभी परस्पर समकाली होने चाहिये ।
' निघण्टसंग्रह' नामक ग्रन्थ में इन्होंने प्राचीन संहिता ग्रन्थों और निघण्टु ग्रन्थों में अनुपलब्ध और आधुनिक आहारमें प्रयुक्त वनस्पतियोंका संग्रह किया है ।
इस विस्तृत विचारसे यह विदित होता है कि दर्शन शास्त्रोंका प्रेरणास्रोत गुजरात में था और इसी प्रकार आयुर्वेद शास्त्रमें भी विशिष्ट प्रदान गुजरात प्रान्त के विद्वानोंका था ।
जिस प्रकार दर्शन शास्त्रमें योगदान करने वाले गुजरात के विद्वानों का एक विशिष्ट स्थान है उसी प्रकार आयुर्वेद शास्त्रमें भी गुजरात के विद्वानों ने एक नवीन और विशिष्ट प्रदान द्वारा प्रतिभापूर्ण व्यक्तित्वका निर्माण किया है ।
प्रकाशनके लिए स्वीकृत यह ' अनुपानमंजरी' नामक ग्रन्थ भी अपनी एक विशिष्ट गुणवनाके कारण आयुर्वेद शास्त्रको एक मूल्यवान प्रदान है ।
इस ग्रन्थ में विष चिकित्सा को विषय बनाकर स्थावर, जंगम और धातु, उपधातु सम्बन्धी विप चिकित्साका वर्णन सरस और सरल भाषामें किया गया है ।
५ आचार्य श्री विश्रामजी
इस अनुपानमंजरी और व्याधिनिग्रह नामक एक अन्य रोगचिकित्सा विषयक ग्रन्थके लेखक आचार्य श्री विश्रामजी का जन्म अट्ठारहवीं शताब्दिमें गुजरात प्रान्त के अन्तर्गत एक कच्छ नामक प्रदेशके अंजार नामक शहरमें हुआ था ।
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