Book Title: Jain Achar Mimansa me Jivan Prabandhan ke Tattva
Author(s): Manishsagar
Publisher: Prachya Vidyapith Shajapur

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Page 798
________________ 77 श्रीमद्देवचन्द्र, वर्तमान चौबीसी, 12/2 115 एगे चरेज्ज धम्म। 78 द्वादशपर्व व्याख्यान, आ. आनन्दसागरसूरिजी, पृ. 3 - प्रश्नव्याकरणसूत्र, 2/5/164 79 जैनभारती (पत्रिका), सितंबर, 2004, पृ. 10 116 भगवतीआराधना, 1813 80 आवश्यकसूत्र, अ. 4, पृ. 70.71 81 तत्त्वार्थसूत्र, 1/1 82 उत्तराध्ययनसूत्र, 23/25 83 वही, 28/35 84 वही, 25/32 85 सूत्रकृतांगसूत्र, 1/12/8 86 आनंदघन चौबीसी, 2/2 87 तत्त्वार्थसूत्र, 1/1 88 आनंदघन चौबीसी, 2/4 89 श्रीमद्भगवद्गीता, 2/56 90 ज्ञानसार, 3/5 91 उत्तराध्ययनसूत्र, 1/31 92 आवश्यकनियुक्ति, 98 93 बृहत्कल्पभाष्य, 4675 94 नियमसार, 2 95 अध्यात्मसार, 3/10/2-28 96 उत्तराध्ययनसूत्र, 3/8 97 आवश्यकनियुक्ति, 841-842 98 स्थानांगसूत्र, 2/1/52 99 उत्तराध्ययनसूत्र, 3/9 100 दशवैकालिकनियुक्ति, 3 101 श्रीमद्देवचन्द्र, वर्तमान चौबीसी, 2/4 102 आवश्यकपूजासंग्रह, दीपचन्द नाहटा, पृ. 23 103 समणसुत्तं, 303 104 पंचुंबरि चउविगई हिम-विस-करगे अ सव्व-मट्टि अ। राइ-भोयणगं चिय बहु-बीअ अणंत-संधाणा।। घोलवडा वायंगण अमुणिअ-नामाइं पुष्फ-फलाई। तुच्छ-फलं चलिअ-रस वज्जे वज्जाणि बावीसं ।। - अभक्ष्य अनंतकाय विचार, प्राणलालमेहता, पृ. 3 105 धर्मबिन्दु, 1/14 106 योगशास्त्र, 1/47-56 107 तत्त्वार्थसूत्र, 7/1,16 108 आवश्यकसूत्र, अ. 4, पृ. 52,53 109 तत्त्वार्थसूत्र, 7/1 110 उत्तराध्ययनसूत्र, 24/2 111 तत्त्वार्थसूत्र, 9/6 112 वही, 9/19-20 113 वही, 9/9 114 बृहत्कल्पभाष्य, 4584 जीवन-प्रबन्धन के तत्त्व 44 696 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org


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