Book Title: Anekant 1989 Book 42 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 10
________________ नथमल विलाला का भक्तिकाव्य ] डा. गंगाराम गर्ग अनेक काव्य रचनाओ के प्रणेता होने पर भी जैन कर्नाटक इक देस उदार, तहां पचीसौ जिनाल सार। साहित्य मे विस्मत माकवि नथमल "विलाला" अपने नगर मांहि पर गिर पं जोय, निति त्रिकाल तहं पूजन होय॥ समय के महान् शासक जाट राजा सूरजमल द्वारा प्रति- नगर मांहि उस देश मझार, धरम ध्यान बरतें इक सार। ष्ठित कवि थे। महाराजा सूरजमल ने अपने पोतदार तहां मिथ्याति लख्यो न कोय, नित्य धरम के उत्सव होय ॥ "बेनी' के कहने पर नथमल को आगरा से भरतपुर नथमल की दासभक्ति :--- बुलवा कर अ ने खजाने पर नौकरी दी थी। “जीवन्धर रीतिमल के शृगारी वातावरण में लिप्त जनमानस चरित" की प्रशस्त मे नथमल विलाला ने अपना जन्म को अपने भक्तिभाव से प्रक्षालित करने की चेष्टा बनारसी स्थान, आगरा का जयसिंहपुरा बतलाया है। इनके पिता दास, द्यानत राय, भूधरदास, हरीसिंह आदि अनेक जैन मह जेठमल शाह और पिता सोम चद थे। कवियो ने की थी। इस परम्परा मे भरतपुर के नथमल "नेमिनाथ व्यालो" और 'अनन्त चतुर्दशी ब्रत कथा' विलाला का योगदान भी सराहनीय है। नयमल विलाला के रचनाकाल क्रमश: सवत् १८१६ वि० एव १८२४ वि० ने विलावल, सोरठ, बसत, रामकली, सारंग आदि कई होने के कारण इस अवधि मे कवि का भरतपुर नगर मे राग-रागनियो मे ४०-६० पद 'सेवक' उपनाम से लिखे रहना सुनिश्चित है। भरतपुर में लिखी गई कवि की है। इनके अधिकांश भक्तिपूर्ण पद ऋषभदेव, महावीर और अन्य रचनाएं "जिन गुणविलास (म । १८२२ वि०) और पार्श्वनाथ तीनों तीर्थंकरो को सम्बोधित करके लिखे गए 'चीठी' है। नथमल ने गिद्धान्तसार दीपक (वि० सवत् है। जिनभक्ति से वादिराज का कोढ़ नष्ट होना, सेठ १८३४) और नागकुमार चरित (स० १८३७) की रचना धनञ्जय के पुत्र का विष उतरना तथा मानतुंग का बंधनहिन्डोन मे की। माघ कृष्ण सप्तमी सवत् १८४३ वि. मुक्त होना आदि घटनाओं ने नथमल को जिन-शरण मे को स्वय के हाथ से लिखी गई एक प्रति के आधार पर जाने की प्रेरणा दी हैकवि का हिन्डोनवास प्रमाणित है। सवत् १८४३ के सरन तेरी पायो जिनराज, महिमा सुन हरषायो। पश्चात् कवि ने अपने अन्तिम दिन करोली मे व्यतीत इन्द्र नरेन्द्र मनेन्द्र नमैं तुम, समरौं जिन सुख पायौ ॥ किए। यहां इन्होंने ३०५ छ-द के विशाल ग्रन्थ समवशरण वादिराज युति करते ही प्रभु, छिन मैं कोढ़ नसायौ । मगल की प्रतिलिपि सवत् १८४८ वि० मे की है। करौली सेठ धनंजय स्तवन कोयो, ता सुत विष उतरायो । नगर के पद्मविला मुहल्ले के पास स्थित विलालाओ की मानतंग ने भक्ति करी जब, बंधन तुरत छड़ायो। हवेली उजड़े रूप में आज भी विद्यमान है। इन्हें प्रादि यह सभी सुनत हो, 'सेवग' मन ललचायो । विभिन्न छन्दो मे चरितकाव्यो और सैद्धान्तिक ग्रन्थो मैं ह दीन, तारक तुम साहिब' का सम्बन्ध रखने के रचयिता नथमल दिलाला की भक्तिभावना बेजोड़ है। वाले नथमल अपने आराध्य के अनन्य भक्त रहे है । पुष्टजिनभक्ति से प्रभावित होकर ही कवि ने अपनी 'चीठी' मागियों की सी सर्वांग-सेवा का भाव उनमे भी विद्यमान नामक रचना मे सुदूरवर्ती कर्नाटक देश मे विद्यमान जैन हैमन्दिरों की हीरा-पुखराज, चाँदी व सोने की कलात्मक निस दिन तेरो ध्यान, मेरे काई की नहि कान । मूतियो और धार्मिक वातावरण का सजीव चित्र खीचा है। और देव सौं प्रीति न जोड़ो, तुम ही सौ पहचान ।

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