Book Title: Sthanang Sutram Part 01
Author(s): Vijaychandrasguptasuri
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
View full book text ________________ श्रीस्थानाङ्गं श्रीअभय० वृत्तियुतम् भाग-१ // 418 // ल्पोपकरणतादिलक्षणसुविहितसाधुरूपधारी वा योज्य इति। पत्तियं ति प्रीतिरेव प्रीतिकं स्वार्थिककप्रत्ययोपादानेऽपि रूढेर्नपुंसकतेति, तत्करोमि प्रत्ययं वा करोमीति परिणतःप्रीतिकमेव प्रत्ययमेव वा करोति, स्थिरपरिणामत्वाद् उचितप्रतिपत्तिनिपुणत्वात् सौभाग्यवत्त्वाद्वेति, अन्यस्तु प्रीतिकरणे परिणतोऽप्रीतिं करोति उक्तवैपरीत्यादिति, अपरोऽप्रीतौ परिणतः प्रीतिमेव करोति,सञ्जातपूर्वभावनिवृत्तत्वात्,परस्य वा अप्रीतिहेतुतोऽपिप्रीत्युत्पत्तिस्वभावत्वादिति, चतुर्थः सुज्ञानः, आत्मन एकः कश्चित् प्रीतिकं-आनन्दं भोजनाच्छादनादिभिः करोति-उत्पादयति आत्मार्थप्रधानत्वान्न परस्य, अन्यः परस्य परार्थप्रधानत्वान्नात्मनोऽपर उभयस्याप्युभयार्थप्रधानत्वादितरोनोभयस्याप्युभयार्थशून्यत्वादिति, आत्मनः प्रत्ययं-प्रतीतिं करोति नपरस्येत्याद्यपिव्याख्येयमिति, पत्तियं पवेसेमि त्ति प्रीतिकं प्रत्ययं वाऽयंकरोतीत्येवं परस्य चित्ते विनिवेशयामीति परिणतस्तथैवैकः प्रवेशयतीत्येक इति, सूत्रशेषोऽनन्तरसूत्रं च पूर्ववत्।। चत्तारि रुक्खा पं० तं०- पत्तोवए पुप्फोवए फलोवए छायोवए, एवामेव चत्तारि पुरिसजाया पं० तं०- पत्तोवारुक्खसमाणे पुप्फोवारुक्खसमाणे फलोवारुक्खसमाणे छातोवारुक्खसमाणे ॥सूत्रम् 313 // भारण्णं वहमाणस्स चत्तारि आसासा पन्नत्ता, तंजहा- जत्थ णं अंसातो असं साहरइ तत्थविय से एगे आसासे पण्णत्ते 1, जत्थविय णं उच्चारंवा पासवर्ण वा परिट्ठावेति तत्थविय से एगे आसासे पण्णत्ते 2, जत्थविय णंणागकुमारावासंसि वा सुवन्नकुमारावासंसि वा वासं उवेति तत्थविय से एगे आसासे पन्नत्ते 3, जत्थविय णं आवकधाते चिट्ठति तत्थविय से एगे आसासे पन्नत्ते 4, एवामेव समणोवासगस्सचत्तारि आसासापं० 20- जत्थ णंसीलव्वतगुणव्वतवेरमणपच्चक्खाणपोसहोववासाइंपडिवजेति तत्थविअ से एगे आसासे पण्णत्ते 1, जत्थविय णं सामाइयं देसावगासियं सम्ममणुपालेइ तत्थविय से एगे आसासे पं०२, जत्थविय णं चतुर्थमध्ययनं | चतुःस्थानम्, तृतीयोद्देशक: सूत्रम् 313-314 पत्र-पुष्पफल-च्छायोपगवृक्षवत् पुरुषाः, भारवाहकाश्वासवत् श्रमणोपासकाश्वासा: // 418 //
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