Book Title: Sramana 1997 07
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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श्रमण/जुलाई-सितम्बर/१९९७ : १२
२३. श्वेताश्वतरोपनिषद्, ४.१८ २४. “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ।" ऋग्वेद, १,१६४,४६ २५. “धर्मतीर्थङ्करेभ्यस्तु स्याद्वादिभ्यो नमः ।
__ ऋषभादि महावीरान्तेभ्य: स्वात्मोपलब्धये ।
अकलङ्कदेव, लघीयस्त्रय, श्लोक ११ २६. हर्मन याकोबी, सेक्रेड बुक्स ऑव दी ईस्ट, जिल्द २२, पृ. १२८, पाद
टिप्पणी १, जिल्द ४५. पृ. ३१५-१९; ठाणांगसुत्त, पृ०९४ अ, ३४२ ब । २७. दीघनिकाय, “सामञफलसुत्त"; विनय चुल्लवग्ग, ५.१०.१२ ; अङ्गत्तरनिकाय,
५.२८.८-१७ (निगण्ठसुत्तादि); देखें, रीस डेविड्स, बुद्धिस्ट इण्डिया, १९५९, पृ० ६१, डायलॉग्स ऑव दी बुद्ध, जिल्द २, सेक्रेड बुक्स ऑव दी बुद्धिस्ट,
पृ. २२०-२२ आदि । २८. उदान, जयचन्दवग्ग से इनके संगठन पर किञ्चित् प्रकाश पड़ता है । “सम्बहला
नानातित्थिया समन ब्राह्मण परिब्बाजका...... नानातित्थिका, नानाखन्तिका, नाना
रुचिका, नाना दित्थि निस्सय निस्सिता", देखें, स्टेन्थल का उदानम्, पृ०६६-६७ २९. मज्झिमनिकाय, सच्चकसुत्त, उपालिसुत्त, सीहसेनापतिसुत्त आदि । ३०. दीघनिकाय, सामञयफलसुत्त । ३१. दीघनिकाय, पोट्ठपादसुत्त, अङ्गुत्तरनिकाय, दिठिवज्ज्सुत्त; १०.२.५.४. महावंश,
तृतीय संगीति का विवरण, विशेष ५.२३३.३५, ५.२७१ आदि । ३२. गोविन्दचन्द पाण्डे, स्टडीज इन दी ऑरिजिन्स ऑव बुद्धिज्म, १९५७, पृ०३४७
४८, बौद्ध धर्म के विकास का इतिहास, १९७६, पृ. ३५,३६ ३३. सीताराम दुबे, बौद्ध संघ का प्रारम्भिक विकास, १९८८, पृ. ४० और आगे,
पृ. ५७-५८ ३४. महेन्द्रकुमार 'न्यायाचार्य', जैन दर्शन, पृ. ५५२; राहुल सांकृत्यायन, दर्शनदिग्दर्शन,
पृ० ४९१ ३५. सूत्रकृताङ्ग, १.१२, ३६. “भिक्खू विभज्जवायं च वियागरेज्जा ।" वही, १.१४.२२, ३७. मेहता, जैन धर्म दर्शन, पृ. ३३७ ३८. भगवतीसूत्र, १६.५.३ ३९. तुलनीय, मेहता, जैन धर्म दर्शन, पृ. ३३४ ४०. सूत्रकृताङ्ग, १.१४.१९ ४१. प्रश्नव्याकरण, ८.२.१०७ ४२. भगवतीसूत्र, १२.१०.४६९
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