Book Title: Sacchaye Prakirnak Dashake
Author(s): Agamoday Samiti,
Publisher: Agamoday Samiti
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पइण्णयदसए १० मरणस
माही
॥९९॥
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णधिईए । सवेसु कसाएमु य निहंतु परमो सया होहि ॥ ४६॥१२८१॥ चइऊण कसाए इंदिए य सचे य Iआराधकागारवे हेतुं । तो मलियरागदोसो करेह आराहणासुद्धिं ॥४७॥ १२८२॥ दसणनाणचरित्ते पञ्चज्जाईसु नाराधक जो य अड्यारो । तं सवं आलोयहि निरवसेसं पणिहियप्पा ॥४८॥ १२८३ ॥ जह कंटएण विद्धो सवंगे वेय- स्वरूपम् णदिओ होइ । तह चेव उद्वियंमि उ निसल्लो निवओ होइ ॥ ४९ ॥ १२८४ ॥ एवमणुद्धियदोसो माइलो तेण दुक्खिओ होइ । सो चेव चत्तदोसो सुविसुद्धो निवओ होइ ॥५०॥ १२८५ ॥रागहोसाभिहया ससलमरणं मरंति जे मूढा। ते दुक्खसल्लवहुला भमंति संसारकतारे ॥५१॥ १२८६॥ जे पुण तिगारवजढा निस्सल्ला दंसणे चरित्ते य । विहरंति मुक्कसंगा खवंति ते सबदुक्खाई॥५२॥१२८७ ॥ सुचिरमवि संकि-| लिटुं विहरितं झाणसंवरविहीणं । नाणी संवरजुत्तो जिणइ अहोरत्तमित्तेणं ॥५३ ॥ १२८८ ॥ जं निजरेइ8 | भव ॥ ४६ ॥ त्यक्त्वा कपायान् इन्द्रियाणि च सर्वाणि च गौरवाणि ह्त्वा । ततो मर्दितरागद्वेपः कुरुष्वाराधनाशुद्धि ।। ४७॥ दर्श-16 | नज्ञानचारित्रेषु प्रत्रज्यादिपु यश्चातिचारः । तं सर्व आलोचय निरवशेष प्रणिहितात्मा ॥ ४८ ॥ यथा कण्टकेन विद्धः सर्वेष्वंगेपु वेदना| ऽदितो भवति । तथैव उद्धृते निइशल्यो निर्वृतो (निर्वातः) भवति ॥४९॥ एवमनुद्धृतदोषो मायावी तेन दुःखितो भवति । स एव त्यक्तदोपः
सुविशुद्धो निर्वृतो (निर्वातः) भवति ॥५०॥ रागद्वेपाभिहताः सशल्यं मरणं म्रियन्ते ये मूढाः । ते दुःखिनो बहुशल्या भ्राम्यन्ति संसारकान्तारे ।।। ५१ ॥ ये पुनस्त्रिगौरवरहिता निश्शल्या दर्शने चारित्रे च । विहरन्ति मुक्तसंगाः क्षपयन्ति तानि सर्वदुःखानि ।। ५२ ॥ सुचिरमपि ॥९९ ॥ संक्लिष्टं विद्दनं ध्यानसंवरविहीनं । ज्ञानी संवरयुक्तो जयति अहोरात्रमात्रेण ॥५३॥ यद् निर्जरयति कर्म असंवृतः सुबहुनाऽपि कालेन ।
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