Book Title: Paiakaha Sangaha
Author(s): Manvijay, Kantivijay
Publisher: Vijaydansuri Jain Granthmala
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PRESHARINCRECRUECALCCADA
समओ तरुणाण पलोयणे न उणो । २१ ।। अप्पाणं रमणीओ तिसि छुहियं 4 नो विआणति । आगच्छंति सगेहे कुमरे पत्तंमि घवलहरे ॥ २२॥ अन्नदिणे सिट्ठिजणो निवई विनवह देव ! अन्नाओ । न गिहे दीसह रमणीलोओ कुमरे पहिभमंते ॥२३।। सोहग्गरूवगुणगणसंजमिओ इव चएइ न कुमारं । रमणिजणो ता तं तह कुणसु जहा ठाइ नियगेहे ॥२४॥ आम ति पमणिऊणं कयसम्माणं विसज्जए लोयं । किंकायविमूढो राया चिंताउरो जाओ ॥ २५ ॥ हक्कारिऊण मणिओ मा हिंडसु कुमर ! नयरमझमि । झिजह तुह लायण्णं पिजंतं तरुणिनयणेहिं ॥ २६ ॥ अहिमाणधणो मुणिउं चित्तं निवइस्स चिंतए कुमरो । नियगुणगणो वि मज्झं संजाओ सत्तुवग्गसमो ।। २७॥ धिद्धी मह जम्मो वि हु लोयाणं दुक्खकारण जेण । ता जह सुहिओ लोओ हवेइ तं चिय लहु करिस्सं ॥ २८॥ इय सो विसन्नचित्तो कहकहमवि गमइ जाव सैयलदिणं । ता मुणिमाणसा पिययमा वि तं पुच्छइ सदुक्खं ॥ २९ ॥ मज्झ सवहेण धिप्पसि सच्च चिय कहसु तुज्झ किं दुक्खं । कुमरो विसायकारणमह कहिउं तं पयंपेह ॥ ३० ॥ कायवं अन्ज मए गमणं देसंतरंमि दूरंमि । ता दइए! मायगिहे चिट्ठ तुम कइवयदिणाई ॥३१॥ सा पडिभणेइ पिययम ! जुत्तं वुत्तं तए इमं वयणं । छाय व तुज्झ पासं न उणो चइउं अहं सक्का ॥३२॥ ता मुणिआभिप्पाओ गहिऊणं धणवई रयणिमझे । वासभवणाउ कुमरो विणिग्गओ तह य नयराओ ॥ ३३ ॥ गच्छंतो संपत्तो समुद्दकूले कमेण सो कुमरो । आरुहइ जाणवत्तं पियाए सहिओ तो तत्थ ।। ३४ । पडिकूलमारुएणं फुटुं तं धणबई वि दिव्ववसा । लहिऊण फलहखंडं संपत्ता तीरभायम्मि ॥ ३५ ।। संपत्तफलहखंडो पिओ वि जइ जीविओ कहवि होजा ।
१ कुमरं C। २ इयमार्या A B प्रत्योनास्ति । ३ दिवसमिणं CI ४ तायगिहे CI
CREDICAECRECAUSA

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