Book Title: Paiakaha Sangaha
Author(s): Manvijay, Kantivijay
Publisher: Vijaydansuri Jain Granthmala
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पाइअकहासंगहे।
॥२१॥
मओ विवाहिउँ पहियवेसेण ।। ८८ ।। नियजीवियअन्महियाई ताई पेच्छित्तु अक्खराइं तहिं । वत्थंचलं पुणो पुण अवलो-16 शीलप्रमावे यइ हरिसपिम्मेण ।। ८९ ॥ कहमेस च्चिय पहिओ जाओ सिरिविक्कमो महीनाहो । मणवंछियपाणपिओ निम्मलसीलप्पहा- सुन्दरिदेवीवेण ॥९० ॥ सा एवं चिंतती नियचरियं दुग्घडं हिययमज्झे । सिग्धं गमेइ रयणी हरिसेणं विहसियसरीरा ॥ ९१ ॥ तो 181
कथानकम्। जामिणी विरामे सेट्ठी पुच्छेद पिययमो कत्थ ? । सा दसइ वत्थंचलमह सो सव्वं पि हु मुणेइ ॥ ९२ ।। अरिदमणमहीवइणो स्यणवईए य कहइ सवं पि । तत्तो सयलं नयरं हरिसपरं ज्झत्ति संजायं ॥ ९३ ॥ उज्जेणीनयरीए रयणवई सुंदरि पि पेसेइ । सिरिअरिदमणो राया महाविभूईए सिग्धं पि ।। ९४ ॥ अह ताण समागमणं नाऊणं उच्छवं कुणइ रम्मं । उज्जेणीनयरीए पवेसए विकमाइचो ॥ ९५ ॥ सेवंताई ताई विसयसुहं पुनपुनभावेण | सविसेसं धम्मपराई निति दियहाई देव ब्व ॥१६॥ सयलपुहई दाणं दाऊणं कुणिय ऊरिणं लोयं । संवच्छरो निओ जेणं अंकिओ विक्कमनिवेण ॥ ९७ ॥ सिरिविकममहिवहणो वह संवच्छरो पुहइमज्झे । अअवि दाणपहावा ता नणं उत्तमंदाणं ।।९८॥ वियरंति ताई दाणं भावंति सुमावणं च हिययंमि । दत्तरतवं तवंति य सीलं पालंति सयकालं ॥९९|| निआउं पालेउंदाणं दाऊण सीलिउं सील । तिनि वि ताई कमेणं लहंति देवत्तरिदीओ ॥१००॥ अजवि दाणपहावो सीलपहावो य दीसए लोए। एयं चिय मुणिऊण ता धम्मे आयरं कुणह ॥१०॥
। इति शीलव्यावर्णने सुन्दरिदेवीकथानकम् ।
- - - ... नवकारफले सौभाग्यसुन्दरकथानकम्-नवकारपहावेणं तं नत्थि जं न हवेइ लोयाणं । सोहम्गसुंदरेण व जह पचा सयलरिद्धीओ॥१॥ मुचिपईनामेणं नयरीए घणधमरिद्धिसुहियजणा । तं पाल नरनाहो जहत्थनामा मही

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