Book Title: Kasaypahudam Part 08
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatiya Digambar Sangh

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Page 333
________________ ३२० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ कस्स ? अण्णद० समयाहियावलियअक्खीणदंसणमोहणीयस्स । अणंताणु०४ जह० द्विदिसं० कस्स ? अण्णद० अणंताणु०४ विसंजोएमाणस्स चरिमद्विदिखंडए चरिमसमयसंकामेंतस्स । अट्ठक० जह० कस्स ? अण्णद० खवयस्स चरिमे द्विदिखंडए चरिमसमयसंकामेंतस्स । इथि०-णस०-छण्णोक० जह० द्विदिसंका० कस्स ? अण्णद० खवयस्स चरिमे डिदिखंडए वट्टमाणयस्स । गवरि णqस० जह० णqसयवेदोदयक्खवयस्स । एदेण णबदे जहा इत्थिवेदस्स परोदएण वि सामित्तमविरुद्धमिदि । कोध-माण-मायासंजल०-पुरिसवेद० जह० ट्ठिदिसं० कस्स ? अण्णद० खवयस्स चरिमद्विदिबंधे चरिमसमयसंका तस्स । णवरि अप्पप्पणो वेद-कसायस्स सेढिमारूढस्स । लोहसंज० जह० द्विदिसं कस्स ? अण्णद० खवयस्स समयाहियावलियचरिमसमयसकसायस्स । ६५३. आदेसेण णेरइय० मिच्छ०-बारसक०-भय-दुगुंछ० जह० द्विदिसं० कस्स? अण्णदरस्स असण्णिपच्छायदस्स हदसमुप्पत्तियदुसमयाहियावलियउववण्णल्लयस्स। सत्तणोक० द्विदिविहत्तिभंगो, पडिवक्खबंधगद्धागालणेण अंतोमुहुत्तणुववण्णल्लयस्स सामित्तविहाणं पडि भेदाभावादो। णवरि सगबंधपारंभादो आवलियचरिमसमए सामित्तकरनेमें एक समय अधिक एक आवलि काल शेष है ऐसे अन्यतर जीवके होता है। अनन्तानुबन्धी चतुष्कका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करनेवाला जो जीव अन्तिम स्थितिकाण्डकके अन्तिम समयमें संक्रम कर रहा है उसके होता है। आठ कषायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? जो क्षपक जीव उनके अन्तिम स्थितिकाण्डकका अन्तिम समयमें संक्रम कर रहा है उसके होता है। स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और छह नोकषायोंका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है। जो अन्यतर क्षपक जीव अन्तिम स्थितिकाण्डकमें विद्यमान है उसके होता है। किन्तु इतनी विशेषता है कि नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम नपुंसकवेदके उदयवाले क्षपक जीवके ही होता है। इससे ज्ञात होता है कि स्त्रीवेदका जघन्य स्वामित्व परोदयसे प्राप्त होने में भी कोई विरोध नहीं आता है । क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन, मायासंज्वलन और पुरुषवेदका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ! जो अन्यतर क्षपक जीव अन्तिम स्थितिबन्धका अन्तिम समयमें संक्रम कर रहा है उसके होता है। किन्तु इतनी विशेषता है कि वेद और कषायोंमें से स्वोदयसे श्रेणिपर चढ़े हुए जीवके यह जघन्य स्वामित्व होता है। लोभ संज्वलनका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है । जो अन्यतर क्षपक जीव एक समय अधिक एक श्रावलि कालरूप अन्तिम समयमें सकषायभावसे स्थित है उसके होता है। ६५३. आदेशसे नारकियोंमें मिथ्यात्व, बारह कषाय, भय और जुगुप्साका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है । हतसमुत्पत्तिक क्रियाको करके जो अन्यतर जीव असंज्ञी पर्यायसे आकर नरकमें उत्पन्न हुआ है उसके दो समय अधिक एक आवलि कालके होने पर उक्त प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है । सात नोकषायोंके जघन्य स्थितिसंक्रमका स्वामित्व स्थितिविभक्तिके समान है, क्योंकि नरकमें उत्पन्न होनेके बाद प्रतिपक्ष प्रकृतियोंके बन्धकालके गलाने में जो अन्तर्मुहूर्त काल लगता है उतनी स्थिति विवक्षित नोकषायोंकी और कम हो जाती है और तब जाकर उनका जघन्य स्थितिसत्त्व प्राप्त होता है। इनका जघन्य स्थितिसंक्रम भी अन्तर्मुहूर्त बाद ही प्राप्त होता है इस अपेक्षासे इन दोनोंके जघन्य स्वामित्वके कथनमें कोई भेद नहीं है। किन्तु इतनी विशेषता है कि जिस प्रकृतिका जघन्य स्वामित्व प्राप्त करना हो उसका बन्ध प्रारम्भ हो जानेके बाद एक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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