Book Title: Bruhad Dravya Sangraha
Author(s): Bramhadev
Publisher: Ganeshprasad Varni Digambar Jain Sansthan

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Page 15
________________ VI] बृहद्रव्यसंग्रहः [विषय-सूची विषय पृष्ठ । विषय निःशंकित व व्यवहार निःशंकित . १६८ ज्ञान सविकल्प-निर्विकल्प व स्वपरप्रकाशक १८१ जिनेन्द्र में असत्यता के कारणों का प्रभाव१६८ 'दर्शन' सामान्यग्रहण व सत्तावलोकन १८३ विभीषण, देवकी व वसुदेव की कथा १६८ सम्यग्दर्शन रूविकल्प, दर्शन निर्विकल्प १८३. सात भय १६६ सम्यग्दर्शन व दर्शन में अन्तर १८३ निश्चय निःशंकित, व्यवह र कारण १६६ छद्मस्थों के दर्शन पूर्वक ज्ञान १८४ निष्कांक्षित व व्यवहार निष्कांक्षित १६६ | केवली के दर्शन व ज्ञान युगपत १८४-१८५ सीता की कथा | दर्शन का लक्षण सन्निकर्ष १८५ निश्चय निष्कांक्षित को व्यहवार कारण १७० लिंगज व शब्दज श्रुतज्ञान । १८५ निर्विचिकित्सा व व्यवहार निर्विचिकित्सा१७० मतिज्ञान पूर्वाक श्रुत व मनःपर्यय १८५ द्रव्य व भाव निर्विचिकित्सा १७०, १७१ मतिज्ञान उपचार से दर्शन १८५ निश्चय निर्विचिकित्सा, व्यवहार कारण १७१ | 'छमस्थ' का अर्थ । १८५ अमूढदृष्टि व व्यवहार अमूढ दृष्टि १७१ तर्क व सिद्धांत से दर्शन का लक्षण १८६ निश्चय अमूढ़द्दष्टि, व्यवहार कारण १७१ | ज्ञान पर-प्रकाशक, दर्शन स्व-प्रकाशक १८७ संकल्प विकल्प का लक्षण. १६७, १७२ सामान्य विशेषात्मक वस्तु १८७ उपगूहन तथा व्यवहार व निश्चय १७२ सामान्य ग्राहक दर्शन तो ज्ञान अप्रमाण१८७ स्थितिकरण गुण, व्यवहार व निश्चय १७३ 'ज्ञान स्वरूप आत्मा' प्रमाण है १८७ मोह कर्मोदय से मिथ्यात्व व रागादि १७३ 'आत्मा' स्व-पर सामान्य विशेष का ज्ञाता १५७ वात्सल्य गुण, व्यवहार व निश्चय १७३ | ज्ञान को जानने से दर्शनपर का भी ज्ञाता १८५ अकम्पनाचार्य व विष्णुकुमार कथा १७३ | | 'सामान्य' का अर्थ 'आत्मा' कैसे १८८ वजकरण व सिंहोदर कथा १७४ तर्क व सिद्धान्त से 'सामान्य' का अर्थ १८८ मुनि भेदाभेद रत्नत्रय के आराधक १७४ सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान में अन्तर १८६ श्रावक भेदाभेद रत्नत्रय के प्रिय (प्रेमी)१७४ अभेद से ज्ञान की अवस्था विशेष सम्यक्त्व १८६ प्रभावना गुण, व्यवहार प्रभावना १७४ सम्यक्त्व व ज्ञान के घातक कर्म२ या १ १६० निश्चय प्रभावना, व्यवहार कारण १७५ शुद्धोपयोग ही वीतराग चारित्र १६० सरागव्यवहार सम्यक्त्व सेसाध्य, वीतराग वीतरागचारित्र का साधक सरागचारित्र १६० चारित्र का अविनाभावी, वीतरागनिश्चय सम्यक्त्व १६० | व्यवहार चारित्र सम्यग्दृष्टि कहाँ-कहाँ उत्पन्न होता है अबत दार्शनिक (सम्यग्दृष्टि) १६१ किस गति में कौनसा सम्यक्त्व १७७ / 'श्रावक' पंचम गुणस्थानवर्ती १६१ सम्यग्ज्ञान, व्यवहार व निश्चय १७७ / ११ प्रतिमाओं का स्वरूप १६१ संशय, विभ्रम, विमोह १७८ सकलचारित्र १६२ 'साकार' शब्द का अर्थ १७८ अशुभोपयोग व शुभोपयोग का लक्षण १६३ द्वादशाङ्ग व अङ्ग बाह्य १७६ निश्चयचारित्र, उत्कृष्टचारित्र १६३ चार अनुयोग, अनुयोग शब्द का अर्थ १८० द्विविध मोक्षमार्ग का साधक ध्यान १६५ निश्चय सम्यग्ज्ञान, व्यवहार साधन १८० ध्यान का कथन १६५ माया, मिथ्या, निदान शल्यों का स्वरूप १८१ | ध्याता का लक्षण १६६ १७६ । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org


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