Book Title: Anusandhan 1997 00 SrNo 10
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 15
________________ सोमतिलकसूरि-कृत : शत्रुजय-यात्रा-वृतांतः - सं. विजयप्रद्युम्नसूरि परिचय अनुमानथी सोळमां सैकामां लखायेला एक प्रचलित 'सिन्दूरप्रकर' नामना ग्रन्थमांथी ग्रन्थ पूर्ण थया पछी दोढ पानामां एक अन्य वृत्तान्त प्राप्त थयो छे. चौदमा सौकाना छेल्ला चरणमां सोमतिलकसूरि शत्रुजय तीर्थनी यात्रा करवा गया त्यारे त्यां केटलां जिनबिंबोने तेमणे वंदना करी हती तेनु आमां वर्णन छे. आना द्वारा ते वर्षोमां शत्रुजय उपर केटलां जिनमंदिर हतां, ते ते मंदिरमां केटली प्रतिमाओ हती, ते ते मंदिरनां नाम शां हतां, ते ऐतिहासिक माहिती आपणने मळे छे. आजे तो आमांनुं घणुं ओर्छ जळवायुं छे. वळी ए पण जाणवा मळे छे के अन्य जैन तीर्थस्थानोनुं त्यांज एक साथे स्मरण थई शके ते हेतुथी मोढेराविहार, शंखेश्वरविहार, साचोरविहार, समळीविहार, सेरीसावतार, कुंडावतार, नंदीश्वरावतार, स्तंभनकावतार, गिरनारावतार - एवा जिनालयो पण त्यां ते वखते हता. परंतु ते वखतना मंदिरोमांथी हाल मात्र नमि-विनमि सेवक सहित युगादिदेवनी प्रतिमा छे. बाकी घणां फेरफार थइ गया छे. चिल्लतलावल्लिनो आ यात्रावृत्तांतमा जे उल्लेख छे, ते उपरथी लागे छे के त्यारे ते उपरना कोटनी साव नजीक हशे. आजे तो ए चिल्लणतलावडी उपरना गढथी खास्सी दूर छे. प्रतिमाओनी कुल संख्या अत्यारे घणी वधी छे. शत्रुजयनी वर्तमान जिनालयनी संख्या अने वर्तमान जिनबिंबोनी संख्यानो ऐतिहासिक दृष्टिए अभ्यास करवा माटे आथी आपणने एक उपयोगी साधन मळे छे. एकदा श्रीतपागच्छाधिराज श्रीसोमतिलकसूरयो महता श्रीसंघेन समं श्रीशत्रुजये जिनान् वंदितुं ययुः तत्रैवं संवत् १३९१ वर्षे [दे] वास्तै(?)वंदिता मुख्यप्रासादे गर्भगृहे पुंडरीकप्रतिमाद्वयं ५६ जिनानन्यांश्च वंदंते स्म । ततस्त्रिद्वार प्रासादे ४९२ जिनान् वंदंते स्म । ततो मोढेरक शंखेश्वर- सत्यपुरसमलिकाविहारेषु १००८ त्रिद्वारप्रासादबलानकं यावत् ततः समरसिंहवसहिकायां Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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