Book Title: Anusandhan 1997 00 SrNo 10
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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दृश्यावश्यायविशिखं विशाखा विशिखा शिखः । विशदः पाशक: पाश्र्वं विश्रामश्चेश्वरोऽशनिः ॥१८९॥ ५०
मध्यतालव्याः ।। ईश प्रकाश कुश केश विकाश काशा - माकाश कीकश पिशाऽनिश पाशि पेशिः।। पिङ्गाश तादृश दृशः सदृशो विनाश - कीनाश कर्कश दिशो दश देशदाशाः ॥१९०॥ ५१ क्रोशाशु लोमश पलाश निवेश लेश - क्लेश प्रवेश परिवेश वसंधवेशः (?) । पशुः पशुः परशुरंशुरुपांशु पांशु - निस्त्रिंश दंश विवशा मश वंश तंशाः ॥१९१॥ ५२ बालिशः कुलिशो राशिर्वराशिर्बडिशो भृशम् । अपभ्रंशः पुरोडाशो विमिश्रोऽश्रिरनेकशः ॥१९२॥ ५३ दर्शः स्पर्शः स्पशोऽमर्शः कर्णो वाशा निशा कशा आशादर्शोर्वशी काशी तिनिशेशानिः कशाः ॥१९३॥ ५४
__अन्ततालव्याः ॥ शौरिर्मुरारौ शिव एव शर्वः शूरः समर्थे झष एव शालः । शमः प्रशान्तौ शकलं च खण्डे शकृत् पुरीषेऽजगरे च शीरः॥१९४॥
५५ मूर्धन्य श्रेष्ठयोर्वेश्या करिण्यां च वशा श्रुणिः । अनं वेदे च कर्णे च श्रुतिर्दास(श)श्च धीवरे ॥१९५॥ ५६ ।
व्यवस्थातालव्याः ॥ शिंशपा शाश्वतं श्वश्रूः श्वशुरः शिशिरः शिशुः । शिश्र श्मश्रु श्मशानानि शशी शश्वत् कुशेशयम् ॥१९६।। ५७ शक(का?)शि विश्वकाशीशस्तथा शीतशिवोऽपि च । तालव्य शद्वययुताः कियन्तोऽमी प्रदर्शिताः ।।१९७।। ५८
उभयतालव्याः ॥
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