Book Title: Anusandhan 1997 00 SrNo 10
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 42
________________ नेमिकुमरु जा पत्तु तहिं, पुणु जंपइ जाइसि एव कहि । जो ससुरासुर-इंदेण, महु दिन्नउ संखु पसन्नेण । सो समरंगणि जिणवि मई, आऊरण-जुत्तउ होइ पर्छ । लइ पहरणु थिइ संमुहर, जुझंतहं नामिउ सो जयउ । ८ तक्खणि पभणइ नेमि-जिणु, सिवदेविहि नंदणु साम-तणु । किं संग्रामि निदिएण, बहु-जीव-समूह-खयंकरेण । वामइ करि तुरु लग्गु महु, जइ नाँवहि लीलई जिणहि तुहुँ । अह व न नाँवहि मज्झु करु, तो जायवि रज्जु करहि पवरु । १२ तिं वयणि आरु? हरि, गुरु-दप्पु लग्गु तसु वाम-करि । बे सूरा बे चारभड, (बे) निज्जिय-तिहुयण-सेस-बल । जासु जिणिदह अतुल बलु, तसु लग्गवि हरि सूहुअकलु (?) । जयजयकारु करंति पर, गयणंगणि आवहिं तेत्थु सुर । १६ बहुविह-फुल्ल-सुयंधीय, कुसुमंजलि तक्खणि मुक्की य । (३८/२) जय जय जायव-कुल-धवल, जय नेमि-जिणेसर अतुल-बल । जय जय सिद्धि-वहुहु कुमर (?), जय निम्मल-नाण-पहाण-धर । तिन्नि पयाहिण दिति सुर, निय-भुवणेहिं जंति तहिं अमर । २० एत्थंतरे सहे (?) कज्ज-गई, तुहं डाडिए (?) निसुणहि मुद्धमई । अद्धचक्कि मण-दुम्मणउ, जावच्छइ तेत्थु दयावणउ । चिंता-सायरे सो पडिउ, अम्ह लेसइ राणिर्वं निज्जिणिउ । जाणिय कज्ज सु दीहमइ, बलदेविं वुच्चइ चक्कवइ । २४ मं उब्वेवइ देहि मणु, बावीसमु एहु उप्पन्नु जिणु । जिणवर होति अणंत-बल, विनाण-कलागम-अइकुसल । मेइणि छत्तु धरति सिरि, उम्मूलवि लीलई डंडु गिरि । संसारिउ सुहं नऽहिलसहि, न-वि रज्जु भोगु विसया वि नहि । २८ ६. दिनउ २२. तेथ ९. सामतj १०. निदृएण १६. तेथ २३. पदिओ ... गणि च २६. विनाण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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