Book Title: Visheshavashyak Bhashyam Uttararddh
Author(s): Jinbhadra Gani Kshamashraman
Publisher: Rushabhdev Keshrimal Shwetambar Samstha

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Page 392
________________ विशेषाव कोव्वाचार्य वृत्ती ॥८८४॥ जह धणुपुरिसपयत्तेरियेसुणो भिण्णदेसगमणं तु । गइकारणविगमम्मिवि सिद्धं पुव्वप्पओगाओ॥३७८८॥ सिद्धस्य बंधच्छेयणकिरियाविरमेऽवि तहा विमुच्चमाणस्स । तस्साऽऽलोगंताओ गमणं पुव्वप्पओगाओ॥३७८९॥ गतिः जह वा कुलालचक्कं किरियाहेउविरमेवि सकिरियं । पुवप्पओगओच्चिय तह किरिया मुच्चमाणस्स ॥३७९०॥5 नालाबुगादिसाहममत्थि सिद्धस्स मुत्तिमत्ताओ । तन्नो तग्गइपरिणामदेससाहम्मओ तेसिं ॥३७९१॥ ॥८८४|| जइव न देसोवणओ दिटुंतोतो न सव्वहा जुत्तो। [सिद्धो जं नत्थि वत्थुणो वत्थुणाजए सव्वसाहम्मं ॥३७९२॥ उड्डगइहेउओच्चिय नाहो तिरिय गमणं नवाऽचलया। सविसेसपच्चयाभावओ य सव्वन्नुमयओ य ॥३७९३॥ गतिमत्तओ विणासी केसी गच्चागमी य मणुओव्व । होइ गइपज्जयाओ णासी ण उसव्वहाऽणुव्व ॥३७९४।। केसनिमित्तं कम्मं न गई तदभावओ तो कत्तो? अह गइ चेव निमित्तं किमजीवाणं तओ नस्थि ॥३७९५।। केसोत्ति जीवधम्मो होज मइ होउकहमजीवस्स। किह वा भवत्थधम्मो होउ भवाओ विमुक्कस्स॥३७९६।। ज गइमओ विधाओऽवस्सं तकारणं च जदवस्सं। वियस्सावत्थाणं जओ य गमणं तओ पुच्छा ॥३७९७॥ 'गंतूण'मित्यादि ॥ आह चोदकः-कथमकर्मकस्य गमनं ?, उच्यते, सकर्मकस्यापि गमने को हेतुर्येनैवं चोद्यते ?। तथाहि'कम्म'मित्यादि स्पष्टं, चोदक आह-स्वभावः, उच्यते-'इह' अकर्मकगमनपक्षे स एव ॥ आह-'सकी'त्यादि प्रख्याता ॥'जं - | त्यादि, अथवा यद् येन क्रियाकारणं तदतः स्वभावात् एवमत्रापीति । शेषं प्रायः सुचिन्त्यं, यावत् 'नालाबुगादि' इत्यादि । न | सिद्धस्स लाबुकादिसाधयं तेषां मूर्तत्वाद् , उच्यते, गत्वोधग(तन्न, तद्ग)तिमात्रसामान्यविवक्षगाद् । 'जती'त्यादि ॥ यदि च न SSSSSSSSSS

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