Book Title: Pali Hindi Shabdakosh Part 01 Khand 02
Author(s): Ravindra Panth and Others
Publisher: Nav Nalanda Mahavihar

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Page 300
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir आहच्चनियम 273 आहच्चभासित 1606; तेसु द्वावीसति तिका सतं दुकाति अयं आहच्चभासिता ... मातिका नाम, ध. स. अट्ट. 10; - च्चाकारभेद पु... कण्ठ आदि उच्चारण स्थानों के साथ वायु की टकराहट के आधार पर आकार के भेदों जैसा भेद - देन तृ. वि., ए. व. - आहच्चाकारभेदेन तिविधा हि विपस्सना, ना. रू. प. 1616; स. उ. प. के रूप में अना. के अन्त., द्रष्ट... आहच्चनियम पु., विशिष्ट स्वरूप का अथवा सुनिश्चित प्रकृति वाला नियम - एत्थ तस्मानपेक्खित्वा आहच्चनियम बुधो, तब्भावभाविमत्तेन, पच्चयत्थं विभावये, ना. रू. प. 730. आहच्चपच्चय पु., पट्ठा. में निर्दिष्ट विशिष्ट प्रकार के प्रत्यय, बुद्ध के सर्वज्ञता के ज्ञान के प्रभाववश विशिष्टरूप में उपदिष्ट पट्ठान-नय के 24 प्रत्यय - ट्ठ पु., विशिष्ट प्रकार के प्रत्यय (कारण) होने का तात्पर्य या आशय - द्वेन तृ. वि., ए. व. - आहच्चपच्चयटेन चतुवीसतिधा ठिता, ना. रू. प. 798; - द्विति स्त्री., पट्ठान में निर्दिष्ट प्रत्ययों की विशिष्टता अथवा विशिष्ट स्वरूप में रहने की स्थिति - ति प्र. वि., ए. व. - पटिच्च फलं एति एतस्माति पच्चयो, तिहति फलं एत्थ तदायत्तवृत्तितायाति ठिति, आहच्च विसेसेत्वा पवत्ता पच्चयसवाता ठिति आहच्चपच्चयद्विति, अभि. ध. वि. टी. 206; केचि पन “आहच्च कण्ठतालुआदीसु पहरित्वा वुत्ता विति आहच्चपच्चयट्टिती ति, तदे.; - तिं द्वि. वि., ए. व. - पट्टाननयो पन आहच्चपच्चयद्वितिमारब्भ पवच्चति, अभि. ध. स. 55; आहच्चपच्चयट्ठितिमारब्भ पवच्चतीति, अभि. ध. वि. टी. 206. आहच्चपद नपुं., स्वयं बुद्ध द्वारा निश्चित रूप से भासित, 1. वचन, प्रामाणिक वचन, उद्धरणीय बुद्धवचन, 2. कण्ठ आदि उच्चारण-स्थानों से ले आकर अपनी वाणी द्वारा भासित वचन - दं प्र. वि., ए. व. - आहच्चपदन्ति सुत्तं अधिप्पेतं, पारा. अट्ठ. 1.179; आहच्चपदन्ति भगवतो सब्ब तआणेन विसेसेत्वा उत्तवचनं, मि. प. टी. 28(रो.); कण्ठादिवण्णप्पवत्तिट्टानं आहच्च विसेसेत्वा भासितं पदं आहच्च पद, सारत्थ. टी. 2.40; कण्ठादिवण्णुप्पत्तिट्टानकरणादीहि आहरित्वा अत्तनो वचीवित्तियाव भासितवचनं आहच्चपदं, वि. वि. टी. 1. 104; - देन तृ. वि., ए. व. - आहच्चपदेन रसेन आचरियवंसेन अधिप्पाया कारणत्तरियताय, मि. प. 148. आहच्चपाठ पु., त्रिपिटक का पाठ, त्रिपिटक में उपलब्ध बुद्धवचन की पंक्ति - ठो प्र. वि., ए. व. - आहच्चपाठो निदस्सनं, सद्द. 1.147; अत्रायं आहच्चपाठो, सद्द. 3.829. आहच्चपाद पु., अलग किए जाने योग्य पायों वाला मंच या पलंग - दो प्र. वि., ए. व. - कुळीरपादो आहच्चपादो चेव मसारको, चत्तारो बुन्दिकाबद्धो तिमे मञ्चन्तरा सियु, अभि. प. 310; यस्स अटनिछिद्दे पादो पविसित्वा तिट्ठति, सो आहच्चपादो, अभि. प. टी. 310 (बर्मी). आहच्चपादक त्रि., ऐसा पलंग जिसके पायों को अलग कर पुनः जोड़ा जा सके, 4 प्रकार के पीठों में से अन्यतम पीठ, तोड़ने एवं जोड़ने योग्य पैरों वाला (मञ्च)- को प्र. वि., ए. व. - सोसानिको आहच्चपादको मञ्चो उप्पन्नो होति, चूळव. 275; कुळीरपादको आहच्चपादकोति, चूळव. अट्ठ. 76; आहच्चपादको नाम अटनियो विज्झित्वा अटनिछिद्दे पादसीसे सिखं कत्वा तं पवेसेवा अटनिया, विन. वि. टी. 1.314; - कं' नपुं., प्र. वि., ए. व. - चत्तारि पीठानि - मसारकं बुन्दिकाबद्ध, कुळीरपादक, आहच्चपादक, पाचि. 60; - कंद्वि. वि., ए. व. - आहच्चपादकन्ति अङ्गे विज्झित्वा पवेसितपादक, कवा. अट्ठ. 198; " ... उपरिवेहासकुटिया आहच्चपादक मञ्च सहसा अभिनिसीदिस्सती ति, पाचि० 67; आहच्चपादक मञ्चं वेहासकुटियूपरि पीठं वाभिनिसीदन्तो, आपज्जति न भूमितो, उत्त. वि. 448; - के सप्त. वि., ए. व. - आहच्चपादके मञ्चे वा पीठे वा ठितो उपरि नागदन्तकादीसु, पाचि. अट्ठ. 43; आहच्चपादके मञ्चे, विन. वि. 1100; आहच्च पादके सीद, उत्त. वि. 85. आहच्चपाळि स्त्री., स्वयं बुद्ध द्वारा उपदिष्ट त्रिपिटक की पंक्ति - या तृ. वि., ए. व. - एकन्तपुमवाचकत्तञ्चस्स आहच्चपाळिया आयति, सद्द. 1.209. आहच्चमासित त्रि., निश्चित रूप से (त्रिपिटक में संगृहीत) स्वयं बुद्ध द्वारा कहा गया (वचन), बुद्ध का आत्मप्रत्यक्षवचन - ता स्त्री., प्र. वि., ए. व. - अयं .... आहच्चभासिता जिनवचनभूता ... मातिका, ध. स. अट्ठ. 10; आहच्चभासिता सावकभासिताति दुविधा... मातिका, मो. वि. टी. 5; -- तं नपुं.. प्र. वि., ए. व. - अत्तपच्चक्खवचनं न होतीति आहच्च भासितं न होतीति अधिप्पायो, वजिर. टी. 19;स्स ष. वि., ए. व. - आहच्चभासितस्स च दस्सनतो For Private and Personal Use Only

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