Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 11
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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षोडशोऽधिकारः ध्यानस्वरूपम् [रथोद्धता]
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ध्यानमहोभवमुक्तनिदानं, पूर्वयुगं न हितं हितमन्त्यम् । आर्तमिहाद्यमुपादिमौद्रं, धर्मामुपान्तिममन्तिमशुक्लम् इष्टवियुक्ति रनिष्टकदाप्ति - र्दुःखदवानुभवो ननु मा भूत् । तद्विपरीतमथाऽस्तु निदानं, ध्यायति नित्यमिहाऽऽर्तवशात्मा जीवविघातमसत्यमदत्तं, रक्षणमिन्द्रियगोचरसत्कम् । रौद्रवशो विदधात्यविरामं, मुञ्चति तं कुगतिर्न निकामम् ध्यायति सन्मतिरहदुपज्ञं, कर्मविपाकमपायमनन्तम् । लोकविचारमनाप्तविकार, धर्म्यमहर्पतिभासितसारम् आत्मनि लीनतया गतकामो, मेरुमहीधरवत्स्थिरभावः । शुक्लपर: परमात्मपदत्वं, विन्दिति नो चिरमुच्छ्रितसत्त्वम् कायबलं बलमात्मसमुत्थं, स्थानबलं बलमीप्सितमन्यत् । ध्यानकृते सुकृती हृदि धृत्वा, ध्यानपथे पथिकत्वमुपेयात् હોદ્દો यस्य मनः स्पृहतेऽत्र शिवाय, दुह्मति दुष्टदुरन्तभवाय । ध्यायति नार्तमसौ न च रौद्रं, ध्यायति धर्म्यमथाऽपि च शुक्लम् ॥७॥ सर्वसमीहितदानसमर्थं, पूरितपूर्णपवित्रपुमर्थम् । ध्यानवरं यदि वाञ्छसि सत्यं, ध्याननूपस्तुतिमाचर तथ्यम्
॥८॥
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