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राजविद्या।
[३३] त्तस्यश्च वृथा न यापनम् दशमम् ॥ एकादशस्थान दृढता दुर्गादि बलम् ॥ इष्ट योगस्य च द्वादशमिति ॥
भाषार्थ पूर्ण अवयव ( हाथ पग आंख कानादि) सामग्री सहित शरीरिक और आत्मिक और बां. धव और सम्बन्धियों का बल पेला है ।। तप और पुरुषार्थ दूसरा बल है ।। तीसरा द्रव्य विद्या कोष (खजाना) बल है ।। चौथा धर्म और वीरता का बल है ।। पांचमा राज्य शासन ( राज्य करना) पराक्रम और पुन्य का। छटा बुद्धि चतुर्ता सहित सत्यभाव और ज्ञान ॥ सातमा अस्त्र शस्त्रों के अभ्यास का बल॥आठमा मित्र और सम्बन्धियों की स्नेह प्रीति और सहायता का बलानवमा नित्य अभ्यास पाई हुइ अपने वश में सेना का बल ।। समय में विचार करना याने वृथा न बिताना ये दशमा बल है । इग्यारमा स्थान दृढता दुर्गादि बल है । इष्टयोग बारमा बल हैं ।
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