Book Title: Prakaran Ratnakar Mool
Author(s): Mehta Nagardas Pragjibhai
Publisher: Mehta Nagardas Pragjibhai
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चोयाला ॥१६५॥ सग सय पएणासा णपिहुत्ति चउवएण सहस मेरुवणे । गिरिविचरि चन सहसा, सवसमासो हव लक्खं ॥ १६६ ॥ जोअणसयदसगंते, समधरणीओ अहो अहो. गामा । बायालीससहसहि, गंतुं मेरुस्स पलिम
ओ ॥१६७॥ चन चउतीसं च जिणा, जहएणमुकोसया अ हुँति कमा। हरिचकिबला चउरो, तीसं पत्तेअमिह दीवे ॥ १६७ ॥ ससि. गरविगचारो, इह दीवे तेसि चार खित्तं तु। पण सय दसुत्तराई, गसहि हाया (जागा) य अमयाला ॥ १६९ ॥ पणरस चुलसीश्सयं, बप्पएणमयालजागमाणाई। ससिसूरमंगला, तयंतराणिगिगहीणाई॥१७॥ पणतीसजोअणे जागतीस चउरो अ नाग सगहा (ना) या। अंतरमाणं ससिणो, रविणो पुण जोधणे मुएिण ॥ १७१ ॥ दीवंतो असिअसए, पण पणसट्ठी थ मंगला तेसिं । तीसहिअतिसय लवणे, दसिगुणवीस सयं कमसो ॥ १७२ ॥ ससिससिरविरवि

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