Book Title: Nandanvan Kalpataru 2016 05 SrNo 35
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 12
________________ श्रामण्यमिष्टजनकं प्रतिरुद्धपापं, लोकोत्तरं शिवमवाप्नुमना यतेत । यत्नं विना भववने निबिडे च देही, बम्धम्यतेऽनवरतं समुपैति दुःखम् ||१३|| सन्तोषिणोऽनुपमसौख्यमुपेयिवांसो, नया मृदुत्वकलिताः सरलाः पवित्राः । सत्यवता भवभयानि विनोदयन्तो, राजन्तु भूमिवलयेषु तपस्विनस्ते ||१४|| सदर्शनोदयकरो बुधनन्दनोऽपि, विज्ञानपद्मसविताऽमृतवाग्विलासः । लावण्य-धाम-विजितेन्दुरविं न नीति, कस्तूररम्यवचसं गुरुनेमिसूरिम् ||१५|| पुण्यं स्तवं शिवकरं श्रमणोत्तमानां, श्रीनेमिसूरिविजयामृतदेवशिष्यः। पन्न्यासमेरुविजयाप्तनिदेशदक्षो, मुम्बापुरे रचितवान्मुनिहेमचन्द्रः ||१६|| * * *

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