Book Title: Kasaypahudam Part 12
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 13
________________ ( १२ ) चौथी सूत्रगाथा में उदाहरणों द्वारा लोभके चार भेदोंको स्पष्ट किया गया है । यथा - कृमिरागके रंगके समान, अक्षमल ( ओंगन ) के समान, धूलिके लेपके समान और हलदी से रंगे हुए वस्त्र के समान । उदाहरणों सहित इन सोलह भेदोंका स्पष्टीकरण मूलमें किया ही है, इसलिये वहाँसे जान लेना चाहिए । पाँचवीं सूत्रगाथा द्वारा चारों कषायोंके उक्त सोलह स्थानोंमें स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी अपेक्षा कौन स्थान किस स्थानसे कम होता और कौन स्थान किस स्थान से अधिक होता है इसका पृच्छारूप में निर्देश किया गया है । जयधवला टीकामें इस सूत्रगाथा की व्याख्या करते हुए स्थितिके विषयमें बतलाया है कि सब स्थितियोंमें एकस्थानीय, द्विस्थानीय, त्रिस्थानीय और चतुःस्थानीय सब प्रकारके कर्मपरमाणु पाये जाते हैं ! इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जैसे किसी जीवने मिथ्यात्वकी सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण स्थितिका बन्ध किया तो जैसे उक्त कर्मको अन्तिम स्थितिमें एक स्थानीय आदि चारों भेदोंको लिये हुए देशघाति और सर्वघाति कर्मपरमाणु पाये जाते हैं उसीप्रकार आबाधासे ऊपर जघन्य स्थिति में भी वे सब प्रकारके कर्मपरमाणु पाये जाते हैं । छठी सूत्रगाथा द्वारा इन स्थानों में प्रदेशों और अनुभागकी अपेक्षा क्या व्यवस्था है इसे स्पष्ट करने के लिये लताके समान मानकषायको विवक्षित कर बतलाया है कि अनुभागकी अपेक्षा जो जघन्य वर्गणा है अर्थात् प्रथम स्पर्धककी प्रथम वर्गणा है उससे अन्तिम ( उत्कृष्ट ) स्पर्धककी जो अन्तिम वर्गणा है वह प्रदेशोंकी अपेक्षा अनन्तगुणी हीन होती है और अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणी अधिक होती है । यह लता के समान मानकषाय में प्रदेशों और अनुभागकी व्यवस्था है । इसी प्रकार मानकषायके शेष तीन प्रकार के अनुभाग में तथा क्रोध, माया और लोभकषायसम्बन्धी प्रत्येकके चार-चार प्रकारके अनुभाग में प्रदेशों और अनुभागकी अपेक्षा उक्त प्रकारसे स्वस्थान अल्पबहुत्व घटित कर लेना चाहिऐ । सातवीं सूत्रगाथाद्वारा एक स्थानसे दूसरेमें प्रदेशोंकी अपेक्षा क्या व्यवस्था है इस बातको स्पष्ट करते हुए बतलाया है कि लताके समान मानकषायके प्रदेशोंसे दारुके समान मानकषायके प्रदेश नियमसे अनन्तगुणे हीन होते हैं । इसी प्रकार आगे अस्थिके समान और शैलके समान मानकपाय में भी जान लेना चाहिए । अर्थात् दारुके समान मानकषायके प्रदेशोंसे अस्थि के समान मानकषायके प्रदेश अनन्तगुणे हीन होते हैं । तथा अस्थ के समान मानकषायके प्रदेशोंसे शैलके समान मानकषायके प्रदेश अनन्तगुणे हीन होते हैं । आठवीं गाथा द्वारा इन स्थानोंमें अनुभागकी व्यवस्था की गई है । वहाँ बतलाया है कि लताके समान मानकषायमें जो अनुभाग है उससे दारु, अस्थि और शैलके समान मानकषायमें अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्त गुण होता है विशेष व्याख्यान मूलसे जानना चाहिए । यहाँ अनुभागाग्रसे फलदान शक्तिके अनुभाग प्रतिच्छेद लिये गये हैं इतना विशेष जानना चाहिए । नौवीं गाथा द्वारा लतासमान आदि भेदोंकी अन्तिम वर्गणासे दारुसमान आदि भेदोंकी प्रथम वर्गणामें प्रदेशों और अनुभागकी अपेक्षा क्या व्यवस्था है इसका विचार करते हुए बतलाया है कि पिछले भेदकी अंतिम वर्गणासे अगले भेदकी प्रथम वर्गणा प्रदेशोंको अपेक्षा हीन और अनुभागकी अपेक्षा अधिक होती है । यहाँ अन्तिम वर्गणा और प्रथम वर्गणाकी 'सन्धि' यह संज्ञा रखकर विचार किया गया है । दसवीं सूत्रगाथा द्वारा यह बतलाया गया है कि लताके समान समस्त मान और दारुके समान मानका प्रारम्भका अनन्तवाँ भाग देशघाति अनुभागरूप है तथा शेष दारुके समान मान और अस्थि तथा शैलरूप मान यह सब सर्वघाति है । यहाँ छठी गाथासे लेकर दसवीं गाया तक मानकपायके आलम्बनसे जो प्ररूपणा की गई है वह सब प्ररूपणा क्रोधकषाय, मायाकपाय और लोभकपायके आलम्बनसे भी करनी चाहिए, क्योंकि मानकषायके

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