Book Title: Jayanti Charitram
Author(s): Malayprabhsuri, Vijayakumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala
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________________ 545453 // 249 परपरिवादे सुभद्रा श्वश्रूवृत्तान्तः। न्धुनामा दवजई कम्मनिजरारहिओ / अहिओ जो चाणके दुक्खी जीवह चिरं कालं // 87 // // पैशुन्यकथानकं समाप्तम् // परपरिवादोपि महापापस्थानमिति प्रतिपादयन्ति प्राज्ञाः। यतः शरदिन्दुकुन्दसुन्दरेषु परगुणेषु द्वेषविदग्धतया, स्वस्य च दुर्विदग्धतया, मात्सर्योत्सर्पिसप्तार्चिदग्धतया, सन्मार्गसंचरणमुग्धतयाऽयं प्रवर्तमानः सरित्पूरे प्रवाह इव भिन्दानः क्षमा, | दधानो रजःपटलकलुषतां, प्रतिपदं प्रसरन्नुक्कलिकामिः समूलमुन्मूलयन् स्थर्यगांभीर्यादिगुणग्रामक्षमारूहान्, निवारयन् तीर्थावतारं, प्रकटयन द्विजानामप्यनभिगमनीयतां, नीचनीचस्थानानुसारितया पातयत्यणोरपारे संसारे पारावारे प्राणिनः। ततः ते भ्राम्यन्ते विविधावतग्रस्यन्ते कुप्राहैरितः ततः समाकृष्यन्ते जलजन्तूभिः, दह्यन्ते महोपतापवडवानलेन न लभन्ते पारं, सुचिरमनुभवन्ति दुःखसंभारं / इहापि जन्मनि परेषामसदोषवादतः वारसमुद्रोद्गारतः प्रवर्तते सरस्वतीषु वैरस्य, जायते नीचैः गोत्रानुषंगतः पापपंकपरिणतिः, सुभद्राश्वसुरश्चशूप्रमुखवर्गस्येव सम्पद्यतेऽनभिगमनीयता / तथाहि चंपानामेण पुरी आसि पुरा तत्थ सावओ हुत्था / जिणदत्तो जिणवयणेसु निच्चलो मेरुगिरिगरूओ॥१॥ तस्स सुयासि सुभद्दा पुबज्जियपुत्रपगरिसवसेण / अइरूवसम्पयाए अवि दिति मोहममराणं // 2 // नवजोवणे हि रूढा जीवाइवियारणे असंमूढा / निम्मलसम्मदंसणमणिभूसियसीललंकारा // 3 // जिणरायपायपूयापरायणा समयसारमणवरयं / आसाइय गुरुमूले कमले भमरि व मयरंदं // 4 // दिवा सहीहि सहिया बच्चन्ति जिणहरंमि अमदिणे / तच्चनियमत्तेणं वणिएणं बुद्धदासेणं // 5 // चिन्तियमणेण एसा मणहरसोहग्गरूवलावना / कना परिणिसई लहिही जस्सेह स कयत्थो // 6 // अन्भत्थिओवि SHAS // 249 //

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