Book Title: Jayanti Charitram
Author(s): Malayprabhsuri, Vijayakumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala

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Page 310
________________ CI // 297i श्रोत्रेन्द्रिय विषयास|क्ता भद्रा सार्थवाहीदृष्टान्तः। स्पर्शनवशमा अप्येवमेव / श्रोत्रंद्रियविषयव्यासक्तो हि जीवो प्रान्तमनाः सार्थवाहपत्नीव इहलोकेऽपि प्राणव्यपरोपणमाप्नोति // तथाहि आसि इह भरहवासे नयरं नामेण पउमिणीखण्डं / तत्थ नीइपहाणो होत्था पउमप्पहो राया ॥१॥धणउ व धणी धनो रनो अइवल्लहोत्ति सुपसिद्धो। धणनामसत्थवाहो आसी पुरलोयनमणिजो // 2 // तस्स य भद्दा धरिणी करिणी घणदाणरसियकरपसरा / उत्तमकूलसम्भूया रहभ्या रुवलच्छीए // 3 // पुबभवजियपुन्नाणुमावसम्पनवन्छियत्थाण / ताणं वच्चइ कालो परूप्परं पेमवन्ताण // 4 // अह अन्नया निसन्ते जागरमाणो इमं विचिन्तेइ / एस धणसत्थवाहो सयावि पडिवननिबाहो // 5 // पुरिसस्स जाव लच्छी अणिट्ठिया सुट्ट भुजमाणावि / तावच्चिय सोहग्गं हवइ जए गउरवं ताव // 6 // दिणमणिकिरणकलावे पसरन्ते हुन्ति जह जए पयडा / अत्था तह अत्थेण गुणा वि परिवढ्डमाणेण // 7 // इच्चाइ चिन्तिऊणं भणिया भद्दा अणेण जह मद्दे ! / अत्थोवजणहेउं गच्छिस्सं अनदेसम्मि // 8 // चिरसंचियावि लच्छी छिनइ जम्हा अणायवयवसओ / निच्चं उल्लिञ्चन्तो कालेणं सुसह जलहीवि // 9 // तुमए पुण कायवो घरम्मि अप्पम्मि रक्खणापयत्तो / जावऽजिऊण अत्थं अहमागच्छामि निविग्धं // 10 // देसन्तरविणिवत्तणजोग्गाइ कयाणगाई चित्तूण / वाणिजेणं गच्छड़ एसो गरूएण सत्थेण // 11 // महावि घरे चिट्ठइ नेवत्थेणं पउत्थवइयाए / धणसत्यवाहपिययमसुमरणगुणगीयरसियंगी // 12 // अन्नम्मि दिणे तीए दासी सम्पेसिया विवणिमग्गे / किणणत्थं पणियाणं चिरेण पत्ता घरे तत्तो // 13 // भद्दाए रुवाए निट्ठरवयणेहि तजिया दासी / आ पावे कत्थ ठिया ? अवरावरकजभंगेणं // 14 // भदाहुत्तं वुत्तं तीए सामिणि ! सुणेहिं 15645453 // 297 //

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