Book Title: Jayanti Charitram
Author(s): Malayprabhsuri, Vijayakumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala

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Page 269
________________ मायामृषावादपापस्थानके कटक्षपको दाहरणम्। डिस्सइ चउत्थपोलीदवारंपि // 106 // एवं परपरिवाओ जाहि कओ ताण दीवयसएहि / दोसागमकलुसाई कहमवि न जयन्तीजयन्ती-II महादीसति मुहाई दीसन्ति // 107 // एयं पावट्ठाण परपरिवायं मुणिन्तु जे जीवा / न कुणन्ति ताण भई होइ सुभद्दा व माणेण // 108 // प्रकरण ।परपरिवादकथानकम् / वृतिः / जिनप्रवचनक्षीरसागरावगाहव्यासक्तिविवेककौस्तुभगमस्तिस्तोमप्रकाश्यमानहृदयभोगैः हृषीकेशः परमर्षिभिः प्रतिपाद्यते मायामृषापि प्रकर्षप्राप्तं महापापस्थानं / अतः स मायामृषावादो समक्षभिक्षुवेषधारितया, निसर्गसिद्धशरीरकृशतया, दुष्कर्मे॥२५६॥ न्धनदहनकृशानुप्रतिमतपश्चरणकरणप्रख्यातिकारितया, विप्रलब्धभक्तिभाजनमहाजनद्रव्यापहारितया खरतरोषरक्षितिरिवाऽप्रभवः सुकृतबीजांकुराणां, पातालमिवावासस्थानं महापापासुराणां, क्षेत्रमिव क्षत्रप्रदानाद्य( ऽवम )क्षत्राणां, सृष्टिरिव प्रथमा दुरन्तदुःखदानसत्राणां, केदारभूमिरिव विषादविषमविषकंदलानां, अग्रानीकमिव महामोहमहीपतिदलाना, चाणक्यबुद्धिरिव कूटयंत्राणां, गर्दास्थानं सर्वास्तिकवादितंत्राणाम् / अनया हि विप्रलब्धा मुग्धाःप्राणिनः सत्यसंकल्पेऽपि विशुद्धब्रह्मचारिणि कलिमलक्षालनगंगावारिणि तेजस्विनि तपस्विनि न विश्वसन्ति / यतः-वियसियपउमे न विससइ तारयपडिबिम्बसंकिरो भमरो। इयरजणविप्पलंभे सुयणेवि जणो न पत्तियइ // 1 // इहलोकेऽप्यनेन त्रिग्राममध्यवासिकूटक्षपकोऽयोरशिव इब पापतः प्रकटीभूतदम्भः प्राणी प्रामोति विचित्रां विडम्बनाम् / तथाहि उज्जेणीनयरीए रिद्धीए सग्गपाडिसिद्धीए / ससिमूलसूरमंगलनिवासपुहवीपसिद्धीए // 1 // आसि य तत्थ माइणपुत्तो | PJ दोसाण मन्दिरं कुडो / नामेणाऽघोरसिवो जणोवतावी हुयासो व // 2 // माइन्दजालकूडप्पओगमोहन्धलो य दवाई / अब % A2% AKAR RJ // 256 //

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