Book Title: Jayanti Charitram
Author(s): Malayprabhsuri, Vijayakumudsuri
Publisher: Manivijay Ganivar Granthmala

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Page 272
________________ // 259 // 5+++ स्थबिर ACCU गुरुणां + + लहुमाया जुवराया रूवसंपया कामो / नवजुवणामिरामो तस्साऽऽसी जणमणारामो // 2 // नाएण विक्कमेण य तिवग्गसाहणपराण दोन्हंपि / रजसिरिपालणेणं सुहेण अणेहम्मि गच्छन्ते // 3 // अप्पडिबद्धविहारा सुयसायरपारगामिणो गुरूणो / बहुगच्छपरिवारा समोसढा बहिरूजाणे // 4 // तेसिं आगमणेणं सुरूदएणेव निहयदोसेण / राया सिरिनिवासो पुंडरीओ होइ सवियासो॥५॥ जुवराएणं सद्धिं तेसिं पयकमलवन्दणाहेऊ / गच्छइ सबिड्डीए वन्दइ तिपयाहिणीकाउं॥६॥ उचियद्वाणनिसन्नो तएक्कचित्तो सुणेइ धम्मकहं / अमियरसं व पियन्तो अवगाहन्तो सुहसमुदं // 7 // सुगुरूण देसणाए दिणमणिकिरणावलिसणाहाण / अवसरइ मोहनिदा निमि सिरिपुंडरीयंमि // 8 // तो एस महाराओ महुयरझंकारमहुरवाणीए / विनति थेराणं सुगुरूणं कुणइ पडिबुद्धो॥९॥ तुम्ह वयणऽञ्जणेणं भयवं अम्हाण नाणदिट्ठीए / संसारस्स सुरूवं पयर्ड चिय सम्पयं जायं // 10 // संसारे कन्तारे भयवं अक्खेसु पत्तपसरेसु / विषयामिलासरक्खसघत्था जीवा परिभमन्ति // 11 // पाविन्ति दुहसयाई चउरासीजीवजोणिलक्खेसु / उप्पन्ना पुणरूत्तं पारं न लहन्ति संसत्ता // 12 // पहु तुम्ह वयणमन्तप्पहावसरेण दलियमाहप्पा / विसएसुं अभिलासा अवकन्ता रक्खसी दूरं // 13 // अप्पवसोऽहं अहुणा रजं चइऊण तुम्ह पयकमले / फुल्लन्धुय व लीणो आसाइस्सामि चरणमहुं // 14 // तत्तो गुरूहि भणिओ अहासुहं मा करेसु पडिबन्धं / नमिऊण तओ राया नयरिं पञ्चागओ झत्ति // 15 // जुवरायं तह भायं मणइ तओ वच्छ इच्छसु इयाणि / रजसिरिं परिपालय जेणाऽहं निक्खमिस्सामि // 16 // पडिभणइ कण्डरिओ रजसिरिं चयसि देव! कीस तुमं? | नरयदुहाणं भीओ जम्पद इय पुण्डरीओवि // 17 // तो किन वल्लहोऽहं ? तुम्हाणं देव नरयदुहहेउं / तं मह दिजइ रजं सावजारम्भसंरम्भ देशनाश्रवणे पुण्डरिकनृपस्य दीक्षाऽमिलापः। + + +++ +++ // 259 //

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