Book Title: Aradhanasar
Author(s): Devsen Acharya, Ratnakirtidev, Suparshvamati Mataji
Publisher: Digambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
View full book text
________________
आराधनासार - ५०
स्याज्जघयोरधोभागे पादोपरि कृते सति । पर्यको नाभिगोत्तानदक्षिणोत्तरपाणिकः ॥
अयमेवैकं जंघाया अधोभागे पादोपरि कृतेऽर्धपर्यकः ।
वामप्रदक्षिणोरूर्ध्वं वामोरूपरि दक्षिणः । क्रियते यत्र तद्वीरोचितं वीरासनं स्मृतं ॥ पृष्ठे यत्राकृतीभूतदोर्भ्यां वीरासने सति । गृह्णीयात् पादयोयंत्रांगुष्ठौ वज्रासनं हि तत् ॥
जंघाया मध्यभागेषु संश्लेषो यत्र जंघया । पद्मासनमिति प्रोक्तं तदासनविचक्षणैः ॥
इत्यादि । निद्रालक्षणं किं । सर्वदोन्निद्रकेवलज्ञानदर्शननेत्रपरमात्मपदार्थविलक्षणनिद्रादर्शनावरणकर्मोदयेन स्वापलक्षणा निद्रा । यावदाहारस्य विजय: आसनस्य विजयः, निद्राया विजयः । आहारादीनां विजय इति । क्रोधः इति चेत् । यथा यौवनावस्थायां पुमान् अनशनावमीदर्यादिभिस्तीव्रतपोविशेषैराहारजयं तथा आसनविजयं निद्राविजयं करोति तथा वृद्धावस्थायां कर्तुं न शक्नोति इति तात्पर्यं । कुतः आहारासननद्वादोनां विजयोस्ति । अप्पणो आत्मनः आत्मनः सकाशात्। कथं । शृणं नूनं निश्चयेन । न
दोनों जषाओं के अधोभाग में दोनों पैरों को ऊपर करके नाभिके समीप बायें हाथ के ऊपर दाहिना हाथ रखना यह पर्यक आसन कहलाता है। इसी प्रकार एक जंघा के अधोभाग में एक पैर को ऊपर रखना अर्ध पर्यंक आसन कहलाता है जिसमें बाम (बायें पैर के ऊपर दाहिना पैर और दाहिने पैर पर बॉया पैर रखा जाता है, उसको धीरो के लिए उचित वीरासन कहा जाता है। वीरासन से बैठकर दायें बायें हाथों को करके जो दोनों हाथों से पैरों के अंगूठे पकड़े जाते हैं उसको वज्रासन कहते हैं। दोनों जंघाओं के मध्य भाग का स्पर्श करके जो दोनों पैर जंधा के ऊपर रखे जाते हैं और उसके ऊपर दोनों हाथ रखे जाते हैं उसको आसनों के जानने वाले महापुरुषों ने पद्मासन कहा है।
निद्रा का लक्षण सदा काल के लिए खुल गये हैं केवलज्ञान और केवल दर्शन रूपी नेत्र जिनके ऐसे परमात्म- पदार्थ से विलक्षण निद्रा दर्शनावरण कर्म के उदय से स्वाप (सोना) लक्षण निद्रा कहलाती अर्थात् जिसमें पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाती हैं उसको निद्रा कहते हैं । आहारविजय, आसन विजय और निद्राविजय करने वाले को आहार - आसन निद्रा विजयी कहते हैं।
मानव अनशन अवौदर्य आदि तप विशेष के द्वारा युवावस्था में जैसा आहार विजयी होता है. आसनविजयी और निद्राविजयी होता है, वैसा आहारविजयी, निद्राविजयी, आसनविजयीं वृद्धावस्था में नहीं हो सकता, अत: आहार, आसन और निद्रा विजयी मानव संन्यास के योग्य होता है।