Book Title: Devta Murti Prakaran
Author(s): Vinaysagar, Bhagvandas Jain, Rima Jain
Publisher: Prakrit Bharati Academy

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Page 223
________________ देवतामूर्ति-प्रकरणम् जिनं देव के आगे स्तुति, मंत्र और पूजा का करके निकलते समय अपनी पीठ देना नहीं, किन्तु देव के सन्मुख होकर द्वार का उल्लंघन करना । 187 In temples dedicated to the Jain devas the back (of a devotee) should never be presented to the idol when holy verses are being recited or rituals conducted or worship being offered, and so forth. The devotee should face the deity and cross the doorway with reverence. (127). प्रणाल का दिशा नियम पूर्वापरे यदा द्वारं प्रणालं चोत्तरे शुभम् । प्रशस्तं सर्वदेवानामिति शास्त्रार्थनिश्चयः ॥ १२८॥ जो मंदिर पूर्व या ंपश्चिम दिशा के द्वार वाले हों तो उसमें पाणी निकालने की प्रणाली उत्तर दिशा में रखना शुभ है। सब देवों के लिये यह प्रशंसनीय है । ऐसा शास्त्रों का निश्चय है । If the door of a (Siva) temple faces eastwards or westwards the pranalam or water-channel should be towards the north. This is auspicious and is commended by all the gods. Such is the belief of the shastras (scriptures). (128). पिण्डिका लक्षण– लिङ्गायामपृथुक्लृप्तं पिण्डिकानां तु लक्षणम् । तत्रादौ ब्रह्मविष्णोश्च पिण्डिकामुच्छ्रयं विदुः ॥ जात्यैकया विधातव्यं नेष्टमन्योन्यसंकरम् ॥ १२९॥ शिव लिङ्ग की लंबाई के मान का पीठिका का विस्तार करना, पीठिका का आदि भाग ब्रह्मा और दूसरा विष्णु का जानना अर्थात् पीठिका की ऊँचाई विष्णु भाग तक समझना । शिव लिङ्ग और पीठिका एक जाति की बनाना, वर्ण शङ्कर बनाना इष्ट नहीं है I The signs for the pindika of a Siva-linga are as follows: The extent or width of the peethika ('scat' or base of a Siva-linga) should be the same as the length or height of the linga. The wisc know the first portion of the peethika as Brahma and the second

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