Book Title: Devta Murti Prakaran
Author(s): Vinaysagar, Bhagvandas Jain, Rima Jain
Publisher: Prakrit Bharati Academy

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Page 232
________________ 196 मुखलिङ्ग * "मुखलिङ्गं त्रिवक्त्रं स्यादेकवक्त्रं चतुर्मुखम् । सम्मुखं चैकवक्त्रं स्यात् त्रिवक्त्रे पृष्ठतो न हि ॥ १५३ ॥ पश्चिमास्यं स्थितं शुभं कुंकुमाभं तथोत्तरम् । याम्यं कृष्णकरालं च प्राच्यं दीप्ताग्निसन्निभम् ॥ १५४॥ मुखलिङ्ग तीन मुख वाला, एक मुख वाला या चार मुख वाला है। एक मुख वाला मुखलिङ्ग सन्मुख मुख वाला करना और तीन मुख वाले मुखलिङ्ग के पिछले भाग में मुख नहीं रखना। उसके तीनों दिशा में तीन मुखलिङ्ग करना । मुखलिङ्ग का पश्चिम मुख सफेद वर्ण का, उत्तर मुख कुंकुम वर्ण का, दक्षिण. दिशा का मुख कराल काले वर्ण का और पूर्व दिशा का मुखं प्रकाशमान अग्नि के जैसा वर्ण वाला है। Mukha-linga— देवतामूर्ति-प्रकरणम् Mukha-lingas may have three faces, or only one face, or even four. A single-faced Mukha-linga should face the devotee. A Mukha-linga with three faces should definitely not have a face at the back (i.e. looking towards the rear or back). (153). The westwards facing visage is white in colour, while one facing the north is the colour of kumkum (vermillion), one facing the south is dark and formidably dreadful, and one facing the east glows brightly like fire. (154). मुखलिङ्गनाम सद्यो वामं तथा घोरं पुरुषं च चतुर्थकम् । पञ्चमं च तथेशानं योगिनामप्यगोचरम् ॥ १५५ ॥ इति पीठिका मुखलिङ्गाधिकारः । **. यह पूर्वार्द्ध मु. में नहीं है. रूपमण्डन में है।

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